• About
  • Advertise
  • Privacy & Policy
  • Contact
Fasal Kranti Agriculture News
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
  • Login
No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
No Result
View All Result
Fasal Kranti Agriculture News
No Result
View All Result
Home कृषि समाचार

अब जीन को ‘साइलेंट’ कर मारे जाएंगे कीट! खेती में RNAi बायोपेस्टिसाइड की नई क्रांति

RNAi बायोपेस्टिसाइड खेती में कीट नियंत्रण की नई तकनीक है। जानिए RNA इंटरफेरेंस कैसे काम करता है, इसके फायदे, चुनौतियां और भविष्य।

Vipin Mishra by Vipin Mishra
September 29, 2026
in कृषि समाचार
0
RNAi बायोपेस्टिसाइड से जीन साइलेंसिंग द्वारा कीट नियंत्रण
0
SHARES
5
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

खेती में कीट नियंत्रण की दुनिया तेजी से बदल रही है। अब कीटों को मारने के लिए हर बार तेज रसायनों की जरूरत नहीं होगी। वैज्ञानिक ऐसी तकनीक को खेत तक ले आए हैं, जिसमें कीट के शरीर में मौजूद एक खास जीन को ही ‘साइलेंट’ करके उसकी जीवन प्रक्रिया को बाधित किया जा सकता है। इस तकनीक का नाम है RNA इंटरफेरेंस यानी RNAi।

कभी प्रयोगशालाओं तक सीमित रही RNAi तकनीक अब व्यावसायिक फसल सुरक्षा उत्पादों तक पहुंच चुकी है। RNA इंटरफेरेंस से जुड़ी खोजों को 2006 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अब इस तकनीक ने एक और महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है। RNAi आधारित बायोपेस्टिसाइड को पंजीकरण मिलने के बाद यह तकनीक वास्तविक कृषि उपयोग की दिशा में प्रवेश कर चुकी है।

नेचर प्लांट्स में प्रकाशित नई समीक्षा में स्टीफन फ्लेचर, नीना मिटर और उनके सहयोगियों ने RNAi आधारित बायोपेस्टिसाइड के विकास की समीक्षा की है। वैज्ञानिकों के अनुसार अब सवाल केवल यह नहीं है कि RNAi आधारित उत्पाद काम करते हैं या नहीं। तकनीकी क्षमता काफी हद तक साबित हो चुकी है। अब असली सवाल है कि किसान, नियामक और उपभोक्ता इस नई तकनीक को कितनी तेजी से स्वीकार करते हैं।

आखिर RNAi करता क्या है?

RNAi को आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी जैविक प्रक्रिया है, जिसमें किसी खास जीन की गतिविधि को बंद किया जा सकता है।

इसके लिए वैज्ञानिक ऐसे डबल-स्ट्रैंडेड RNA यानी dsRNA तैयार करते हैं, जिसकी आनुवंशिक संरचना किसी खास कीट के महत्वपूर्ण जीन से मेल खाती है। जब यह RNA कीट के शरीर में पहुंचता है तो कोशिका की प्राकृतिक प्रणाली इसे छोटे-छोटे RNA अणुओं में बदल देती है।

इसके बाद ये छोटे RNA उस जीन से जुड़े मैसेंजर RNA को पहचानकर उसे नष्ट करने में मदद करते हैं। परिणाम यह होता है कि संबंधित प्रोटीन बनना बंद हो जाता है। यदि वह प्रोटीन कीट के जीवित रहने, भोजन करने या प्रजनन के लिए जरूरी है तो कीट कमजोर पड़ सकता है या उसकी मृत्यु हो सकती है।

यानी पारंपरिक कीटनाशक की तरह पूरे कीट शरीर पर व्यापक रासायनिक हमला करने के बजाय RNAi तकनीक एक खास आनुवंशिक लक्ष्य को निशाना बना सकती है।

प्रयोगशाला से खेत तक पहुंची तकनीक

RNAi कोई नई खोज नहीं है। इसकी वैज्ञानिक कहानी कई दशक पुरानी है। 1920 के दशक में वायरस से जुड़ी पौधों की बीमारियों के अध्ययन से ऐसे संकेत मिले थे, जिन्होंने आगे चलकर जीन साइलेंसिंग को समझने में मदद की।

