धान की कटाई का मौसम शुरू होते ही हरियाणा सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी की है। इस बार खेतों में आग की घटनाओं को रोकने के लिए जिला और ब्लॉक स्तर पर विशेष ‘पराली सुरक्षा बल’ या Parali Protection Force तैनात करने के साथ ड्रोन से निगरानी करने की योजना बनाई गई है।
सरकारी रणनीति का उद्देश्य केवल खेत में आग लगने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को पहले ही रोकना और किसानों को फसल अवशेष के वैकल्पिक प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित करना भी है। इसके लिए पुलिस, कृषि विभाग, प्रशासनिक अधिकारी, नोडल अधिकारी और अन्य संबंधित विभागों के कर्मचारियों के बीच समन्वय बढ़ाया जाएगा।
राज्य सरकार की यह तैयारी वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी Commission for Air Quality Management (CAQM) की उस व्यापक योजना से भी जुड़ी है, जिसमें 2026 के धान कटाई सीजन के दौरान पराली जलाने की घटनाओं को खत्म करने के लिए राज्यों को कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। CAQM की वेबसाइट पर मई 2026 में जारी Direction No. 99 में 2026 के लिए Paddy Stubble Burning की रोकथाम और नियंत्रण की कार्ययोजना का उल्लेख किया गया है।
क्या है ‘Drone Surveillance’?
हरियाणा में प्रस्तावित Parali Protection Force कोई अलग स्थायी पुलिस बल नहीं है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह जिला और ब्लॉक स्तर पर काम करने वाली संयुक्त निगरानी व्यवस्था होगी।
इसमें पुलिस कर्मचारियों के अलावा कृषि विभाग के अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, नोडल और क्लस्टर अधिकारी तथा अन्य संबंधित विभागों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे। इन टीमों की जिम्मेदारी पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने, संभावित घटनाओं को रोकने और सत्यापित मामले सामने आने पर संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने की होगी।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय स्तर पर सक्रिय निगरानी है। सरकार का मानना है कि केवल उपग्रह से मिलने वाली जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर अधिकारियों की मौजूदगी से किसी घटना की तेजी से पुष्टि की जा सकती है।यही वजह है कि Haryana Stubble Burning Control Plan में तकनीक और जमीनी निगरानी दोनों को एक साथ इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया है।
खेतों पर ड्रोन रखेंगे नजर
इस बार पराली प्रबंधन अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक Drone Surveillance for Stubble Burning है। राज्य सरकार DRIISHYA यानी Drone Imaging and Information Service of Haryana के साथ मिलकर पराली जलाने की घटनाओं की ड्रोन से निगरानी की दिशा में काम कर रही है। जिला उपायुक्तों को उन गांवों और क्षेत्रों की पहचान पहले से करने के लिए कहा गया है जहां ड्रोन उड़ाकर निगरानी की आवश्यकता होगी।
ड्रोन के इस्तेमाल से प्रशासन को खेतों की वास्तविक स्थिति देखने में मदद मिल सकती है। खासकर ऐसे बड़े कृषि क्षेत्रों में जहां प्रत्येक खेत तक लगातार प्रशासनिक टीम पहुंचाना कठिन हो सकता है, वहां ड्रोन निगरानी एक अतिरिक्त माध्यम के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है।
पानीपत में भी प्रशासन ने सितंबर से धान कटाई पूरी होने तक खेतों में real-time drone monitoring की तैयारी की है। स्थानीय स्तर पर यह व्यवस्था पराली जलाने की घटनाओं को पहचानने और संबंधित टीम तक सूचना पहुंचाने में मदद करेगी।
सैटेलाइट, ड्रोन और ग्राउंड टीम की संयुक्त निगरानी
हरियाणा में पराली जलाने पर रोक लगाने की नई रणनीति केवल ड्रोन तक सीमित नहीं है। निगरानी व्यवस्था में सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी, ड्रोन सर्विलांस और जमीन पर मौजूद अधिकारियों की रिपोर्ट को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। अभी तक खेतों में आग की घटनाओं की पहचान में सैटेलाइट आधारित fire counts महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। नई व्यवस्था में इसके साथ स्थानीय सत्यापन और ड्रोन से मिलने वाली जानकारी को भी जोड़ा जाएगा।
इसके पीछे एक व्यावहारिक वजह भी है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अधिकारियों के अनुसार कुछ मामलों में शाम या रात के समय पराली जलाने का प्रयास किया जाता है। इसलिए देर शाम और रात की गश्त बढ़ाने की योजना भी बनाई गई है।इस तरह Haryana Farm Fire Monitoring System तीन स्तरों पर काम कर सकता है:
