Emran Khan

Emran Khan

HI 8849: A wheat variety offering a yield of 51.9 quintals per hectare along with a high zinc content.

HI 8849: गेहूं की ऐसी किस्म, जिसमें 51.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज के साथ जिंक की भी भरपूर मात्रा

देश में गेहूं उत्पादन बढ़ाने के साथ खाद्यान्न की पोषण गुणवत्ता बेहतर बनाने के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए भारतीय...

Discussions held on strengthening cooperation between ICAR and the SAARC Agriculture Centre; agricultural research and capacity building to receive a boost.

ICAR और SAARC कृषि केंद्र के बीच सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा, कृषि अनुसंधान और क्षमता निर्माण को मिलेगा बढ़ावा

दक्षिण एशिया में कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक सहयोग और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद...

New facilities developed at ICAR-IIAB Ranchi at a cost of ₹119 crore; inaugurated by Shivraj Singh Chouhan.

₹119 करोड़ की लागत से ICAR-IIAB रांची में विकसित हुईं नई सुविधाएं, शिवराज सिंह चौहान ने किया उद्घाटन

कृषि अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और संस्थागत बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्रीय...

कृषि अनुसंधान, आधुनिक कृषि तकनीकों और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी तथा कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने रांची स्थित भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-IIAB) की प्रमुख अनुसंधान, प्रशिक्षण और प्रदर्शन सुविधाओं का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान में विकसित की जा रही कृषि प्रौद्योगिकियों, पशुधन सुधार से जुड़ी तकनीकों, फसल अनुसंधान और एकीकृत कृषि प्रणाली की गतिविधियों का अवलोकन किया। दौरे का प्रमुख उद्देश्य कृषि अनुसंधान को प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय उसे खेतों और किसानों तक पहुंचाने, आधुनिक तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा देने तथा झारखंड सहित देश के अन्य कृषि क्षेत्रों में टिकाऊ और लाभकारी कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करने के प्रयासों को समझना रहा। विभिन्न अनुसंधान एवं प्रदर्शन इकाइयों के निरीक्षण के दौरान कृषि उत्पादन बढ़ाने, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और खेती से जुड़े विविध क्षेत्रों के बीच समन्वय स्थापित करने की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। डेयरी फार्म में पशुधन सुधार और भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक की जानकारी दौरे के दौरान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी और डॉ. एम. एल. जाट ने संस्थान के डेयरी फार्म का निरीक्षण किया। यहां उन्हें पशुधन की आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार, बेहतर नस्लों के विकास तथा आधुनिक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से पशुधन की उत्पादकता बढ़ाने से संबंधित गतिविधियों की जानकारी दी गई। डेयरी फार्म में अधिकारियों को भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक (Embryo Transfer Technology) के बारे में विस्तार से अवगत कराया गया। यह तकनीक पशुधन के आनुवंशिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके माध्यम से उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं से प्राप्त भ्रूणों को उपयुक्त मादा पशुओं में स्थानांतरित करके बेहतर आनुवंशिक गुणों वाली संतानों के उत्पादन की संभावनाएं बढ़ाई जा सकती हैं। भारत में डेयरी क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष रूप से झारखंड जैसे राज्यों में छोटे और सीमांत किसानों के लिए पशुपालन कृषि आय का अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध कराता है। ऐसे में पशुधन की गुणवत्ता में सुधार, संतुलित पशु पोषण, वैज्ञानिक प्रजनन और बेहतर प्रबंधन पद्धतियों का प्रसार किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में सहायक हो सकता है। आधुनिक प्रजनन तकनीकों का प्रभावी उपयोग केवल बेहतर नस्लों के विकास तक सीमित नहीं है। इनके साथ पशुओं के स्वास्थ्य, प्रजनन क्षमता, आहार प्रबंधन, रोग नियंत्रण और स्थानीय जलवायु के अनुकूल पशुधन के चयन पर भी ध्यान देना आवश्यक है। वैज्ञानिक पद्धतियों के समन्वित उपयोग से डेयरी उत्पादन की दक्षता बढ़ाने और पशुपालकों