भारत में DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की उपलब्धता और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने के लिए सरकार उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में बदलाव पर विचार कर रही है। सल्फर और अन्य कच्चे माल की लागत में लगातार बढ़ोतरी के बीच सरकार DAP के लिए डिफरेंशियल सब्सिडी यानी अलग-अलग स्तर की सब्सिडी देने की व्यवस्था पर विचार कर रही है। इसका प्रमुख उद्देश्य देश में DAP का उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।
भारत में DAP किसानों के लिए प्रमुख फॉस्फेट उर्वरकों में शामिल है। नाइट्रोजन और फॉस्फोरस उपलब्ध कराने वाला यह उर्वरक विशेष रूप से बुवाई के समय व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। देश में इसकी मांग काफी अधिक है, जबकि घरेलू उत्पादन क्षमता और कच्चे माल की उपलब्धता मांग के मुकाबले सीमित है। यही वजह है कि भारत को हर साल बड़ी मात्रा में DAP का आयात करना पड़ता है।
कच्चे माल की बढ़ती लागत बनी चुनौती
DAP के घरेलू उत्पादन में कई महत्वपूर्ण कच्चे माल की जरूरत होती है। इनमें फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और सल्फर प्रमुख हैं। वैश्विक बाजार में इन कच्चे माल की कीमतों में होने वाले बदलाव का सीधा असर DAP उत्पादन की लागत पर पड़ता है।
हाल के महीनों में सल्फर की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण सल्फर की आपूर्ति और परिवहन लागत पर दबाव बढ़ा है। सल्फर DAP के साथ-साथ SSP और कई अन्य जटिल उर्वरकों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
जब कच्चे माल की लागत बढ़ती है तो घरेलू कंपनियों के लिए DAP का उत्पादन महंगा हो जाता है। दूसरी तरफ, सरकार किसानों के लिए DAP की खुदरा कीमत को नियंत्रित स्तर पर बनाए रखना चाहती है। ऐसे में उत्पादन लागत और किसान से लिए जाने वाले मूल्य के बीच का अंतर बढ़ सकता है।
डिफरेंशियल सब्सिडी क्या है?
डिफरेंशियल सब्सिडी का मतलब अलग-अलग परिस्थितियों या लागत के आधार पर सब्सिडी में अंतर करना है। DAP के मामले में इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी स्थिति में घरेलू निर्माताओं को अतिरिक्त आर्थिक सहायता देना हो सकता है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की लागत बहुत अधिक हो।
इस व्यवस्था से सरकार घरेलू स्तर पर उत्पादन करने वाली कंपनियों को लागत के दबाव से राहत देने की कोशिश कर सकती है। यदि घरेलू उत्पादन आर्थिक रूप से व्यवहार्य बना रहता है तो कंपनियों के लिए उत्पादन बढ़ाने, नई क्षमता लगाने और आयात पर निर्भरता कम करने की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, सब्सिडी की वास्तविक संरचना, पात्र कंपनियां और इसकी अवधि जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर अंतिम निर्णय सरकार की नीति और संबंधित मंत्रालयों के विचार-विमर्श के बाद ही स्पष्ट होगा।
घरेलू उत्पादन बढ़ाना क्यों जरूरी?