1990 में पेटुनिया पौधों पर हुए प्रयोग और 1992 में Neurospora पर किए गए अध्ययनों ने भी इस क्षेत्र को आगे बढ़ाया। इसके बाद 1998 में एंड्रयू फायर और क्रेग मेलो ने Caenorhabditis elegans पर डबल-स्ट्रैंडेड RNA की मदद से जीन साइलेंसिंग का प्रभाव दिखाया।

इस खोज ने वैज्ञानिकों को यह समझने का रास्ता दिया कि dsRNA किस तरह किसी विशेष जीन की गतिविधि को रोक सकता है। बाद में Dicer और Argonaute जैसे प्रोटीनों की भूमिका सामने आई, जो RNAi प्रक्रिया के प्रमुख हिस्से हैं।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने इस प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया को कृषि में कीट नियंत्रण के लिए इस्तेमाल करने की दिशा में काम शुरू किया।

पहला बड़ा कदम: Colorado potato beetle पर हमला

RNAi आधारित बायोपेस्टिसाइड के व्यावसायिक विकास में Colorado potato beetle को लक्षित करने वाला उत्पाद महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

Calantha नामक स्प्रे योग्य dsRNA उत्पाद इस कीट के प्रोटीसम सबयूनिट बीटा-5 जीन को लक्षित करता है। अमेरिका में पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी EPA ने 2023 के अंत में इसके उत्पाद लेबल को मंजूरी दी।

इससे पहली बार यह स्पष्ट संकेत मिला कि RNA आधारित फसल सुरक्षा उत्पाद केवल वैज्ञानिक प्रयोग नहीं हैं, बल्कि नियामक प्रक्रिया से गुजरकर खेत में उपयोग के लिए बाजार तक पहुंच सकते हैं।

एक अन्य उत्पाद Norroa Varroa destructor माइट को लक्षित करता है। यह परजीवी माइट मधुमक्खियों की प्रबंधित कॉलोनियों के लिए बड़ी समस्या है। इसके अध्ययन में dsRNA आधारित तकनीक से माइट के प्रजनन को दबाने की संभावना सामने आई है।

हर कीट पर एक जैसा असर नहीं

RNAi तकनीक जितनी आकर्षक है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है। सबसे बड़ी समस्या है कि dsRNA को सही जगह और सही मात्रा में पहुंचाया जाए।

RNA एक नाजुक अणु है। कीट की आंत और पत्तियों की सतह पर मौजूद कुछ एंजाइम इसे जल्दी तोड़ सकते हैं। यही वजह है कि सभी कीट RNAi के प्रति समान संवेदनशील नहीं होते।

कई बीटल प्रजातियों में RNAi का प्रभाव अच्छा देखा गया है, जबकि कुछ लेपिडोप्टेरा कीटों और एफिड्स में इसका प्रभाव कमजोर हो सकता है। कुछ मामलों में dsRNA कोशिका के अंदर फंस जाता है या तेजी से टूट जाता है।

यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल RNA बनाने पर ही काम नहीं कर रहे, बल्कि उसे कीट के सही हिस्से तक सुरक्षित पहुंचाने की तकनीक भी विकसित कर रहे हैं।

नैनो टेक्नोलॉजी से मिल रहा नया रास्ता

RNA को सुरक्षित रखने और उसकी प्रभावशीलता बढ़ाने में नैनो टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

BioClay जैसी तकनीक में नैनो स्तर की परतों का इस्तेमाल करके RNA को पत्तियों की सतह पर अधिक समय तक बनाए रखने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा लिपोसोम, चिटोसान नैनोपार्टिकल, ग्राफीन क्वांटम डॉट और कृत्रिम झिल्ली आधारित नैनो संरचनाओं पर भी शोध हुआ है।

इन तकनीकों का उद्देश्य एक ही है—RNA को जल्दी टूटने से बचाना और उसे लक्ष्य जीव तक प्रभावी तरीके से पहुंचाना।

कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि पत्तियों पर लगाया गया dsRNA पौधे के अंदर गतिशील हो सकता है और रोगजनकों तक पहुंचकर उनके जीन को साइलेंस करने में भूमिका निभा सकता है।