के लिए अधिक टिकाऊ आजीविका के अवसर विकसित करने में मदद मिल सकती है। इस संदर्भ में संस्थान की डेयरी संबंधी अनुसंधान एवं प्रदर्शन गतिविधियां वैज्ञानिक ज्ञान और उसके व्यावहारिक उपयोग के बीच संबंध स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। फसल अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र की गतिविधियों की समीक्षा इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान के क्रॉप रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर यानी फसल अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने फसल अनुसंधान, कृषि प्रशिक्षण और उन्नत कृषि पद्धतियों के विकास एवं प्रसार से संबंधित गतिविधियों की समीक्षा की। फसल अनुसंधान का उद्देश्य कृषि उत्पादन की चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान विकसित करना और किसानों को ऐसी तकनीकों से परिचित कराना है, जिनका उपयोग वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कर सकें। बदलती जलवायु, अनियमित वर्षा, मिट्टी की उर्वरता में कमी, उत्पादन लागत में वृद्धि और बाजार की अनिश्चितताओं के बीच किसानों के लिए वैज्ञानिक जानकारी और व्यावहारिक प्रशिक्षण का महत्व लगातार बढ़ रहा है। फसल अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र जैसे संस्थान किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का माध्यम बन सकते हैं। यहां विकसित या प्रदर्शित तकनीकों के माध्यम से फसल उत्पादन, कृषि संसाधनों के कुशल उपयोग, फसल प्रबंधन और खेती की लागत को नियंत्रित करने से जुड़े विषयों पर जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। झारखंड की कृषि परिस्थितियों को देखते हुए फसल विविधीकरण, स्थानीय संसाधनों के अनुरूप खेती, जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और कृषि आधारित आजीविका के विविध विकल्प विशेष महत्व रखते हैं। राज्य के अनेक क्षेत्रों में खेती वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसल प्रणालियों और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों का प्रसार किसानों के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है। इस प्रकार के अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि किसानों को दी जाने वाली तकनीकी जानकारी कितनी सरल, व्यावहारिक और उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप है। खेतों पर प्रदर्शन, प्रशिक्षण, वैज्ञानिकों के साथ संवाद और स्थानीय स्तर पर तकनीकी मार्गदर्शन इस प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। आधुनिक प्रजनन सुविधाओं का अवलोकन प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान की आधुनिक प्रजनन संबंधी सुविधाओं का भी अवलोकन किया। इस दौरान उन्नत प्रजनन तकनीकों और कृषि अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए विकसित की जा रही सुविधाओं के महत्व पर ध्यान दिया गया। आधुनिक कृषि में प्रजनन तकनीकों की भूमिका फसलों और पशुधन, दोनों के सुधार में महत्वपूर्ण है। फसल प्रजनन के माध्यम से बेहतर उत्पादन क्षमता, रोगों एवं कीटों के प्रति सहनशीलता, प्रतिकूल मौसम में बेहतर प्रदर्शन और विभिन्न कृषि परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों के विकास की दिशा में काम किया जाता है। वहीं पशुधन प्रजनन का उद्देश्य आनुवंशिक गुणों में सुधार और उत्पादकता बढ़ाने के साथ पशुओं के स्वास्थ्य तथा अनुकूलन क्षमता को बेहतर बनाना है। अनुसंधान सुविधाओं का विकास वैज्ञानिकों को व्यवस्थित अध्ययन, तकनीकों के परीक्षण और उनके संभावित उपयोग का मूल्यांकन करने में मदद करता है। हालांकि, किसी भी नई तकनीक का किसानों तक विस्तार करने से पहले उसकी प्रभावशीलता, लागत, स्थानीय परिस्थितियों में उपयोगिता और दीर्घकालिक लाभों का आकलन महत्वपूर्ण होता है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए ऐसी तकनीकें अधिक उपयोगी होती हैं, जिन्हें अपनाने की लागत उनकी आर्थिक क्षमता के अनुरूप हो और जिनसे वास्तविक उत्पादन या आय संबंधी लाभ मिलने की संभावना हो। इसलिए अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य के कृषि विभागों के बीच समन्वय कृषि नवाचारों के प्रभावी प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एकीकृत कृषि प्रणाली इकाई में किसानों से संवाद दौरे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संस्थान की एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System—IFS) इकाई का निरीक्षण रहा। यहां प्रतिनिधिमंडल ने किसानों