देश के कई हिस्सों में अगस्त 2006 के दौरान सामान्य से कम बारिश और कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियों का असर कृषि गतिविधियों के साथ-साथ उर्वरक बाजार पर भी दिखाई दिया। प्रारंभिक फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में NP/NPK कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री में करीब 19.4 प्रतिशत और म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) की बिक्री में करीब 13.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। उर्वरक बिक्री में यह कमी खरीफ सीजन के अंतिम चरण में किसानों की ओर से पोषक तत्वों की मांग कमजोर पड़ने का संकेत देती है।
अगस्त के दौरान देश के कई कृषि क्षेत्रों में बारिश की स्थिति असमान रही। कुछ राज्यों में सामान्य से कम बारिश हुई, जबकि कुछ क्षेत्रों में बारिश के लंबे अंतराल के कारण खेतों में नमी की स्थिति प्रभावित हुई। जहां पर्याप्त नमी नहीं होती है, वहां किसान कई बार फसल में अतिरिक्त उर्वरक डालने से बचते हैं। इसका सीधा असर उर्वरक बिक्री पर पड़ सकता है।
NP/NPK उर्वरकों की बिक्री में 19.4 प्रतिशत गिरावट
प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में NP/NPK कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री लगभग 19.4 प्रतिशत घट गई। NP और NPK उर्वरक किसानों को एक साथ कई प्रमुख पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। इनका इस्तेमाल धान, मक्का, कपास, गन्ना, सब्जियों और अन्य फसलों में किया जाता है।
खरीफ सीजन में इन उर्वरकों की मांग मुख्य रूप से फसल की स्थिति, बारिश और बुवाई के क्षेत्र पर निर्भर करती है। यदि बारिश सामान्य रहती है और फसल की बढ़वार अच्छी होती है तो किसान टॉप ड्रेसिंग तथा अन्य पोषक तत्वों के लिए उर्वरक खरीदते हैं। लेकिन बारिश में कमी होने पर कई क्षेत्रों में फसल का रकबा प्रभावित हो सकता है या किसान उर्वरक डालने का समय आगे बढ़ा सकते हैं।
अगस्त में बिक्री में आई लगभग 19.4 प्रतिशत की गिरावट को इसी व्यापक कृषि परिस्थिति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
MOP की बिक्री भी घटी
अगस्त 2026 में म्यूरेट ऑफ पोटाश यानी MOP की बिक्री में करीब 13.6 प्रतिशत की कमी बताई गई है। MOP पोटाश का प्रमुख स्रोत है और भारत में इसका इस्तेमाल विभिन्न फसलों में किया जाता है।
पोटाश पौधों में पानी के उपयोग, रोग और प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने की क्षमता तथा कई अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि किसान इसका इस्तेमाल फसल और मिट्टी की जरूरत के आधार पर करते हैं।
MOP की बिक्री में कमी को भी खरीफ फसलों की स्थिति, बारिश और कृषि गतिविधियों में आए बदलाव से जोड़कर देखा जा सकता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में MOP की कीमत और आयात लागत भी इसकी मांग को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल हैं।
बारिश और उर्वरक मांग का संबंध
भारत में कृषि क्षेत्र की उर्वरक मांग का बारिश के साथ सीधा संबंध है। देश में बड़ी संख्या में किसान अभी भी मानसूनी बारिश पर निर्भर हैं। मानसून समय पर और पर्याप्त रहने पर किसान खरीफ फसलों की बुवाई और बाद की कृषि गतिविधियों को तेजी से पूरा करते हैं।
उर्वरक का इस्तेमाल भी फसल के विकास के अलग-अलग चरणों में किया जाता है। यदि बारिश में लंबा अंतराल हो जाए तो खेतों में नमी कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में किसान उर्वरक डालने से पहले बारिश का इंतजार कर सकते हैं।
विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है, बारिश की कमी का असर उर्वरक की मांग पर अधिक दिखाई दे सकता है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था है, वहां किसान बारिश की कमी के बावजूद उर्वरक का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं।
अगस्त में कमजोर रही मानसूनी स्थिति
अगस्त 2026 के दौरान देश के कई हिस्सों में बारिश की स्थिति कमजोर रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अगस्त में देश में बारिश सामान्य से लगभग 16.3 प्रतिशत कम रही। यह कमी कृषि गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगस्त खरीफ फसलों की बढ़वार के लिहाज से महत्वपूर्ण महीना होता है।
धान, कपास, सोयाबीन, मक्का, दालों और अन्य खरीफ फसलों में अगस्त के दौरान फसल विकास की महत्वपूर्ण अवस्थाएं होती हैं। यदि इस अवधि में पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो फसल की स्थिति और किसानों की उर्वरक जरूरत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि देशभर में बारिश की स्थिति एक जैसी नहीं रही। कुछ राज्यों और जिलों में सामान्य से अधिक बारिश भी हुई। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर बिक्री में गिरावट को हर क्षेत्र में समान स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता।
यूरिया की मांग पर भी असर
NP/NPK और MOP की बिक्री में गिरावट के बावजूद उर्वरक बाजार में यूरिया की स्थिति अलग रही है। यूरिया देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है और इसकी मांग खरीफ तथा रबी दोनों मौसम में रहती है।
