खेती में अच्छी पैदावार के लिए पौधों को संतुलित पोषण देना जरूरी है। इसके लिए किसान मुख्य रूप से यूरिया, डीएपी और एनपीके जैसे रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी ओर, जैव उर्वरक भी हैं, जिनमें उपयोगी सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं। ये सूक्ष्मजीव मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और पौधों को पोषण प्राप्त करने में मदद करते हैं। दोनों की भूमिका अलग-अलग है, इसलिए इन्हें एक-दूसरे का सीधा विकल्प मानना सही नहीं है।
जैव उर्वरकों का सही चुनाव, फसल के अनुसार उपयोग और उचित भंडारण किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। गलत तरीके से इस्तेमाल करने या उत्पाद को अनुचित परिस्थितियों में रखने से इसकी प्रभावशीलता घट सकती है।
जैव उर्वरक और रासायनिक खाद में बुनियादी अंतर
जैव उर्वरक ऐसे उत्पाद हैं जिनमें जीवित लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं। मिट्टी या पौधों की जड़ों के आसपास सक्रिय होकर ये सूक्ष्मजीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में उपलब्ध कराने, मिट्टी में मौजूद फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने या पौधों की पोषक तत्व प्राप्त करने की क्षमता में मदद कर सकते हैं।
इसके विपरीत, रासायनिक उर्वरक पौधों को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व सीधे उपलब्ध कराते हैं। उदाहरण के लिए, यूरिया नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत है, जबकि डीएपी नाइट्रोजन और फॉस्फोरस उपलब्ध कराता है।
जैव उर्वरकों में पोषण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया सूक्ष्मजीवों की सक्रियता और खेत की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। रासायनिक उर्वरकों में पोषक तत्वों की मात्रा उत्पाद की निर्धारित संरचना के अनुसार होती है। इसलिए जैव उर्वरक को केवल रासायनिक खाद का विकल्प मानने के बजाय संतुलित पोषण प्रबंधन के एक हिस्से के रूप में देखना चाहिए।
राइजोबियम: दलहनी फसलों के लिए उपयोगी
राइजोबियम एक ऐसा जीवाणु समूह है जो उपयुक्त दलहनी फसलों की जड़ों में गांठें बनाकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के उपयोग योग्य रूप में बदलने में मदद करता है। इस प्रक्रिया को जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते हैं।
चना, मटर, अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों में राइजोबियम का उपयोग लाभकारी हो सकता है। हालांकि, हर राइजोबियम किस्म हर दलहनी फसल के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसलिए फसल के अनुरूप जीवाणु वाला उत्पाद चुनना जरूरी है।
राइजोबियम के प्रभावी उपयोग के लिए बीज उपचार एक सामान्य तरीका है। उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों के अनुसार बीज पर इसकी परत चढ़ाई जाती है और उपचारित बीज को तेज धूप में रखने से बचाया जाता है। बीज उपचार के दौरान रासायनिक बीज-उपचार दवाओं के साथ इसकी अनुकूलता भी जांचनी चाहिए, क्योंकि कुछ रसायन जीवित जीवाणुओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
राइजोबियम का उपयोग करने का अर्थ यह नहीं है कि दलहनी फसल को किसी भी परिस्थिति में नाइट्रोजन की जरूरत नहीं पड़ेगी। फसल, मिट्टी की स्थिति और स्थानीय कृषि सिफारिशों के अनुसार पोषण प्रबंधन करना जरूरी है।
एजोटोबैक्टर: गैर-दलहनी फसलों में नाइट्रोजन प्रबंधन
एजोटोबैक्टर एक स्वतंत्र रूप से रहने वाला नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला जीवाणु है। यह दलहनी फसलों की तरह जड़ों में विशेष गांठें बनाकर काम नहीं करता, बल्कि मिट्टी और जड़ों के आसपास सक्रिय रह सकता है।
गेहूं, मक्का और कुछ अन्य गैर-दलहनी फसलों में उपयुक्त एजोटोबैक्टर उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है। यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में योगदान देने के साथ पौधों की वृद्धि से जुड़ी कुछ जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। इसका वास्तविक असर मिट्टी, नमी, तापमान, फसल और उत्पाद में मौजूद सूक्ष्मजीवों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
एजोटोबैक्टर का इस्तेमाल बीज उपचार, पौधों की जड़ों के उपचार या मिट्टी में देने के रूप में किया जा सकता है, लेकिन सही तरीका उत्पाद के निर्देशों के अनुसार ही तय करना चाहिए। इसे डालने के बाद तत्काल अधिक पैदावार मिलने की गारंटी नहीं मानी जानी चाहिए। यह संतुलित उर्वरक प्रबंधन में सहयोगी उपाय है।
फॉस्फेट घुलनशील सूक्ष्मजीव: फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने में मदद
मिट्टी में फॉस्फोरस मौजूद होने के बावजूद उसका कुछ हिस्सा पौधों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होता। फॉस्फेट घुलनशील सूक्ष्मजीव, जिन्हें पीएसबी (PSB) भी कहा जाता है, मिट्टी में मौजूद कुछ कम घुलनशील फॉस्फेट यौगिकों को घुलनशील बनाने में मदद कर सकते हैं। इससे पौधों को फॉस्फोरस प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
