भारत में गेहूं की खेती करने वाले बहुत से किसानों के सामने हर साल एक बड़ी परेशानी आती है। धान की कटाई में देरी, खेत में अधिक नमी, मजदूरों की कमी या मौसम खराब होने के कारण गेहूं की बुवाई सही समय पर नहीं हो पाती। जब नवंबर का महीना निकलने लगता है और दिसंबर आ जाता है, तब किसानों की चिंता बढ़ जाती है कि अब गेहूं बोने से अच्छी पैदावार मिलेगी या नहीं।
ऐसे समय में Late sowing यानी गेहूं की पछेती बुवाई के लिए सही किस्म का चुनाव बहुत जरूरी हो जाता है। सभी गेहूं की किस्में देर से बुवाई के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। कुछ किस्में समय पर बुवाई करने पर अच्छा उत्पादन देती हैं, लेकिन वही किस्में दिसंबर में बोने पर उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पातीं।
अच्छी बात यह है कि कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसे कई गेहूं के विकल्प विकसित किए हैं, जिन्हें देर से बुवाई वाली परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इनका चुनाव करते समय किसान को अपने क्षेत्र की जलवायु, सिंचाई की उपलब्धता और बुवाई की तारीख का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
इस लेख में हम जानेंगे कि 2026-27 के रबी सीजन के लिए गेहूं की कौन-सी किस्मों पर विचार किया जा सकता है, किस राज्य में कौन-सी varieties उपयुक्त हैं, दिसंबर में बुवाई करते समय किन गलतियों से बचना चाहिए और नई कृषि जानकारी किसानों के लिए किस तरह उपयोगी हो सकती है।
Late sowing क्या होती है और किसानों के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?
गेहूं की सामान्य बुवाई का समय अलग-अलग राज्यों में जलवायु के अनुसार बदलता है। उत्तर भारत के कई सिंचित क्षेत्रों में नवंबर का महीना गेहूं की बुवाई के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, जब किसान सामान्य अनुशंसित अवधि के बाद गेहूं बोता है, तो इसे Late sowing या पछेती बुवाई कहा जाता है।
गेहूं की देर से बुवाई होने पर पौधे को बढ़ने और बालियां विकसित करने के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिल सकता है। फसल के अंतिम विकास चरण में अधिक तापमान आने की आशंका भी बढ़ सकती है।
इसका असर दानों के भराव, पौधों की वृद्धि और अंतिम पैदावार पर पड़ सकता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि देर से बोई गई हर फसल खराब हो। सही किस्म, उचित सिंचाई और संतुलित पोषण से किसान नुकसान के जोखिम को कम कर सकते हैं। Late sowing के लिए बनाई या अनुशंसित किस्मों की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि वे अपने निर्धारित कृषि क्षेत्र में देरी से बुवाई की परिस्थितियों के लिए परखी गई होती हैं।
2026-27 का नया अपडेट: गेहूं की पछेती बुवाई में क्या बदला है?
