फसल की अच्छी पैदावार के लिए केवल खाद डालना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझना भी जरूरी है कि खेत की मिट्टी में मौजूद पोषक तत्व पौधों को कितनी आसानी से मिल पा रहे हैं। कई बार किसान यूरिया, डीएपी और पोटाश का इस्तेमाल निर्धारित मात्रा में करते हैं, फिर भी फसल की बढ़वार अपेक्षा के अनुसार नहीं होती। इसकी एक वजह मिट्टी का असंतुलित पीएच (pH) हो सकता है।
मिट्टी का पीएच यह बताता है कि मिट्टी अम्लीय है, तटस्थ है या क्षारीय। इसका सीधा संबंध पोषक तत्वों की उपलब्धता, कुछ तत्वों की विषाक्तता और पौधों की जड़ों की सक्रियता से है। इसलिए खाद की मात्रा तय करने के साथ मिट्टी की स्थिति समझना भी जरूरी है।
मिट्टी का पीएच क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
मिट्टी का पीएच सामान्यतः 0 से 14 के पैमाने पर मापा जाता है। पीएच 7 को तटस्थ माना जाता है, 7 से कम मान अम्लीय और 7 से अधिक मान क्षारीय स्थिति को दर्शाते हैं। अधिकांश कृषि फसलों के लिए हल्की अम्लीय से तटस्थ के आसपास की मिट्टी अनुकूल रहती है, लेकिन सही सीमा फसल और मिट्टी के प्रकार के अनुसार बदल सकती है।
मिट्टी का पीएच पोषक तत्वों की घुलनशीलता और रासायनिक रूप को प्रभावित करता है। इससे यह तय होता है कि मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, लोहा, जस्ता और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों को कितनी मात्रा में उपलब्ध हो सकेंगे।
यदि पीएच फसल के लिए उपयुक्त सीमा से बाहर चला जाए, तो मिट्टी में पोषक तत्व मौजूद होने के बावजूद पौधों को उनकी कमी महसूस हो सकती है। ऐसी स्थिति में केवल अधिक खाद डालना समस्या का सही समाधान नहीं होता।
अम्लीय मिट्टी में खाद का असर कैसे बदलता है?
जब मिट्टी का पीएच 7 से कम होता है, तो उसे अम्लीय मिट्टी कहा जाता है। ऐसी मिट्टी कुछ क्षेत्रों में अधिक वर्षा, लंबे समय तक मिट्टी से क्षारीय तत्वों के बहकर निकलने और मूल चट्टानों की प्रकृति जैसे कारणों से बन सकती है।
अम्लीय मिट्टी में फॉस्फोरस की उपलब्धता कम हो सकती है, क्योंकि वह मिट्टी में मौजूद लोहा और एल्युमिनियम के साथ ऐसे यौगिक बना सकता है जिन्हें पौधे आसानी से उपयोग नहीं कर पाते। इसके अलावा, अत्यधिक अम्लीय परिस्थितियों में एल्युमिनियम और मैंगनीज की घुलनशीलता बढ़ सकती है। इनकी अधिक मात्रा जड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है और पौधों की वृद्धि प्रभावित कर सकती है।
कैल्शियम, मैग्नीशियम और मोलिब्डेनम जैसे पोषक तत्वों की उपलब्धता भी अम्लीय मिट्टी में कम हो सकती है। इससे पौधों की सामान्य वृद्धि और पोषण संतुलन प्रभावित होता है।
ऐसी मिट्टी में किसान यदि केवल यूरिया या डीएपी की मात्रा बढ़ाते रहें, तो जरूरी नहीं कि फसल की समस्या दूर हो जाए। पहले मिट्टी का पीएच और पोषक तत्वों की स्थिति जांचना जरूरी है। जरूरत होने पर कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार चूना या अन्य उपयुक्त सुधारक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्षारीय मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता
