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Success Story: सिर्फ 500 वर्ग मीटर में चुकंदर की खेती से ₹20,000 की कमाई, ICAR की Crimson Globe किस्म ने बदली किसानों की सोच

Success Story: Earning ₹20,000 by cultivating beetroot in just 500 square meters

Emran Khan by Emran Khan
November 4, 2026
in कृषि समाचार, सफ़लता की कहानी
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Success Story: Earning ₹20,000 by cultivating beetroot in just 500 square meters

Success Story: Earning ₹20,000 by cultivating beetroot in just 500 square meters

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Crimson Globe Beetroot Success Story: राजस्थान के जयपुर जिले से किसानों की आय बढ़ाने वाली एक उत्साहजनक खबर सामने आई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ओर से साझा किए गए खेत-स्तरीय प्रदर्शनों के परिणाम बताते हैं कि आधुनिक कृषि तकनीक, उन्नत बीज और सही फसल का चुनाव छोटे किसानों के लिए भी कमाई के नए अवसर खोल सकता है। जयपुर के किसानों के खेतों में चुकंदर की उन्नत किस्म Crimson Globe ने स्थानीय किस्म की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक उत्पादन दिया है। वहीं, रबी सीजन 2024-25 में एक किसान ने मात्र 500 वर्ग मीटर जमीन पर चुकंदर उगाकर लगभग 20,000 रुपये की कमाई की।

यह सफलता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खेती में अधिक आमदनी के लिए हमेशा बड़ी जमीन का होना जरूरी नहीं है। सही फसल, अच्छी गुणवत्ता वाला उत्पादन, बाजार की मांग और वैज्ञानिक खेती का तालमेल भी किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर सकता है।

ICAR द्वारा अक्टूबर 2026 में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, जयपुर के विभिन्न गांवों में किए गए Field Demonstrations में चुकंदर की इस किस्म ने अच्छे परिणाम दिए हैं। यह सफलता अब आसपास के किसानों को भी पारंपरिक फसलों के साथ सब्जियों की व्यावसायिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

छोटे खेत से बड़ी उम्मीद: जयपुर के किसानों की सफलता की कहानी

राजस्थान को आमतौर पर गेहूं, सरसों, बाजरा और अन्य पारंपरिक फसलों की खेती के लिए जाना जाता है। हालांकि, बदलते कृषि बाजार और बढ़ती उत्पादन लागत के बीच किसान अब ऐसी फसलों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे सीमित जमीन पर भी अच्छी आमदनी मिल सके।

जयपुर जिले के कुछ गांवों में चुकंदर की खेती का अनुभव इसी बदलाव की कहानी सामने लाता है। यहां वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के सहयोग से चुकंदर की उन्नत किस्मों को वास्तविक खेतों में परखा गया।

इस पहल में ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली के Centre for Agricultural Technology Assessment and Transfer (CATAT) और कृषि विज्ञान केंद्र, चोमू (जयपुर-I) की भूमिका रही।

संस्थानों ने किसानों को उन्नत किस्मों से परिचित कराने और स्थानीय परिस्थितियों में उनकी उपज क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए प्रदर्शन आयोजित किए। इनमें Crimson Globe और Detroit Dark जैसी चुकंदर की किस्में शामिल थीं।

इन प्रयासों का उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन प्राप्त करना नहीं था, बल्कि किसानों को यह समझाना भी था कि Crop Diversification यानी फसल विविधीकरण के माध्यम से कृषि आय के नए स्रोत कैसे विकसित किए जा सकते हैं।

500 वर्ग मीटर जमीन से 20 हजार रुपये की कमाई

इस सफलता की कहानी का सबसे आकर्षक पहलू एक किसान की कमाई का आंकड़ा है।

ICAR की जानकारी के अनुसार, रबी सीजन 2024-25 के दौरान चुकंदर की खेती करने वाले एक किसान ने केवल 500 वर्ग मीटर भूमि से लगभग 20,000 रुपये अर्जित किए।

500 वर्ग मीटर का क्षेत्र लगभग 0.124 एकड़ होता है। यानी एक एकड़ के करीब आठवें हिस्से पर खेती करके किसान ने यह कमाई दर्ज की।

