रबी सीजन में सरसों की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए किसानों को बुवाई से पहले खेत की तैयारी, सही किस्म का चयन, बीजोपचार, खरपतवार नियंत्रण और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के सहयोग से सरसों की खेती के लिए कृषि परामर्श जारी किया है। इसमें किसानों को भूमि की तैयारी से लेकर बुवाई, बीज उपचार, उर्वरकों के उपयोग और सल्फर प्रबंधन तक के महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं।
इस कृषि परामर्श में पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए सरसों की उपयुक्त किस्मों, बुवाई के समय और प्रति एकड़ उर्वरक की अनुशंसित मात्रा का उल्लेख किया गया है। साथ ही, मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी की बचत करने, शुरुआती खरपतवारों पर नियंत्रण पाने और फसल को बीज एवं मिट्टी से फैलने वाले रोगों से बचाने के उपाय भी बताए गए हैं।
कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार, सरसों की खेती में शुरुआत से ही उचित प्रबंधन अपनाने से फसल की स्थापना बेहतर बनाने और उत्पादन संबंधी जोखिम कम करने में सहायता मिल सकती है। किसानों को अपनी भूमि, स्थानीय मौसम, सिंचाई की उपलब्धता और मिट्टी की जांच के आधार पर कृषि संबंधी निर्णय लेने चाहिए।
1. सरसों की खेती के लिए कैसी होनी चाहिए मिट्टी?
सरसों की फसल अच्छी जल निकासी वाली हल्की से मध्यम बनावट की मिट्टी में अच्छी तरह उगती है। इसलिए बुवाई से पहले खेत की स्थिति का आकलन करना और जल निकासी की व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है। खेत में पानी का अनावश्यक ठहराव फसल की बढ़वार को प्रभावित कर सकता है, जबकि उपयुक्त मिट्टी और उचित प्रबंधन फसल की स्थापना में मदद करते हैं।
परामर्श में सरसों को विभिन्न फसल चक्रों में शामिल करने की भी सिफारिश की गई है। इनमें धान-सरसों-सेसबानिया (हरी खाद) और मक्का-सरसों-मूंग जैसे फसल चक्र शामिल हैं। ऐसे फसल चक्रों की योजना बनाते समय किसानों को स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और संबंधित फसलों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए।
धान या मक्का की कटाई के बाद सरसों की समय पर बुवाई के लिए खेत तैयार करना विशेष महत्व रखता है। कटाई और बुवाई के बीच अनावश्यक देरी होने से फसल की स्थापना और आगे की कृषि गतिविधियों का समय प्रभावित हो सकता है।
2. खेत की तैयारी के लिए अपनाएं सही तरीका
सरसों की बुवाई से पहले भूमि की तैयारी फसल की शुरुआती वृद्धि और खरपतवार प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। परामर्श के अनुसार, प्रत्यक्ष बुवाई वाले धान (DSR) और मक्का की कटाई के बाद खेत तैयार करने के लिए दो बार हैरो चलाने, उसके बाद एक बार कल्टीवेटर चलाने और अंत में खेत को समतल करने के लिए पट्टा लगाने की सलाह दी गई है।
खेत को उचित तरीके से तैयार करने से बुवाई के लिए अनुकूल स्थिति बनाने में मदद मिलती है। हालांकि, खेत की वास्तविक स्थिति और उपलब्ध कृषि मशीनरी के अनुसार किसानों को उपयुक्त विधि अपनानी चाहिए।
परामर्श में मक्का की कटाई के बाद जीरो टिलेज (Zero Tillage) अपनाने का भी उल्लेख किया गया है। इस पद्धति में जुताई कम करने या बिना पारंपरिक जुताई के बुवाई करने पर जोर दिया जाता है। इससे मिट्टी की नमी संरक्षित करने, खरपतवारों को दबाने और सिंचाई की आवश्यकता कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके अतिरिक्त, स्थायी क्यारियों पर जीरो टिलेज ड्रिल से सरसों की बुवाई करने का विकल्प भी बताया गया है। इस विधि में समय पर बुवाई, मिट्टी की नमी का संरक्षण, पानी के अवशोषण और निकास में सुधार तथा खेती की लागत कम करने जैसे संभावित लाभ शामिल हैं।
3. बुवाई से पहले खरपतवार नियंत्रण पर दें ध्यान
सरसों की फसल के शुरुआती चरण में खरपतवारों का नियंत्रण आवश्यक है, क्योंकि खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्वों और अन्य संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। यदि शुरुआती अवस्था में इनका प्रबंधन उचित तरीके से नहीं किया जाए, तो फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है।