रबी 2026-27 सीजन से पहले किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण जानकारी भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIWBR), करनाल की ओर से उपलब्ध कराई गई है।
संस्थान ने दिसंबर 2025 की फसल सलाह में उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और मध्य भारत के लिए अलग-अलग पछेती बुवाई वाली किस्मों की जानकारी दी थी। उस सलाह में संबंधित सिंचित क्षेत्रों के लिए 25 दिसंबर तक की बुवाई अवधि का उल्लेख था। यह पिछली फसल सलाह है, इसलिए इसे 2026-27 की अंतिम क्षेत्रीय सिफारिश मानने के बजाय नई सलाह से मिलाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, संस्थान के आधिकारिक बीज पोर्टल पर 1 सितंबर 2026 को जारी सूचना के अनुसार, किसानों के पंजीकरण और बीज बुकिंग के लिए पोर्टल 15 सितंबर 2026 से खोलने की घोषणा की गई थी। इससे किसान आधिकारिक माध्यम से बीज की उपलब्धता की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्थान की किस्मों की सूची में JKW 261, DBW 316 और DBW 425 जैसी किस्मों को अलग-अलग क्षेत्रों की Late sowing परिस्थितियों से जोड़ा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि पूरे भारत के लिए एक ही गेहूं की किस्म चुनना उचित नहीं होगा।
Late sowing के लिए गेहूं की प्रमुख varieties
गेहूं की सही किस्म के साथ बीज की गुणवत्ता, खेत की स्थिति और सिंचाई प्रबंधन भी उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।पहले एक नजर उन प्रमुख किस्मों पर डालते हैं, जिनका उल्लेख ICAR-IIWBR की दिसंबर 2025 की क्षेत्रीय सलाह या आधिकारिक किस्म सूची में मिलता है।
| कृषि क्षेत्र | देर से बुवाई के लिए प्रमुख किस्में |
|---|---|
| पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश | PBW 752, PBW 771, DBW 173, JKW 261, HD 3059, WH 1021 |
| बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल | DBW 316, PBW 833, DBW 107, HD 3118, JKW 261, PBW 752 |
| मध्य प्रदेश, गुजरात, मध्य भारत के संबंधित क्षेत्र | HD 3407, HI 1634, CG 1029, MP 3336 |
स्रोत: ICAR-IIWBR की 1 से 15 दिसंबर 2025 की फसल सलाह। संबंधित सूची सिंचित, पछेती बुवाई की परिस्थितियों के लिए थी। अब इन किस्मों के बारे में विस्तार से जानते हैं।
1. DBW 316 (करण प्रेमा): पूर्वी भारत के किसानों के लिए महत्वपूर्ण किस्म
DBW 316, जिसे करण प्रेमा नाम से भी जाना जाता है, गेहूं की ऐसी किस्म है जिसे विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र की सिंचित, पछेती बुवाई के लिए अनुशंसित किया गया है। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान की तकनीकी जानकारी के अनुसार, इस किस्म का रिलीज वर्ष 2023 है। इसे बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र की संबंधित कृषि परिस्थितियों में उपयोग के लिए सूचीबद्ध किया गया है। DBW 316 उन किसानों के लिए खास तौर पर विचार करने योग्य है जिनकी धान की कटाई नवंबर के आखिर तक चलती रहती है और गेहूं की बुवाई दिसंबर में पहुंच जाती है।
लेकिन सिर्फ यह देखकर कि किस्म देर से बुवाई के लिए है, इसे हर राज्य में नहीं बोना चाहिए। उदाहरण के लिए, पंजाब या हरियाणा के किसान को अपने क्षेत्र की अलग सूची देखनी होगी। DBW 316 की खास बातें:
-
उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र के लिए विकसित किस्म।
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सिंचित खेतों में पछेती बुवाई की अनुशंसित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त।
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धान के बाद देर से खाली होने वाले खेतों के लिए विचारणीय विकल्प।
बीज खरीदने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से इसकी मौजूदा अनुशंसा और उपलब्धता अवश्य जांचें।