अब कंप्यूटर तय करेगा कौन सा RNA बेहतर है

RNAi आधारित उत्पादों के विकास में कंप्यूटर और बायोइन्फॉर्मेटिक्स की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है।

वैज्ञानिक अब ऐसे सॉफ्टवेयर टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो यह पहचानने में मदद करते हैं कि कौन सा जीन लक्ष्य बनाने के लिए बेहतर होगा और किस RNA सीक्वेंस से अपेक्षित प्रभाव मिल सकता है।

dsRIP, dsRNAEngineer, SIREN और dsRNAmax जैसे प्लेटफॉर्म RNA डिजाइन, लक्ष्य जीन की पहचान और संभावित ऑफ-टारगेट प्रभावों का आकलन करने में मदद करते हैं।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RNA की सीक्वेंस यदि किसी गैर-लक्षित जीव के जीन से बहुत अधिक मेल खाती है, तो अनचाहा प्रभाव पैदा हो सकता है। इसलिए RNA डिजाइन में प्रभावशीलता के साथ-साथ सुरक्षा को भी देखा जाता है।

पर्यावरण के लिए कितनी सुरक्षित है यह तकनीक?

RNAi बायोपेस्टिसाइड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसका पर्यावरणीय व्यवहार है।

उपलब्ध अध्ययनों में कृषि मिट्टी और जल-तलछट प्रणालियों में dsRNA के तेजी से टूटने के संकेत मिले हैं। इसका मतलब है कि RNA के लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहने की संभावना पारंपरिक स्थायी प्रदूषकों की तुलना में कम हो सकती है।

मानव सुरक्षा को लेकर भी अध्ययन किए गए हैं। कुछ 28-दिवसीय मौखिक विषाक्तता अध्ययनों में चूहों पर प्रासंगिक मात्रा में प्रतिकूल प्रभाव नहीं मिले। साथ ही कंप्यूटेशनल विश्लेषण के जरिए संभावित गैर-लक्षित प्रभावों का आकलन किया जा रहा है।

लेकिन कीट भी हार मानने वाले नहीं!

किसी भी कीट नियंत्रण तकनीक के सामने सबसे बड़ी दीर्घकालिक चुनौती प्रतिरोध है। RNAi भी इससे पूरी तरह मुक्त नहीं है।

शोधकर्ताओं ने Colorado potato beetle और western corn rootworm में dsRNA के प्रति प्रतिरोध विकसित होने की संभावना का अध्ययन किया है। इसका मतलब है कि समय के साथ कुछ कीट आबादी RNAi के प्रभाव को कम करने की क्षमता विकसित कर सकती है।

हालांकि यहां एक दिलचस्प संभावना भी सामने आई है। RNAi के प्रति प्रतिरोधी बने कुछ बीटल लार्वा पारंपरिक छोटे-अणु वाले कीटनाशकों के प्रति अभी भी संवेदनशील रहे। इससे भविष्य में RNAi और पारंपरिक रसायनों को अलग-अलग mode of action के रूप में इस्तेमाल कर प्रतिरोध प्रबंधन की रणनीति बनाई जा सकती है।

असली परीक्षा खेत से ज्यादा बाजार में?

RNAi तकनीक की सफलता केवल प्रयोगशाला या खेत में प्रभावशीलता से तय नहीं होगी। किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा—उत्पाद कितना प्रभावी है और उसकी लागत कितनी है?

यदि किसी उत्पाद की कीमत ज्यादा है या उसका प्रभाव खेत की परिस्थितियों में स्थिर नहीं रहता, तो बड़े पैमाने पर किसान अपनाने में रुचि नहीं दिखा सकते हैं।

इसके अलावा नियामक प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। अलग-अलग देशों में RNA आधारित उत्पादों के लिए अलग-अलग नियम होने से कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंचने की लागत और समय बढ़ सकता है।

छोटी कंपनियों और कम क्षेत्रफल वाली फसलों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है।

जनता का भरोसा भी होगा निर्णायक

RNAi तकनीक के सामने सबसे दिलचस्प चुनौती शायद वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक है।