FAO के कृषि परामर्श में धान की कटाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करने का सुझाव दिया गया है, ताकि मिट्टी में मौजूद खरपतवारों के बीज अंकुरित हो सकें। परामर्श के अनुसार, शुरुआती खरपतवार लगभग पांच से सात दिनों में निकल आते हैं। इसके बाद सरसों की बुवाई से पहले हैरो या रोटावेटर से उथली जुताई करके अंकुरित खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य फसल की बुवाई से पहले खरपतवारों की संख्या कम करना है। इससे सरसों की शुरुआती वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल परिस्थितियां तैयार करने में मदद मिल सकती है।
परामर्श में बुवाई के 48 घंटे के भीतर पेंडीमेथालिन 30 प्रतिशत ईसी को 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशी के रूप में उपयोग करने की सलाह भी दी गई है। दस्तावेज में इसे चौड़ी पत्ती वाले और घास प्रजाति के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए प्रभावी बताया गया है।
हालांकि, किसी भी खरपतवारनाशी का उपयोग करने से पहले उत्पाद के लेबल, पंजीकृत उपयोग, निर्धारित मात्रा, फसल की अवस्था और सुरक्षा संबंधी निर्देशों की पुष्टि करना जरूरी है। रसायनों का उपयोग कृषि विशेषज्ञ की सलाह और स्थानीय रूप से लागू अनुशंसाओं के अनुसार ही करना चाहिए।
4. पंजाब और हरियाणा में सरसों की बुवाई का सही समय
सरसों की अच्छी स्थापना के लिए सही समय पर बुवाई करना महत्वपूर्ण है। कृषि परामर्श में पंजाब और हरियाणा के लिए अलग-अलग बुवाई अवधि बताई गई है।
पंजाब में सरसों की बुवाई का अनुशंसित समय मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक है। वहीं, हरियाणा में 30 सितंबर से 20 अक्टूबर तक बुवाई करने की सलाह दी गई है।
किसानों को इन समय-सीमाओं के साथ स्थानीय मौसम, मिट्टी में उपलब्ध नमी, पिछली फसल की कटाई और सिंचाई की उपलब्धता को भी ध्यान में रखना चाहिए। समय पर बुवाई से फसल को उसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
धान और मक्का की कटाई के बाद खेत तैयार करने वाले किसानों के लिए बुवाई की योजना पहले से बनाना उपयोगी रहेगा। इससे भूमि की तैयारी, बीज की व्यवस्था, बीजोपचार और उर्वरकों के प्रबंधन को समय पर पूरा किया जा सकता है।
5. पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए सरसों की उन्नत किस्में
कृषि परामर्श में पंजाब और हरियाणा के लिए कुछ सरसों की किस्मों और संकरों की जानकारी दी गई है। इनके साथ अनुमानित उपज, फसल अवधि और प्रमुख विशेषताओं का भी उल्लेख किया गया है।
पंजाब के लिए अनुशंसित किस्में
- PHR 127: लगभग 5 क्विंटल प्रति एकड़ की उल्लेखित उपज और 140 दिनों की अवधि। यह समय पर बोई गई फसल और सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त बताई गई है।
- PHR 126: लगभग 1 क्विंटल प्रति एकड़ की उल्लेखित उपज और 145 दिनों की अवधि। इसकी प्रमुख विशेषता उच्च तेल सामग्री बताई गई है।
- गिरिराज (Giriraj): लगभग 7 क्विंटल प्रति एकड़ की उल्लेखित उपज और 144 दिनों की अवधि। इसमें उच्च तेल सामग्री और अंतिम गर्मी सहन करने की विशेषता का उल्लेख है।
हरियाणा के लिए अनुशंसित किस्में
- RH 1706: लगभग 2 क्विंटल प्रति एकड़ की उल्लेखित उपज और 140 दिनों की अवधि। इसकी विशेषता मोटे बीज हैं।
- RH 1975: लगभग 6 क्विंटल प्रति एकड़ की उल्लेखित उपज और 144 दिनों की अवधि। इसे भी मोटे बीज वाली किस्म के रूप में दर्शाया गया है।
- RHH 2101: लगभग 12 क्विंटल प्रति एकड़ की उल्लेखित उपज और 140 दिनों की अवधि। इसमें अधिक शाखाएं और 5 प्रतिशत तेल सामग्री का उल्लेख किया गया है।
ये उपज आंकड़े कृषि परामर्श में दिए गए हैं। वास्तविक पैदावार मिट्टी की स्थिति, मौसम, सिंचाई, बीज की गुणवत्ता और फसल प्रबंधन के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। इसलिए किसानों को अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म चुनते समय स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह भी लेनी चाहिए।
6. प्रति एकड़ 1.5 किलोग्राम बीज का उपयोग करने की सलाह