2. JKW 261: पछेती बुवाई में ध्यान देने योग्य विकल्प
JKW 261 गेहूं की उन किस्मों में शामिल है जिनका उल्लेख संस्थान के आधिकारिक बीज पोर्टल पर Late sown श्रेणी में किया गया है।बीज पोर्टल पर इसे उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के लिए सूचीबद्ध किया गया है। वहीं दिसंबर 2025 की फसल सलाह में इसका नाम उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी, दोनों क्षेत्रों की पछेती बुवाई वाली सूची में आता है। इसलिए इसकी खेती से पहले राज्य-विशेष अनुशंसा की पुष्टि करना बेहतर है।यदि किसी किसान की बुवाई दिसंबर में होने वाली है, तो JKW 261 के बारे में अपने जिले के कृषि विशेषज्ञ से जानकारी लेना उपयोगी रहेगा।नई किस्म चुनते समय एक बात ध्यान रखनी चाहिए। खेत में अच्छा प्रदर्शन केवल किस्म के नाम से तय नहीं होता। मिट्टी की उर्वरता, तापमान, बीज की गुणवत्ता और समय पर सिंचाई भी महत्वपूर्ण होते हैं।किसान यदि JKW 261 को पहली बार अपना रहे हैं, तो पूरे खेत में लगाने से पहले सीमित क्षेत्र में परीक्षण करना व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
3. DBW 173: उत्तर-पश्चिमी भारत के लिए पछेती बुवाई का विकल्प
DBW 173 गेहूं की ऐसी किस्म है जिसके बारे में ICAR-IIWBR की वेबसाइट पर उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के लिए पछेती किस्म के रूप में जानकारी उपलब्ध है।इसका नाम संस्थान की दिसंबर 2025 की पछेती बुवाई वाली सूची में भी शामिल था।
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐसे किसान, जो देर से गेहूं लगाते हैं, अपने क्षेत्र की कृषि अनुशंसा के अनुसार इस किस्म पर विचार कर सकते हैं।हालांकि यह जरूरी है कि किसान पुराने लोकप्रिय नाम और वर्तमान क्षेत्रीय सिफारिश के बीच अंतर समझें।किसी किस्म के बारे में इंटरनेट पर अधिक जानकारी मिलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह हर परिस्थिति में सर्वोत्तम होगी। DBW 173 खरीदते समय बीज की प्रमाणिकता, अंकुरण क्षमता और स्थानीय उपलब्धता जांचना चाहिए।
4. HD 3059: दिसंबर में गेहूं बोने वाले किसानों के लिए विकल्प
HD 3059 का नाम गेहूं की पछेती बुवाई वाली किस्मों में लंबे समय से लिया जाता रहा है। दिसंबर 2025 की ICAR-IIWBR सलाह में इसे उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के लिए शामिल किया गया था।यदि गेहूं की बुवाई सामान्य अवधि से आगे निकल गई है, तो HD 3059 उन किस्मों में है जिनके बारे में किसान स्थानीय स्तर पर जानकारी ले सकते हैं।
लेकिन केवल पुरानी सफलता के आधार पर इसे चुनना समझदारी नहीं होगी। नई किस्मों की उपलब्धता, क्षेत्र में रोगों की स्थिति और मौसम के अनुसार किसानों के पास बेहतर या अधिक उपयुक्त विकल्प हो सकते हैं।HD 3059 के लिए भी यही नियम लागू होता है कि बुवाई की तारीख और क्षेत्रीय कृषि सलाह का मेल होना चाहिए।
5. PBW 752 और PBW 771: उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के विकल्प
गेहूं की पछेती बुवाई के लिए PBW 752 और PBW 771 का उल्लेख ICAR-IIWBR की दिसंबर 2025 की सलाह में उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के अंतर्गत किया गया है।इन किस्मों पर पंजाब, हरियाणा और आसपास के अनुशंसित क्षेत्रों के किसान विचार कर सकते हैं।
जहां धान की कटाई देर से होती है, वहां किसानों के सामने मुख्य चुनौती गेहूं की बुवाई जल्दी पूरी करने की होती है। ऐसी स्थिति में केवल उपज की संभावना नहीं, बल्कि उपलब्ध बीज और बुवाई की वास्तविक तारीख भी महत्वपूर्ण होती है।
यदि स्थानीय स्तर पर PBW 752 या PBW 771 की उपलब्धता है, तो किसान पहले कृषि विभाग से पुष्टि करें कि उनके जिले और बुवाई की अवधि के लिए कौन-सी किस्म अधिक उपयुक्त है।किसानों को यह भी समझना चाहिए कि सिंचित खेत के लिए सुझाई गई किस्म को बिना जांच के असिंचित खेत में लगाना जोखिम बढ़ा सकता है।