के साथ बातचीत की और फसल विविधीकरण, पशुपालन, डेयरी तथा अन्य कृषि गतिविधियों को एक साथ अपनाने की संभावनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की। एकीकृत कृषि प्रणाली ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसान अपनी जमीन, पानी, श्रम और अन्य उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए एक से अधिक कृषि गतिविधियों को परस्पर जोड़ते हैं। इसका उद्देश्य केवल एक फसल पर निर्भरता कम करना ही नहीं, बल्कि कृषि संसाधनों की दक्षता बढ़ाना, उत्पादन प्रणाली को अधिक संतुलित बनाना और परिवार की आय के विविध स्रोत विकसित करना भी है। उदाहरण के लिए, किसी उपयुक्त कृषि मॉडल में फसल उत्पादन के साथ डेयरी या अन्य पशुपालन गतिविधियां शामिल की जा सकती हैं। फसल अवशेषों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में और पशुओं से प्राप्त गोबर का उपयोग खाद तैयार करने में किया जा सकता है। इससे उपलब्ध संसाधनों का पुनः उपयोग बढ़ सकता है और बाहरी कृषि निवेशों पर निर्भरता कुछ हद तक कम करने की संभावना बनती है। इसी तरह, स्थानीय परिस्थितियों और संसाधनों के अनुसार बागवानी, सब्जी उत्पादन, मछली पालन या अन्य कृषि आधारित गतिविधियों को भी कृषि प्रणाली का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि, प्रत्येक गतिविधि का चयन किसान की जमीन, पानी की उपलब्धता, श्रम, पूंजी, तकनीकी जानकारी और स्थानीय बाजार की मांग को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। झारखंड में छोटे जोत आकार वाले किसानों के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली विशेष उपयोगिता रख सकती है। यदि स्थानीय संसाधनों और बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप गतिविधियों का चयन किया जाए, तो किसान अलग-अलग समय पर आय प्राप्त करने के अवसर विकसित कर सकते हैं। इससे किसी एक फसल की विफलता या बाजार मूल्य में गिरावट के कारण होने वाले जोखिम को कम करने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, एकीकृत कृषि प्रणाली के परिणाम सभी किसानों के लिए समान नहीं होते। इसके लाभों का निर्धारण स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों, उत्पादन लागत, बाजार तक पहुंच और गतिविधियों के वैज्ञानिक प्रबंधन से होता है। इसलिए किसानों को मॉडल अपनाने से पहले तकनीकी मार्गदर्शन, लागत-लाभ का आकलन और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का मूल्यांकन करना चाहिए। एकीकृत कृषि प्रणाली इकाई में किसानों के साथ संवाद का महत्व इसी बात में है कि अनुसंधान और तकनीकी जानकारी को किसानों की वास्तविक जरूरतों के साथ जोड़ा जा सके। किसानों के अनुभवों और उनकी समस्याओं को समझकर अनुसंधान संस्थान अधिक उपयोगी तकनीकी समाधान विकसित करने की दिशा में काम कर सकते हैं। टिकाऊ कृषि और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में अनुसंधान इस दौरे के दौरान सामने आए प्रमुख विषयों में कृषि अनुसंधान का व्यावहारिक उपयोग, आधुनिक तकनीकों का प्रसार, फसल एवं पशुधन उत्पादन प्रणालियों का बेहतर समन्वय और किसानों के लिए टिकाऊ आजीविका के अवसर शामिल रहे। आज भारतीय कृषि कई चुनौतियों का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन, वर्षा के बदलते स्वरूप, उत्पादन लागत, मिट्टी के स्वास्थ्य, जल संसाधनों पर दबाव और कृषि उत्पादों के बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव किसानों की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। कृषि प्रणाली को अधिक संसाधन-कुशल, जलवायु-अनुकूल और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाना भी आवश्यक है। इस दिशा में वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रशिक्षण और कृषि प्रौद्योगिकियों का प्रसार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बेहतर कृषि प्रबंधन, फसल विविधीकरण, पशुधन सुधार और एकीकृत कृषि मॉडल किसानों को उपलब्ध संसाधनों के अनुसार खेती की योजना बनाने में मदद कर सकते हैं। कृषि अनुसंधान संस्थानों की जिम्मेदारी केवल नई तकनीकों का विकास करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने में भी योगदान देना है कि किसानों को उनके उपयोग, सीमाओं, लागत और संभावित लाभों की स्पष्ट जानकारी मिले। कृषि विस्तार सेवाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, खेतों पर प्रदर्शन और किसान संवाद के माध्यम से इस दिशा में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। झारखंड जैसे राज्यों में अनुसंधान को