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Home कृषि समाचार

झारखंड के 1,500 किसानों को वैज्ञानिक खेती की नई राह, शिवराज सिंह चौहान ने ICAR-IIAB की आधुनिक सुविधाओं का किया उद्घाटन

Shivraj Singh Chouhan inaugurated the modern facilities of ICAR-IIAB, which opened a new path....

Emran Khan by Emran Khan
October 9, 2026
in कृषि समाचार
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Shivraj Singh Chouhan inaugurated the modern facilities of ICAR-IIAB, which opened a new path to scientific farming for 1,500 farmers of Jharkhand.

Shivraj Singh Chouhan inaugurated the modern facilities of ICAR-IIAB, which opened a new path to scientific farming for 1,500 farmers of Jharkhand.

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झारखंड के किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने, फसल उत्पादकता बढ़ाने और खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-IIAB), रांची में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। गुरुवार, 8 अक्टूबर को संस्थान की ओर से अनुसूचित जाति उप-योजना (SCSP) और जनजातीय उप-योजना (TSP) के अंतर्गत प्री-रबी किसान गोष्ठी-सह-कृषि इनपुट वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें रांची, खूंटी, गुमला और रामगढ़ जिलों के लगभग 1,500 किसानों ने हिस्सा लिया।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को आगामी रबी सीजन की तैयारियों के लिए वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना, कृषि अनुसंधान में विकसित तकनीकों को खेतों तक पहुंचाना और किसानों, वैज्ञानिकों तथा नीति-निर्माताओं के बीच सीधा संवाद स्थापित करना था। इस अवसर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ICAR-IIAB की विभिन्न नई सुविधाओं का उद्घाटन किया। उन्होंने वैज्ञानिकों के ‘लैब टू लैंड’ प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि कृषि अनुसंधान का वास्तविक लाभ तभी है, जब उससे विकसित तकनीकें किसानों के खेतों तक पहुंचें और उनकी आय तथा उत्पादन क्षमता में सुधार लाएं।

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट, ICAR के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी. के. यादव तथा ICAR-IIAB के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित सहित कृषि अनुसंधान और संस्थान से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

ICAR-IIAB को मिलीं आधुनिक सुविधाएं, नई ब्रीडिंग फैसिलिटी का उद्घाटन

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ICAR-IIAB परिसर में विकसित विभिन्न नई सुविधाओं का उद्घाटन किया। इनमें एडमिन-कम-स्कूल भवन, बिरसा मुंडा बहुउद्देशीय सभागार, जयपाल सिंह मुंडा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और NEXTGEN Breeding Facility शामिल हैं। इसके साथ ही संस्थान में नए गेस्ट हाउस की आधारशिला भी रखी गई।

इन सुविधाओं का उद्देश्य संस्थान में अनुसंधान, शैक्षणिक गतिविधियों, वैज्ञानिक संवाद और प्रशिक्षण के लिए बेहतर आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराना है। आधुनिक Breeding Facility के माध्यम से फसल सुधार और उन्नत किस्मों के विकास से संबंधित अनुसंधान गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

कृषि क्षेत्र में बदलती परिस्थितियों के बीच बेहतर बीजों और स्थानीय जरूरतों के अनुकूल फसल किस्मों का विकास महत्वपूर्ण हो गया है। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की गुणवत्ता, पोषक तत्वों की कमी और उत्पादन लागत जैसी चुनौतियों के मद्देनजर कृषि अनुसंधान संस्थानों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में नई वैज्ञानिक सुविधाएं अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने और किसानों तक उपयोगी तकनीकों को पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

हालांकि, नई सुविधाओं की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इनके माध्यम से विकसित तकनीकों को कितनी प्रभावी ढंग से किसानों तक पहुंचाया जाता है और स्थानीय कृषि परिस्थितियों में उनका कितना लाभ मिलता है।

शिवराज सिंह चौहान बोले- पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय जरूरी