6. WH 1021: पछेती गेहूं की एक स्थापित किस्म
WH 1021 भी उत्तर-पश्चिमी भारत की पछेती बुवाई वाली सूची में शामिल रही है।इस किस्म पर उन किसानों को विचार करना चाहिए जो सिंचित स्थिति में देरी से बुवाई कर रहे हैं और जिनके क्षेत्र में इसकी आधिकारिक सिफारिश उपलब्ध है।WH 1021 जैसी पहले से स्थापित किस्मों की उपयोगिता यह है कि किसानों को इनके स्थानीय प्रदर्शन का अनुभव मिल सकता है।फिर भी किसी पड़ोसी खेत में अच्छा उत्पादन मिलने का अर्थ यह नहीं कि दूसरे किसान के खेत में भी उतना ही परिणाम मिलेगा।खेत की मिट्टी, सिंचाई, बुवाई का समय और प्रबंधन अलग होने के कारण फसल का प्रदर्शन बदल सकता है।
7. HD 3407, HI 1634 और MP 3336: मध्य भारत के लिए विकल्प
मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में गेहूं की खेती की परिस्थितियां उत्तर भारत से अलग होती हैं।तापमान, मिट्टी और सिंचाई व्यवस्था अलग होने के कारण यहां किस्म का चुनाव भी स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखकर करना चाहिए।ICAR-IIWBR की दिसंबर 2025 की सलाह में मध्य क्षेत्र के लिए HD 3407, HI 1634, CG 1029 और MP 3336 का उल्लेख किया गया था।जो किसान मध्य प्रदेश या गुजरात में दिसंबर के दौरान गेहूं की बुवाई करने की योजना बना रहे हैं, वे इन विकल्पों के बारे में स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।विशेष रूप से यह ध्यान रखें कि सभी राज्यों में एक जैसी बुवाई अवधि नहीं होती। कुछ क्षेत्रों में तापमान जल्दी बढ़ने लगता है, जिससे देर से बोई गई गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है।
8. DBW 425: नई जानकारी में शामिल एक और Late sowing किस्म
2026 में उपलब्ध ICAR-IIWBR के आधिकारिक बीज पोर्टल की किस्म सूची में DBW 425 को मध्य क्षेत्र यानी Central Zone की Late sowing श्रेणी में दिखाया गया है।यह जानकारी मध्य भारत के किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि पुराने विकल्पों के अलावा संस्थान की सूची में अन्य किस्में भी उपलब्ध हैं।हालांकि DBW 425 का नाम पोर्टल पर होने से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि इसका बीज हर जिले में उपलब्ध है या यह पहले से अनुशंसित सभी किस्मों से अधिक उत्पादन देती है।इसके बारे में बीज की उपलब्धता, उपयुक्त बुवाई अवधि और जिलेवार सिफारिश जानना आवश्यक है।
Late sowing और समय पर बुवाई वाली किस्मों में क्या अंतर है?
कई बार किसान सोचते हैं कि अधिक उत्पादन देने वाली किस्म को किसी भी समय बोया जा सकता है। यही सोच नुकसान का कारण बन सकती है।गेहूं की किस्मों का चयन और परीक्षण खास बुवाई परिस्थितियों में किया जाता है।कुछ किस्में जल्दी बुवाई और अधिक पोषण वाली परिस्थितियों के लिए उपयुक्त होती हैं। कुछ सामान्य बुवाई के लिए, जबकि कुछ किस्में पछेती बुवाई के लिए अनुशंसित होती हैं। उदाहरण के लिए DBW 370, DBW 371 और DBW 372 जैसी किस्मों को संस्थान की सूची में उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र की जल्दी बुवाई वाली श्रेणी में रखा गया है। इन्हें केवल नया या उन्नत नाम देखकर दिसंबर की पछेती बुवाई के लिए चुनना सही नहीं होगा।इसी तरह DBW 222 सामान्य समय पर बुवाई की परिस्थितियों के लिए सूचीबद्ध है।
इसलिए गेहूं की किस्म चुनते समय किसान को तीन सवाल जरूर पूछने चाहिए। पहला, किस्म किस कृषि क्षेत्र के लिए है? दूसरा, यह किस बुवाई अवधि के लिए अनुशंसित है? और तीसरा, इसे कितनी सिंचाई की आवश्यकता होती है? इन सवालों के जवाब मिलने के बाद सही विकल्प चुनना आसान हो जाता है।
Late sowing में गेहूं की बुवाई कब तक की जा सकती है?
