वैश्विक उर्वरक बाजार में एक बार फिर यूरिया की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जारी व्यवधान ने मध्य-पूर्व से होने वाली उर्वरक आपूर्ति को प्रभावित किया है। 18 सितंबर 2026 को समाप्त सप्ताह के वैश्विक बाजार अपडेट के अनुसार, प्रमुख आयातक क्षेत्रों में यूरिया की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। हालांकि चीन से अतिरिक्त निर्यात की संभावना बाजार को कुछ राहत दे रही है, लेकिन उपलब्ध माल की कमी और समुद्री परिवहन में अनिश्चितता के कारण बाजार में तेजी का दबाव बना हुआ है। (Get The Word Out)
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी के देशों से यूरिया, अमोनिया और अन्य उर्वरकों की बड़ी मात्रा इसी क्षेत्र से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती है। मौजूदा संकट के कारण इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी नीचे बनी हुई है। 18 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, 17 सितंबर को केवल चार कमोडिटी जहाजों ने हॉर्मुज पार किया, जबकि 10 दिनों का औसत करीब 16 जहाज प्रतिदिन था। (Reuters)
यूरिया के दाम में फिर तेजी
वैश्विक बाजार के ताजा साप्ताहिक आकलन में यूरिया बाजार का रुख ‘फर्म टू राइजिंग’ यानी मजबूत से बढ़ती कीमतों की ओर बताया गया है। चीन की प्रिल्ड यूरिया कीमत करीब 370 डॉलर प्रति टन एफओबी, जबकि ग्रैन्युलर यूरिया करीब 430 डॉलर से ऊपर प्रति टन एफओबी बताई गई है। मध्य-पूर्व की ग्रैन्युलर यूरिया कीमत लगभग 470-480 डॉलर प्रति टन एफओबी तक पहुंच गई है। उत्तर अफ्रीका में कीमतें करीब 518-550 डॉलर और ब्राजील में कीमत लगभग 500 डॉलर प्रति टन सीएफआर के आसपास बताई गई है। (Get The Word Out)
इस तेजी का सबसे बड़ा कारण मांग में अचानक उछाल नहीं, बल्कि उपलब्ध आपूर्ति और उसे बाजार तक पहुंचाने की क्षमता है। बाजार विश्लेषकों के अनुसार, हॉर्मुज के आसपास करीब 6 लाख टन यूरिया जहाजों पर फंसा होने की रिपोर्ट है। केवल कभी-कभार कुछ जहाजों के निकल पाने के कारण आयातकों के बीच उपलब्ध माल के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। (Get The Word Out)
ब्राजील में 80 डॉलर प्रति टन तक बढ़ी कीमत
हॉर्मुज संकट का असर अलग-अलग देशों में अलग स्तर पर दिखाई दे रहा है। ब्राजील में हाल के सप्ताहों में यूरिया की सीएफआर कीमत में 80 डॉलर प्रति टन से अधिक की वृद्धि हुई है। ईरान से मिलने वाली अपेक्षाकृत सस्ती आपूर्ति के बाजार से बाहर होने के बाद ब्राजील के खरीदार अब अन्य स्रोतों की ओर देख रहे हैं। इससे गैर-चीनी उत्पादकों को ऊंची कीमत पर यूरिया बेचने का अवसर मिला है। (Get The Word Out)
अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका असर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्राजील दुनिया के बड़े उर्वरक आयातकों में शामिल है। वहां की खरीद गतिविधि बढ़ने पर उपलब्ध वैश्विक माल पर दबाव और बढ़ सकता है। आने वाले महीनों में दक्षिण अमेरिका की कृषि मांग और उत्तरी गोलार्ध में शरद ऋतु की उर्वरक मांग बाजार को और प्रभावित कर सकती है। (IFPRI)
चीन बना बाजार के लिए महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता
हॉर्मुज संकट के बीच चीन की भूमिका वैश्विक यूरिया बाजार में तेजी से महत्वपूर्ण हुई है। चीन ने 2026 की पहली छमाही में करीब 28 लाख टन नाइट्रोजन उर्वरक का निर्यात किया, जो पिछले साल की समान अवधि से लगभग 47 प्रतिशत अधिक था। भारत समेत कई देशों ने चीन से अधिक उर्वरक खरीदा है। (IFPRI)
ताजा बाजार रिपोर्ट में चीन से यूरिया के अतिरिक्त निर्यात की संभावना भी बताई गई है। चीन के निर्यात कोटा की एक और खेप करीब 10 लाख टन बताई गई है और कुल उपलब्धता आगे चलकर 15-20 लाख टन तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। यदि यह माल अंतरराष्ट्रीय बाजार में समय पर पहुंचता है तो इससे आपूर्ति का दबाव कुछ कम हो सकता है। (Get The Word Out)
भारत के लिए यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है। भारत दुनिया के बड़े यूरिया आयातकों में शामिल है और घरेलू उत्पादन के बावजूद अपनी जरूरत का एक हिस्सा आयात से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता और कीमतों में बदलाव का असर भारत की आयात रणनीति तथा उर्वरक सब्सिडी पर पड़ सकता है।
भारत के लिए स्थिति थोड़ी अलग