ICAR की रिपोर्ट से प्रमुख आंकड़े

₹20,000

एक किसान की दर्ज कमाई

500 m²

खेती का कुल क्षेत्रफल

15%

स्थानीय किस्म से अधिक उपज, मोरिजा

240 q/ha

रबी 2024-25 में रिपोर्ट की गई उपज

यहां एक जरूरी बात समझनी चाहिए। 20,000 रुपये कमाने का मतलब 20,000 रुपये शुद्ध मुनाफा होना नहीं है। ICAR की सार्वजनिक रिपोर्ट में इस किसान की संपूर्ण उत्पादन लागत का विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन के खर्च घटाने के बाद वास्तविक लाभ कितना रहा, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

फिर भी यह उदाहरण दिखाता है कि छोटे क्षेत्र में चुकंदर जैसी सब्जियों की व्यावसायिक खेती अतिरिक्त आय का अच्छा विकल्प बन सकती है।

Crimson Globe किस्म ने स्थानीय चुकंदर से दिया 15 प्रतिशत अधिक उत्पादन

इस सफलता की दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि रबी सीजन 2025-26 में सामने आई।

जयपुर जिले के मोरिजा गांव में किसानों ने Crimson Globe की खेती की। खेतों में किए गए प्रदर्शन के दौरान स्थानीय चुकंदर की किस्म की तुलना में इस उन्नत किस्म से लगभग 15 प्रतिशत अधिक उत्पादन प्राप्त होने की जानकारी सामने आई।

किसानों ने इसके आकर्षक आकार, रंग, स्वाद और जड़ों की गुणवत्ता की भी सराहना की।

यह अंतर केवल कृषि वैज्ञानिकों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उन किसानों के लिए भी उपयोगी है जो अपनी मौजूदा खेती में बदलाव करके उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि कोई स्थानीय किस्म एक खेत में 100 क्विंटल उपज देती है और समान परिस्थितियों में नई किस्म 15 प्रतिशत अधिक उत्पादन देती है, तो नई किस्म से 115 क्विंटल उपज प्राप्त होगी।

हालांकि, यह केवल अंतर को समझाने के लिए उदाहरण है। मोरिजा में मिला 15 प्रतिशत अतिरिक्त उत्पादन हर किसान और हर खेत में मिलने की गारंटी नहीं है।

भूमि की उर्वरता, मौसम, सिंचाई, बुवाई का समय और फसल प्रबंधन जैसे कारक वास्तविक उत्पादन को प्रभावित करते हैं।

रबी 2024-25 में 240 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंचा उत्पादन

ICAR की रिपोर्ट के अनुसार, रबी 2024-25 में नरसिंहपुरा, बालेखान और उदयपुरिया गांवों में चुकंदर की खेती के उत्साहजनक परिणाम मिले। इन क्षेत्रों में चुकंदर का उत्पादन 240 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक दर्ज किया गया।

एक हेक्टेयर में लगभग 2.47 एकड़ जमीन होती है। इस हिसाब से 240 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज लगभग 97 क्विंटल प्रति एकड़ के बराबर है।

यह उत्पादन क्षमता उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है जो सीमित क्षेत्र में अधिक मूल्य वाली सब्जियों की खेती करना चाहते हैं।

हालांकि, उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों को बिक्री की व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा। यदि बाजार में चुकंदर की मांग कम है या एक साथ अधिक आवक हो जाती है, तो अच्छी पैदावार मिलने के बावजूद बिक्री मूल्य प्रभावित हो सकता है।

इसलिए चुकंदर की खेती को सफल बनाने के लिए केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि Market Linkage और Crop Marketing Strategy भी जरूरी है।

आखिर क्या है Crimson Globe चुकंदर की किस्म?

Crimson Globe चुकंदर की एक उन्नत किस्म है, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने किसानों के लिए उपलब्ध कराया है। इस किस्म के बीज उत्पादन में IARI का कटराईं केंद्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसकी जड़ें आमतौर पर गोल से कुछ चपटी गोलाकार होती हैं। बाहरी रंग लाल और अंदर का गूदा गहरे लाल रंग का होता है। इसकी पत्तियों में हरे रंग के साथ लाल या मरून रंग की झलक दिखाई दे सकती है।

चुकंदर एक ठंडे मौसम की सब्जी है, जिसकी जड़ें सलाद, जूस, पकाए जाने वाले खाद्य पदार्थों और विभिन्न Food Processing Products में इस्तेमाल होती हैं।

Crimson Globe की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • आकर्षक गोलाकार जड़ें और लाल रंग।
  • अच्छे फसल प्रबंधन में बेहतर उपज की संभावना।
  • ताजा सब्जी बाजार के लिए उपयोगी आकार और गुणवत्ता।
  • रबी सीजन में खेती का विकल्प।
  • किसानों के लिए फसल विविधीकरण का अवसर।