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने झारखंड की प्राकृतिक संपदा, पारंपरिक ज्ञान और जनजातीय संस्कृति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि झारखंड की जनजातीय परंपराओं में जल, पौधों और प्रकृति के संरक्षण का विशेष महत्व रहा है। इस पारंपरिक समझ को आधुनिक वैज्ञानिक कृषि के साथ जोड़कर खेती को अधिक टिकाऊ और उपयोगी बनाया जा सकता है।

उन्होंने ICAR-IIAB को अनुसंधान, नवाचार और आत्मनिर्भरता के संगम के रूप में रेखांकित किया। उनके अनुसार, वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। किसानों को वैज्ञानिक जानकारी, आधुनिक तकनीक और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता है।

केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि झारखंड जैसे राज्यों में फसलों और किस्मों का चयन स्थानीय मिट्टी, जलवायु, उपलब्ध संसाधनों और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही किसानों को उन्नत बीज समय पर उपलब्ध कराने और कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों को खेतों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है।

उन्होंने वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि वे प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को केवल शोध और प्रकाशनों तक सीमित न रखें, बल्कि किसानों को उनके व्यावहारिक उपयोग के बारे में भी जानकारी दें। ‘लैब टू लैंड’ की अवधारणा को मजबूत करने के लिए किसानों के साथ नियमित संवाद, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है।

संतुलित उर्वरक उपयोग और नकली कृषि उत्पादों पर नियंत्रण पर जोर

शिवराज सिंह चौहान ने खेती में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और उर्वरकों के उचित उपयोग को विशेष महत्व दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का इस्तेमाल करने के लिए जागरूक करना आवश्यक है। उर्वरकों का असंतुलित उपयोग न केवल खेती की लागत बढ़ा सकता है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकता है।

मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग, फसल की जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों की आपूर्ति और कृषि संसाधनों का बेहतर प्रबंधन वैज्ञानिक खेती के महत्वपूर्ण आधार हैं। किसानों को इन तरीकों के बारे में व्यावहारिक जानकारी देना रबी सीजन की तैयारियों के लिहाज से भी उपयोगी है।

केंद्रीय मंत्री ने नकली बीज, मिलावटी उर्वरक और घटिया कीटनाशकों की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे अपनी मेहनत और निवेश के अनुरूप बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकें।

उन्होंने किसान कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्रत्येक गांव तक पहुंचाने और आगामी रबी मौसम के लिए किसानों को वैज्ञानिक जानकारी तथा प्रशिक्षण उपलब्ध कराने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने आने वाले दिनों में देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू करने का आह्वान भी किया।

एकीकृत कृषि प्रणाली से किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं

केंद्रीय मंत्री ने एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System-IFS) को किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बताते हुए कहा कि खेती को केवल एक फसल तक सीमित रखने के बजाय सब्जियों, अनाज और पशुधन जैसी गतिविधियों को आपस में जोड़ने पर ध्यान देना चाहिए।

एकीकृत कृषि प्रणाली में फसल उत्पादन, पशुपालन और अन्य कृषि आधारित गतिविधियों को एक साथ संचालित किया जाता है। इसमें एक गतिविधि से निकलने वाले संसाधनों का दूसरी गतिविधि में उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन, पशुधन से प्राप्त जैविक खाद और कृषि अपशिष्ट का पुनर्चक्रण खेती में संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकता है।

झारखंड के छोटे और सीमांत किसानों के लिए ऐसी प्रणालियां विशेष रूप से प्रासंगिक हो सकती हैं, जहां खेती की लागत, सीमित संसाधन और मौसमी जोखिम आम चुनौतियां हैं। हालांकि, प्रत्येक किसान के लिए उपयुक्त मॉडल का चयन भूमि, पानी, श्रम, बाजार और उपलब्ध पूंजी को ध्यान में रखकर करना जरूरी है।

किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन देना कृषि को अधिक विविध और संसाधन-कुशल बनाने में सहायक हो सकता है।

