भारत में खरीफ और रबी सीजन की जरूरतों को देखते हुए डाय-अमोनियम फॉस्फेट यानी DAP की अंतरराष्ट्रीय खरीद पर बाजार की नजर बनी हुई है। देश में DAP की मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों, समुद्री परिवहन, कच्चे माल की उपलब्धता और प्रमुख निर्यातक देशों की नीतियों में बदलाव का सीधा असर भारत की खाद आपूर्ति रणनीति पर पड़ता है। सरकार और भारतीय उर्वरक कंपनियां अब केवल तत्काल जरूरत के लिए खरीद करने के बजाय लंबी अवधि के समझौतों और अलग-अलग देशों से आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दे रही हैं।
DAP के लिए आयात पर निर्भर भारत
DAP भारत की प्रमुख फॉस्फेटिक खादों में शामिल है। इसमें नाइट्रोजन और फॉस्फोरस दोनों पोषक तत्व होते हैं, इसलिए गेहूं, धान, मक्का, दलहन और कई अन्य फसलों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। घरेलू स्तर पर फॉस्फेटिक खादों का उत्पादन होने के बावजूद भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, रबी 2025-26 में 1 अक्टूबर 2025 से 23 मार्च 2026 के बीच DAP की आवश्यकता 52.80 लाख टन थी, जबकि इस अवधि में 74.74 लाख टन उपलब्धता दर्ज की गई। बिक्री 52.94 लाख टन रही और 23 मार्च को 21.80 लाख टन का भंडार उपलब्ध था।
इससे पता चलता है कि सरकार ने मांग के मुकाबले पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध रखने की कोशिश की है। हालांकि, इसके लिए घरेलू उत्पादन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगातार खरीद जरूरी रहती है।
चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश
भारत की DAP खरीद रणनीति में चीन की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। लेकिन चीन की निर्यात नीतियों में बदलाव के कारण भारत के लिए एक ही स्रोत पर अत्यधिक निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो गया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत ने चीन से 2023-24 में 22.28 लाख टन DAP आयात किया था। 2024-25 में यह मात्रा घटकर 8.47 लाख टन रह गई।
इस बदलाव के बाद भारत ने DAP के लिए दूसरे प्रमुख उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालीन आपूर्ति समझौते बढ़ाने शुरू किए हैं। इसका उद्देश्य यह है कि किसी एक देश की निर्यात नीति या वैश्विक संकट के कारण भारत में DAP की उपलब्धता प्रभावित न हो।
सऊदी अरब और मोरक्को पर बढ़ा भरोसा
भारत की मौजूदा रणनीति में सऊदी अरब और मोरक्को की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। सरकार ने भारतीय उर्वरक कंपनियों के माध्यम से सऊदी अरब की कंपनी माअदेन के साथ पांच साल की अवधि के लिए DAP और NPK की आपूर्ति के समझौते की सुविधा दी है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, 2025-26 से 2029-30 तक हर साल 31 लाख टन DAP/NPK की आपूर्ति के लिए दीर्घकालीन समझौता किया गया है। इसके अलावा मोरक्को से भी 25 लाख टन DAP/TSP की आपूर्ति के लिए व्यवस्था की गई है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत को हर बार तत्काल बाजार भाव पर पूरी मात्रा खरीदने की जरूरत कम हो सकती है। लंबे समय के समझौते आपूर्ति की निश्चितता बढ़ाते हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं।
रूस भी बना अहम आपूर्तिकर्ता
भारत ने DAP और दूसरे फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए रूस के साथ भी आपूर्ति संबंध मजबूत किए हैं। सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार रूस से DAP/NPK की करीब 30.10 लाख टन वार्षिक आपूर्ति के लिए समझौते किए गए हैं।
सितंबर 2026 में रूसी उर्वरक उद्योग की ओर से भी भारत को आपूर्ति बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई है। रूस से भारत को 2026 की पहली छमाही में कुल 28 लाख टन उर्वरक की आपूर्ति होने की जानकारी सामने आई है।
इससे भारत की रणनीति में रूस का महत्व समझा जा सकता है। हालांकि DAP की आपूर्ति में अलग-अलग देशों की हिस्सेदारी उत्पाद, अनुबंध और बाजार परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।
वैश्विक कीमतों पर क्यों है नजर?