वैज्ञानिक स्रोतों के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में इस किस्म की फसल सामान्यतः लगभग 80 से 90 दिनों में तैयार हो सकती है। हालांकि, वास्तविक अवधि तापमान और खेती की परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।

वैज्ञानिकों और किसानों की साझेदारी से मिली सफलता

जयपुर के किसानों की यह उपलब्धि वैज्ञानिक संस्थानों और ग्रामीण किसानों के बीच सहयोग का भी उदाहरण है।

ICAR-IARI के CATAT केंद्र और कृषि विज्ञान केंद्र, चोमू ने किसानों के खेतों पर किस्मों का मूल्यांकन और प्रदर्शन करने में सहयोग किया।

इस व्यवस्था का लाभ यह है कि किसानों को केवल प्रयोगशाला या अनुसंधान केंद्र के आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वे अपने आसपास के खेतों में नई किस्म का प्रदर्शन देख सकते हैं।

इस तरह के On-Farm Demonstration के माध्यम से किसान समझ पाते हैं कि नई किस्म स्थानीय मिट्टी और मौसम में कैसी प्रतिक्रिया देती है।

उदयपुरिया, मोरिजा, नरसिंहपुरा और खन्नीपुरा जैसे गांवों में किए गए प्रयासों ने इस प्रक्रिया को मजबूत किया है।

यह पहल बताती है कि कृषि अनुसंधान का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब वैज्ञानिक तकनीक किसानों के खेतों तक पहुंचे और किसान उसके परिणाम स्वयं परख सकें।

क्या कम जमीन वाले किसान भी चुकंदर की खेती अपना सकते हैं?

चुकंदर की खेती का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसे शुरुआत में छोटे क्षेत्र में आजमाया जा सकता है।

जिन किसानों के पास सीमित जमीन है, वे पूरे खेत में नई फसल लगाने के बजाय पहले छोटे हिस्से में इसका प्रदर्शन कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, कोई किसान 200 से 500 वर्ग मीटर क्षेत्र में चुकंदर की खेती करके उत्पादन लागत, पैदावार और बिक्री मूल्य की जानकारी जुटा सकता है।

इससे किसान को पता चल सकेगा कि उसके क्षेत्र में चुकंदर की खेती आर्थिक रूप से कितनी उपयोगी है।

व्यावसायिक खेती शुरू करने से पहले स्थानीय सब्जी मंडी में चुकंदर की मांग, परिवहन खर्च और संभावित खरीदारों की जानकारी लेना आवश्यक है।

जयपुर के अनुभव से प्रेरणा जरूर मिलती है, लेकिन किसानों को अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के आधार पर फैसला करना चाहिए।

Crimson Globe Beetroot Cultivation: किसान कैसे करें बेहतर खेती?

चुकंदर की अच्छी पैदावार के लिए उन्नत किस्म के साथ सही कृषि प्रबंधन भी आवश्यक है।

  1. खेत और मिट्टी का चुनाव

चुकंदर के लिए अच्छी जल निकासी वाली भुरभुरी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयोगी मानी जाती है। खेत में पानी जमा होने से जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है।

मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ होने से जड़ों की बढ़वार में मदद मिलती है। किसानों को खेती शुरू करने से पहले Soil Testing करानी चाहिए।

  1. सही समय पर बुवाई

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में चुकंदर की खेती सामान्यतः ठंडे मौसम में की जाती है। स्थानीय तापमान और मौसम की स्थिति के अनुसार अक्टूबर से नवंबर के दौरान बुवाई कई क्षेत्रों में उपयुक्त हो सकती है।

हालांकि, बुवाई का सही समय अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र या उद्यान विभाग से सुनिश्चित करना चाहिए।

  1. अच्छी गुणवत्ता वाला बीज

किसानों को विश्वसनीय स्रोत से अच्छी गुणवत्ता वाला बीज खरीदना चाहिए। बीज खरीदते समय किस्म का नाम, पैकिंग की तारीख, अंकुरण संबंधी जानकारी और अन्य जरूरी विवरण जांचना उपयोगी रहता है।

  1. संतुलित पोषण प्रबंधन

चुकंदर की फसल में जड़ों के विकास के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन देने पर पत्तियों की बढ़वार तो बढ़ सकती है, लेकिन जड़ों की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

