देश की कृषि भूमि की उर्वरता बचाने, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के असंतुलित इस्तेमाल को कम करने और किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने हरियाणा के करनाल जिले के ऐतिहासिक कस्बे तरावड़ी से राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने किसानों को आगाह किया कि मिट्टी का स्वास्थ्य खराब होने का सीधा असर कृषि उत्पादन, खाद्य गुणवत्ता और मानव जीवन पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि खेतों की उर्वरता बनाए रखना केवल किसानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे देश का राष्ट्रीय कर्तव्य है।
केंद्रीय मंत्री ने घोषणा की कि 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक देशभर में व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत कृषि वैज्ञानिक, कृषि विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े विशेषज्ञ गांवों में जाकर किसानों को मिट्टी के स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल विविधीकरण और प्राकृतिक खेती के लाभों के बारे में जानकारी देंगे। कार्यक्रम में देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि संस्थानों से लाखों किसानों, वैज्ञानिकों तथा अधिकारियों के वर्चुअल माध्यम से जुड़ने की जानकारी दी गई।
इसी कार्यक्रम में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में श्री चौहान ने हरियाणा के ग्रामीण गरीब परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत 28,422 पक्के मकानों के निर्माण को मंजूरी से संबंधित स्वीकृति पत्र भी सौंपा। इसके लिए 1,343.06 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का उल्लेख किया गया। इस अवसर पर हरियाणा के कृषि एवं पशुपालन मंत्री श्री श्याम सिंह राणा सहित कृषि क्षेत्र के वैज्ञानिक, अधिकारी और बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे।
मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ा तो खेती और मानव जीवन पर पड़ेगा असर
किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मिट्टी कृषि उत्पादन का मूल आधार है। यदि भूमि की उर्वरता लगातार कम होती रही और रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का असंतुलित उपयोग जारी रहा, तो भविष्य में खेती के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी देश की कृषि भूमि और मिट्टी के बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जिस तरह मानव शरीर को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार और उचित देखभाल जरूरी है, उसी तरह खेतों की उत्पादकता बनाए रखने के लिए मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराना और उसका प्राकृतिक संतुलन सुरक्षित रखना जरूरी है। जरूरत से अधिक उर्वरक डालने से फसल उत्पादन में हमेशा उसी अनुपात में वृद्धि नहीं होती। इसके विपरीत, अनावश्यक खाद का इस्तेमाल किसानों की लागत बढ़ा सकता है और मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि खेतों को बचाने का अभियान मानव जीवन की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। भोजन मानव जीवन की बुनियादी जरूरत है और उसकी गुणवत्ता का संबंध कृषि उत्पादन से है। इसलिए मिट्टी, पानी और पर्यावरण की रक्षा करते हुए सुरक्षित एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की आवश्यकता है।
हरियाणा के किसानों ने देश को दिखाई नई राह
श्री चौहान ने हरियाणा के किसानों की मेहनत, लगन और कृषि क्षेत्र में नए प्रयोग अपनाने की क्षमता की सराहना की। उन्होंने कहा कि हरियाणा के प्रगतिशील किसानों ने कृषि विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और उनके अनुभव दूसरे राज्यों के किसानों के लिए भी उपयोगी साबित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हरियाणा के किसान मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी कृषि पद्धतियों में बदलाव और आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जब किसान नई तकनीकों, फसल विविधीकरण और प्राकृतिक खेती जैसे विकल्पों पर काम करते हैं, तो उनके अनुभव दूसरे किसानों तक पहुंचाना भी जरूरी हो जाता है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ‘खेत बचाओ अभियान’ का उद्देश्य किसानों को केवल सलाह देना नहीं, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक जानकारी और व्यावहारिक समाधान उपलब्ध कराना है। कृषि वैज्ञानिकों को गांवों तक पहुंचकर किसानों की समस्याएं समझनी चाहिए और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मार्गदर्शन देना चाहिए।
सस्ती खाद का मतलब अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं
किसानों को उर्वरकों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल का संदेश देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए भारी सब्सिडी दे रही है। उन्होंने बताया कि सरकार उर्वरकों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सहायता उपलब्ध करा रही है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद किसानों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ कम रखा जा सके।
