भारतीय उर्वरक उद्योग के सामने एक के बाद एक नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के बाद अब सल्फर की बढ़ती कीमत और उपलब्धता ने चिंता बढ़ा दी है। सल्फर उर्वरक उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है और इसकी कीमत में बदलाव का असर डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) और कई जटिल उर्वरकों की उत्पादन लागत पर पड़ सकता है।
वैश्विक बाजार में सल्फर की आपूर्ति और कीमतों पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव तथा रूस-यूक्रेन संघर्ष का असर बताया जा रहा है। इन क्षेत्रों से जुड़ी ऊर्जा और रासायनिक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी तरह की बाधा का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकता है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी सल्फर जरूरत के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है।
उर्वरक उत्पादन में क्यों महत्वपूर्ण है सल्फर
सल्फर को केवल एक औद्योगिक कच्चे माल के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह कई प्रमुख उर्वरकों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फॉस्फोरिक एसिड के निर्माण की प्रक्रिया में सल्फ्यूरिक एसिड की जरूरत होती है और सल्फर इसके उत्पादन का प्रमुख आधार है। इसी कारण सल्फर की कीमत और उपलब्धता का संबंध DAP तथा अन्य फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की लागत से भी जुड़ जाता है।
SSP के उत्पादन में भी सल्फ्यूरिक एसिड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके अलावा कई जटिल और मिश्रित उर्वरकों की उत्पादन प्रक्रिया में सल्फर से जुड़े कच्चे माल की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर महंगा होता है तो इसका सीधा असर उर्वरक कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है।
किसानों के लिए भी सल्फर एक आवश्यक पोषक तत्व है। यह पौधों में प्रोटीन निर्माण, एंजाइम गतिविधियों और कई महत्वपूर्ण जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। तिलहन, दलहन और कुछ अन्य फसलों में सल्फर की पर्याप्त उपलब्धता उत्पादन और गुणवत्ता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
आयात पर निर्भरता बढ़ाती है जोखिम
भारत में उर्वरक क्षेत्र की एक बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता है। देश में उर्वरकों का उत्पादन होता है, लेकिन कई महत्वपूर्ण कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। सल्फर भी इसी श्रेणी में आता है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें सामान्य रहती हैं तो आयात के जरिए घरेलू जरूरत पूरी करना अपेक्षाकृत आसान होता है। लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री परिवहन में बाधा, ऊर्जा कीमतों में बदलाव या प्रमुख उत्पादक देशों से निर्यात में कमी जैसी परिस्थितियां आयात लागत को तेजी से प्रभावित कर सकती हैं।
इसका असर केवल सल्फर तक सीमित नहीं रहता। यदि कच्चे माल की कीमत बढ़ती है तो उर्वरक निर्माण की कुल लागत बढ़ सकती है। इसके बाद कंपनियों की लागत, आयात सौदों और सरकारी सब्सिडी व्यवस्था पर भी दबाव बन सकता है।
पश्चिम एशिया संकट का असर
पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा और रासायनिक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर तेल, गैस और विभिन्न रासायनिक उत्पादों की आपूर्ति तथा परिवहन प्रभावित हो सकता है। उर्वरक उद्योग के लिए यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा और रासायनिक कच्चे माल दोनों उत्पादन लागत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है और परिवहन मार्गों पर जोखिम बढ़ता है तो जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत और माल ढुलाई खर्च प्रभावित हो सकते हैं। इससे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए वास्तविक लागत बढ़ सकती है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष भी वैश्विक उर्वरक बाजार के लिए लंबे समय से एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। रूस कृषि उर्वरकों और उनसे जुड़े कच्चे माल के वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। इसलिए वहां उत्पादन, निर्यात या परिवहन से संबंधित किसी भी बदलाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ सकता है।
DAP की लागत पर पड़ सकता है असर
सल्फर की बढ़ती लागत की सबसे बड़ी चिंता DAP और अन्य फॉस्फेट उर्वरकों को लेकर है। DAP के उत्पादन में फॉस्फोरिक एसिड और अमोनिया जैसे प्रमुख कच्चे माल की आवश्यकता होती है। फॉस्फोरिक एसिड के निर्माण में सल्फ्यूरिक एसिड महत्वपूर्ण है और सल्फर इस प्रक्रिया का प्रमुख आधार है।