- सैटेलाइट से संभावित खेत की आग की जानकारी
- ड्रोन के जरिए क्षेत्र की निगरानी
- नोडल अधिकारियों और अन्य स्थानीय टीमों द्वारा मौके पर सत्यापन
यह संयुक्त व्यवस्था गलत सूचना और वास्तविक आग की घटना के बीच अंतर करने में भी उपयोगी हो सकती है।
8 हजार से ज्यादा नोडल अधिकारी मैदान में
हरियाणा में पराली जलाने की रोकथाम के लिए बड़े स्तर पर गांवों में नोडल अधिकारी भी तैनात किए गए हैं।सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में फील्ड मॉनिटरिंग के लिए 8,134 village-level nodal officers लगाए गए हैं। राज्य में लगभग 5,600 गांवों के करीब 6.2 लाख पंजीकृत धान किसानों और लगभग 34.1 लाख एकड़ धान क्षेत्र का उल्लेख किया गया है। उस समय तक नोडल अधिकारियों की पहुंच करीब 6.04 लाख किसानों तक होने की जानकारी दी गई थी।स्थानीय स्तर पर भी अधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर रेवाड़ी में धान की खेती वाले गांवों में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने 132 नोडल अधिकारी नियुक्त किए हैं, जिनकी जिम्मेदारी पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने की है।इन अधिकारियों की भूमिका केवल कार्रवाई तक सीमित नहीं है। किसानों को पराली प्रबंधन के विकल्पों, उपलब्ध मशीनरी और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देना भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पराली जलाने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि सत्यापित stubble burning incidents को लेकर सख्ती बरती जाएगी।सितंबर 2026 में सामने आई कार्ययोजना के अनुसार सत्यापित मामले में FIR, चालान और किसान के भूमि रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ जैसी कार्रवाई शामिल है। इसके अलावा नियमों के मुताबिक पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि यानी Environmental Compensation Charge भी लगाई जा सकती है।यह व्यवस्था बताती है कि सरकार पराली प्रबंधन को केवल जागरूकता अभियान के रूप में नहीं देख रही। निगरानी, प्रोत्साहन और प्रवर्तन तीनों को एक साथ लागू करने का प्रयास किया जा रहा है।हालांकि इस रणनीति की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि किसानों को समय पर व्यवहारिक और किफायती विकल्प मिलते हैं या नहीं।
किसानों को पराली नहीं जलाने के लिए मिलेगा प्रोत्साहन
Crop Residue Management in Haryana में सरकार केवल दंडात्मक कार्रवाई पर निर्भर नहीं रहना चाहती। किसानों को फसल अवशेष का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने के लिए आर्थिक सहायता और मशीनरी उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है।रिपोर्ट के मुताबिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किसानों के लिए 1,200 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है। इसके साथ Crop Residue Management मशीनरी खरीदने के लिए सब्सिडी भी उपलब्ध कराई जा रही है।इसका उद्देश्य किसानों के सामने ऐसा विकल्प तैयार करना है जिसमें खेत जल्दी खाली भी हो सके और उन्हें पराली जलाने की जरूरत भी न पड़े।सरकार की योजना में बेलर, रेक और अन्य फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों को धान की कटाई के समय के अनुसार अलग-अलग जिलों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया है।
अलग-अलग जिलों के लिए मशीनरी की योजना
हरियाणा में सभी जिलों में धान की कटाई एक साथ नहीं होती। इसलिए Haryana Crop Residue Management Plan में मशीनरी को कटाई के समय के हिसाब से स्थानांतरित करने की तैयारी भी की गई है।सितंबर से यमुनानगर, अंबाला, करनाल और कुरुक्षेत्र जैसे क्षेत्रों में धान की कटाई शुरू हो जाती है। इसके बाद अक्टूबर के आखिर तक सिरसा, फतेहाबाद, हिसार और जींद जैसे जिलों में कटाई तेज होती है।इसी अंतर को देखते हुए बेलर, रेक और अन्य मशीनों को आवश्यकता वाले जिलों तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है। अधिकारियों को पड़ोसी राज्यों और हरियाणा के अन्य जिलों के मशीन मालिकों के साथ भी समन्वय करने के निर्देश दिए गए हैं।यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान के पास धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सीमित समय होता है। मशीन समय पर उपलब्ध नहीं होने पर फसल अवशेष का प्रबंधन मुश्किल हो सकता है।
किसान पराली क्यों जलाते हैं?