भारत में उर्वरकों की मांग लगातार ऊंची बनी हुई है। देश की कृषि व्यवस्था के लिए DAP, NPK और अन्य फॉस्फेट आधारित उर्वरक महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इनके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल के लिए भारत को विदेशी बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी तरह का संकट भारत की उर्वरक आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। युद्ध, समुद्री मार्गों में व्यवधान, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, निर्यात प्रतिबंध और किसी प्रमुख उत्पादक देश की आपूर्ति नीति में बदलाव का असर सीधे आयात लागत पर पड़ सकता है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से भारत को इन जोखिमों से कुछ हद तक सुरक्षा मिल सकती है। साथ ही, लंबे समय में विदेशी मुद्रा की बचत और उर्वरक आपूर्ति को अधिक स्थिर बनाने में भी मदद मिल सकती है।
किसानों के लिए DAP की कीमत महत्वपूर्ण
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि DAP की लागत बढ़ने के बावजूद किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत बढ़ने पर यदि उसका पूरा असर घरेलू बाजार में डाल दिया जाए तो किसानों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
इसी कारण सरकार सब्सिडी व्यवस्था के माध्यम से किसानों को अपेक्षाकृत स्थिर कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने की कोशिश करती है। डिफरेंशियल सब्सिडी का विचार इसी संतुलन का हिस्सा माना जा सकता है, जिसमें एक तरफ किसानों के लिए उर्वरक की कीमत को नियंत्रित रखने और दूसरी तरफ घरेलू कंपनियों की उत्पादन लागत को ध्यान में रखने की कोशिश होगी।
आयात और घरेलू उत्पादन के बीच संतुलन
भारत के लिए DAP में पूरी तरह आयात से मुक्ति हासिल करना आसान नहीं है। देश की मांग काफी बड़ी है और इसके लिए आवश्यक कच्चे माल की घरेलू उपलब्धता भी सीमित है। इसलिए निकट अवधि में आयात की भूमिका बनी रहने की संभावना है।
ऐसे में सरकार के लिए आयात और घरेलू उत्पादन के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जब वैश्विक बाजार में कीमतें कम हों तो आयात से घरेलू जरूरत पूरी की जा सकती है, जबकि घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन जारी रखा जा सकता है।
इस रणनीति से अचानक वैश्विक आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के पास घरेलू उत्पादन का मजबूत आधार मौजूद रह सकता है।
सल्फर की कीमतों पर भी नजर
DAP नीति के संदर्भ में सल्फर की कीमत विशेष महत्व रखती है। यदि सल्फर की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो DAP और अन्य फॉस्फेट उर्वरकों की उत्पादन लागत पर दबाव बना रह सकता है।
इसके अलावा सल्फर की उपलब्धता और समुद्री परिवहन लागत भी महत्वपूर्ण हैं। भारत को सल्फर के लिए भी आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए DAP के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा
सरकार पिछले कुछ समय से उर्वरक क्षेत्र में आयात स्रोतों में विविधता लाने के साथ घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। यूरिया में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयासों के बाद अब फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की आपूर्ति सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनती जा रही है।
DAP के लिए डिफरेंशियल सब्सिडी जैसी व्यवस्था लागू होती है तो इससे घरेलू उत्पादन को अंतरराष्ट्रीय लागत के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सब्सिडी की राशि कितनी तय की जाती है और इसे किस तरह लागू किया जाता है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
सरकार के सामने एक साथ दो लक्ष्य हैं। पहला, किसानों को DAP उचित कीमत पर उपलब्ध कराना और दूसरा, घरेलू कंपनियों के लिए उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखना। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमत बढ़ने की स्थिति में दोनों लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता।
यदि घरेलू उत्पादन लागत बहुत अधिक हो जाती है तो कंपनियां आयातित DAP की तुलना में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पातीं। वहीं यदि आयात पर निर्भरता बहुत ज्यादा रहती है तो वैश्विक संकट के समय देश में खाद की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
इसी वजह से DAP के लिए अलग-अलग सब्सिडी की संभावित व्यवस्था को उर्वरक क्षेत्र में दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले समय में सरकार के फैसले से यह स्पष्ट होगा कि घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए किस तरह की सब्सिडी व्यवस्था लागू की जाती है।
निष्कर्ष
DAP की बढ़ती लागत और कच्चे माल की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भारत के सामने उर्वरक आपूर्ति को लेकर नई चुनौती खड़ी की है। सल्फर की महंगी कीमतों के बीच डिफरेंशियल सब्सिडी का विचार घरेलू उत्पादन को समर्थन देने की दिशा में एक संभावित कदम हो सकता है। हालांकि, किसानों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने, कंपनियों को उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने और सरकार के बढ़ते सब्सिडी खर्च के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा। लंबे समय में घरेलू उत्पादन क्षमता, कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति और आयात स्रोतों में विविधता ही भारत की DAP आपूर्ति को अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