भागीरथ चौधरी ने आधुनिक कृषि तकनीक और मृदा परीक्षण पर दिया जोर

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने अपने संबोधन में देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास में किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए किसानों तक आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों की पहुंच बढ़ाना आवश्यक है।

उन्होंने मूल्य संवर्धन (Value Addition), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय अपनी उपज की गुणवत्ता, प्रसंस्करण, बाजार संपर्क और बेहतर मूल्य प्राप्त करने के अवसरों के बारे में भी जागरूक करना जरूरी है।

राज्य मंत्री ने मृदा परीक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग को भी महत्वपूर्ण बताया। मिट्टी की पोषक स्थिति को समझकर खेती करने से किसानों को उर्वरकों के अधिक सटीक इस्तेमाल में मदद मिल सकती है। इससे अनावश्यक खर्च कम करने और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने की दिशा में सहायता मिल सकती है।

उन्होंने किसानों को अपनी कृषि भूमि के एक हिस्से में प्राकृतिक खेती का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके साथ ही नकली बीज, मिलावटी उर्वरक और घटिया कीटनाशकों से किसानों को सुरक्षित रखने तथा सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र किसानों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया।

पूर्वी भारत में कृषि विकास की बड़ी संभावनाएं: डॉ. एम. एल. जाट

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने पूर्वी भारत में कृषि क्षेत्र के विकास की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि झारखंड में कृषि अनुसंधान और ज्ञान आधारित संस्थानों को मजबूत करके किसानों के लिए नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

उन्होंने Rice-Fallow Intensification यानी धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में दूसरी फसलों की खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया। कई क्षेत्रों में धान की कटाई के बाद खेतों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त रबी फसलों को शामिल करके उपलब्ध भूमि और नमी का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि, इसके लिए मिट्टी में नमी, सिंचाई की उपलब्धता, फसल अवधि, बीजों की गुणवत्ता और बाजार की मांग जैसे कारकों का आकलन आवश्यक है। वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ फसल चक्र में विविधता लाने से किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और आय के अवसर मिल सकते हैं।

डॉ. जाट ने झारखंड में अम्लीय मिट्टी और फास्फोरस की कमी जैसी कृषि संबंधी चुनौतियों के समाधान के लिए अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। मिट्टी की प्रकृति और पोषक तत्वों की उपलब्धता फसल उत्पादन को सीधे प्रभावित करती है। इसलिए स्थानीय मिट्टी की विशेषताओं के अनुसार पोषक तत्व प्रबंधन और फसल चयन की तकनीक विकसित करना महत्वपूर्ण है।

उन्होंने पशुधन उत्पादकता बढ़ाने, प्राकृतिक एवं जैविक खेती को प्रोत्साहित करने तथा आगामी रबी सीजन के लिए उचित कृषि योजना तैयार करने पर भी बल दिया।

किसानों की जरूरतों के अनुसार हो कृषि अनुसंधान: डॉ. डी. के. यादव

ICAR के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी. के. यादव ने कृषि अनुसंधान को किसानों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान से विकसित तकनीकों को अंतिम किसान तक पहुंचाने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों, कृषि विस्तार तंत्र और किसानों के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए।

कृषि अनुसंधान का उद्देश्य केवल नई तकनीक विकसित करना नहीं, बल्कि उसे किसानों के लिए उपयोगी और व्यावहारिक बनाना भी है। इसके लिए खेतों में तकनीकों का प्रदर्शन, किसानों का प्रशिक्षण, स्थानीय समस्याओं का अध्ययन और तकनीकी सुझावों पर उनकी प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है।

उन्होंने विद्यार्थियों के विकास, उचित मार्गदर्शन और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। कृषि शिक्षा और अनुसंधान में प्रशिक्षित युवाओं की भागीदारी भविष्य में नई तकनीकों, नवाचारों और कृषि आधारित उद्यमों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है।