पराली जलाने की समस्या को समझने के लिए किसानों के सामने मौजूद समय और लागत की चुनौती को समझना जरूरी है।धान की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में फसल अवशेष बचता है। इसके तुरंत बाद किसान को गेहूं या अगली फसल की बुवाई करनी होती है। दोनों फसलों के बीच समय कम होने के कारण खेत को जल्दी साफ करने का दबाव रहता है।पराली को खेत से हटाने में मशीन, श्रम और परिवहन की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में कुछ किसान कम समय और कम तत्काल लागत वाले विकल्प के रूप में खेत में बचे अवशेष को जला देते हैं।CAQM की नीतिगत सामग्री में भी धान कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच कम समय, कृषि मशीनीकरण और पराली हटाने की आर्थिक चुनौती जैसे कारकों का उल्लेख किया गया है।इसलिए दीर्घकालीन समाधान केवल जुर्माने तक सीमित नहीं हो सकता। किसानों को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें पराली का प्रबंधन आर्थिक रूप से उपयोगी हो।
पराली से प्रदूषण की समस्या क्यों बढ़ती है?
खेत में फसल अवशेष जलाने से धुआं और विभिन्न वायु प्रदूषक वातावरण में पहुंचते हैं। स्थानीय स्तर पर इसका असर गांवों और आसपास के इलाकों की हवा पर पड़ सकता है।अक्टूबर और नवंबर के दौरान मौसम में बदलाव, हवा की दिशा और अन्य प्रदूषण स्रोतों के साथ मिलकर उत्तर भारत में वायु गुणवत्ता की समस्या गंभीर हो सकती है।दिल्ली-NCR में प्रदूषण के लिए केवल पराली को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा, क्योंकि वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों, सड़क की धूल और अन्य स्रोतों का योगदान भी होता है। वहीं, विशेष मौसम परिस्थितियों में खेतों की आग से होने वाला धुआं क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता को अतिरिक्त रूप से प्रभावित कर सकता है।इसलिए Stubble Burning Control को व्यापक air pollution management strategy के एक हिस्से के रूप में देखना जरूरी है।
पिछले वर्षों में कम हुई हैं खेतों में आग की घटनाएं
हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान दर्ज farm fire incidents में गिरावट देखी गई है।CAQM के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2025 के धान कटाई सीजन में हरियाणा में 662 farm fire incidents दर्ज किए गए थे। 2024 में यह संख्या 1,406 थी। यानी एक वर्ष में करीब 53 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।इसके पहले 2023 में 2,303, 2022 में 3,661 और 2021 में 6,987 घटनाएं दर्ज की गई थीं।यह गिरावट महत्वपूर्ण है, लेकिन सरकार और CAQM का लक्ष्य इन घटनाओं को और कम करते हुए समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना है।2026 में ड्रोन, सैटेलाइट, नोडल अधिकारियों और Parali Protection Force Haryanaजैसी व्यवस्था इसी प्रयास का हिस्सा है।
लगभग 80 लाख टन फसल अवशेष के प्रबंधन की चुनौती
हरियाणा में धान की खेती बड़े क्षेत्र में होने के कारण फसल अवशेष प्रबंधन भी बड़े पैमाने का काम है।सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार ने लगभग 80 लाख टन फसल अवशेष के प्रबंधन को लेकर तीन-स्तरीय रणनीति तैयार की है।इतनी बड़ी मात्रा में पराली को केवल खेत से हटाना समाधान नहीं है। इसके उपयोग के लिए बाजार और उद्योगों से जुड़ा तंत्र भी जरूरी है।पराली का इस्तेमाल बायोमास ऊर्जा, कम्पोस्ट, पशुओं के लिए कुछ प्रकार के चारे, बायोगैस, औद्योगिक ईंधन और अन्य उपयोगों में किया जा सकता है। अलग-अलग प्रकार की पराली के उपयोग की व्यवहार्यता अलग हो सकती है, इसलिए क्षेत्र के अनुसार समाधान तैयार करना जरूरी होता है।
पराली को कचरा नहीं, संसाधन बनाने पर जोर
लंबे समय के लिए Haryana Stubble Burning Solution तभी सफल हो सकता है जब किसानों के लिए पराली एक समस्या के बजाय आर्थिक संसाधन बन सके।बेलर मशीनें पराली को एकत्र कर गांठों में बदल सकती हैं। इन गांठों को ऐसी इकाइयों तक भेजा जा सकता है जहां biomass या अन्य औद्योगिक उपयोग के लिए इसकी मांग हो।इसी तरह खेत के अंदर ही फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाने वाली मशीनों का उपयोग भी किया जा सकता है। इससे पराली को खेत से बाहर ले जाने की जरूरत कम हो सकती है।Crop Residue Management का उद्देश्य यही है कि फसल अवशेष के लिए अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार विकल्प मौजूद हों।यदि किसान को समय पर मशीन, बाजार और परिवहन व्यवस्था मिलती है तो खेत में आग लगाने की आर्थिक मजबूरी कम हो सकती है।