पीएच 7 से अधिक होने पर मिट्टी क्षारीय कहलाती है। हालांकि, हल्की क्षारीय मिट्टी और अत्यधिक क्षारीय मिट्टी का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। मिट्टी की लवणता, सोडियम की मात्रा और बनावट भी यह निर्धारित करती है कि फसल पर कितना असर पड़ेगा।
क्षारीय मिट्टी में लोहा, जस्ता, मैंगनीज और कुछ अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता घट सकती है। इससे पौधों की नई पत्तियों में पीलापन, कमजोर बढ़वार और अन्य कमी के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, केवल पत्तियों के रंग से पोषक तत्वों की कमी का निश्चित निदान नहीं किया जा सकता।
उच्च पीएच वाली मिट्टी में फॉस्फोरस कैल्शियम के साथ ऐसे यौगिक बना सकता है जिनकी उपलब्धता कम होती है। इससे फॉस्फोरस देने के बावजूद पौधे को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता।
क्षारीय मिट्टी में सुधार का तरीका उसकी वास्तविक प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि मिट्टी में सोडियम की अधिकता के कारण संरचना खराब हो रही है, तो जिप्सम जैसे सुधारक की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन हर क्षारीय मिट्टी में जिप्सम डालना उचित नहीं है। पहले मिट्टी परीक्षण से पीएच, विद्युत चालकता और जरूरत पड़ने पर विनिमेय सोडियम की स्थिति समझनी चाहिए।
मिट्टी के पीएच का प्रमुख पोषक तत्वों पर प्रभाव
मिट्टी का पीएच अलग-अलग पोषक तत्वों को अलग तरह से प्रभावित करता है।
- नाइट्रोजन: नाइट्रोजन की उपलब्धता मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता, तापमान, नमी और जैविक पदार्थों के विघटन पर निर्भर करती है। अत्यधिक अम्लीय या क्षारीय परिस्थितियां इन प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती हैं। सतह पर यूरिया डालने के बाद कुछ परिस्थितियों में अमोनिया के रूप में नाइट्रोजन की हानि भी हो सकती है।
- फॉस्फोरस: बहुत अम्लीय मिट्टी में लोहा और एल्युमिनियम तथा क्षारीय मिट्टी में कैल्शियम के साथ प्रतिक्रियाओं के कारण फॉस्फोरस की उपलब्धता कम हो सकती है।
- पोटैशियम: इसकी उपलब्धता पर मिट्टी की बनावट, चिकनी मिट्टी के खनिज, दूसरे धनायनों की मात्रा और पोषक तत्वों का संतुलन भी असर डालता है। केवल पीएच के आधार पर पोटाश की जरूरत तय नहीं करनी चाहिए।
- लोहा और जस्ता: उच्च पीएच वाली मिट्टी में इनकी उपलब्धता अक्सर कम हो जाती है। इससे पौधों में कमी के लक्षण दिख सकते हैं।
- कैल्शियम और मैग्नीशियम: अत्यधिक अम्लीय मिट्टी में इनकी कमी का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि क्षारीय मिट्टी में इनकी मौजूदगी और पौधों को उपलब्ध होने की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
इसलिए खाद का चुनाव केवल फसल के नाम या पिछली बार इस्तेमाल की गई मात्रा के आधार पर नहीं, बल्कि मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के आधार पर करना चाहिए।
मिट्टी सुधारने के लिए कौन-से उपाय अपनाएं?