स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ना विशेष महत्व रखता है। यहां की भौगोलिक विविधता, वर्षा आधारित खेती, छोटे कृषि जोत और ग्रामीण परिवारों की आजीविका संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कृषि मॉडल विकसित करना आवश्यक है। ऐसे मॉडल किसानों की आय के स्रोतों को विविध बनाने, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और कृषि गतिविधियों की स्थिरता बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं। झारखंड में पौधरोपण अभियान और प्रगतिशील किसानों से संवाद संस्थान के दौरे से जुड़ी गतिविधियों में आईसीएआर संस्थानों और सरकारी एजेंसियों की भागीदारी के साथ पौधरोपण अभियान तथा प्रगतिशील किसानों के साथ संवाद भी शामिल रहा। इन गतिविधियों का महत्व कृषि विकास को पर्यावरण संरक्षण और किसानों के व्यावहारिक अनुभवों से जोड़ने में है। पौधरोपण और वृक्ष आधारित कृषि गतिविधियां उपयुक्त स्थानों एवं प्रजातियों के चयन के साथ अपनाई जाएं, तो वे दीर्घकाल में पर्यावरणीय संतुलन, मिट्टी संरक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधन विकसित करने में योगदान दे सकती हैं। कृषि वानिकी जैसे मॉडल कुछ परिस्थितियों में खेतों की उत्पादकता और किसानों की आय के विविधीकरण के अवसर भी उपलब्ध करा सकते हैं। हालांकि, पौधरोपण की सफलता केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है। पौधों की प्रजातियों का स्थानीय जलवायु के अनुरूप चयन, सिंचाई, सुरक्षा और शुरुआती वर्षों में देखभाल जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी और संबंधित विभागों के बीच समन्वय से ऐसे प्रयास अधिक प्रभावी बन सकते हैं। प्रगतिशील किसानों के साथ संवाद भी कृषि अनुसंधान की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसान अपने खेतों में मौसम, मिट्टी, कीट-रोग, उत्पादन लागत, श्रम और बाजार से जुड़ी समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव रखते हैं। इन अनुभवों को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने पर ऐसी तकनीकों की पहचान और प्रसार में मदद मिल सकती है, जो स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हों। किसानों और वैज्ञानिकों के बीच नियमित संवाद से तकनीकों के उपयोग में आने वाली व्यावहारिक बाधाओं को समझना, प्रशिक्षण की जरूरतों की पहचान करना और उपलब्ध कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग के उपाय विकसित करना संभव होता है। अनुसंधान से खेत तक तकनीक पहुंचाने पर जोर ICAR-IIAB रांची की अनुसंधान एवं प्रदर्शन सुविधाओं का यह दौरा कृषि अनुसंधान, पशुधन सुधार, फसल प्रबंधन, एकीकृत कृषि प्रणाली और पर्यावरणीय पहलुओं को एक साथ देखने का अवसर रहा। डेयरी फार्म में आधुनिक प्रजनन तकनीकों की जानकारी, फसल अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र की गतिविधियों की समीक्षा, आधुनिक प्रजनन सुविधाओं का अवलोकन और एकीकृत कृषि प्रणाली इकाई में किसानों से संवाद ने कृषि विकास के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया। कृषि क्षेत्र में अनुसंधान का वास्तविक प्रभाव तब अधिक व्यापक हो सकता है, जब विकसित तकनीकों को किसानों की जरूरतों, आर्थिक परिस्थितियों और स्थानीय कृषि-जलवायु के अनुरूप उपयोग में लाया जाए। इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों, कृषि विस्तार एजेंसियों और किसानों के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है। झारखंड में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए फसल और पशुधन आधारित गतिविधियों का समन्वय, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकों का चयन, कृषि प्रशिक्षण और किसानों के अनुभवों का उपयोग महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। साथ ही, किसी भी नई तकनीक या कृषि मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले उसकी व्यवहार्यता और लागत-लाभ का मूल्यांकन करना भी आवश्यक है। कुल मिलाकर, ICAR-IIAB रांची की सुविधाओं का दौरा वैज्ञानिक अनुसंधान को व्यावहारिक कृषि से जोड़ने और किसानों के लिए उपयोगी तकनीकों के प्रसार के महत्व को सामने लाता है। ऐसे प्रयास कृषि उत्पादन की दक्षता बढ़ाने, संसाधनों के बेहतर उपयोग और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने की दिशा में योगदान दे सकते हैं। किसानों की सक्रिय भागीदारी, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और संस्थागत समन्वय के माध्यम से इन पहलों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