भारत के लिए DAP खरीद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कीमत है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत कई कारकों से प्रभावित होती है। इनमें फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और सल्फर जैसे कच्चे माल की कीमत, प्राकृतिक गैस की लागत, समुद्री मालभाड़ा, ऊर्जा कीमतें और प्रमुख उत्पादक देशों की निर्यात नीति शामिल हैं।
यदि कच्चे माल की कीमत बढ़ती है तो DAP की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। इसी तरह समुद्री मार्गों में व्यवधान आने पर मालभाड़ा बढ़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान भारत की उर्वरक आपूर्ति पर समुद्री मार्गों को लेकर चिंता बढ़ी थी। सरकार ने उस समय कई जहाजों के सुरक्षित मार्ग और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों के जरिए खाद उपलब्धता बनाए रखने की जानकारी दी थी।
इसलिए भारत के लिए केवल DAP की अंतरराष्ट्रीय कीमत देखना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लागत में समुद्री परिवहन, बीमा, बंदरगाह शुल्क और अन्य आयात संबंधी खर्च भी शामिल होते हैं।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती कीमत और उपलब्धता का संतुलन
भारत में किसानों को DAP अपेक्षाकृत नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत लगातार बदलती रहती है। ऐसे में यदि वैश्विक कीमत बढ़ती है तो सरकार और उर्वरक कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
यही कारण है कि सरकार की रणनीति में पहले से खरीद, भंडारण और दीर्घकालीन समझौतों को महत्व दिया जा रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक कीमत बढ़ने की स्थिति में तत्काल खरीद का दबाव कुछ कम किया जा सकता है।
सरकार ने पहले भी कहा है कि उर्वरक की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए घरेलू उत्पादन, आयात और वितरण को एक साथ समन्वित किया जा रहा है। जुलाई 2026 की सरकारी जानकारी के अनुसार 2 जुलाई तक देश में DAP का उपलब्ध भंडार 16.64 लाख टन था।
समुद्री मार्ग भी बन रहे हैं रणनीति का हिस्सा
भारत की DAP जरूरत का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्ग से पूरा होता है। इसलिए बंदरगाहों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की स्थिति भी खरीद रणनीति को प्रभावित करती है।
पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य और दूसरे समुद्री मार्गों को लेकर जोखिम सामने आया। ऐसी स्थिति में भारत के लिए अलग-अलग देशों से खाद खरीदना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अलग-अलग आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित रखना भी जरूरी हो जाता है।
विशेषज्ञों ने भी भारत के लिए स्रोतों और मार्गों दोनों में विविधता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। मोरक्को से खरीद बढ़ाना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत की DAP खरीद रणनीति का सीधा असर किसानों पर पड़ता है। यदि सरकार समय रहते पर्याप्त मात्रा में DAP उपलब्ध करा लेती है तो बुवाई के समय बाजार में कमी की स्थिति बनने की संभावना कम होती है।
पर्याप्त आयात और भंडार रहने से राज्यों को जरूरत के अनुसार खाद भेजना आसान होता है। इससे किसानों को लंबी दूरी तय करके खाद लेने या निजी बाजार में अधिक कीमत चुकाने का जोखिम कम हो सकता है।
हालांकि केवल DAP की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं है। खाद का वितरण समय पर होना, राज्यों में पर्याप्त भंडार रहना और खुदरा स्तर पर निर्धारित व्यवस्था के अनुसार बिक्री होना भी उतना ही जरूरी है।
आगे क्या होगी भारत की रणनीति?
आने वाले समय में भारत की DAP खरीद रणनीति तीन प्रमुख आधारों पर आगे बढ़ सकती है। पहला, आयात स्रोतों में विविधता। दूसरा, दीर्घकालीन समझौतों के जरिए पहले से मात्रा सुरक्षित करना। तीसरा, घरेलू स्तर पर फॉस्फेटिक खाद उत्पादन और वैकल्पिक खादों की उपलब्धता बढ़ाना।
चीन से आयात में उतार-चढ़ाव के बीच सऊदी अरब, मोरक्को और रूस जैसे देशों के साथ समझौते भारत को अधिक विकल्प दे रहे हैं। इससे किसी एक देश पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, भारत की DAP खरीद अब केवल कीमत के आधार पर होने वाली खरीद नहीं रह गई है। इसमें वैश्विक आपूर्ति, भू-राजनीतिक परिस्थितियां, समुद्री मार्ग, कच्चे माल की लागत और किसानों की घरेलू मांग सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार की नजर भारत की अगली DAP खरीद पर बनी हुई है। यदि भारत समय रहते पर्याप्त मात्रा में DAP सुरक्षित कर लेता है और आयात स्रोतों को लगातार विविध बनाता रहता है, तो वैश्विक बाजार में अचानक आने वाले झटकों का असर घरेलू किसानों पर सीमित रखने में मदद मिल सकती है।