पछेती बुवाई की अवधि सभी राज्यों में समान नहीं मानी जा सकती।ICAR-IIWBR की दिसंबर 2025 की फसल सलाह में उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और मध्य क्षेत्रों की सूचीबद्ध सिंचित किस्मों के लिए 25 दिसंबर तक की बुवाई अवधि दी गई थी।लेकिन इस तारीख को पूरे भारत में सभी किस्मों के लिए अंतिम सीमा नहीं समझना चाहिए।कुछ क्षेत्रों में नवंबर के अंत तक बुवाई बेहतर मानी जा सकती है, जबकि अन्य स्थानों पर दिसंबर में भी उपयुक्त परिस्थितियां मिल सकती हैं।
यदि किसान दिसंबर के अंतिम सप्ताह या जनवरी में गेहूं बोने की सोच रहा है, तो उसे विशेष सावधानी रखनी चाहिए। बहुत देर से बुवाई होने पर फसल के दाने भरने के समय गर्म मौसम का सामना करने का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए अत्यधिक देर से बुवाई की स्थिति में किसान अपने कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेकर ही किस्म और फसल का फैसला करें।
Late sowing में बीज की मात्रा कितनी रखनी चाहिए?
पछेती बुवाई में बीज की मात्रा एक महत्वपूर्ण विषय है।सामान्य समय पर बोई जाने वाली गेहूं की फसल और देर से बोई जाने वाली फसल की आवश्यकताएं अलग हो सकती हैं।
ICAR की पूर्व रबी कृषि सलाह में पछेती गेहूं के लिए बीज दर बढ़ाने की सिफारिश की गई थी। उसमें सामान्य बुवाई के मुकाबले लगभग 25 प्रतिशत अधिक बीज का उल्लेख मिलता है। हालांकि सही दर किस्म के दाने के आकार, अंकुरण क्षमता, बुवाई मशीन और स्थानीय सिफारिश पर निर्भर करेगी।यदि किसान केवल अनुमान लगाकर बहुत ज्यादा बीज डाल देता है, तो पौधों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।वहीं कम बीज डालने से खेत में पौधों की संख्या अपेक्षा से कम रह सकती है।सबसे अच्छा तरीका है कि प्रमाणित बीज के पैकेट पर दी गई जानकारी और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की अनुशंसा के अनुसार बीज दर तय की जाए।
https://icar.org.in/https://icar.org.in/पछेती बुवाई में खेत की तैयारी कैसे करें?
जब गेहूं की बुवाई पहले ही देर से हो रही हो, तब खेत की तैयारी में अनावश्यक समय नहीं लगाना चाहिए।धान की कटाई के बाद कई स्थानों पर खेत में फसल अवशेष रहते हैं। इन्हें जलाने के बजाय ऐसी बुवाई तकनीक अपनाई जा सकती है, जिससे खेत जल्दी तैयार हो और मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों की रक्षा भी हो।हैप्पी सीडर और स्मार्ट सीडर जैसी तकनीकें कुछ धान-गेहूं वाले क्षेत्रों में उपयोगी विकल्प हो सकती हैं।
इन मशीनों से उचित परिस्थितियों में फसल अवशेषों के साथ गेहूं की बुवाई की जा सकती है। इससे बार-बार जुताई की आवश्यकता घट सकती है और बुवाई में होने वाली देरी कम की जा सकती है।ICAR-IIWBR की दिसंबर 2025 की सलाह में भी फसल अवशेष न जलाने और उपयुक्त मशीन से बुवाई करने पर जोर दिया गया था।लेकिन किसान को यह जरूर देखना चाहिए कि खेत में नमी पर्याप्त हो और मशीन सही गहराई पर बीज डाल रही हो।बुवाई के समय मिट्टी का बहुत अधिक गीला या बहुत अधिक सूखा होना अंकुरण को प्रभावित कर सकता है।
Late sowing में सिंचाई का सही प्रबंधन
गेहूं की पछेती बुवाई में सिंचाई का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है।किसान अक्सर यह मान लेते हैं कि देर से बोई गई फसल को अधिक पानी देने से उसकी बढ़वार तेज हो जाएगी। लेकिन जरूरत से ज्यादा सिंचाई नुकसान पहुंचा सकती है।पहली सिंचाई का समय मिट्टी की नमी, बुवाई के तरीके और फसल के विकास पर निर्भर करता है।
गेहूं में जड़ों और कल्लों के विकास के शुरुआती चरण पर पर्याप्त नमी बनाए रखना आवश्यक है।हल्की मिट्टी में पानी जल्दी निकल सकता है, जबकि भारी मिट्टी में नमी अधिक समय तक रह सकती है। इसलिए हर खेत में सिंचाई का एक ही अंतराल रखना सही नहीं होगा।पछेती फसल में पानी की कमी और जलभराव, दोनों से बचना चाहिए।
यदि मौसम विभाग ने बारिश की संभावना बताई है तो किसान खेत की स्थिति देखकर सिंचाई का फैसला करें।इसके अतिरिक्त, जब पौधों में बालियां बनने और दानों के विकास का समय हो, तब पानी की कमी फसल के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है।
देर से बोए गए गेहूं में खाद का प्रबंधन कैसे करें?