खाद की मात्रा मिट्टी परीक्षण और स्थानीय कृषि सिफारिश के आधार पर तय करनी चाहिए।

  1. सिंचाई का सही प्रबंधन

चुकंदर की फसल में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है। लंबे समय तक पानी की कमी रहने से जड़ों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है।

वहीं अत्यधिक सिंचाई से जलभराव की समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए किसानों को मिट्टी की नमी देखकर सिंचाई करनी चाहिए।

  1. समय पर कटाई और ग्रेडिंग

बाजार में अच्छे दाम पाने के लिए सही समय पर खुदाई और उपज की सफाई जरूरी है।

चुकंदर की जड़ों को आकार और गुणवत्ता के आधार पर अलग करने से खरीदारों की जरूरत के अनुसार बिक्री करने में सुविधा हो सकती है।

चुकंदर की खेती में कमाई का गणित समझना जरूरी

जयपुर के किसान ने 500 वर्ग मीटर से लगभग 20 हजार रुपये की कमाई दर्ज की। इस उदाहरण को समझने के लिए खेती में सकल आय और शुद्ध लाभ का अंतर जानना जरूरी है।

मान लीजिए किसी किसान ने 500 वर्ग मीटर में चुकंदर उगाया और उपज बेचकर 20,000 रुपये प्राप्त किए।

उसकी अनुमानित लागत इस प्रकार हो सकती है:

खर्च का विवरण उदाहरण के लिए राशि
बीज और खेत की तैयारी ₹1,500
खाद और पोषण प्रबंधन ₹2,000
सिंचाई और देखभाल ₹1,000
मजदूरी और कटाई ₹2,500
पैकिंग और परिवहन ₹1,000
कुल अनुमानित लागत ₹8,000

इस काल्पनिक उदाहरण में:

सकल आय = ₹20,000

कुल खर्च = ₹8,000

अनुमानित शुद्ध लाभ = ₹12,000

ध्यान दें: यह तालिका केवल किसानों को Farm Profit Calculation समझाने के लिए बनाई गई है। यह जयपुर के संबंधित किसान की वास्तविक लागत या मुनाफे का प्रमाणित विवरण नहीं है। जमीन का किराया और पारिवारिक श्रम का मूल्य भी वास्तविक आर्थिक गणना में शामिल करना चाहिए।

फसल विविधीकरण से किसानों की आय में कैसे आ सकता है बदलाव?

भारत में बड़ी संख्या में किसान सीमित फसलों पर निर्भर रहते हैं। किसी एक फसल के बाजार भाव गिरने या मौसम प्रतिकूल होने से उनकी पूरी कृषि आय प्रभावित हो सकती है।

ऐसी स्थिति में Crop Diversification जोखिम को अलग-अलग फसलों में बांटने का विकल्प देता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसान के पास सिंचाई की सुविधा है और स्थानीय बाजार में मांग मौजूद है, तो वह मुख्य फसल के साथ सीमित क्षेत्र में चुकंदर, गाजर, मूली या अन्य मौसमी सब्जियां उगाने पर विचार कर सकता है।

इससे अलग-अलग समय पर उपज बेचने के अवसर बन सकते हैं।

हालांकि, विविधीकरण का मतलब बिना योजना के कई फसलें लगाना नहीं है। हर फसल के लिए लागत, श्रम, बाजार मांग और संभावित बिक्री मूल्य का मूल्यांकन जरूरी है।

जयपुर में Crimson Globe की सफलता इसी दृष्टिकोण को मजबूत करती है कि वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर चुनी गई वैकल्पिक फसल किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा कर सकती है।

बाजार में चुकंदर की मांग और बिक्री के अवसर

चुकंदर का उपयोग घरों, रेस्तरां, जूस केंद्रों और विभिन्न खाद्य उत्पादों में किया जाता है।

बड़े शहरों और सब्जी बाजारों में इसकी मांग अलग-अलग स्तर पर मौजूद रहती है। लेकिन मांग की मात्रा और कीमत क्षेत्र के अनुसार बदलती है।

किसानों को उत्पादन शुरू करने से पहले अपने आसपास की मंडियों में उपलब्ध कीमतों की जानकारी एकत्र करनी चाहिए।

इसके अलावा स्थानीय सब्जी व्यापारियों, थोक विक्रेताओं और संगठित खरीदारों से संपर्क बनाना उपयोगी हो सकता है।

यदि किसान सामूहिक रूप से उत्पादन करते हैं, तो वे परिवहन और विपणन संबंधी कुछ खर्च साझा कर सकते हैं।

Farmer Producer Organization (FPO) के माध्यम से ग्रेडिंग, पैकिंग और सामूहिक बिक्री जैसे विकल्पों की भी संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं।

इस तरह अधिक उपज के साथ बेहतर बिक्री व्यवस्था विकसित करके किसानों की वास्तविक आय बढ़ाने की दिशा में काम किया जा सकता है।

IARI का कटराईं केंद्र क्यों है महत्वपूर्ण?