उन्होंने यूरिया और डीएपी के उपयोग में सावधानी बरतने की अपील करते हुए कहा कि खाद सस्ती होने का अर्थ यह नहीं है कि उसका इस्तेमाल जरूरत से अधिक किया जाए। खेत में चार-चार बोरे यूरिया डालने से उत्पादन अपने आप नहीं बढ़ जाता। उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की वास्तविक जरूरत, फसल की मांग और वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार होना चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसान अपनी मेहनत की कमाई को अनावश्यक खाद पर खर्च करने से बचाएं। उर्वरकों की मात्रा निर्धारित करते समय मिट्टी की जांच और फसल की पोषण आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से खेती की लागत को नियंत्रित करने और भूमि की उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने भविष्य में हरित अमोनिया के उपयोग को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, हरित अमोनिया भारत को उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में योगदान दे सकता है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर करें खाद का इस्तेमाल
केंद्रीय मंत्री ने किसानों से अपील की कि वे उर्वरक डालने से पहले अपने मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) की जांच करें। इस कार्ड के माध्यम से मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति और उनकी कमी के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके आधार पर किसान तय कर सकते हैं कि खेत को किन पोषक तत्वों की आवश्यकता है और किसकी मात्रा कम या अधिक रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि बिना मिट्टी की जरूरत समझे लगातार एक ही प्रकार की खाद डालना उचित नहीं है। फसल की आवश्यकताओं और मिट्टी की स्थिति के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने से संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
किसानों को सलाह दी गई कि वे कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विभाग के विशेषज्ञों से संपर्क कर अपने खेत के लिए उपयुक्त उर्वरक योजना तैयार करें। स्थानीय मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता, फसल की किस्म और मौसम के अनुसार पोषण प्रबंधन में बदलाव करना भी जरूरी है।
फसल चक्र में बदलाव से बढ़ेगी मिट्टी की सेहत
‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत फसल विविधीकरण को भी प्रमुखता दी गई है। श्री चौहान ने किसानों से बार-बार धान और गेहूं की खेती करने के बजाय फसल चक्र में बदलाव करने तथा चना, मसूर और अरहर जैसी दलहनी फसलों को शामिल करने की अपील की।
दलहनी फसलें अपनी जड़ों में मौजूद विशेष जीवाणुओं की मदद से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में योगदान देती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों के प्रबंधन में सहायता मिल सकती है। फसल चक्र में बदलाव से किसानों को खेती की एक ही पद्धति पर निर्भरता कम करने का अवसर भी मिलता है।
हालांकि, फसल विविधीकरण अपनाते समय किसानों को स्थानीय जलवायु, मिट्टी, बाजार की मांग, सिंचाई की उपलब्धता और फसल की लाभप्रदता का आकलन करना चाहिए। वैज्ञानिक सलाह के आधार पर तैयार किया गया फसल चक्र भूमि की उत्पादकता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
आधे एकड़ से प्राकृतिक खेती शुरू करने की अपील
केंद्रीय मंत्री ने किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर धीरे-धीरे बढ़ने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को शुरुआत में अपनी पूरी जमीन को प्राकृतिक खेती में बदलने की आवश्यकता नहीं है। वे अपनी कुल भूमि के एक छोटे हिस्से, कम से कम आधे एकड़, से इसकी शुरुआत कर सकते हैं।
उन्होंने बीजामृत और घन जीवामृत जैसे प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाले इनपुट के उपयोग का उल्लेख किया। इनका उद्देश्य खेती में स्थानीय जैविक संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाना और रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयास करना है।
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को अपने खेत की मिट्टी, फसल, सिंचाई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेने की जरूरत है। छोटे क्षेत्र में प्रयोग करने से किसान लागत, फसल की स्थिति और उत्पादन के परिणामों का आकलन कर सकते हैं। इसके बाद अनुभव के आधार पर प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।
श्री चौहान ने प्राकृतिक खेती को खेती की लागत घटाने, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और घरेलू उपयोग के लिए रसायनों पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि, उत्पादन और लागत पर इसके परिणाम खेत की परिस्थितियों तथा अपनाई गई तकनीकों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
फसल अवशेष जलाने से नष्ट होते हैं मिट्टी के उपयोगी जीव
केंद्रीय मंत्री ने फसल अवशेष जलाने की प्रथा पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि खेत में आग लगाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों, कीटों तथा केंचुओं को नुकसान पहुंच सकता है। ये जीव मिट्टी की प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जैविक पदार्थों के विघटन और पोषक तत्वों के चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने किसानों से अपील की कि फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनके उचित प्रबंधन के विकल्प अपनाएं। अवशेषों को खेत में उचित तरीके से प्रबंधित करने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बनाए रखने और भूमि के स्वास्थ्य की रक्षा करने में सहायता मिल सकती है।