ICAR-IIAB रांची की अनुसंधान एवं प्रदर्शन सुविधाओं का केंद्रीय मंत्रियों ने किया दौरा, टिकाऊ कृषि और किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

कृषि अनुसंधान, आधुनिक कृषि तकनीकों और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री...

IMD के महानिदेशक ने चक्रवात पूर्वानुमान और समय पर चेतावनी के महत्व को बताया

चक्रवात और समुद्री मौसम की चेतावनी अब होगी अधिक प्रभावी, IMD की कार्यशाला में 650 से अधिक हितधारकों ने लिया प्रशिक्षण

भारत में चक्रवात और समुद्री मौसम से जुड़ी आपदाओं के जोखिम को कम करने तथा मौसम संबंधी चेतावनियों को अधिक...

ICAR में Mission Karmayogi को मिलेगी रफ्तार, वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के लिए विषय-विशिष्ट ऑनलाइन कोर्स पर जोर आईजीओटी कर्मयोगी प्लेटफॉर्म पर नियमित Learning अनिवार्य करने की पहल, डॉ. एम. एल. जाट ने ICAR संस्थानों को समय पर पाठ्यक्रम तैयार करने और अपलोड करने के दिए निर्देश नई दिल्ली, 7 अक्टूबर 2026: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अपने संस्थानों में कर्मचारियों की Professional Skills, कार्यक्षमता और तकनीकी दक्षता बढ़ाने के लिए डिजिटल प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाया है। इसी उद्देश्य से ICAR के कृषि शिक्षा प्रभाग ने आईजीओटी कर्मयोगी (iGOT Karmayogi) प्लेटफॉर्म के लिए विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों के विकास और डिजिटलीकरण की प्रगति की समीक्षा की। इस संबंध में 7 अक्टूबर 2026 को एक ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने की। बैठक में ICAR संस्थानों द्वारा तैयार किए जा रहे विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों की स्थिति, उनकी गुणवत्ता, निर्धारित समयसीमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने की प्रक्रिया पर चर्चा की गई। डॉ. एम. एल. जाट ने सभी संस्थानों को निर्देश दिया कि वे तय दिशा-निर्देशों के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाले पाठ्यक्रम तैयार करें। इन्हें आंतरिक समीक्षा के बाद समय पर iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाए, ताकि कर्मचारियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण और सीखने के अवसर मिल सकें। इस पहल का उद्देश्य केवल ऑनलाइन कोर्स की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि कृषि अनुसंधान और शिक्षा से जुड़े कर्मचारियों के लिए व्यवस्थित, उपयोगी और निरंतर Learning Ecosystem विकसित करना है। इससे संस्थानों में क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने और मिशन कर्मयोगी के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। ICAR कर्मचारियों के लिए नियमित Learning पर विशेष जोर बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. एम. एल. जाट ने कहा कि सभी ICAR संस्थानों को पाठ्यक्रम विकास और डिजिटलीकरण के कार्य को निर्धारित समयसीमा में पूरा करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रमों को अपलोड करने से पहले उनकी उचित आंतरिक समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि सामग्री की गुणवत्ता और निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित हो सके। उन्होंने ICAR के सभी कर्मचारियों को iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म पर नियमित रूप से कम से कम दो घंटे Learning करने पर भी जोर दिया। इसके लिए संस्थानों को सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने और निर्धारित Learning Hours तथा Course Upload Targets को समय पर पूरा करने की आवश्यकता बताई गई। डिजिटल प्रशिक्षण व्यवस्था में