भारत का चावल निर्यात उद्योग विदेशी बाजारों में गुणवत्ता और कीटनाशक अवशेष से जुड़े अनुपालन को लेकर सतर्क हो गया है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (IREF) ने निर्यात खेपों की शिपमेंट से पहले अधिक मजबूत और प्रभावी परीक्षण व्यवस्था की जरूरत बताई है। महासंघ के अनुसार, कीटनाशक अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाने, माइक्रोबियल और भौतिक संदूषण, खरीदार की तय specifications से मेल न खाने और दस्तावेजों से जुड़ी गलतियों के कारण भारतीय चावल की कुछ खेपों को विदेशी बाजारों में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
25 सितंबर 2026 को सामने आए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है और वैश्विक बाजार में उसकी हिस्सेदारी काफी महत्वपूर्ण है। बड़े निर्यात कारोबार के कारण गुणवत्ता अनुपालन में छोटी सी चूक भी निर्यातकों के लिए आर्थिक नुकसान के साथ-साथ बाजार की विश्वसनीयता पर असर डाल सकती है।
2024-25 में भारत ने किया 20.19 मिलियन टन चावल का निर्यात
IREF की ओर से कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 20.19 मिलियन मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया। इस निर्यात का मूल्य 12.47 अरब डॉलर रहा।
निर्यात की यह बड़ी मात्रा बताती है कि भारत के चावल कारोबार के लिए विदेशी बाजारों में गुणवत्ता मानकों का पालन कितना महत्वपूर्ण है। यदि किसी बाजार में भारतीय चावल की खेप लगातार गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती है, तो इसका असर केवल एक निर्यातक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे भारतीय चावल उद्योग की बाजार छवि और भविष्य के व्यापार पर पड़ सकता है।
इसी वजह से IREF ने निर्यात से पहले होने वाले परीक्षण को मजबूत करने पर जोर दिया है। महासंघ का मानना है कि बंदरगाह से खेप रवाना होने से पहले ही संभावित अनुपालन समस्याओं की पहचान कर ली जाए तो सीमा पर खेप के अस्वीकार होने का जोखिम कम किया जा सकता है।
कीटनाशक अवशेष बनी बड़ी चिंता
IREF ने विदेशी बाजारों में चावल की खेपों के सामने आने वाली कई तरह की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया है। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दों में से एक कीटनाशक अवशेष का निर्धारित सीमा से अधिक होना है।
अलग-अलग देशों और बाजारों में खाद्य उत्पादों के लिए अधिकतम अवशेष सीमा यानी Maximum Residue Limit (MRL) निर्धारित होती है। यदि किसी निर्यात खेप में किसी कीटनाशक का अवशेष संबंधित बाजार में स्वीकार्य सीमा से अधिक पाया जाता है, तो उस खेप को अनुपालन संबंधी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
IREF ने विशेष रूप से यूरोपीय संघ के बाजार का उल्लेख किया है, जहां आयातित खाद्य उत्पादों के लिए MRL व्यवस्था के तहत गैर-अनुपालन वाली खेपों को सीमा पर अस्वीकृति का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में भारतीय निर्यातकों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे उत्पादन के स्तर से ही अवशेष प्रबंधन और परीक्षण पर पर्याप्त ध्यान दें।
हालांकि IREF ने यह आंकड़ा जारी नहीं किया है कि चावल की कुल अस्वीकृत खेपों में से कितने प्रतिशत मामलों के लिए केवल कीटनाशक अवशेष जिम्मेदार हैं। इसलिए फिलहाल इस मुद्दे को चावल निर्यात में एक महत्वपूर्ण अनुपालन जोखिम के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके वास्तविक हिस्से का अलग से आंकलन उपलब्ध नहीं है।
सिर्फ कीटनाशक अवशेष ही नहीं हैं समस्या
चावल निर्यात में गुणवत्ता संबंधी चुनौतियां केवल कीटनाशक अवशेष तक सीमित नहीं हैं। IREF ने माइक्रोबियल और भौतिक संदूषण को भी खेपों के लिए संभावित समस्या बताया है।
इसके अलावा खरीदार और निर्यातक के बीच तय specifications में अंतर भी विवाद का कारण बन सकता है। किसी खरीदार द्वारा चावल की गुणवत्ता, आकार, नमी, पैकेजिंग या अन्य मानकों को लेकर विशेष शर्तें तय की गई हों और भेजी गई खेप उन शर्तों के अनुरूप न हो, तो भी समस्या उत्पन्न हो सकती है।
एक अन्य चुनौती परीक्षण व्यवस्था में अंतर से जुड़ी है। भारत में किए गए परीक्षण और आयात करने वाले देश की प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण के परिणामों में अंतर होने पर निर्यातक के लिए स्थिति जटिल हो सकती है। इसके साथ ही निर्यात दस्तावेजों में गलतियां भी सीमा पर अनुपालन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकती हैं।
इसलिए IREF का जोर पूरे निर्यात तंत्र को मजबूत करने पर है, जिसमें खेत से लेकर परीक्षण प्रयोगशाला, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और निर्यात दस्तावेजों तक प्रत्येक चरण को शामिल किया जाए।
बाजार पहुंच केवल बंदरगाह तक सीमित नहीं
IREF के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग ने इस मुद्दे को केवल दस्तावेजी प्रक्रिया के बजाय लंबे समय तक बाजार पहुंच बनाए रखने से जोड़कर देखा है। उनका कहना है कि बाजार तक पहुंच उस समय खत्म नहीं होती जब माल बंदरगाह से निकल जाता है, बल्कि तब पूरी होती है जब भेजी गई खेप खरीदार की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