संवेदनशील जिलों पर रहेगी ज्यादा नजर
हरियाणा के कुछ धान उत्पादक जिलों में प्रशासन विशेष सतर्कता बरत रहा है।करनाल, कैथल और कुरुक्षेत्र जैसे प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्र पराली प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों में सैटेलाइट के साथ ड्रोन और स्थानीय टीमों की निगरानी का इस्तेमाल किए जाने की तैयारी है।जिला प्रशासन स्थानीय परिस्थितियों, धान के क्षेत्रफल, पिछले farm fire records और कटाई के समय को देखते हुए संवेदनशील गांवों की पहचान कर सकता है।ड्रोन भी इन्हीं प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।
देर शाम और रात में बढ़ेगी गश्त
इस बार Parali Protection Force की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देर शाम और रात के समय निगरानी बढ़ाना भी होगी।अधिकारियों का कहना है कि कुछ मामलों में सैटेलाइट निगरानी से बचने के उद्देश्य से अंधेरा होने के बाद खेत में आग लगाने का प्रयास किया जाता है। इसी कारण प्रशासन ने ground-level patrolling को अधिक मजबूत करने की योजना बनाई है।इसमें स्थानीय अधिकारियों, कृषि विभाग और पुलिस के बीच तत्काल सूचना साझा करना महत्वपूर्ण होगा।यदि ड्रोन या दूसरी निगरानी व्यवस्था से किसी संभावित घटना की जानकारी मिलती है तो नजदीकी टीम मौके पर जाकर सत्यापन कर सकेगी।
तकनीक से कितनी बदलेगी पराली की निगरानी?
Drone Monitoring for Stubble Burning in Haryana प्रशासन को बड़े कृषि क्षेत्रों पर तेजी से नजर रखने में मदद कर सकती है।हालांकि केवल तकनीक से समस्या खत्म हो जाएगी, ऐसा मानना उचित नहीं होगा।ड्रोन को उड़ाने के लिए निर्धारित क्षेत्र, प्रशिक्षित कर्मचारी, डेटा का समय पर विश्लेषण और स्थानीय अधिकारियों तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था जरूरी होगी।इसके साथ गलत पहचान से बचने के लिए मौके पर सत्यापन भी महत्वपूर्ण रहेगा।इसलिए ड्रोन को पुलिस, कृषि विभाग और नोडल अधिकारियों की जगह लेने वाली तकनीक के बजाय उनकी मदद करने वाले उपकरण के रूप में देखा जाना अधिक उचित होगा।
किसानों की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण
पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान किसानों की भागीदारी के बिना संभव नहीं है।यदि किसान को मशीन समय पर मिले, मशीन किराए पर लेने का खर्च वहन करने योग्य हो और पराली बेचने या इस्तेमाल करने का विकल्प मौजूद हो तो वह Crop Residue Management को आसानी से अपना सकता है।इसीलिए जागरूकता अभियान भी सरकार की रणनीति का हिस्सा हैं। विभिन्न जिलों में किसानों को पराली न जलाने और उसके वैकल्पिक उपयोग की जानकारी देने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं।पराली प्रबंधन से जुड़ी नीति में किसान, प्रशासन, पंचायत, कृषि विभाग, मशीन मालिक और पराली खरीदने वाले उद्योग सभी की भूमिका है।
दिल्ली-NCR की हवा के लिए भी अहम है हरियाणा की योजना
हरियाणा दिल्ली और NCR के नजदीक स्थित है, इसलिए राज्य में खेतों में आग की घटनाओं का मुद्दा हर साल व्यापक चर्चा में रहता है।हालांकि किसी भी दिन दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता पर पराली का वास्तविक योगदान मौसम, हवा की दिशा और अन्य परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है, लेकिन धान कटाई के दौरान बड़े पैमाने पर खुले में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को कम करना क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
CAQM भी पंजाब, हरियाणा और अन्य संबंधित राज्यों के लिए अलग-अलग seasonal action plans की निगरानी करता है। 2026 के लिए जारी Direction No. 99 में Paddy Stubble Burning की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राज्य कार्ययोजनाओं के क्रियान्वयन को शामिल किया गया है।
सख्ती के साथ समाधान उपलब्ध कराना होगा