नियमित भागीदारी कर्मचारियों को अपने कार्यक्षेत्र से संबंधित नई जानकारियां हासिल करने, Professional Competencies विकसित करने और कार्य प्रक्रियाओं को बेहतर समझने में सहायता कर सकती है। कृषि अनुसंधान जैसे तकनीकी क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां वैज्ञानिक ज्ञान, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और डिजिटल तकनीकों में लगातार बदलाव होते रहते हैं। हालांकि, ऑनलाइन प्रशिक्षण की प्रभावशीलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि पाठ्यक्रम कर्मचारियों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हों, उनकी सामग्री व्यावहारिक हो और प्राप्त ज्ञान का उपयोग कार्यस्थल पर किया जा सके। क्या है iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म? iGOT Karmayogi केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए विकसित एक डिजिटल Learning Platform है, जिसका उद्देश्य क्षमता निर्माण को अधिक व्यवस्थित, सुलभ और निरंतर बनाना है। यह मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को उनके कार्य, जिम्मेदारियों और व्यावसायिक जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस तरह के डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कर्मचारियों को अपनी सुविधा के अनुसार विभिन्न विषयों पर अध्ययन करने और नई दक्षताएं विकसित करने में मदद मिल सकती है। पारंपरिक प्रशिक्षण व्यवस्था में जहां कर्मचारियों को निर्धारित स्थान और समय पर उपस्थित होना पड़ता है, वहीं ऑनलाइन Learning से प्रशिक्षण सामग्री तक पहुंच अधिक लचीली हो सकती है। ICAR जैसे बड़े अनुसंधान नेटवर्क में इस प्रकार की व्यवस्था का विशेष महत्व है। परिषद के अंतर्गत विभिन्न संस्थान कृषि विज्ञान, फसल सुधार, पशुपालन, कृषि शिक्षा, जैव प्रौद्योगिकी और अन्य संबंधित क्षेत्रों में काम करते हैं। इन संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों की जरूरतें और विशेषज्ञता अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रम विकसित करने से कर्मचारियों को उनके कार्यक्षेत्र से संबंधित ज्ञान और कौशल हासिल करने के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि पाठ्यक्रमों की विषयवस्तु प्रासंगिक हो, उन्हें सरल डिजिटल प्रारूप में प्रस्तुत किया जाए और समय-समय पर उनकी समीक्षा की जाए। विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के निर्देश ICAR की समीक्षा बैठक में पाठ्यक्रम विकास के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया गया। डॉ. एम. एल. जाट ने संस्थानों को निर्देश दिया कि वे निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए पाठ्यक्रम तैयार करें और उन्हें अपलोड करने से पहले उचित Internal Review प्रक्रिया पूरी करें। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशिक्षण सामग्री स्पष्ट, उपयोगी और संबंधित विषय के अनुरूप हो। डिजिटल पाठ्यक्रम तैयार करते समय केवल जानकारी को ऑनलाइन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होता। सामग्री को इस तरह व्यवस्थित करना भी आवश्यक है कि कर्मचारी उसे आसानी से समझ सकें और अपने काम में उपयोग कर सकें। विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों के विकास में विशेषज्ञों की भागीदारी, सही तथ्यों का उपयोग, स्पष्ट Learning Objectives और व्यवस्थित प्रस्तुति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही पाठ्यक्रमों को निर्धारित समयसीमा में पूरा करना भी जरूरी है, ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लक्ष्य प्रभावित न हों। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि सभी ICAR संस्थान अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से लें और निर्धारित Course Upload Targets को पूरा करने के लिए समयबद्ध कार्रवाई करें। कृषि अनुसंधान संस्थानों में क्षमता निर्माण को मिलेगी मजबूती कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में लगातार नए वैज्ञानिक तरीकों, तकनीकों और कार्य प्रणालियों का विकास हो रहा है। ऐसे में कर्मचारियों की क्षमताओं को समय के साथ विकसित करना संस्थानों की कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। Capacity Building यानी क्षमता निर्माण का उद्देश्य कर्मचारियों के ज्ञान, कौशल और कार्य निष्पादन की क्षमता को बेहतर बनाना है। इसके अंतर्गत विषय से जुड़ी जानकारी के साथ-साथ डिजिटल दक्षता, प्रशासनिक कार्यप्रणाली, प्रबंधन और अन्य आवश्यक व्यावसायिक कौशल भी शामिल हो सकते हैं। ICAR के संदर्भ में विषय-विशिष्ट ऑनलाइन पाठ्यक्रम संस्थानों को प्रशिक्षण गतिविधियों को व्यवस्थित करने का अवसर दे सकते हैं। डिजिटल माध्यम से तैयार सामग्री को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जा सकता है, जिससे विभिन्न संस्थानों के कर्मचारियों को समान विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त करने में सुविधा हो सकती है। इसके अतिरिक्त, नियमित Learning से कर्मचारियों को अपनी विशेषज्ञता को अपडेट रखने और बदलती कार्य आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को तैयार करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए संस्थानों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रशिक्षण सामग्री केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर न रह जाए, बल्कि कर्मचारियों के वास्तविक कार्यों से जुड़ी हो। डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने समय पर कार्रवाई की आवश्यकता बताई बैठक की शुरुआत में ICAR के उप महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत परिषद के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए सभी ICAR संस्थानों द्वारा समय पर कार्रवाई करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने और राष्ट्रीय स्तर पर ICAR की रैंकिंग में सुधार लाने के लिए संस्थानों की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है। इसके लिए पाठ्यक्रम विकास, डिजिटलीकरण और नियमित Learning से संबंधित कार्यों को प्राथमिकता देने की जरूरत है। किसी बड़े संस्थागत नेटवर्क में प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने के लिए केवल केंद्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता। संबंधित संस्थानों को अपनी जिम्मेदारियों के अनुसार कार्य करना, प्रगति की समीक्षा करना और निर्धारित लक्ष्यों को समय पर पूरा करना भी आवश्यक होता है। इस दृष्टि से बैठक में संस्थानों की भागीदारी और समयबद्ध कार्य निष्पादन को महत्व दिया गया। नियमित समीक्षा से पाठ्यक्रम विकास की प्रगति पर नजर रखने और निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में आने वाली संभावित बाधाओं को पहचानने में सहायता मिल सकती है। कर्मयोगी भारत के विशेषज्ञ ने समझाई पाठ्यक्रम डिजिटलीकरण की प्रक्रिया बैठक के दौरान कर्मयोगी भारत के विशेषज्ञ श्री अश्विन ने प्रतिभागियों को पाठ्यक्रम सामग्री विकसित करने और उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने पाठ्यक्रम विकास के लिए उपलब्ध सूचीबद्ध एजेंसियों के बारे में भी बताया। इसके साथ ही उन्होंने गुणवत्तापूर्ण विषय-विशिष्ट Learning Material तैयार करने और उसे प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने से संबंधित तकनीकी सुझाव साझा किए। पाठ्यक्रमों का डिजिटलीकरण ऑनलाइन प्रशिक्षण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अंतर्गत