फसल अवशेष प्रबंधन के लिए किसानों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मशीनरी, कृषि विभाग की सलाह और फसल की परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त तकनीक चुननी चाहिए। समय पर अवशेषों का प्रबंधन करने से अगली फसल की बुवाई और खेत की तैयारी को भी बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है।
22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक गांव-गांव पहुंचेंगे वैज्ञानिक
‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक देशभर में जन-जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। केंद्रीय मंत्री ने कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक, वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों से अपील की कि वे प्रयोगशालाओं और कार्यालयों से बाहर निकलकर गांवों में किसानों के साथ सीधे संवाद करें।
इस अभियान में किसानों को मिट्टी की जांच, उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल, फसल विविधीकरण, प्राकृतिक खेती और फसल अवशेष प्रबंधन के बारे में जानकारी देने पर जोर रहेगा। गांवों में बैठकें और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर वैज्ञानिक सलाह को किसानों तक पहुंचाने की योजना है।
कृषि वैज्ञानिकों और किसानों के बीच सीधा संवाद स्थानीय समस्याओं की पहचान करने और उनके समाधान के लिए उपयोगी हो सकता है। किसानों को भी अपनी मिट्टी की स्थिति, फसल की जरूरतों और खेती में आने वाली चुनौतियों के बारे में विशेषज्ञों से चर्चा करने का अवसर मिलेगा।
हरियाणा के 28,422 गरीब परिवारों को पक्के मकानों की मंजूरी
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने हरियाणा के ग्रामीण गरीब परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत 28,422 पक्के मकानों के निर्माण की स्वीकृति से संबंधित पत्र हरियाणा के कृषि एवं पशुपालन मंत्री श्री श्याम सिंह राणा को सौंपा।
इस योजना के तहत 1,343.06 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का उल्लेख किया गया। इस स्वीकृति से पात्र ग्रामीण परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराने के प्रयासों को गति मिलने की उम्मीद है।
कृषि सम्मेलन में इस घोषणा ने ग्रामीण विकास और किसानों के हित से जुड़े विषयों को भी प्रमुखता दी। कार्यक्रम का मुख्य केंद्र खेतों की उर्वरता बचाना और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना रहा, जबकि आवास योजना की स्वीकृति ग्रामीण परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण विकास संबंधी पहल के रूप में सामने आई।
किसानों ने खेतों की रक्षा का लिया सामूहिक संकल्प
कार्यक्रम के समापन पर केंद्रीय मंत्री की अपील पर उपस्थित किसानों ने अपने खेतों की सेहत की रक्षा करने का सामूहिक संकल्प लिया। किसानों ने संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल चक्र में बदलाव, फसल अवशेष नहीं जलाने और प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने की दिशा में प्रयास करने का संकल्प व्यक्त किया। इस दौरान ‘भारत माता की जय’ के नारे भी लगाए गए।
कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक एवं कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. मांगी लाल जाट, हरियाणा के अतिरिक्त मुख्य सचिव (कृषि) श्री विजेंद्र कुमार सहित कृषि वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों और बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इस अवसर पर ‘खेत बचाओ अभियान’ से संबंधित पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।
मिट्टी बचाने की पहल, टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
तरावड़ी से शुरू किया गया ‘खेत बचाओ अभियान’ मिट्टी के स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की पहल है। इसका उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना और खेती में ऐसे तरीकों को प्रोत्साहित करना है, जिनसे भूमि की उत्पादकता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सके।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर उर्वरकों का उपयोग, फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करना, प्राकृतिक खेती के छोटे प्रयोग और फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन इस अभियान के प्रमुख संदेश हैं। यदि इन उपायों को स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार अपनाया जाता है, तो मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा और खेती की दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में मदद मिल सकती है।
केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया कि खेतों को बचाना केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा से जुड़ा दायित्व है। देशभर में चलने वाला यह अभियान किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से इस लक्ष्य को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास करेगा।