मिट्टी सुधारने का पहला कदम उसका परीक्षण कराना है। मिट्टी की जांच से पीएच के साथ-साथ जैविक कार्बन, प्रमुख पोषक तत्वों और जरूरत के अनुसार लवणता या सोडियम की स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
- अम्लीय मिट्टी में चूने का प्रयोग
अम्लीय मिट्टी में कृषि चूना या अन्य उपयुक्त चूना सामग्री का इस्तेमाल पीएच सुधारने के लिए किया जा सकता है। इसकी मात्रा मिट्टी की अम्लता, बनावट और चूना आवश्यकता पर निर्भर करती है। बिना जांच के मनमानी मात्रा डालने से बचना चाहिए। बहुत अधिक चूना देने से कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता घट सकती है।
- क्षारीय या सोडियम प्रभावित मिट्टी का सुधार
यदि मिट्टी में विनिमेय सोडियम अधिक है और उसकी संरचना प्रभावित हो गई है, तो मिट्टी परीक्षण के आधार पर जिप्सम की जरूरत तय की जा सकती है। इसके साथ निकासी की उपयुक्त व्यवस्था और पर्याप्त गुणवत्ता वाले पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण हो सकती है। केवल जिप्सम डालने से हर तरह की क्षारीयता दूर नहीं होती।
- जैविक पदार्थ बढ़ाना
गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, कम्पोस्ट और उपयुक्त फसल अवशेषों के इस्तेमाल से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद मिलती है। इससे मिट्टी की संरचना, जलधारण क्षमता और सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को लाभ हो सकता है। हालांकि, जैविक खाद अकेले अत्यधिक अम्लीय या सोडियम प्रभावित मिट्टी की समस्या का पूरा समाधान नहीं है।
- उर्वरकों का सही चयन और प्रयोग
खाद की मात्रा मिट्टी परीक्षण और फसल की पोषण जरूरत के अनुसार निर्धारित करें। जहां फॉस्फोरस की उपलब्धता कम हो, वहां केवल उसकी कुल मात्रा बढ़ाने के बजाय मिट्टी की स्थिति और उपयुक्त उर्वरक प्रबंधन पर ध्यान दें। यूरिया का प्रयोग सही समय और उचित विधि से करने से नाइट्रोजन के बेहतर उपयोग में मदद मिल सकती है।
- सिंचाई के पानी की गुणवत्ता जांचें
कुछ क्षेत्रों में सिंचाई के पानी में लवण या सोडियम की अधिकता मिट्टी की स्थिति बिगाड़ सकती है। ऐसी जगह पानी की गुणवत्ता की जांच और खेत में जल निकासी का प्रबंधन भी मिट्टी सुधार योजना का हिस्सा होना चाहिए।
मिट्टी का पीएच सुधारने में जल्दबाजी न करें
मिट्टी का पीएच बदलना हमेशा तुरंत होने वाली प्रक्रिया नहीं है। सुधार की गति मिट्टी की बनावट, उसकी बफर क्षमता, सुधारक की गुणवत्ता और मात्रा, नमी तथा प्रबंधन पर निर्भर करती है। इसलिए एक बार सुधारक डालने के बाद बिना जांच के बार-बार उसका प्रयोग करना उचित नहीं है।
किसान को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पीएच की समस्या और लवणता की समस्या अलग हो सकती हैं। कुछ मिट्टियों में पीएच सामान्य होने के बावजूद लवणता फसल की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह, हर पीली पत्ती का कारण मिट्टी का पीएच नहीं होता; जलभराव, जड़ों की बीमारी, कीट या दूसरे पोषक तत्वों की कमी भी इसके कारण हो सकते हैं।
निष्कर्ष
मिट्टी का पीएच खाद की उपयोगिता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। अम्लीय मिट्टी में फॉस्फोरस और कुछ अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो सकती है, जबकि क्षारीय मिट्टी में लोहा और जस्ता जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते।
इसलिए अच्छी पैदावार के लिए केवल खाद की मात्रा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। मिट्टी परीक्षण, जरूरत के अनुसार सुधारक का प्रयोग, जैविक पदार्थों का प्रबंधन और संतुलित उर्वरक उपयोग मिलकर मिट्टी की सेहत बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। सही खाद वही है, जो फसल की जरूरत और मिट्टी की वास्तविक स्थिति के अनुसार दी जाए।
