भारत में किसानों को यूरिया अपेक्षाकृत बहुत कम कीमत पर मिलता है। बाजार में यूरिया की वास्तविक उत्पादन या आयात लागत इससे काफी अधिक हो सकती है, लेकिन किसान को 45 किलोग्राम की बोरी के लिए निर्धारित कीमत ही चुकानी पड़ती है। इसके पीछे केंद्र सरकार की व्यापक उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था काम करती है।
सरकार यूरिया को किसानों के लिए सस्ता रखने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करती है कि देश में इसकी पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। इसके लिए घरेलू उत्पादन, आयात, कंपनियों की लागत और किसानों को मिलने वाली कीमत के बीच का अंतर सरकार की ओर से काफी हद तक संभाला जाता है।
यूरिया की किसान कीमत कितनी होती है?
भारत में नीम-कोटेड यूरिया की 45 किलोग्राम बोरी की अधिकतम खुदरा कीमत लंबे समय से करीब ₹266.50 रखी गई है। इसमें नीम कोटिंग से जुड़े शुल्क और करों को मिलाकर किसान के लिए कीमत बाजार की वास्तविक लागत की तुलना में काफी कम रहती है।
यही वजह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक गैस, ऊर्जा, समुद्री परिवहन या यूरिया की कीमत बढ़ती है, तब भी किसान को यूरिया की कीमत में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं दिखाई देती।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य खेती की लागत को नियंत्रित रखना और किसानों को समय पर नाइट्रोजन उर्वरक उपलब्ध कराना है।
असली लागत और किसान की कीमत में बड़ा अंतर
यूरिया बनाने में प्राकृतिक गैस, बिजली, पानी, परिवहन और संयंत्र संचालन जैसी लागत शामिल होती है। आयातित यूरिया के मामले में अंतरराष्ट्रीय कीमत, जहाज से ढुलाई, बंदरगाह खर्च और देश के अंदर परिवहन की लागत भी जुड़ती है।
अगर किसी समय यूरिया की वास्तविक लागत ₹1,000 या उससे अधिक प्रति बोरी के बराबर बैठती है, लेकिन किसान से लगभग ₹267 ही लिया जाता है, तो बाकी राशि का बड़ा हिस्सा सरकारी सहायता के माध्यम से समायोजित किया जाता है।
यही अंतर मूल रूप से यूरिया सब्सिडी व्यवस्था का आधार है।
सरकार सब्सिडी देती कैसे है?
यूरिया के मामले में सरकार की व्यवस्था अन्य उर्वरकों से कुछ अलग है। यूरिया नियंत्रित मूल्य व्यवस्था के तहत आता है। सरकार इसकी अधिकतम खुदरा कीमत तय करती है और उत्पादकों को उनकी निर्धारित लागत तथा अनुमोदित कीमत के आधार पर भुगतान किया जाता है।
सरल शब्दों में समझें तो पूरी प्रक्रिया कुछ इस तरह काम करती है:
उत्पादन या आयात → सरकार द्वारा व्यवस्था → उर्वरक कंपनियां → डीलर/वितरक → किसान
किसान निर्धारित कीमत पर यूरिया खरीदता है। वास्तविक लागत और किसान से प्राप्त राशि के बीच का अंतर सरकार की सब्सिडी व्यवस्था से पूरा किया जाता है।
इससे किसान को अंतरराष्ट्रीय बाजार की पूरी कीमत नहीं चुकानी पड़ती।
घरेलू यूरिया पर सब्सिडी
भारत में कई कंपनियां घरेलू स्तर पर यूरिया का उत्पादन करती हैं। उत्पादन की लागत सभी संयंत्रों में समान नहीं होती। पुराने और नए संयंत्रों की ऊर्जा दक्षता अलग-अलग हो सकती है।
सरकार उत्पादन लागत और निर्धारित नीति के अनुसार कंपनियों को सब्सिडी उपलब्ध कराती है। इसका उद्देश्य यह है कि किसान तक यूरिया नियंत्रित कीमत पर पहुंचता रहे और कंपनियों को उत्पादन जारी रखने में आर्थिक व्यवहार्यता बनी रहे।
सरकार ने पिछले वर्षों में यूरिया उत्पादन बढ़ाने के लिए नए संयंत्रों और मौजूदा संयंत्रों के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया है। इससे घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है।
आयातित यूरिया पर भी सरकार का खर्च
भारत अपनी जरूरत का पूरा यूरिया घरेलू उत्पादन से पूरा नहीं करता। जब घरेलू उत्पादन मांग से कम होता है तो सरकार को विदेशों से यूरिया आयात करना पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत कई बार भारत में निर्धारित किसान कीमत से कई गुना अधिक हो सकती है। इसके बावजूद किसान को निर्धारित खुदरा कीमत पर ही यूरिया मिलता है।
इस अंतर को संभालने के लिए सरकार आयात और वितरण व्यवस्था पर खर्च करती है। इसलिए वैश्विक बाजार में यूरिया महंगा होने पर सरकार का वित्तीय बोझ बढ़ सकता है, लेकिन किसान पर उसका पूरा बोझ तुरंत नहीं डाला जाता।
सब्सिडी का पैसा आखिर जाता किसके पास है?
एक आम सवाल यह है कि जब किसान केवल ₹266.50 के आसपास भुगतान करता है तो सब्सिडी किसे मिलती है?