यह दृष्टिकोण निर्यात अनुपालन की बदलती भूमिका को दिखाता है। पहले गुणवत्ता जांच को कई बार निर्यात प्रक्रिया का एक चरण माना जाता था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजारों में बढ़ते मानकों के साथ यह निर्यात प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है।
भारत के लिए इसका अर्थ है कि किसानों द्वारा खेत में इस्तेमाल किए जाने वाले कृषि रसायनों से लेकर निर्यातक द्वारा तैयार किए जाने वाले दस्तावेज तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला में मानकों का पालन सुनिश्चित करना होगा।
अक्टूबर में BIRC 2026 में उठेगा मुद्दा
IREF इस विषय को औपचारिक रूप से भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस (BIRC) 2026 में उठाने की तैयारी कर रहा है। यह सम्मेलन 23 से 25 अक्टूबर 2026 तक आयोजित होने वाला है।
महासंघ सम्मेलन में चावल की पूरी आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े अनुपालन जोखिम पर एक विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बना रहा है। इसमें खेत स्तर पर कीटनाशकों के इस्तेमाल से लेकर निर्यात दस्तावेजों तक के विभिन्न चरणों पर चर्चा की जाएगी।
IREF की योजना इस चर्चा के परिणामों को “BIRC 2026 Rice Export Compliance Alert” नाम से एक संदर्भ दस्तावेज के रूप में जारी करने की है। इसका उद्देश्य चावल उद्योग से जुड़े कारोबारियों को आगामी निर्यात सीजन से पहले अपने आंतरिक गुणवत्ता नियंत्रण को मजबूत करने में मदद करना है।
पहले के अध्ययनों से अलग है IREF का फोकस
2026 में भारत में कीटनाशक अवशेष और निर्यात अस्वीकृति से संबंधित दो अन्य अध्ययन भी सामने आए हैं। Crop Care Federation of India के एक अध्ययन में नौ वर्षों के घरेलू निगरानी आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। इसमें 209,000 से अधिक खाद्य नमूनों में 97.18 प्रतिशत नमूनों के अवशेष मानकों के अनुरूप होने की बात कही गई थी।
एक अन्य अध्ययन में 14 वर्षों के UNIDO rejection data का विश्लेषण करते हुए दावा किया गया कि भारत के निर्यात अस्वीकृति मामलों में केवल 19 प्रतिशत मामले कीटनाशक से संबंधित थे। शेष मामले लेबलिंग, संदूषण और अन्य गैर-कीटनाशक कारणों से जुड़े बताए गए।
IREF का वर्तमान हस्तक्षेप इन अध्ययनों से अलग है क्योंकि इसका फोकस विशेष रूप से चावल निर्यातकों की व्यावहारिक चुनौतियों पर है। यानी चर्चा केवल कुल अवशेष आंकड़ों पर नहीं, बल्कि बंदरगाहों, विदेशी खरीदारों और निर्यात खेपों के अनुपालन पर केंद्रित है।
छोटे किसानों से जुड़ी है बड़ी चुनौती
भारत का चावल उत्पादन और निर्यात एक व्यापक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर करता है। ऐसे में अलग-अलग क्षेत्रों में किसानों द्वारा कृषि रसायनों के इस्तेमाल की पद्धति में अंतर होना भी निर्यातकों के लिए चुनौती बन सकता है।
यदि किसी विदेशी बाजार में किसी विशेष कीटनाशक के लिए MRL कम है और किसान स्तर पर उसके इस्तेमाल, मात्रा या अंतिम छिड़काव और कटाई के बीच अंतराल का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता है, तो अंतिम उत्पाद में अवशेष का स्तर प्रभावित हो सकता है।
इसी कारण निर्यात अनुपालन का मुद्दा केवल निर्यातक या प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहता। इसमें किसान, कृषि सलाह, कीटनाशक उपयोग, फसल प्रबंधन, खरीद, प्रसंस्करण और परीक्षण सभी शामिल हो जाते हैं।
भारत के वैश्विक चावल कारोबार के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा
भारत के चावल निर्यात की बड़ी मात्रा को देखते हुए गुणवत्ता अनुपालन आने वाले समय में कारोबार का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रह सकता है। यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका जैसे बाजारों में खरीदारों की आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध कराना निर्यातकों के लिए जरूरी है।
IREF का pre-shipment testing पर जोर इसी दिशा में एक कदम है। यदि निर्यात से पहले संभावित गुणवत्ता या अवशेष संबंधी समस्या की पहचान हो जाती है, तो निर्यातक समय रहते आवश्यक सुधार कर सकता है।
हालांकि फिलहाल IREF ने चावल की कुल निर्यात अस्वीकृतियों में कीटनाशक अवशेष से जुड़ी समस्याओं का अलग से कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है। इसी तरह इस मुद्दे को लेकर केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति (CIBRC) या वाणिज्य मंत्रालय की ओर से किसी नई नियामकीय कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है।
इसलिए वर्तमान स्थिति को नई MRL नीति या नियामकीय बदलाव के बजाय उद्योग की ओर से उठाए गए अनुपालन प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। अक्टूबर में होने वाला BIRC 2026 इस विषय पर आगे की चर्चा और संभावित उद्योग-स्तरीय सुझावों के लिए महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।