सरसों की बुवाई में बीज की उचित मात्रा का उपयोग पौधों की सही संख्या प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। कृषि परामर्श में प्रति एकड़ 1.5 किलोग्राम सरसों के बीज का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
बीज की मात्रा के साथ बुवाई की गहराई, कतारों के बीच दूरी और खेत में नमी जैसी परिस्थितियां भी फसल की स्थापना को प्रभावित करती हैं। किसानों को संबंधित किस्म और स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के अनुसार बुवाई करनी चाहिए।
परामर्श में बीज ड्रिल या रिजर सीडर से नालियों में बुवाई करने के फायदे भी बताए गए हैं। इस पद्धति से यांत्रिक निराई को आसान बनाने, पानी की बचत करने और जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। मेड़ों पर बुवाई से जड़ों की वृद्धि के लिए बेहतर परिस्थितियां बनाने का भी उल्लेख है।
मक्का की कटाई के बाद स्थायी क्यारियों को दोबारा आकार देकर जीरो टिलेज ड्रिल से सरसों की बुवाई करना भी एक विकल्प है। इससे समय पर बुवाई और मिट्टी की नमी संरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
7. बीजोपचार से शुरुआती रोगों का जोखिम कम करने पर जोर
बुवाई से पहले बीजोपचार करने से फसल की शुरुआती अवस्था में बीज एवं मिट्टी से फैलने वाले कुछ रोगों के जोखिम को कम करने में सहायता मिल सकती है। कृषि परामर्श में सरसों के बीज के उपचार के लिए Pseudomonas putida स्ट्रेन MLE 8 का 250 ग्राम प्रति एकड़ उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। इसे 50 से 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर बीजों पर समान रूप से लेप करने की सलाह दी गई है।
परामर्श में तना सड़न (Stem Rot) के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम से प्रति किलोग्राम बीज पर दो ग्राम की दर से बीज उपचार का भी उल्लेख है। इसके साथ पिछले सरसों सीजन के संक्रमित फसल अवशेषों को हटाने की सलाह दी गई है, ताकि अल्टरनेरिया ब्लाइट (Alternaria Blight) और व्हाइट रस्ट (White Rust) के प्रबंधन में सहायता मिल सके।
बीजोपचार से स्वस्थ पौधों की शुरुआती स्थापना, अंकुरण और पौधों की शक्ति में सुधार जैसे लाभ मिल सकते हैं। परामर्श में जैविक एजेंटों के उपयोग से पोषक तत्वों की उपलब्धता और अवशोषण में सुधार की संभावना भी बताई गई है।
हालांकि, जैविक उत्पाद और रासायनिक बीजोपचार एक साथ या क्रमशः इस्तेमाल करने से पहले उनकी अनुकूलता की पुष्टि करना जरूरी है। किसानों को उत्पाद के लेबल, निर्धारित मात्रा और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही बीजोपचार करना चाहिए।
8. मिट्टी की जांच के आधार पर करें उर्वरकों का उपयोग
सरसों की फसल को संतुलित पोषण उपलब्ध कराने के लिए मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। कृषि परामर्श में किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) के अनुसार उर्वरक प्रबंधन करने की सलाह दी गई है।
दस्तावेज में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद छह टन प्रति एकड़ की दर से खेत में डालने का सुझाव है। इसे अधिमानतः बुवाई से दो सप्ताह पहले खेत में शामिल करने की सलाह दी गई है।
इसके अतिरिक्त, बीज को एजोटोबैक्टर (Azotobacter) से उपचारित करने का उल्लेख किया गया है। परामर्श के अनुसार, प्रति एकड़ एक पैकेट का उपयोग अनुशंसित दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाना चाहिए।
पोषक तत्वों के प्रबंधन में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की संतुलित आपूर्ति महत्वपूर्ण है। हालांकि, उर्वरकों की वास्तविक आवश्यकता खेत की मिट्टी और स्थानीय अनुशंसाओं के आधार पर तय की जानी चाहिए।
प्रति एकड़ उर्वरक की अनुशंसित मात्रा
| राज्य | यूरिया | सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) | म्यूरिएट ऑफ पोटाश (MOP) |
| पंजाब | 90 किलोग्राम | 75 किलोग्राम | 10 किलोग्राम |
| हरियाणा | 70 किलोग्राम | 75 किलोग्राम | 14 किलोग्राम |