कई उपभोक्ताओं के लिए “जीन साइलेंसिंग” शब्द अपने आप में जटिल या चिंताजनक हो सकता है। कुछ लोग RNA आधारित स्प्रे को आनुवंशिक संशोधन से जोड़ सकते हैं, जबकि बाहरी रूप से लगाए जाने वाले RNAi उत्पादों का उद्देश्य किसी जीव के जीनोम को बदलना नहीं होता।

इसलिए वैज्ञानिकों, कंपनियों और नियामक संस्थाओं के लिए तकनीक की सुरक्षा और कार्यप्रणाली को सरल भाषा में समझाना महत्वपूर्ण होगा।

खेती के लिए कितना बड़ा बदलाव?

RNAi आधारित बायोपेस्टिसाइड अभी विकास के ऐसे मोड़ पर हैं, जहां विज्ञान से आगे बढ़कर व्यावसायिक कृषि की वास्तविक दुनिया में प्रवेश शुरू हो चुका है।

लक्षित जीन पर कार्रवाई, संभावित उच्च विशिष्टता, RNA का पर्यावरण में तेजी से टूटना और नई डिलीवरी तकनीकें इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख ताकतें हैं।

लेकिन बड़े पैमाने पर सफलता के लिए लागत, खेत में प्रभावशीलता, नियामक मंजूरी, प्रतिरोध प्रबंधन और किसानों व उपभोक्ताओं का भरोसा—इन सभी सवालों का समाधान जरूरी होगा।

यदि ये बाधाएं दूर होती हैं, तो आने वाले वर्षों में RNAi आधारित बायोपेस्टिसाइड एकीकृत कीट प्रबंधन यानी IPM का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। फसल सुरक्षा की यह तकनीक शायद उस दिशा की शुरुआत है, जहां कीट नियंत्रण का हथियार किसी जहरीले रसायन से ज्यादा एक सटीक आनुवंशिक संदेश होगा।

 

Tags: dsRNARNA इंटरफेरेंसRNAiकीट नियंत्रणकृषि तकनीककृषि समाचारजीन साइलेंसिंगजैव कीटनाशकफसल सुरक्षाबायोपेस्टिसाइड
Previous Post

पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर भारत सरकार का बड़ा फैसला, सभी पंजीकरण रद्द

Next Post

रबी 2026 की तैयारी: खाद उपलब्धता और संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर

Next Post
रबी 2026 की तैयारी में खाद और उर्वरक उपलब्धता पर जोर

रबी 2026 की तैयारी: खाद उपलब्धता और संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर

Recent Posts

  • Rabi Season 2026: रबी में फिर चलेगा ‘खेत बचाओ अभियान’ कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने किया बड़ा ऐलान
  • Drought Assessment: महाराष्ट्र में सूखे से निपटने के लिए सरकार सख्त, 11 विभागों के कर्मचारियों की छुट्टी कैंसिल
  • रबी 2026 की तैयारी: खाद उपलब्धता और संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर
  • अब जीन को ‘साइलेंट’ कर मारे जाएंगे कीट! खेती में RNAi बायोपेस्टिसाइड की नई क्रांति
  • पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर भारत सरकार का बड़ा फैसला, सभी पंजीकरण रद्द

Recent Comments

No comments to show.
Fasal Kranti is a leading monthly agricultural magazine dedicated to empowering Indian farmers. Published scince 2013 in Hindi, Punjabi, Marathi, and Gujarati, it provides valuable insights, modern farming techniques, and the latest agricultural updates. With a vision to support 21st-century farmers, Fasal Kranti strives to be a trusted source of knowledge and innovation in the agricultural sector.

Category

  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes

Newsletter

Subscribe to our Newsletter. You choose the topics of your interest and we’ll send you handpicked news and latest updates based on your choice.

Quick Links

  • Privacy policy
  • Terms and Conditions

Contact

Promote your brand with Fasalkranti. Connect with us for advertising.
  • E-Mail: info@fasalkranti.in
  • Phone: +91 9625941688
Copyrights © 2026. Fasal Kranti, Inc. All Rights Reserved. Maintained By Fasalkranti Team .

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry

© 2026 Fasalkranti - News and Magazine by Fasalkranti news.