वैज्ञानिकों ने किसानों को रबी फसलों, पशुपालन और प्राकृतिक खेती की जानकारी दी

प्री-रबी किसान गोष्ठी में कृषि और पशुपालन से संबंधित विभिन्न विषयों पर किसानों को जानकारी दी गई। इसमें किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की भूमिका और अवसर, एथनो-वेटरिनरी मेडिसिन, डेयरी फार्मिंग, फल फसलों की उत्पादन तकनीक, रबी फसलों में समेकित कीट प्रबंधन (IPM), फसल विविधीकरण, एकीकृत कृषि प्रणाली, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, पशुधन आहार प्रबंधन और लाख की खेती शामिल रहे।

इन विषयों का चयन झारखंड के कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी माना जा सकता है। राज्य के कई किसानों की आजीविका खेती के साथ पशुपालन, बागवानी और अन्य कृषि आधारित गतिविधियों पर भी निर्भर करती है। ऐसे में विभिन्न कृषि गतिविधियों से जुड़ी जानकारी किसानों को उत्पादन प्रणाली बेहतर बनाने और उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करने में मदद कर सकती है।

समेकित कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management-IPM) में कीटों की निगरानी, कृषि पद्धतियों, जैविक उपायों और जरूरत के अनुसार कीटनाशकों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को महत्व दिया जाता है। इससे फसल सुरक्षा के साथ-साथ कृषि लागत और पर्यावरणीय प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिल सकती है।

इसी तरह, फल उत्पादन, डेयरी फार्मिंग, पशुधन आहार प्रबंधन और लाख की खेती पर प्रशिक्षण किसानों को अपनी मौजूदा कृषि गतिविधियों में सुधार करने तथा आय के वैकल्पिक स्रोतों की संभावनाएं तलाशने में सहायता कर सकता है।

गोष्ठी के दौरान किसानों ने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों से सीधे संवाद किया तथा उन्नत कृषि एवं पशुपालन पद्धतियों के संबंध में व्यावहारिक जानकारी प्राप्त की।

किसानों को बांटे गए उन्नत बीज, नैनो उर्वरक और पशुधन संबंधी इनपुट

कार्यक्रम के दौरान किसानों को आगामी कृषि गतिविधियों के लिए विभिन्न कृषि और पशुधन संबंधी इनपुट वितरित किए गए। इनमें नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, मिनरल मिक्सचर, उन्नत बीज, गेहूं, मटर, सरसों और सब्जियों के बीज किट शामिल थे।

इसके अलावा मिल्क कैन कूलर तथा उच्च उत्पादकता वाली टमाटर और बैंगन की बीज किस्में भी वितरित की गईं। इन इनपुट का उद्देश्य किसानों को खेती और पशुपालन से जुड़ी उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना तथा उन्हें बेहतर कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना था।

रबी सीजन में गेहूं, सरसों, मटर और अन्य फसलों की बुवाई से पहले गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। उपयुक्त किस्म का चयन, बीज की गुणवत्ता, समय पर बुवाई, मिट्टी की तैयारी और पोषक तत्व प्रबंधन फसल की शुरुआती बढ़वार तथा संभावित उत्पादन को प्रभावित करते हैं।

नैनो उर्वरकों सहित किसी भी कृषि इनपुट का उपयोग उत्पाद के निर्देशों, फसल की जरूरत और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करना चाहिए। मिट्टी परीक्षण तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को ध्यान में रखकर इनपुट का इस्तेमाल करने से किसानों को बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।

कार्यक्रम में ICAR संस्थानों द्वारा विकसित विभिन्न प्रकाशनों और प्रौद्योगिकियों का विमोचन भी किया गया, जिससे कृषि संबंधी जानकारी और अनुसंधान उपलब्धियों को किसानों तथा अन्य हितधारकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।

संस्थान की अनुसंधान इकाइयों का अवलोकन, किसानों से किया संवाद

कार्यक्रम से पहले केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों और ICAR-IIAB के अधिकारियों के साथ संस्थान की विभिन्न सुविधाओं का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने डेयरी फार्म, फसल अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, NEXTGEN Breeding Facility और एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) इकाई का दौरा किया।