अगस्त के दौरान कुल उर्वरक बिक्री में भी गिरावट दर्ज की गई। उपलब्ध प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में कुल उर्वरक बिक्री करीब 65.1 लाख टन रही, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले लगभग 10.3 प्रतिशत कम थी।
इससे संकेत मिलता है कि अगस्त में कृषि क्षेत्र में उर्वरक की कुल मांग पर मौसम की स्थिति का व्यापक प्रभाव पड़ा। हालांकि अलग-अलग उर्वरक उत्पादों में गिरावट की दर अलग रही।
किसानों ने जरूरत के हिसाब से खरीद की
उर्वरक बिक्री में कमी का यह अर्थ जरूरी नहीं है कि किसानों ने उर्वरक का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया। बिक्री के आंकड़े बाजार में उस महीने हुई खरीद को दर्शाते हैं, जबकि किसान पहले खरीदा गया उर्वरक बाद के महीनों में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
कई किसान मौसम को देखते हुए उर्वरक खरीदने का समय बदलते हैं। यदि बारिश की संभावना कम हो तो वे तत्काल खरीद को टाल सकते हैं। बाद में अच्छी बारिश होने पर मांग तेजी से बढ़ सकती है।
इसलिए अगस्त में आई गिरावट को पूरे खरीफ सीजन की अंतिम तस्वीर मानना जल्दबाजी होगी। सितंबर और अक्टूबर की बारिश तथा फसल की स्थिति से यह पता चलेगा कि खरीफ सीजन में कुल उर्वरक खपत किस स्तर पर रहती है।
उर्वरक कंपनियों के लिए क्या संकेत
बिक्री में गिरावट का असर उर्वरक कंपनियों के कारोबार और स्टॉक प्रबंधन पर भी पड़ सकता है। कंपनियों को उत्पादन, आयात और वितरण की योजना बनाते समय मौसम तथा राज्यवार मांग को ध्यान में रखना पड़ता है।
यदि किसी क्षेत्र में मांग कम रहती है तो वहां स्टॉक बढ़ सकता है। वहीं दूसरे क्षेत्रों में बारिश के बाद अचानक मांग बढ़ने पर अतिरिक्त आपूर्ति की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए कंपनियों के लिए राज्य और क्षेत्र के अनुसार मांग का अनुमान लगाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
NP/NPK और MOP जैसे उर्वरकों के मामले में आयात का भी महत्वपूर्ण योगदान है। अंतरराष्ट्रीय कीमत, समुद्री मालभाड़ा और विदेशी मुद्रा दर में बदलाव से आयात लागत प्रभावित होती है। ऐसे में कमजोर घरेलू मांग और महंगे आयात के बीच कंपनियों के लिए स्टॉक प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
रबी सीजन पर अब नजर
अगस्त की बिक्री में गिरावट के बाद अब उर्वरक बाजार का ध्यान रबी सीजन की ओर है। अक्टूबर से रबी फसलों की बुवाई शुरू होती है और नवंबर-दिसंबर में गेहूं, सरसों, चना तथा अन्य फसलों की उर्वरक मांग बढ़ती है।
रबी में यूरिया के साथ DAP, NPK और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों की मांग भी महत्वपूर्ण रहती है। ऐसे में सरकार और उर्वरक कंपनियों के लिए यह जरूरी होगा कि खरीफ सीजन के दौरान कमजोर रही मांग के बावजूद रबी के लिए पर्याप्त स्टॉक तैयार रखा जाए।
विशेषकर DAP और अन्य P&K उर्वरकों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों तथा कच्चे माल की लागत को देखते हुए समय पर खरीद और वितरण महत्वपूर्ण रहेगा।
बारिश की आगे की स्थिति महत्वपूर्ण
उर्वरक बाजार में आने वाले महीनों की मांग काफी हद तक मौसम पर निर्भर करेगी। यदि सितंबर में बारिश में सुधार होता है तो खरीफ फसलों में किसानों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं और कुछ उर्वरकों की मांग में सुधार संभव है।
दूसरी ओर, यदि बारिश की कमी बनी रहती है तो खरीफ फसलों की अंतिम अवस्था में उर्वरक की अतिरिक्त मांग कमजोर रह सकती है। इसके बाद रबी की बुवाई के लिए मिट्टी की नमी और सिंचाई की उपलब्धता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
सरकार के लिए भी चुनौती
उर्वरक बिक्री में गिरावट ऐसे समय आई है जब सरकार देश में खाद की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने पर जोर दे रही है। सरकार के सामने एक तरफ किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत और सब्सिडी खर्च को नियंत्रित रखने की चुनौती है।
यदि खरीफ के दौरान बिक्री कम रहती है तो कुछ क्षेत्रों में स्टॉक अगले सीजन के लिए उपलब्ध रह सकता है। लेकिन राज्यवार स्टॉक की स्थिति अलग होने के कारण केवल राष्ट्रीय स्तर का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होता। किसी राज्य में अतिरिक्त स्टॉक हो सकता है, जबकि दूसरे राज्य में रबी से पहले नई आपूर्ति की जरूरत पड़ सकती है।
कुल मिलाकर क्या तस्वीर बन रही है?
अगस्त में NP/NPK कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री में 19.4 प्रतिशत और MOP की बिक्री में 13.6 प्रतिशत की गिरावट उर्वरक बाजार में मौसम के प्रभाव को दर्शाती है। कम बारिश और कई क्षेत्रों में नमी की कमी के कारण किसानों की उर्वरक खरीद प्रभावित हुई है।
हालांकि इसे केवल मांग में स्थायी कमजोरी के रूप में देखना सही नहीं होगा। उर्वरक की खरीद फसल की अवस्था, बारिश, सिंचाई, बाजार कीमत, किसान की आय और आगामी मौसम की उम्मीद जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
अब सितंबर की बारिश, खरीफ फसलों की अंतिम स्थिति और रबी की तैयारियां यह तय करेंगी कि उर्वरक बाजार में मांग किस दिशा में जाती है। अगस्त की गिरावट के बाद रबी सीजन में उर्वरक की मांग में संभावित बदलाव पर सरकार, कंपनियों और किसानों—तीनों की नजर रहेगी।