सही किस्म चुनने के बाद खाद का संतुलित उपयोग भी उतना ही आवश्यक है।बहुत से किसान फसल की धीमी बढ़वार देखकर अधिक यूरिया डाल देते हैं। लेकिन पौधों का पीला पड़ना हमेशा नाइट्रोजन की कमी का संकेत नहीं होता।ठंड, मिट्टी में अधिक नमी, पोषक तत्वों की अनुपलब्धता और अन्य कारणों से भी पौधे पीले दिखाई दे सकते हैं।इसलिए बिना कारण पहचाने खाद बढ़ाना उचित नहीं है।
मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद की मात्रा तय करना बेहतर तरीका है।ICAR-IIWBR की दिसंबर 2025 की सलाह में नाइट्रोजन की आवश्यक मात्रा को बुवाई के लगभग 40 से 45 दिनों के भीतर पूरा करने और सिंचाई के समय का ध्यान रखने की बात कही गई थी।
Late sowing में खरपतवार नियंत्रण क्यों जरूरी है?
गेहूं के साथ उगने वाले खरपतवार पानी, पोषण और सूर्य की रोशनी के लिए फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं।देर से बोई गई गेहूं की फसल में बढ़वार के लिए समय सीमित हो सकता है। ऐसे में शुरुआती अवस्था में खरपतवारों की अधिकता फसल को प्रभावित कर सकती है।खेत में उगने वाले खरपतवारों की पहचान करना जरूरी है, क्योंकि सभी खरपतवारों के नियंत्रण का तरीका एक जैसा नहीं होता।
कुछ खेतों में संकरी पत्ती वाले खरपतवार अधिक होते हैं, जबकि कुछ स्थानों पर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार की समस्या होती है।किसान स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से खरपतवार की पहचान कराकर उपयुक्त नियंत्रण विधि चुनें।यदि खेत में पहले से खरपतवारनाशी के कम असर की समस्या रही है, तो उसे भी कृषि अधिकारी को बताना चाहिए।सही समय पर निगरानी, उचित बुवाई और फसल प्रबंधन से खरपतवारों के कारण होने वाली प्रतिस्पर्धा को कम किया जा सकता है।
बढ़ते तापमान से पछेती गेहूं को कैसे बचाएं?
हाल के वर्षों में गेहूं की खेती में मौसम की अनिश्चितता एक महत्वपूर्ण चिंता बनी हुई है।पछेती बुवाई करने वाले किसानों के लिए विशेष चुनौती यह होती है कि फसल का दाना भरने वाला चरण गर्म मौसम में पहुंच सकता हैजब अनुकूल अवधि कम हो जाती है, तो फसल को अपना विकास पूरा करने में कठिनाई हो सकती है।इसलिए केवल अधिक उत्पादन क्षमता वाली किस्म का प्रचार देखकर उसे चुनना उचित नहीं है। किसानों को यह देखना चाहिए कि किस्म उनके क्षेत्र में देर से बुवाई की परिस्थितियों के लिए अनुशंसित है या नहीं।इसके साथ खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना, पोषक तत्वों का सही प्रबंधन और नियमित निगरानी महत्वपूर्ण है।
यदि अचानक तापमान बढ़ने की संभावना हो तो किसान को स्थानीय कृषि मौसम सलाह का पालन करना चाहिए।मौसम संबंधी सूचना के लिए जिला कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र और आधिकारिक मौसम सेवाओं की जानकारी उपयोगी हो सकती है।
2026-27 में गेहूं का बीज खरीदते समय क्या सावधानी रखें?