डेयरी फार्म में उन्हें पशुधन के आनुवंशिक सुधार के लिए भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Transfer) तकनीक के बारे में जानकारी दी गई। यह तकनीक पशुधन प्रजनन और बेहतर आनुवंशिक गुणों के प्रसार से जुड़े वैज्ञानिक प्रयासों का हिस्सा है। इसका उपयोग प्रशिक्षित विशेषज्ञों और उचित पशु स्वास्थ्य प्रबंधन के अंतर्गत किया जाता है।

एकीकृत कृषि प्रणाली इकाई में राज्य मंत्री ने किसानों से संवाद किया और कृषि अपशिष्ट पुनर्चक्रण तथा संसाधन-कुशल कृषि पद्धतियों के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस प्रकार की प्रणालियों में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करके कृषि गतिविधियों के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया जाता है।

उन्होंने पौधरोपण कार्यक्रम में भी भाग लिया और प्रगतिशील किसानों से बातचीत की। इस अवसर पर ICAR संस्थानों तथा झारखंड सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें कृषि फसलों, पशुधन और डेयरी तकनीकों, अनुसंधान उपलब्धियों, सरकारी योजनाओं तथा किसानोन्मुख नवाचारों को प्रदर्शित किया गया।

कार्यक्रम के दौरान ICAR-IIAB के विकास और योगदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों को भी सम्मानित किया गया। इनमें डॉ. आर. रमानी, डॉ. के. के. शर्मा, डॉ. तिलक राज शर्मा और संस्थान के प्रथम नियमित निदेशक डॉ. अरुणव पटनायक शामिल रहे।

‘लैब टू लैंड’ से मजबूत होगा किसान-वैज्ञानिक संवाद

ICAR-IIAB के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित ने कार्यक्रम के समापन पर झारखंड के किसानों के हित में किसान, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता के बीच संवाद को मजबूत करने की संस्थान की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कृषि अनुसंधान और नवाचारों को खेतों तक पहुंचाने के महत्व पर जोर दिया।

इस आयोजन ने रबी सीजन की तैयारियों, आधुनिक कृषि तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण बीजों, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और एकीकृत कृषि प्रणाली जैसे विषयों पर किसानों को जानकारी देने के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराया।

झारखंड में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल चयन, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार, वर्षा जल और उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग, पशुधन प्रबंधन तथा किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण रहेगा। इसके साथ ही कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों का खेतों में प्रदर्शन और किसानों को नियमित प्रशिक्षण देना भी जरूरी है।

लगभग 1,500 किसानों की भागीदारी वाला यह प्री-रबी कार्यक्रम अनुसंधान संस्थानों और ग्रामीण कृषि समुदाय के बीच संपर्क मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा। अब इसकी सफलता इस बात से भी आंकी जाएगी कि किसान यहां प्राप्त जानकारी और तकनीकी मार्गदर्शन को अपने खेतों में किस तरह अपनाते हैं और उससे उत्पादन, लागत तथा कृषि आय में कितना सुधार होता है।

ICAR-IIAB, रांची में आयोजित प्री-रबी किसान गोष्ठी ने झारखंड में वैज्ञानिक और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने, कृषि अनुसंधान को किसानों से जोड़ने तथा उन्नत बीज, आधुनिक तकनीक और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व को सामने रखा। केंद्र सरकार, ICAR संस्थानों और राज्य के कृषि तंत्र के समन्वित प्रयासों से स्थानीय जरूरतों के अनुरूप तकनीकों को खेतों तक पहुंचाने और किसानों को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

 

