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Home कृषि समाचार

उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का बढ़ा खर्च, 6 महीने में 1.14 लाख करोड़ रुपये खर्च

उर्वरक सब्सिडी पर सरकार ने चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में 1.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। यूरिया, DAP और सल्फर की वैश्विक कीमतों का असर।

Vipin Mishra by Vipin Mishra
September 26, 2026
in कृषि समाचार
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भारत में उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का बढ़ता खर्च और यूरिया-DAP की वैश्विक कीमतें
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वैश्विक बाजार में तैयार उर्वरकों की ऊंची कीमतों और घरेलू यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख गैस एलएनजी (LNG) की महंगी कीमतों का असर अब भारत के उर्वरक सब्सिडी बजट पर दिखाई देने लगा है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में सरकार उर्वरक सब्सिडी पर 1.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है। यह राशि पूरे वित्त वर्ष के शुरुआती बजट अनुमान 1.76 लाख करोड़ रुपये का करीब 65 प्रतिशत है।

उर्वरक सब्सिडी में सबसे बड़ा हिस्सा यूरिया का है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अब तक करीब 87,316 करोड़ रुपये यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन पर सब्सिडी के रूप में खर्च किए जा चुके हैं। वहीं, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) और एनपीके जैसे उर्वरकों के आयात तथा घरेलू उत्पादन के लिए करीब 26,857 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई है।

उर्वरक सब्सिडी का खर्च बजट से आगे बढ़ने की आशंका

व्यापार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में मई के उच्च स्तर से कमी जरूर आई है, लेकिन इसके बावजूद पूरे वित्त वर्ष में सरकार का उर्वरक सब्सिडी खर्च बजट अनुमान से काफी अधिक रह सकता है।

अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का कुल खर्च पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के 2.17 लाख करोड़ रुपये से लगभग 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये अधिक हो सकता है। इस बीच वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उर्वरक सब्सिडी का बजट अनुमान भी बढ़ाकर 1.84 लाख करोड़ रुपये किया गया है।

इस बढ़ते खर्च का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है। भारत अपनी जरूरत के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर सरकार के सब्सिडी खर्च पर पड़ता है।

यूरिया की कीमतों में आई बड़ी गिरावट

अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की स्थिति पिछले कुछ महीनों में बदली है। आपूर्ति में सुधार और आयात के स्रोतों में विविधता आने के कारण भारत में आयातित यूरिया की लैंडेड लागत में काफी गिरावट आई है।

अगस्त 2026 में यूरिया की लैंडेड लागत लगभग 406 डॉलर प्रति टन रही, जबकि मई 2026 में यह बढ़कर करीब 947 डॉलर प्रति टन पहुंच गई थी। यानी मई के मुकाबले अगस्त में यूरिया की लैंडेड लागत करीब 57 प्रतिशत कम हुई है।

उर्वरक विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में वैश्विक यूरिया कीमत सालाना आधार पर करीब 23 प्रतिशत कम रही। इससे सरकार को आगे सब्सिडी खर्च पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद बनती है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों, समुद्री परिवहन और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण बाजार में अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है।

कई देशों से यूरिया आयात कर रहा भारत

आपूर्ति में व्यवधान के बाद भारत ने यूरिया आयात के स्रोतों को बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। अब देश कई अलग-अलग देशों से यूरिया मंगा रहा है। इनमें ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्की और नीदरलैंड जैसे देश शामिल हैं।

आयात के स्रोतों में विविधता बढ़ाने का उद्देश्य किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। इससे वैश्विक संकट या किसी विशेष क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के लिए वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध रह सकते हैं।

DAP की वैश्विक कीमत बढ़ी

जहां यूरिया की वैश्विक कीमतों में गिरावट आई है, वहीं DAP के मामले में स्थिति अलग है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में DAP की वैश्विक कीमत करीब 853 डॉलर प्रति टन थी, जो अगस्त में बढ़कर 925 डॉलर प्रति टन हो गई। यानी इस अवधि में DAP की कीमत में लगभग 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