फॉस्फोरस जड़ों के विकास, ऊर्जा स्थानांतरण और पौधों की सामान्य वृद्धि के लिए जरूरी पोषक तत्व है। पीएसबी का उपयोग कई फसलों में किया जा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव मिट्टी की प्रकृति, पीएच, उपलब्ध फॉस्फोरस और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता पर निर्भर करता है।
यह समझना जरूरी है कि पीएसबी मिट्टी में फॉस्फोरस पैदा नहीं करते। वे पहले से मौजूद कुछ रूपों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद करते हैं। यदि मिट्टी में फॉस्फोरस की कुल मात्रा बहुत कम है, तो केवल पीएसबी के भरोसे फसल की पूरी जरूरत पूरी होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। मिट्टी परीक्षण और कृषि विभाग की सिफारिशों के अनुसार फॉस्फोरस का प्रबंधन करना चाहिए।
जैव उर्वरक का उपयोग करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
जैव उर्वरक की सफलता केवल उत्पाद खरीदने से तय नहीं होती। उसका सही सूक्ष्मजीव, उचित उपयोग और उत्पाद की जीवित सूक्ष्मजीवों वाली गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।
- फसल के अनुसार उत्पाद चुनें: दलहनी फसलों के लिए उपयुक्त राइजोबियम और गैर-दलहनी फसलों के लिए अनुशंसित एजोटोबैक्टर उत्पाद चुनें। फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से पीएसबी का उपयोग किया जा सकता है।
- लेबल के निर्देश पढ़ें: बीज उपचार, मिट्टी में प्रयोग या जड़ों के उपचार की विधि उत्पाद के अनुसार अलग हो सकती है। मात्रा और उपयोग की विधि का अनुमान खुद न लगाएं।
- रासायनिक दवाओं के साथ सावधानी रखें: बीज उपचार में इस्तेमाल होने वाले फफूंदनाशक या अन्य रसायन जैव उर्वरक के सूक्ष्मजीवों को प्रभावित कर सकते हैं। उत्पाद के निर्देशों में दी गई अनुकूलता और उपचार का क्रम देखें।
- मिट्टी में उचित नमी रखें: सूखी मिट्टी, अत्यधिक तापमान और प्रतिकूल परिस्थितियां सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को प्रभावित कर सकती हैं। बुवाई और सिंचाई का प्रबंधन स्थानीय सिफारिशों के अनुसार करें।
- समाप्ति तिथि जांचें: पैकेट पर निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि, बैच नंबर और भंडारण संबंधी निर्देश जरूर देखें।
जैव उर्वरकों के भंडारण में सावधानियां
जैव उर्वरकों में जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं, इसलिए इनके भंडारण में लापरवाही से उत्पाद की प्रभावशीलता कम हो सकती है। किसान और विक्रेता कुछ सामान्य सावधानियां अपनाकर इस जोखिम को घटा सकते हैं।
सबसे पहले उत्पाद को उसकी पैकिंग पर दिए गए तापमान और भंडारण संबंधी निर्देशों के अनुसार रखें। कई उत्पादों को ठंडी और सूखी जगह में, सीधी धूप और अत्यधिक गर्मी से दूर रखना जरूरी होता है। सभी जैव उर्वरकों के लिए एक ही तापमान या भंडारण अवधि मान लेना उचित नहीं है।
पैकेट को इस्तेमाल तक बंद रखें और उसे पानी, नमी तथा रसायनों के सीधे संपर्क से बचाएं। फटी हुई पैकिंग, असामान्य गंध, खराब स्थिति या समाप्ति तिथि पार कर चुके उत्पाद के उपयोग से बचें। जैव उर्वरकों को गर्म वाहन, धूप में खड़े ट्रैक्टर या गर्म गोदाम में लंबे समय तक छोड़ना भी ठीक नहीं है।
किसान को यह भी देखना चाहिए कि दुकान पर उत्पाद किस स्थिति में रखा गया था। यदि उत्पाद को अनुचित तापमान में रखा गया हो या उसकी गुणवत्ता पर संदेह हो, तो विक्रेता से जानकारी लेकर ही खरीदें। जैव उर्वरक की प्रभावशीलता केवल पैकेट पर लिखे नाम से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों की गुणवत्ता और उनकी जीवित रहने की क्षमता से भी जुड़ी है।
क्या जैव उर्वरक से रासायनिक खाद की जरूरत खत्म हो जाती है?
इसका सीधा जवाब है—नहीं, हर स्थिति में नहीं। जैव उर्वरक पोषक तत्वों की उपलब्धता और पोषण चक्र में मदद कर सकते हैं, जबकि रासायनिक उर्वरक फसल को निर्धारित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराने का प्रमुख साधन हैं। दोनों की भूमिका अलग है।
किसान को सबसे पहले मिट्टी परीक्षण के आधार पर फसल की पोषण जरूरत समझनी चाहिए। इसके बाद अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों, जैव उर्वरकों, जैविक खाद और फसल अवशेषों का उचित समन्वय किया जा सकता है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग में मदद मिल सकती है, लेकिन परिणाम खेत की वास्तविक परिस्थितियों और अपनाई गई कृषि पद्धतियों पर निर्भर करेंगे।
निष्कर्ष: राइजोबियम, एजोटोबैक्टर और फॉस्फेट घुलनशील सूक्ष्मजीव खेती में पोषण प्रबंधन के उपयोगी सहयोगी हैं। सही उत्पाद, फसल के अनुकूल प्रयोग और सावधानीपूर्वक भंडारण से इनका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। जैव उर्वरकों को रासायनिक खाद का पूर्ण विकल्प मानने के बजाय मिट्टी परीक्षण और वैज्ञानिक कृषि सिफारिशों के साथ अपनाना अधिक उपयुक्त है।

