भारत सरकार ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड के पंजीकरण पर रोक लगा दी है और इस खरपतवारनाशी के लिए पहले से जारी सभी पंजीकरण प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 22 सितंबर 2026 को जारी आदेश S.O. 5234(E) के माध्यम से यह फैसला लिया। इसके साथ ही पैराक्वाट डाइक्लोराइड को लेकर कई महीनों से चल रही नियामकीय समीक्षा औपचारिक रूप से समाप्त हो गई है।
सरकार ने यह कदम जनता से प्राप्त आपत्तियों और सुझावों, विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों तथा कीटनाशक अधिनियम के तहत गठित पंजीकरण समिति के साथ विचार-विमर्श के बाद उठाया है। आदेश में सरकार ने कहा है कि पैराक्वाट डाइक्लोराइड का उपयोग मनुष्यों और पशुओं के लिए ऐसे गंभीर जोखिम पैदा करता है, जिनके कारण तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।
पंजीकरण प्रमाणपत्र किए गए रद्द
सरकार का यह आदेश राजपत्र यानी Official Gazette में प्रकाशित होने की तारीख से प्रभावी होगा। कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 9 के तहत पैराक्वाट डाइक्लोराइड के लिए जारी किए गए सभी पंजीकरण प्रमाणपत्र उसी तारीख से रद्द माने जाएंगे।
पंजीकरण समिति को इस उत्पाद से संबंधित सभी जारी प्रमाणपत्र वापस लेने के निर्देश दिए गए हैं। जिन प्रमाणपत्र धारकों द्वारा प्रमाणपत्र वापस नहीं किए जाएंगे, उनके खिलाफ कीटनाशक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
इसके साथ ही राज्य सरकारों को भी अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में इस प्रतिबंध को लागू करने के लिए कीटनाशक अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के अनुसार आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।
सरकार ने यह आदेश कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27(2) को धारा 28 के साथ पढ़ते हुए जारी किया है।
जुलाई में जारी हुआ था प्रतिबंध का मसौदा
पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर अंतिम फैसला जुलाई में जारी किए गए मसौदा अधिसूचना के बाद आया है। कृषि मंत्रालय ने 10 जुलाई 2026 को S.O. 3800(E) के माध्यम से प्रस्तावित अधिसूचना जारी की थी।
इस मसौदे में पैराक्वाट डाइक्लोराइड के निर्माण, आयात, परिवहन, वितरण, बिक्री और उपयोग पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। यह राजपत्र 13 जुलाई 2026 को जनता के लिए उपलब्ध कराया गया था और हितधारकों को अपनी आपत्तियां और सुझाव देने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था।
इसके बाद प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर विचार किया गया। सरकार ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और पंजीकरण समिति की सिफारिशों को भी अंतिम निर्णय में शामिल किया।
जनवरी में बनी थी विशेषज्ञ समिति
पैराक्वाट डाइक्लोराइड की समीक्षा की प्रक्रिया वर्ष की शुरुआत में शुरू हुई थी। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 14 जनवरी 2026 को एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस समिति को भारत में पैराक्वाट डाइक्लोराइड के पंजीकरण और इसके उपयोग को जारी रखने से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट 12 जून 2026 को केंद्र सरकार को सौंप दी। इसके बाद पंजीकरण समिति ने जून के अंतिम सप्ताह में अपनी 473वीं बैठक में विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर विचार किया।
इस बैठक में पैराक्वाट डाइक्लोराइड के साथ कीटनाशक कार्बोसल्फान की भी समीक्षा की गई। दोनों उत्पादों पर विचार करने के बाद पंजीकरण समिति ने अपनी सिफारिशें अलग-अलग सरकार को भेजीं।
स्वास्थ्य जोखिमों को बताया गया प्रमुख कारण
पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर प्रतिबंध की प्रक्रिया में इसके स्वास्थ्य जोखिमों को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया। मसौदा अधिसूचना में पंजीकरण समिति ने उल्लेख किया था कि पैराक्वाट डाइक्लोराइड को 70 से अधिक देशों में प्रतिबंधित या कड़े प्रतिबंधों के अधीन किया गया है।
समिति ने इसके उपयोग से जुड़े प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों और विषाक्तता के मामलों को भी गंभीर चिंता के रूप में देखा। समीक्षा में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया, जिनमें पैराक्वाट विषाक्तता से जुड़ी घटनाओं में मृत्यु दर अधिक रही है।
इसके अलावा किसी विशिष्ट antidote यानी विशेष प्रतिविष की उपलब्धता न होने को भी चिंता का विषय बताया गया। सरकार के अंतिम आदेश में भी मनुष्यों और पशुओं के लिए जोखिम को तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता से जोड़ा गया है।
खेतों में उपयोग को लेकर भी उठे सवाल
पैराक्वाट डाइक्लोराइड भारत में एक non-selective contact herbicide के रूप में पंजीकृत था। इसका अर्थ है कि यह खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसके संपर्क में आने वाले पौधों पर प्रभाव डाल सकता है।
समीक्षा के दौरान इसके खेतों में इस्तेमाल के तरीके को लेकर भी चर्चा हुई। पैराक्वाट का पंजीकृत उपयोग खरपतवार नियंत्रण के लिए था, लेकिन कुछ मामलों में इसे फसल को जल्दी सुखाने यानी crop desiccant के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।
मसौदा दस्तावेज में मूंग और सोयाबीन जैसी फसलों की यांत्रिक कटाई से पहले उन्हें सुखाने के लिए पैराक्वाट के उपयोग के मामलों का उल्लेख किया गया था। यह इस्तेमाल स्वीकृत लेबल उपयोग से अलग माना गया।
यानी नियामकीय समीक्षा में केवल उत्पाद के रासायनिक गुणों और स्वास्थ्य जोखिमों पर ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि खेत स्तर पर इसके वास्तविक इस्तेमाल के तरीकों को भी देखा गया।
अब क्या होगा बाजार पर असर?