अच्छी किस्म का नाम जानना पर्याप्त नहीं है। किसानों तक पहुंचने वाले बीज की गुणवत्ता भी अच्छी होनी चाहिए।बाजार में कई बार अलग-अलग नामों से गेहूं के बीज बेचे जाते हैं। किसान को किसी भी किस्म की खरीद केवल दुकानदार के बड़े उत्पादन के दावे के आधार पर नहीं करनी चाहिए।बीज खरीदते समय प्रमाणित या विश्वसनीय स्रोत को प्राथमिकता दें।बीज के पैकेट पर किस्म का पूरा नाम, लॉट नंबर, परीक्षण संबंधी जानकारी और पैकिंग की तारीख जांचें।किसानों को बीज का बिल भी संभालकर रखना चाहिए।किसी नई किस्म का प्रचार देखकर पूरे खेत में तुरंत बुवाई करने के बजाय स्थानीय कृषि अनुसंधान केंद्र से उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना बेहतर रहेगा।2026 की उपयोगी जानकारी: ICAR-IIWBR के आधिकारिक बीज पोर्टल पर किसानों के पंजीकरण और बीज बुकिंग की व्यवस्था की सूचना उपलब्ध है। किसान आधिकारिक IIWBR बीज पोर्टलपर संबंधित जानकारी देख सकते हैं।हालांकि पोर्टल पर किसी किस्म का नाम दिखाई देने का अर्थ यह नहीं है कि वह हर समय स्टॉक में उपलब्ध होगी।
Late sowing में किसानों को किन पांच गलतियों से बचना चाहिए?
पछेती गेहूं की खेती में कई छोटी गलतियां मिलकर उत्पादन और लागत पर बड़ा प्रभाव डाल सकती हैं।
- पहली गलती: गलत क्षेत्र की किस्म चुनना। पंजाब के लिए अनुशंसित गेहूं की किस्म को बिना स्थानीय पुष्टि के बिहार या मध्य प्रदेश में लगाना सही नहीं होगा।
- दूसरी गलती: सामान्य बुवाई वाली किस्म को बहुत देर से बोना। अधिक उपज देने वाली हर किस्म दिसंबर की बुवाई के लिए उपयुक्त नहीं होती।
- तीसरी गलती: खेत तैयार करने में अतिरिक्त समय लगाना। जहां उपयुक्त मशीन उपलब्ध हो, वहां कम जुताई या फसल अवशेष प्रबंधन वाली तकनीक पर विचार किया जा सकता है।
- चौथी गलती: अधिक खाद और पानी को बेहतर उत्पादन की गारंटी मान लेना। जरूरत से ज्यादा संसाधन लगाने पर लागत बढ़ सकती है और फसल प्रभावित हो सकती है।
- पांचवीं गलती: बिना जांचे बीज खरीदना। अच्छी किस्म भी खराब अंकुरण क्षमता वाले बीज से अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगी।
इन गलतियों से बचना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सही variety चुनना।
Late sowing के लिए कौन-सी varieties चुनें? राज्य के अनुसार समझें
यदि कोई किसान पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं की देर से बुवाई कर रहा है, तो वह PBW 752, PBW 771, DBW 173, JKW 261, HD 3059 और WH 1021 जैसी किस्मों की स्थानीय सिफारिश जांच सकता है।यदि किसान बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड या पश्चिम बंगाल से है, तो DBW 316, PBW 833, DBW 107 और HD 3118 सहित संबंधित क्षेत्र की सूची देख सकता है।वहीं मध्य प्रदेश और गुजरात के लिए HD 3407, HI 1634, CG 1029 और MP 3336 के बारे में जानकारी लेना उपयोगी हो सकता है।
जहां DBW 425 जैसी अन्य सूचीबद्ध किस्मों का बीज उपलब्ध हो, वहां भी स्थानीय सिफारिश के आधार पर चुनाव किया जाना चाहिए।ध्यान रहे कि ये विकल्प अलग-अलग आधिकारिक सूचियों से लिए गए हैं। इन्हें उत्पादन के आधार पर पहले से अंतिम स्थान तक की रैंकिंग नहीं माना जाना चाहिए।
Late sowing से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या दिसंबर में गेहूं की बुवाई करने से अच्छी पैदावार मिल सकती है?