प्रशिक्षण सामग्री को डिजिटल प्रारूप में तैयार करना, उसे उपयुक्त ढंग से व्यवस्थित करना और संबंधित प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना शामिल है। इस प्रक्रिया में तकनीकी मानकों तथा सामग्री की गुणवत्ता का ध्यान रखना आवश्यक होता है। बैठक में दी गई जानकारी का उद्देश्य ICAR संस्थानों को पाठ्यक्रम विकास और अपलोड प्रक्रिया में सहायता प्रदान करना था, ताकि वे निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप अपना कार्य पूरा कर सकें। Mission Karmayogi के तहत संस्थागत जवाबदेही पर जोर मिशन कर्मयोगी का व्यापक उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों की क्षमताओं को मजबूत करना और सरकारी कार्यप्रणाली को अधिक दक्ष, जवाबदेह तथा नागरिक-केंद्रित बनाने में सहायता करना है। इस संदर्भ में डिजिटल Learning और नियमित प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। ICAR में इस पहल के अंतर्गत विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों का विकास कृषि अनुसंधान और शिक्षा से जुड़े कर्मचारियों के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि, इसके लिए प्रशिक्षण की गुणवत्ता, कर्मचारियों की भागीदारी और पाठ्यक्रमों की समय पर उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। संस्थागत स्तर पर नियमित समीक्षा, जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण और निर्धारित समयसीमा का पालन प्रशिक्षण व्यवस्था को प्रभावी बनाने में योगदान दे सकते हैं। इसके साथ ही पाठ्यक्रमों की उपयोगिता का आकलन करना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि यह समझा जा सके कि प्रशिक्षण से कर्मचारियों के ज्ञान और कार्य निष्पादन में किस प्रकार सुधार हो रहा है। बैठक के समापन पर पाठ्यक्रम विकास और डिजिटलीकरण में तेजी लाने, आंतरिक समीक्षा के माध्यम से गुणवत्ता सुनिश्चित करने, निर्धारित Learning Hours पूरे करने और समयसीमा के भीतर पाठ्यक्रम अपलोड करने के निर्देश दोहराए गए। निष्कर्ष: डिजिटल प्रशिक्षण से मजबूत होगी ICAR की कार्यक्षमता ICAR की यह समीक्षा बैठक कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा से जुड़े संस्थानों में डिजिटल प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल है। iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म पर विषय-विशिष्ट पाठ्यक्रमों का विकास और नियमित Learning कर्मचारियों को अपने ज्ञान तथा व्यावसायिक कौशल को बेहतर बनाने के अवसर प्रदान कर सकता है। डॉ. एम. एल. जाट द्वारा नियमित रूप से कम से कम दो घंटे Learning करने और पाठ्यक्रमों को निर्धारित समयसीमा में अपलोड करने पर दिया गया जोर इस पहल के कार्यान्वयन को महत्व देता है। वहीं, डॉ. यशपाल सिंह मलिक और कर्मयोगी भारत के विशेषज्ञ द्वारा साझा किए गए निर्देश तथा तकनीकी सुझाव संस्थानों को इस प्रक्रिया में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से दिए गए। आगे इस पहल की सफलता पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता, संस्थानों की सक्रिय भागीदारी और प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग पर निर्भर करेगी। यदि डिजिटल Learning को कर्मचारियों की वास्तविक जरूरतों के साथ जोड़ा जाता है, तो इससे ICAR की संस्थागत क्षमता मजबूत करने और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा से जुड़े कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।

ICAR में Mission Karmayogi को मिलेगी रफ्तार, वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के लिए विषय-विशिष्ट ऑनलाइन कोर्स पर जोर

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