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प्रक्रिया पर चर्चा की गई। डॉ. एम. एल. जाट ने सभी संस्थानों को निर्देश दिया कि वे तय दिशा-निर्देशों के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाले पाठ्यक्रम तैयार करें। इन्हें आंतरिक समीक्षा के बाद समय पर iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाए, ताकि कर्मचारियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण और सीखने के अवसर मिल सकें। इस पहल का उद्देश्य केवल ऑनलाइन कोर्स की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि कृषि अनुसंधान और शिक्षा से जुड़े कर्मचारियों के लिए व्यवस्थित, उपयोगी और निरंतर Learning Ecosystem विकसित करना है। इससे संस्थानों में क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने और मिशन कर्मयोगी के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। ICAR कर्मचारियों के लिए नियमित Learning पर विशेष जोर बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. एम. एल. जाट ने कहा कि सभी ICAR संस्थानों को पाठ्यक्रम विकास और डिजिटलीकरण के कार्य को निर्धारित समयसीमा में पूरा करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रमों को अपलोड करने से पहले उनकी उचित आंतरिक समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि सामग्री की गुणवत्ता और निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित हो सके। उन्होंने ICAR के सभी कर्मचारियों को iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म पर नियमित रूप से कम से कम दो घंटे Learning करने पर भी जोर दिया। इसके लिए संस्थानों को सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने और निर्धारित Learning Hours तथा Course Upload Targets को समय पर पूरा करने की आवश्यकता बताई गई। डिजिटल प्रशिक्षण व्यवस्था में नियमित भागीदारी कर्मचारियों को अपने कार्यक्षेत्र से संबंधित नई जानकारियां हासिल करने, Professional Competencies विकसित करने और कार्य प्रक्रियाओं को बेहतर समझने में सहायता कर सकती है। कृषि अनुसंधान जैसे तकनीकी क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां वैज्ञानिक ज्ञान, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और डिजिटल तकनीकों में लगातार बदलाव होते रहते हैं। हालांकि, ऑनलाइन प्रशिक्षण की प्रभावशीलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि पाठ्यक्रम कर्मचारियों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हों, उनकी सामग्री व्यावहारिक हो और प्राप्त ज्ञान का उपयोग कार्यस्थल पर किया जा सके। क्या है iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म? iGOT Karmayogi केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए विकसित एक डिजिटल Learning Platform है, जिसका उद्देश्य क्षमता निर्माण को अधिक व्यवस्थित, सुलभ और निरंतर बनाना है। यह मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को उनके कार्य, जिम्मेदारियों और व्यावसायिक जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस तरह के डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कर्मचारियों को अपनी सुविधा के अनुसार विभिन्न विषयों पर अध्ययन करने और नई दक्षताएं विकसित करने में मदद मिल सकती है। पारंपरिक प्रशिक्षण व्यवस्था में जहां कर्मचारियों को निर्धारित स्थान और समय पर उपस्थित होना पड़ता है, वहीं ऑनलाइन Learning से प्रशिक्षण सामग्री तक पहुंच अधिक लचीली हो सकती है। ICAR जैसे बड़े अनुसंधान नेटवर्क में इस प्रकार की व्यवस्था का विशेष महत्व है। परिषद के अंतर्गत विभिन्न संस्थान कृषि विज्ञान, फसल सुधार, पशुपालन, कृषि शिक्षा, जैव प्रौद्योगिकी और अन्य संबंधित क्षेत्रों में काम करते हैं। इन संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों की जरूरतें और विशेषज्ञता अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रम विकसित करने से कर्मचारियों को उनके कार्यक्षेत्र से संबंधित ज्ञान और कौशल हासिल करने के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि पाठ्यक्रमों की विषयवस्तु प्रासंगिक हो, उन्हें सरल डिजिटल प्रारूप में प्रस्तुत किया जाए और समय-समय पर उनकी समीक्षा की जाए। विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के निर्देश ICAR की समीक्षा बैठक में पाठ्यक्रम विकास के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया गया। डॉ. एम. एल. जाट ने संस्थानों को निर्देश दिया कि वे निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए पाठ्यक्रम तैयार करें और उन्हें अपलोड करने से पहले उचित Internal Review प्रक्रिया पूरी करें। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशिक्षण सामग्री स्पष्ट, उपयोगी और संबंधित विषय के अनुरूप हो। डिजिटल पाठ्यक्रम तैयार करते समय केवल जानकारी को ऑनलाइन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होता। सामग्री को इस तरह व्यवस्थित करना भी आवश्यक है कि कर्मचारी उसे आसानी से समझ सकें और अपने काम में उपयोग कर सकें। विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों के विकास में विशेषज्ञों की भागीदारी, सही तथ्यों का उपयोग, स्पष्ट Learning Objectives और व्यवस्थित प्रस्तुति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही पाठ्यक्रमों को निर्धारित समयसीमा में पूरा करना भी जरूरी है, ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लक्ष्य प्रभावित न हों। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि सभी ICAR संस्थान अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से लें और निर्धारित Course Upload Targets को पूरा करने के लिए समयबद्ध कार्रवाई करें। कृषि अनुसंधान संस्थानों में क्षमता निर्माण को मिलेगी मजबूती कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में लगातार नए वैज्ञानिक तरीकों, तकनीकों और कार्य प्रणालियों का विकास हो रहा है। ऐसे में कर्मचारियों की क्षमताओं को समय के साथ विकसित करना संस्थानों की कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। Capacity Building यानी क्षमता निर्माण का उद्देश्य कर्मचारियों के ज्ञान, कौशल और कार्य निष्पादन की क्षमता को बेहतर बनाना है। इसके अंतर्गत विषय से जुड़ी जानकारी के साथ-साथ डिजिटल दक्षता, प्रशासनिक कार्यप्रणाली, प्रबंधन और अन्य आवश्यक व्यावसायिक कौशल भी शामिल हो सकते हैं। ICAR के संदर्भ में विषय-विशिष्ट ऑनलाइन पाठ्यक्रम संस्थानों को प्रशिक्षण गतिविधियों को व्यवस्थित करने का अवसर दे सकते हैं। डिजिटल माध्यम से तैयार सामग्री को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जा सकता है, जिससे विभिन्न संस्थानों के कर्मचारियों को समान विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त करने में सुविधा हो सकती है। इसके अतिरिक्त, नियमित Learning से कर्मचारियों को अपनी विशेषज्ञता को अपडेट रखने और बदलती कार्य आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को तैयार करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए संस्थानों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रशिक्षण सामग्री केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर न रह जाए, बल्कि कर्मचारियों के वास्तविक कार्यों से जुड़ी हो। डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने समय पर कार्रवाई की आवश्यकता बताई बैठक की शुरुआत में ICAR के उप महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत परिषद के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए सभी ICAR संस्थानों द्वारा समय पर कार्रवाई करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने और राष्ट्रीय स्तर पर ICAR की रैंकिंग में सुधार लाने के लिए संस्थानों की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है। इसके लिए पाठ्यक्रम विकास, डिजिटलीकरण और नियमित Learning से संबंधित कार्यों को प्राथमिकता देने की जरूरत है। किसी बड़े संस्थागत नेटवर्क में प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने के लिए केवल केंद्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता। संबंधित संस्थानों को अपनी जिम्मेदारियों के अनुसार कार्य करना, प्रगति की समीक्षा करना और निर्धारित लक्ष्यों को समय पर पूरा करना भी आवश्यक होता है। इस दृष्टि से बैठक में संस्थानों की भागीदारी और समयबद्ध कार्य निष्पादन को महत्व दिया गया। नियमित समीक्षा से पाठ्यक्रम विकास की प्रगति पर नजर रखने और निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में आने वाली संभावित बाधाओं को पहचानने में सहायता मिल सकती है। कर्मयोगी भारत के विशेषज्ञ ने समझाई