व्यवस्था में सरकार उर्वरक कंपनियों को उनकी पात्रता के अनुसार सब्सिडी/भुगतान करती है। यानी किसान को सीधे उसके बैंक खाते में यूरिया सब्सिडी की रकम नहीं मिलती। किसान को लाभ सस्ती कीमत के रूप में मिलता है।
इस मॉडल को इस तरह समझ सकते हैं:
वास्तविक लागत – किसान से प्राप्त कीमत = सरकार द्वारा वहन किया जाने वाला अंतर
हालांकि वास्तविक सरकारी भुगतान की गणना इससे अधिक जटिल होती है और इसमें उत्पादन लागत, आयात लागत, माल ढुलाई, विभिन्न नीति प्रावधान तथा अन्य अनुमोदित खर्च शामिल हो सकते हैं।
DBT से कैसे जुड़ी है व्यवस्था?
उर्वरक क्षेत्र में सरकार ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी DBT प्रणाली लागू की है। लेकिन यहां DBT को सामान्य कल्याणकारी योजनाओं की तरह नहीं समझना चाहिए, जिसमें सरकार सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में पैसा भेजती है।
उर्वरक DBT व्यवस्था में किसान द्वारा खरीद किए जाने के बाद बिक्री का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होता है। खुदरा विक्रेता के स्तर पर पॉइंट ऑफ सेल मशीन के जरिए बिक्री दर्ज की जाती है। इसके आधार पर संबंधित उर्वरक कंपनी के लिए सब्सिडी भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह पता लगाना है कि सब्सिडी वाला उर्वरक वास्तव में किस मात्रा में और कहां बेचा गया।
दूसरी खाद और यूरिया में अंतर
यूरिया की कीमत को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सभी उर्वरकों पर एक जैसी सब्सिडी व्यवस्था लागू नहीं होती।
डीएपी, एमओपी और एनपीके जैसे गैर-यूरिया उर्वरकों के लिए सरकार पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी NBS व्यवस्था का इस्तेमाल करती है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों के आधार पर सब्सिडी निर्धारित की जाती है।
यूरिया के लिए अलग मूल्य नियंत्रण व्यवस्था होने के कारण किसान को इसकी कीमत अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
यही कारण है कि बाजार में यूरिया और डीएपी की कीमतों की तुलना करने पर दोनों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे सकता है।
सरकार पर कितना वित्तीय बोझ पड़ता है?
उर्वरक सब्सिडी केंद्र सरकार के बड़े खर्चों में शामिल है। हर साल बजट में इसके लिए बड़ी राशि रखी जाती है। वैश्विक बाजार में गैस और उर्वरकों की कीमत बढ़ने पर सब्सिडी बिल भी बढ़ सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया महंगा हो जाए और भारत को अधिक कीमत पर आयात करना पड़े, लेकिन घरेलू किसान कीमत में बदलाव न किया जाए, तो उस अंतर का बड़ा हिस्सा सरकारी वित्त पर आ सकता है।
इसीलिए उर्वरक सब्सिडी केवल किसानों के लिए सस्ती खाद उपलब्ध कराने की योजना नहीं है, बल्कि यह सरकार की खाद्य सुरक्षा और कृषि नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सस्ती यूरिया का दूसरा पहलू भी है
सस्ती यूरिया व्यवस्था किसानों के लिए काफी फायदेमंद है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। यूरिया अपेक्षाकृत सस्ता होने के कारण कई बार किसान इसका जरूरत से अधिक इस्तेमाल कर लेते हैं।
फसल को नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व संतुलित मात्रा में चाहिए। केवल यूरिया का अधिक इस्तेमाल मिट्टी के पोषक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
इसीलिए सरकार अब संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी जांच और वैकल्पिक पोषक तत्वों के इस्तेमाल पर भी जोर देती है।
आगे सरकार की चुनौती क्या है?
आने वाले वर्षों में सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां रहेंगी। पहली, किसानों को उचित कीमत पर पर्याप्त यूरिया उपलब्ध कराना और दूसरी, सब्सिडी के बढ़ते वित्तीय बोझ को नियंत्रित रखना।
इसके लिए घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ाना, ऊर्जा दक्षता सुधारना, आयात स्रोतों में विविधता लाना और वितरण व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव का असर भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में यूरिया की कीमत कम रहने के पीछे मुख्य कारण सरकार की सब्सिडी और नियंत्रित मूल्य व्यवस्था है। किसान को 45 किलोग्राम की बोरी के लिए लगभग ₹266.50 के आसपास निर्धारित कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि यूरिया की वास्तविक उत्पादन या आयात लागत इससे काफी अधिक हो सकती है।
इस अंतर को सरकार की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था संभालती है। घरेलू उत्पादन, आयात, कंपनियों को भुगतान, DBT आधारित बिक्री रिकॉर्ड और सरकारी निगरानी—ये सभी मिलकर इस व्यवस्था को चलाते हैं।
यानी किसान को सस्ती यूरिया मिलने का मतलब यह नहीं है कि यूरिया वास्तव में सस्ता बन रहा है। वास्तविक लागत का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है, ताकि खेती की लागत नियंत्रित रहे, किसानों को समय पर खाद मिले और देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत बनी रहे।