भारत में यूरिया की स्थिति को वैश्विक बाजार की तेजी से सीधे जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। अगस्त 2026 में भारत में यूरिया की खपत करीब 42.1 लाख टन रही, जो अगस्त 2025 के 49.6 लाख टन से कम है। कमजोर मानसून और कम कृषि गतिविधि का असर मांग पर पड़ा है। (Get The Word Out)
इसके साथ ही भारत ने वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से खरीद बढ़ाई है। हॉर्मुज मार्ग से मध्य-पूर्वी देशों की आपूर्ति प्रभावित होने के बाद चीन, मिस्र, वियतनाम और रूस जैसे देशों से आयात बढ़ा है। IFPRI के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में भारत का नाइट्रोजन उर्वरक आयात पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 52 प्रतिशत बढ़कर 11 लाख टन से अधिक हो गया। (IFPRI)
भारत के लिए यह रणनीति आपूर्ति बनाए रखने में मददगार हो सकती है, लेकिन लंबी अवधि में वैकल्पिक स्रोतों से माल मंगाने पर माल ढुलाई, बीमा और अन्य लॉजिस्टिक लागत बढ़ सकती है।
यूरिया के साथ अमोनिया बाजार भी प्रभावित
हॉर्मुज संकट का असर केवल यूरिया तक सीमित नहीं है। अमोनिया बाजार में भी क्षेत्रीय स्तर पर बदलाव दिखाई दे रहे हैं। यूरोप में प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों के कारण कुछ उत्पादन इकाइयों की परिचालन दर प्रभावित हुई है। इससे यूरोप में आयात की जरूरत बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय अमोनिया कारोबार का रुख यूरोप की ओर हो रहा है। (Get The Word Out)
यदि यूरोप, ब्राजील और अन्य बड़े खरीदार एक ही समय में बाजार से माल खरीदते हैं तो उपलब्ध उर्वरक की मात्रा पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में यूरिया के अलावा अमोनिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं।
DAP और फॉस्फेट उर्वरकों की चुनौती अलग
वैश्विक उर्वरक बाजार में फॉस्फेट उर्वरकों की स्थिति यूरिया से अलग है। यहां सबसे बड़ी चिंता सल्फर की उपलब्धता और कीमत को लेकर है। सल्फर फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन का महत्वपूर्ण कच्चा माल है। IFPRI के अनुसार, 2026 की शुरुआत से सल्फर की कीमत दोगुने से अधिक हो चुकी है और हॉर्मुज बंद होने के बाद इसमें 40 प्रतिशत से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि हुई है। (IFPRI)
इसका असर DAP और MAP जैसे फॉस्फेट उर्वरकों की उत्पादन लागत पर पड़ सकता है। 18 सितंबर तक के बाजार आकलन में भारत के लिए DAP कीमत करीब 895-915 डॉलर प्रति टन सीएफआर बताई गई है। (Get The Word Out)
इस तरह वैश्विक उर्वरक बाजार में इस समय दो अलग दबाव दिखाई दे रहे हैं—नाइट्रोजन क्षेत्र में हॉर्मुज के कारण आपूर्ति और परिवहन की समस्या तथा फॉस्फेट क्षेत्र में सल्फर की ऊंची लागत।
आगे क्या होगा?
आने वाले समय में यूरिया बाजार की दिशा मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करेगी। पहला, हॉर्मुज जलडमरूमध्य से नियमित जहाजों की आवाजाही कब सामान्य होती है। दूसरा, चीन से अतिरिक्त यूरिया निर्यात कितनी मात्रा में और कितनी तेजी से बाजार में आता है। तीसरा, भारत, ब्राजील और अन्य बड़े आयातक देशों की आगामी खरीद कितनी रहती है।
IFPRI के अनुसार, इस साल यूरिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों की कीमतें मई के अंत के मुकाबले 25-45 प्रतिशत तक नीचे भी आई थीं, लेकिन अगर हॉर्मुज में व्यवधान लंबे समय तक जारी रहता है और उत्तरी गोलार्ध में मौसमी मांग बढ़ती है तो कीमतों में फिर वृद्धि हो सकती है। (IFPRI)
इसलिए मौजूदा स्थिति को केवल तत्काल यूरिया संकट के रूप में देखना सही नहीं होगा। अभी वैश्विक बाजार में पर्याप्त वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता मौजूद हैं, लेकिन उर्वरक को उत्पादन केंद्र से आयातक देश तक सुरक्षित और कम लागत में पहुंचाना बड़ी चुनौती बन गया है। लंबे समय तक परिवहन बाधित रहने पर इसका असर आयात लागत, सरकारी सब्सिडी और अंततः किसानों के लिए उर्वरक उपलब्धता पर पड़ सकता है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि रबी सीजन से पहले यूरिया, DAP और अन्य प्रमुख उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने की स्थिति में घरेलू बाजार में किसानों पर तत्काल पूरा बोझ डालने के बजाय सरकार को आयात स्रोतों में विविधता, अग्रिम खरीद और पर्याप्त बफर स्टॉक पर ध्यान देना होगा।