कृषि परामर्श में उर्वरकों की मात्रा के लिए यही आंकड़े दिए गए हैं। खेत में उपयोग से पहले किसानों को संबंधित राज्य की नवीनतम कृषि अनुशंसाओं और मृदा स्वास्थ्य कार्ड से इनकी पुष्टि करनी चाहिए।
परामर्श में अनुशंसित नाइट्रोजन की आधी मात्रा को फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा के साथ बुवाई से पहले या बुवाई के समय डालने की सलाह दी गई है। शेष आधी नाइट्रोजन पहली सिंचाई के साथ देने का सुझाव है।
उर्वरकों का सही समय और उचित मात्रा में उपयोग पोषक तत्वों की उपलब्धता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। वहीं, बिना जरूरत अतिरिक्त उर्वरक डालने से लागत बढ़ सकती है। इसलिए मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर पोषण प्रबंधन करना अधिक उपयुक्त है।
9. सरसों में सल्फर की भूमिका को न करें नजरअंदाज
सरसों की खेती में सल्फर एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। कृषि परामर्श के अनुसार, सल्फर तेल के संश्लेषण, प्रोटीन निर्माण और पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायता करता है। इसकी पर्याप्त उपलब्धता बीज की गुणवत्ता और उपज में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है।
परामर्श में सल्फर की कमी होने पर बुवाई के समय प्रति एकड़ 80 किलोग्राम जिप्सम या 10 किलोग्राम बेंटोनाइट सल्फर डालने की सलाह दी गई है। इसके साथ प्रति एकड़ 25 किलोग्राम डीएपी और 35 किलोग्राम यूरिया का उल्लेख भी किया गया है।
किसानों को सल्फर की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए। बिना आवश्यकता किसी पोषक तत्व का अतिरिक्त उपयोग करने से लागत बढ़ सकती है और पोषण प्रबंधन असंतुलित हो सकता है।
सरसों में तेल उत्पादन की दृष्टि से सल्फर का महत्व होने के कारण पोषण प्रबंधन की योजना बनाते समय इसकी उपलब्धता पर ध्यान देना जरूरी है।
10. कृषि विज्ञान केंद्र से लें तकनीकी मार्गदर्शन
FAO के कृषि परामर्श में किसानों को अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विकास अधिकारी या किसान कॉल सेंटर से संपर्क करने की सलाह दी गई है। यह परामर्श राज्य कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज के आधार पर तैयार किया गया है और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के सहयोग से जारी किया गया है।
किसानों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे सरसों की खेती से जुड़े निर्णय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लें। सही किस्म का चयन, समय पर बुवाई, खेत की उचित तैयारी, खरपतवार प्रबंधन, बीजोपचार और संतुलित पोषण फसल की स्थापना में मदद कर सकते हैं।
इसके साथ ही, किसानों को रसायनों के जिम्मेदार उपयोग और पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा से जुड़े निर्देशों का पालन करना चाहिए। किसी भी कृषि रसायन का उपयोग करते समय निर्धारित मात्रा, सुरक्षा उपाय और उत्पाद के लेबल पर दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
शुरुआत में सही प्रबंधन से बेहतर हो सकती है सरसों की खेती
रबी सीजन में सरसों की अच्छी फसल लेने के लिए केवल उन्नत बीज का चयन पर्याप्त नहीं है। खेत की तैयारी से लेकर कटाई तक अपनाई जाने वाली कृषि पद्धतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। FAO और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से जारी परामर्श में भूमि की तैयारी, खरपतवार नियंत्रण, बीजोपचार, बुवाई की विधि और संतुलित पोषण प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया है।
पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए बुवाई के समय, किस्मों और उर्वरक प्रबंधन से जुड़ी जानकारी उपयोगी हो सकती है। हालांकि, किस्मों की उपज के आंकड़े और उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग परिणाम दे सकते हैं। इसलिए किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर खेती की योजना बनानी चाहिए।
समय पर बुवाई, उचित बीजोपचार, खरपतवारों का शुरुआती नियंत्रण और पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग सरसों की खेती को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