व्यापार से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ने से DAP की वैश्विक कीमतों पर दबाव आया है।

भारत DAP और अन्य एनपीके उर्वरकों की जरूरत पूरी करने के लिए रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से आयात कर रहा है। समुद्री मार्गों में व्यवधान और बढ़ी हुई फ्रेट लागत के कारण आयातित उर्वरकों की लागत पर असर पड़ रहा है।

सल्फर की कीमत बढ़ना भी चिंता का कारण

उर्वरक क्षेत्र में केवल तैयार उत्पादों की कीमत ही सरकार के लिए चिंता का विषय नहीं है। उर्वरक निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमत भी सब्सिडी खर्च को प्रभावित करती है।

सल्फर DAP, सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) और कई अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के निर्माण में महत्वपूर्ण कच्चा माल है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में आपूर्ति संबंधी व्यवधान के कारण इस साल की शुरुआत से सल्फर की लैंडेड लागत लगभग दोगुनी होकर करीब 1,050 डॉलर प्रति टन पहुंच गई है।

यदि सल्फर की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो इससे DAP और अन्य फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर सरकार के सब्सिडी खर्च पर भी पड़ सकता है।

किसानों के लिए यूरिया और DAP के दाम नियंत्रित

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद किसानों के लिए यूरिया की कीमत लंबे समय से नियंत्रित रखी गई है। वर्तमान में यूरिया 45 किलोग्राम की बोरी 266.50 रुपये में बेचा जा रहा है। यह कीमत मार्च 2018 से अपरिवर्तित है।

वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत 4,000 रुपये प्रति बोरी से अधिक के बराबर होने के बावजूद किसानों को इसे बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है। अंतरराष्ट्रीय कीमत और किसानों से लिए जाने वाले नियंत्रित मूल्य के बीच के बड़े अंतर को सरकार सब्सिडी के माध्यम से पूरा करती है।

इसी तरह DAP की खुदरा कीमत भी किसानों के लिए 50 किलोग्राम की बोरी पर 1,350 रुपये बनाए रखी गई है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद किसानों पर तत्काल इसका पूरा बोझ नहीं डाला गया है।

FY23 में भी बढ़ा था सब्सिडी का बोझ

वैश्विक संकट के कारण उर्वरक सब्सिडी में बड़ी वृद्धि पहले भी देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2022-23 में उर्वरक सब्सिडी का कुल बिल रिकॉर्ड करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। उस समय रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति और समुद्री परिवहन व्यवस्था प्रभावित हुई थी।

वर्तमान परिस्थितियों में भी पश्चिम एशिया का संघर्ष, समुद्री मार्गों में व्यवधान, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें भारत के उर्वरक आयात बिल और सब्सिडी खर्च के लिए चुनौती बनी हुई हैं।

आयात पर निर्भरता बड़ी चुनौती

भारत दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन उर्वरक और उनके कच्चे माल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। भारत अपनी कुल उर्वरक जरूरतों और कच्चे माल का लगभग 70 प्रतिशत आयात करता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में विभिन्न प्रकार के उर्वरकों की वार्षिक खपत 70 मिलियन टन से अधिक रही। इतनी बड़ी खपत और आयात पर निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाला छोटा बदलाव भी भारत के आयात बिल और सरकारी सब्सिडी खर्च को प्रभावित कर सकता है।

आने वाले महीनों में यूरिया की कीमतों में गिरावट से सरकार को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन DAP, सल्फर और अन्य फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की ऊंची कीमतें चिंता का कारण बनी हुई हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार, समुद्री मार्गों और ऊर्जा कीमतों पर नजर रखना सरकार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। किसानों के लिए उर्वरकों की कीमतों को नियंत्रित रखने के साथ-साथ सरकार के सामने सब्सिडी खर्च को संतुलित रखने की चुनौती भी बनी रहेगी।

 

Tags: DAPfertilizer newsLNGMOPNPKउर्वरक बाजारउर्वरक सब्सिडीकिसानकृषि समाचारखाद आयातखाद कीमतयूरियासल्फर
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