पाठ्यक्रम डिजिटलीकरण की प्रक्रिया बैठक के दौरान कर्मयोगी भारत के विशेषज्ञ श्री अश्विन ने प्रतिभागियों को पाठ्यक्रम सामग्री विकसित करने और उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने पाठ्यक्रम विकास के लिए उपलब्ध सूचीबद्ध एजेंसियों के बारे में भी बताया। इसके साथ ही उन्होंने गुणवत्तापूर्ण विषय-विशिष्ट Learning Material तैयार करने और उसे प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने से संबंधित तकनीकी सुझाव साझा किए। पाठ्यक्रमों का डिजिटलीकरण ऑनलाइन प्रशिक्षण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अंतर्गत प्रशिक्षण सामग्री को डिजिटल प्रारूप में तैयार करना, उसे उपयुक्त ढंग से व्यवस्थित करना और संबंधित प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना शामिल है। इस प्रक्रिया में तकनीकी मानकों तथा सामग्री की गुणवत्ता का ध्यान रखना आवश्यक होता है। बैठक में दी गई जानकारी का उद्देश्य ICAR संस्थानों को पाठ्यक्रम विकास और अपलोड प्रक्रिया में सहायता प्रदान करना था, ताकि वे निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप अपना कार्य पूरा कर सकें। Mission Karmayogi के तहत संस्थागत जवाबदेही पर जोर मिशन कर्मयोगी का व्यापक उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों की क्षमताओं को मजबूत करना और सरकारी कार्यप्रणाली को अधिक दक्ष, जवाबदेह तथा नागरिक-केंद्रित बनाने में सहायता करना है। इस संदर्भ में डिजिटल Learning और नियमित प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। ICAR में इस पहल के अंतर्गत विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों का विकास कृषि अनुसंधान और शिक्षा से जुड़े कर्मचारियों के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि, इसके लिए प्रशिक्षण की गुणवत्ता, कर्मचारियों की भागीदारी और पाठ्यक्रमों की समय पर उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। संस्थागत स्तर पर नियमित समीक्षा, जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण और निर्धारित समयसीमा का पालन प्रशिक्षण व्यवस्था को प्रभावी बनाने में योगदान दे सकते हैं। इसके साथ ही पाठ्यक्रमों की उपयोगिता का आकलन करना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि यह समझा जा सके कि प्रशिक्षण से कर्मचारियों के ज्ञान और कार्य निष्पादन में किस प्रकार सुधार हो रहा है। बैठक के समापन पर पाठ्यक्रम विकास और डिजिटलीकरण में तेजी लाने, आंतरिक समीक्षा के माध्यम से गुणवत्ता सुनिश्चित करने, निर्धारित Learning Hours पूरे करने और समयसीमा के भीतर पाठ्यक्रम अपलोड करने के निर्देश दोहराए गए। निष्कर्ष: डिजिटल प्रशिक्षण से मजबूत होगी ICAR की कार्यक्षमता ICAR की यह समीक्षा बैठक कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा से जुड़े संस्थानों में डिजिटल प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल है। iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म पर विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों का विकास और नियमित Learning कर्मचारियों को अपने ज्ञान तथा व्यावसायिक कौशल को बेहतर बनाने के अवसर प्रदान कर सकता है। डॉ. एम. एल. जाट द्वारा नियमित रूप से कम से कम दो घंटे Learning करने और पाठ्यक्रमों को निर्धारित समयसीमा में अपलोड करने पर दिया गया जोर इस पहल के कार्यान्वयन को महत्व देता है। वहीं, डॉ. यशपाल सिंह मलिक और कर्मयोगी भारत के विशेषज्ञ द्वारा साझा किए गए निर्देश तथा तकनीकी सुझाव संस्थानों को इस प्रक्रिया में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से दिए गए। आगे इस पहल की सफलता पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता, संस्थानों की सक्रिय भागीदारी और प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग पर निर्भर करेगी। यदि डिजिटल Learning को कर्मचारियों की वास्तविक जरूरतों के साथ जोड़ा जाता है, तो इससे ICAR की संस्थागत क्षमता मजबूत करने और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा से जुड़े कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।

ICAR में Mission Karmayogi को मिलेगी रफ्तार, वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के लिए विषय-विशिष्ट ऑनलाइन कोर्स पर जोर

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