इसलिए सल्फर की कीमत में लगातार वृद्धि होने पर DAP की अंतरराष्ट्रीय उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है। भारत बड़ी मात्रा में DAP का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने पर घरेलू उर्वरक व्यवस्था के सामने लागत और उपलब्धता दोनों से जुड़ी चुनौती पैदा हो सकती है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमत बढ़ने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि किसान के लिए उर्वरक की खुदरा कीमत भी उसी अनुपात में बढ़े। भारत में कई प्रमुख उर्वरकों की कीमतों को किसानों के लिए नियंत्रित और सुलभ रखने के लिए सरकार सब्सिडी व्यवस्था के माध्यम से हस्तक्षेप करती है।
SSP और जटिल उर्वरकों पर भी दबाव
सल्फर की कीमत बढ़ने से DAP के अलावा SSP और कई जटिल उर्वरकों पर भी असर पड़ सकता है। SSP में फॉस्फोरस के साथ सल्फर भी उपलब्ध होता है। भारत में तिलहन और अन्य फसलों के लिए सल्फर युक्त उर्वरकों की मांग बनी रहती है।
जटिल उर्वरकों के उत्पादन में भी अलग-अलग पोषक तत्वों के स्रोतों की आवश्यकता होती है। कच्चे माल की कीमत बढ़ने से इन उर्वरकों की उत्पादन लागत में बदलाव आ सकता है। इसका प्रभाव कंपनियों के आयात निर्णय, उत्पादन योजना और बाजार में उपलब्धता पर पड़ सकता है।
इस स्थिति में उर्वरक कंपनियों के लिए समय पर कच्चे माल की खरीद और पर्याप्त भंडार बनाए रखना महत्वपूर्ण हो जाता है। खासकर रबी सीजन से पहले उपलब्धता सुनिश्चित करना उद्योग और सरकार दोनों के लिए प्राथमिकता बन सकता है।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है
किसानों के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण सवाल उर्वरक की उपलब्धता और कीमत का है। यदि वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो उर्वरक कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इससे आयात और घरेलू उत्पादन की योजना प्रभावित होने की संभावना रहती है।
हालांकि इसका तत्काल असर किसान स्तर पर दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। सरकार के पास सब्सिडी, आयात व्यवस्था और घरेलू उपलब्धता के माध्यम से कीमतों और आपूर्ति को संभालने के कई साधन हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर महंगा होने और किसानों को उसी अनुपात में महंगा उर्वरक मिलने के बीच सीधा संबंध नहीं माना जाना चाहिए।
फिर भी लंबे समय तक ऊंची कीमतें रहने पर सरकारी उर्वरक सब्सिडी पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। सरकार को किसानों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने के साथ-साथ कंपनियों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता और आयात की व्यवहार्यता भी बनाए रखनी होगी।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने की जरूरत
सल्फर संकट ने एक बार फिर कृषि क्षेत्र में कच्चे माल के मामले में आत्मनिर्भरता की जरूरत को सामने ला दिया है। केवल तैयार उर्वरक का घरेलू उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उर्वरक निर्माण में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूत करना होगा।
सरकार और उद्योग को लंबी अवधि के आयात समझौतों, विभिन्न देशों से आपूर्ति स्रोत बढ़ाने, रणनीतिक भंडार और घरेलू उत्पादन क्षमता पर ध्यान देना होगा। किसी एक देश या सीमित क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसके साथ ही उर्वरक उपयोग में संतुलन पर जोर देना जरूरी है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों का उचित इस्तेमाल किया जाए तो किसान अनावश्यक लागत से बच सकते हैं और मिट्टी की उर्वरता भी बेहतर रख सकते हैं।
आगे की चुनौती
यूरिया के बाद सल्फर की कीमत और उपलब्धता से जुड़ी चिंता यह संकेत देती है कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भारतीय कृषि की लागत को कई स्तरों पर प्रभावित कर सकती हैं। खाद की कीमत केवल खेत में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद की कीमत से तय नहीं होती, बल्कि उसके पीछे कच्चे माल, ऊर्जा, परिवहन, विनिर्माण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की पूरी श्रृंखला काम करती है।
इसलिए आने वाले समय में भारत के लिए चुनौती केवल पर्याप्त DAP, SSP या जटिल उर्वरक उपलब्ध कराने की नहीं होगी, बल्कि इनके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की सुरक्षित और लागत-प्रभावी आपूर्ति सुनिश्चित करने की भी होगी।
सल्फर की मौजूदा स्थिति इसी व्यापक चुनौती की ओर संकेत करती है। यदि वैश्विक बाजार में अस्थिरता बनी रहती है तो भारत को दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों, घरेलू क्षमता, रणनीतिक भंडारण और वैकल्पिक स्रोतों पर समानांतर रूप से काम करना होगा। इससे किसानों के लिए उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने और कृषि लागत पर बाहरी झटकों के प्रभाव को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