सरकार की Haryana Stubble Burning Control Strategy 2026 में एक ओर निगरानी और कार्रवाई है तो दूसरी ओर आर्थिक प्रोत्साहन तथा मशीनरी उपलब्ध कराने की व्यवस्था।यह संतुलन महत्वपूर्ण है।
यदि केवल जुर्माना लगाया जाए और किसान को खेत साफ करने का व्यवहारिक विकल्प न मिले तो समस्या का दीर्घकालीन समाधान कठिन हो सकता है। दूसरी तरफ सब्सिडी और मशीन उपलब्ध होने के बावजूद जानबूझकर नियम तोड़ने के मामलों में कार्रवाई की जरूरत पड़ सकती है।इसी कारण 2026 की रणनीति में prevention, monitoring, incentives और enforcement को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
‘पराली सुरक्षा बल’ के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
Parali Protection Force Haryana के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतने बड़े कृषि क्षेत्र की लगातार निगरानी होगी।हजारों गांवों और लाखों एकड़ धान क्षेत्र में प्रत्येक खेत तक प्रशासनिक टीम का पहुंचना आसान नहीं है। ड्रोन और सैटेलाइट इस चुनौती को कुछ हद तक कम कर सकते हैं, लेकिन अंतिम स्तर पर स्थानीय अधिकारियों की भूमिका बनी रहेगी।दूसरी चुनौती समय की है। धान की कटाई के बाद किसान के पास गेहूं की बुवाई के लिए सीमित अवधि होती है। ऐसे में Crop Residue Management मशीनरी की मांग अचानक बढ़ जाती है।यदि सही समय पर मशीन उपलब्ध नहीं होगी तो किसानों के सामने परेशानी पैदा हो सकती है।
तीसरी चुनौती पराली के बाजार की है। यदि किसानों के खेत से पराली एकत्र करने के बाद उसे खरीदने और इस्तेमाल करने वाली इकाइयों का स्थायी नेटवर्क विकसित होता है तो पराली जलाने की समस्या को आर्थिक मॉडल के जरिए भी कम किया जा सकता है।
क्या 2026 में पराली जलाने की घटनाएं और कम होंगी?
पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा में दर्ज farm fire incidents लगातार कम हुए हैं।2021 के 6,987 मामलों की तुलना में 2025 में 662 farm fire incidents दर्ज किए गए।2026 की नई रणनीति में अब Drone Surveillance, Parali Protection Force, Satellite Monitoring, Village-Level Nodal Officers और Crop Residue Management Incentives को एक साथ इस्तेमाल किया जा रहा है।इन उपायों का वास्तविक प्रभाव 2026 का धान कटाई सीजन पूरा होने के बाद उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से अधिक स्पष्ट होगा।
हरियाणा में पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए इस बार सरकार तकनीक, प्रशासनिक निगरानी और किसानों को मिलने वाली सहायता को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।जिला और ब्लॉक स्तर पर ‘पराली सुरक्षा बल’, खेतों की Drone Surveillance, satellite monitoring, हजारों village-level nodal officers और देर शाम की गश्त इस अभियान के प्रमुख हिस्से हैं।इसके साथ Crop Residue Management मशीनरी, किसानों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन और पराली के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
सत्यापित मामलों में FIR, चालान, भूमि रिकॉर्ड में रेड एंट्री और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति जैसी कार्रवाई का प्रावधान प्रशासन की सख्ती को दिखाता है। वहीं मशीनरी और प्रोत्साहन योजनाएं इस समस्या का व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश हैं।
2025 में हरियाणा में खेतों में आग की दर्ज घटनाओं में पिछले वर्ष की तुलना में 53 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई थी। अब 2026 में सरकार का लक्ष्य इस गिरावट को आगे बढ़ाना और पराली जलाने की घटनाओं को खत्म करने की दिशा में काम करना है।इस योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासन कितनी तेजी से संभावित घटनाओं की पहचान करता है, किसानों तक मशीनरी कितनी आसानी से पहुंचती है और पराली को एक बेकार अवशेष के बजाय उपयोगी संसाधन में बदलने के लिए कितना मजबूत बाजार तैयार होता है।
यदि निगरानी, तकनीक, किसान सहयोग और आर्थिक विकल्प चारों स्तर पर प्रभावी ढंग से काम करते हैं, तो Haryana Stubble Burning Control का यह मॉडल आने वाले वर्षों में फसल अवशेष प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