सरकार के अंतिम आदेश के बाद पैराक्वाट डाइक्लोराइड के पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द होने से भारत के कृषि-रसायन बाजार पर इसका सीधा प्रभाव पड़ने की संभावना है। किसी कीटनाशक को भारत में वैध रूप से बनाने, आयात करने या बेचने के लिए वैध पंजीकरण आवश्यक होता है।
इसलिए पंजीकरण रद्द होने के बाद पैराक्वाट आधारित उत्पादों की बाजार में उपलब्धता पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा। हालांकि वितरण श्रृंखला में पहले से मौजूद स्टॉक के संबंध में राज्य स्तर पर किस तरह की कार्रवाई की जाती है, यह आगे महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा।
सरकार ने राज्यों को अधिनियम और नियमों के तहत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में विभिन्न राज्यों में प्रतिबंध लागू करने की प्रक्रिया और बाजार में मौजूद पुराने स्टॉक का प्रबंधन आने वाले समय में देखने वाली बात होगी।
वैकल्पिक खरपतवारनाशी की बढ़ेगी जरूरत
पैराक्वाट डाइक्लोराइड लंबे समय से विभिन्न कृषि परिस्थितियों में खरपतवार नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसके पंजीकरण और प्रमाणपत्र रद्द होने के बाद किसानों, कृषि-इनपुट विक्रेताओं और कंपनियों के सामने वैकल्पिक खरपतवार नियंत्रण विकल्पों की जरूरत बढ़ सकती है।
पैराक्वाट का इस्तेमाल बागानों, प्लांटेशन और कई खेत फसलों में खरपतवार प्रबंधन के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में इसका बाजार से हटना कृषि-रसायन कंपनियों की उत्पाद रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।
जिन कंपनियों के पास वैकल्पिक herbicide उत्पाद उपलब्ध हैं, उनके लिए बाजार में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। दूसरी ओर पैराक्वाट पर अधिक निर्भर कंपनियों और वितरकों को अपने उत्पाद पोर्टफोलियो तथा बाजार रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
कृषि रसायन उद्योग के लिए बड़ा नियामकीय फैसला
पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर यह फैसला भारत के कृषि-रसायन क्षेत्र में हाल के महत्वपूर्ण नियामकीय निर्णयों में शामिल है। सरकार ने इस निर्णय तक पहुंचने के लिए विशेषज्ञ समिति, सार्वजनिक आपत्तियों और पंजीकरण समिति की समीक्षा प्रक्रिया का सहारा लिया।
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि कृषि-रसायनों के पंजीकरण और उपयोग से जुड़े फैसलों में स्वास्थ्य सुरक्षा, खेतों में वास्तविक उपयोग और नियामकीय अनुपालन जैसे मुद्दों पर बढ़ता ध्यान है।
22 सितंबर 2026 का आदेश नए पंजीकरण को रोकने के साथ-साथ पहले जारी प्रमाणपत्रों को भी रद्द करता है। अब इसके प्रभाव का अगला चरण राज्यों द्वारा लागू किए जाने वाले कदमों और बाजार में मौजूद स्टॉक के प्रबंधन पर निर्भर करेगा।
पैराक्वाट डाइक्लोराइड के बाजार से बाहर होने के साथ भारत में खरपतवार नियंत्रण के लिए वैकल्पिक उत्पादों और प्रबंधन तकनीकों की भूमिका भी बढ़ सकती है। कृषि-रसायन कंपनियों, वितरकों और किसानों के लिए आने वाला समय इस बदलाव के अनुरूप रणनीति तैयार करने का होगा।