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का कटराईं क्षेत्रीय केंद्र सब्जियों के अनुसंधान और बीज उत्पादन के लिए जाना जाता है।

यह केंद्र शीतोष्ण सब्जियों की विभिन्न किस्मों के बीज उत्पादन और संबंधित कृषि तकनीकों पर कार्य करता है।

ICAR की जानकारी के अनुसार, Crimson Globe के बीज उत्पादन में भी IARI के इस केंद्र की भूमिका है।

किसानों के लिए उन्नत बीज की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी अच्छी किस्म का लाभ तभी व्यापक स्तर पर मिल सकता है जब उसका गुणवत्तापूर्ण बीज इच्छुक किसानों तक पहुंचे।

किसानों के लिए इस Success Story से पांच महत्वपूर्ण सीख

जयपुर की यह सफलता कई उपयोगी संदेश देती है।

पहला, छोटी जमीन को कमाई के रास्ते की बाधा नहीं मानना चाहिए। उचित फसल चयन से छोटे खेत में भी व्यावसायिक खेती के अवसर बन सकते हैं।

दूसरा, उन्नत किस्मों की जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र और अनुसंधान संस्थानों से संपर्क करना चाहिए।

तीसरा, नई फसल को पूरे खेत में अपनाने के बजाय पहले सीमित क्षेत्र में आजमाना समझदारी हो सकती है।

चौथा, अच्छी पैदावार के साथ बाजार की मांग, उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य का रिकॉर्ड रखना जरूरी है।

पांचवां, किसी एक किसान की सफल कमाई को हर किसान के लिए निश्चित आय नहीं मानना चाहिए। खेती की वास्तविक सफलता स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

क्या Crimson Globe सभी राज्यों के किसानों के लिए फायदेमंद होगी?

जयपुर के प्रदर्शन में इस किस्म ने उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे भारत में एक जैसी पैदावार और कमाई होगी।

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश तथा अन्य क्षेत्रों में मिट्टी, तापमान, पानी की उपलब्धता और बाजार की स्थिति अलग-अलग होती है।

किसानों को अपने क्षेत्र की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार किस्म की उपयुक्तता जांचनी चाहिए।

सबसे अच्छा तरीका है कि किसान स्थानीय KVK या उद्यान विशेषज्ञ से सलाह लेकर छोटे खेत पर प्रदर्शन करें और उसके बाद खेती का क्षेत्र बढ़ाने पर फैसला लें।

चुकंदर की उन्नत किस्म से छोटे किसानों को मिली नई उम्मीद

राजस्थान के जयपुर जिले में Crimson Globe चुकंदर की खेती का अनुभव बताता है कि कृषि अनुसंधान और किसानों की भागीदारी से आय बढ़ाने के नए रास्ते खोजे जा सकते हैं।

एक ओर रबी 2024-25 के दौरान चुकंदर की उपज 240 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई, वहीं एक किसान ने 500 वर्ग मीटर भूमि से लगभग 20 हजार रुपये की कमाई की।

दूसरी ओर रबी 2025-26 में मोरिजा के किसानों ने स्थानीय किस्म के मुकाबले लगभग 15 प्रतिशत अधिक उपज मिलने की जानकारी दी।

ये आंकड़े राजस्थान में चुकंदर की उन्नत खेती की संभावनाएं दिखाते हैं। हालांकि, बेहतर उत्पादन के साथ कम लागत, अच्छा बाजार और उचित फसल प्रबंधन भी जरूरी हैं।

Crimson Globe Beetroot Success Story का सबसे बड़ा संदेश यही है कि छोटे किसानों के लिए कृषि आय बढ़ाने का रास्ता केवल ज्यादा जमीन में नहीं, बल्कि सही तकनीक, अच्छी किस्म, बेहतर बाजार और सोच-समझकर किए गए फसल विविधीकरण में भी छिपा है।

 

 

 

Tags: AgricultureFarmingIndiaIndian Farming
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