हां, उपयुक्त कृषि क्षेत्रों में दिसंबर में गेहूं की बुवाई संभव है। हालांकि पैदावार किस्म, तापमान, खेत की स्थिति, सिंचाई और पोषण प्रबंधन पर निर्भर करेगी। सामान्य बुवाई की तुलना में देर से बुवाई का जोखिम अधिक हो सकता है।
Late sowing के लिए सबसे अच्छी गेहूं की किस्म कौन-सी है?
पूरे भारत के लिए एक ही किस्म को सबसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। उदाहरण के लिए DBW 316 उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र की पछेती बुवाई के लिए अनुशंसित है, जबकि उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की किस्मों की सूची अलग है।
क्या DBW 327 दिसंबर की पछेती बुवाई के लिए सही है?
DBW 327 को ICAR-IIWBR की सूची में जल्दी बुवाई वाली परिस्थितियों के लिए रखा गया है। इसलिए इसे बिना विशेष स्थानीय अनुशंसा के दिसंबर की पछेती बुवाई का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
क्या जनवरी में गेहूं की बुवाई कर सकते हैं?
कुछ स्थानों पर बहुत देर से बुवाई की संभावना हो सकती है, लेकिन जनवरी की बुवाई में मौसम और फसल अवधि से जुड़ा जोखिम बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेकर फैसला करना चाहिए।
क्या पछेती गेहूं में ज्यादा यूरिया डालना चाहिए?
नहीं। यूरिया की मात्रा केवल इस कारण नहीं बढ़ानी चाहिए कि बुवाई देर से हुई है। खाद का उपयोग मिट्टी परीक्षण, फसल की आवश्यकता और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार होना चाहिए।
2026-27 के लिए नई गेहूं की किस्मों की जानकारी कहां मिलेगी?
किसान ICAR-IIWBR के आधिकारिक पोर्टल, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विभाग और नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से नई सिफारिशों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
गेहूं की खेती में देर से बुवाई होना किसानों के लिए चिंता का विषय जरूर है, लेकिन सही योजना बनाकर इसके जोखिम को कम किया जा सकता है।Late sowing के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैसला सही किस्म का चुनाव है। इसके बाद प्रमाणित बीज, मिट्टी में उपयुक्त नमी, संतुलित खाद और समय पर सिंचाई पर ध्यान देना चाहिए।
2026-27 के रबी सीजन में किसान केवल नई किस्म के नाम पर भरोसा करने के बजाय उसकी आधिकारिक क्षेत्रीय सिफारिश जरूर जांचें। DBW 316, JKW 261, DBW 173, PBW 752 और अन्य किस्मों में से कौन-सी उनके खेत के लिए सही होगी, इसका निर्णय स्थानीय परिस्थितियों से ही होगा।यदि धान की कटाई देर से हुई है तो गेहूं की बुवाई में और अनावश्यक देरी करने से बचें। जहां उपयुक्त हो, वहां आधुनिक बुवाई मशीनों और फसल अवशेष प्रबंधन का सहारा लिया जा सकता है।अंत में किसान भाइयों के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि अच्छी पैदावार केवल महंगे बीज से नहीं मिलती। किस्म का सही चुनाव, बुवाई की उचित अवधि और पूरी फसल के दौरान अच्छा प्रबंधन मिलकर खेती को सफल बनाते हैं।

