दक्षिण एशिया में कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक सहयोग और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और SAARC Agriculture Centre (SAC), ढाका, बांग्लादेश के बीच सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा हुई। SAARC Agriculture Centre के निदेशक डॉ. Md. Golam Mahboob ने 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में ICAR के सहायक महानिदेशक (अंतरराष्ट्रीय संबंध) डॉ. एन.पी. सिंह से मुलाकात की। बैठक में दोनों संस्थानों के बीच जारी सहयोग तथा संस्थागत समन्वय को अधिक प्रभावी बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।
बैठक का प्रमुख उद्देश्य दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कृषि अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सहयोग के मौजूदा तंत्र की समीक्षा करना तथा भविष्य में संयुक्त गतिविधियों को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा करना था। इस दौरान जर्मप्लाज्म का आदान-प्रदान, पीएचडी फेलोशिप, संयुक्त क्षमता निर्माण कार्यक्रम, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, क्षेत्रीय वित्तपोषण के अवसर और SAARC सदस्य देशों में सहयोगात्मक कृषि परियोजनाओं के लिए कार्ययोजना तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे।
बैठक ने इस बात को रेखांकित किया कि क्षेत्रीय स्तर पर संस्थागत साझेदारी और वैज्ञानिक सहयोग दक्षिण एशिया की कृषि संबंधी चुनौतियों का समाधान खोजने, अनुसंधान क्षमताओं को मजबूत करने और कृषि नवाचारों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान पर विशेष जोर
बैठक के प्रमुख विषयों में जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान शामिल रहा। कृषि अनुसंधान में जर्मप्लाज्म से आशय पौधों की आनुवंशिक सामग्री से है, जिसमें बीज, पौध सामग्री और अन्य आनुवंशिक संसाधन शामिल हो सकते हैं। ये संसाधन फसल सुधार, नई किस्मों के विकास, जैव विविधता के संरक्षण और बदलती कृषि परिस्थितियों के अनुकूल फसलें विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
दक्षिण एशिया में जलवायु, मिट्टी, वर्षा और कृषि प्रणालियों में विविधता पाई जाती है। इस क्षेत्र के कई देश समान प्रकार की कृषि चुनौतियों का सामना करते हैं, जिनमें जलवायु परिवर्तन, फसलों में रोग एवं कीटों का प्रकोप, उत्पादन क्षमता में सुधार और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण शामिल है।
ऐसी परिस्थितियों में वैज्ञानिक सहयोग के माध्यम से आनुवंशिक संसाधनों से संबंधित जानकारी और अनुसंधान अनुभवों का आदान-प्रदान उपयोगी हो सकता है। हालांकि, जर्मप्लाज्म का वास्तविक आदान-प्रदान संबंधित राष्ट्रीय नियमों, जैव सुरक्षा आवश्यकताओं, पादप स्वच्छता मानकों और आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच से जुड़े प्रावधानों के अनुरूप किया जाना आवश्यक है।
इस क्षेत्र में ICAR और SAARC Agriculture Centre के बीच समन्वय कृषि वैज्ञानिकों को क्षेत्रीय जरूरतों के अनुरूप अनुसंधान सहयोग विकसित करने के अवसर प्रदान कर सकता है।
पीएचडी फेलोशिप से वैज्ञानिक प्रतिभाओं को प्रोत्साहन
बैठक में पीएचडी फेलोशिप और शैक्षणिक सहयोग पर भी चर्चा हुई। कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में उच्च शिक्षा और शोध प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। कृषि जैव प्रौद्योगिकी, फसल सुधार, मृदा विज्ञान, पौध संरक्षण, जल प्रबंधन और टिकाऊ कृषि जैसे विषयों में प्रशिक्षित शोधकर्ताओं की आवश्यकता लगातार बनी हुई है।
पीएचडी फेलोशिप और शैक्षणिक आदान-प्रदान की संभावनाएं दक्षिण एशियाई देशों के युवा वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों को उन्नत अनुसंधान वातावरण से जुड़ने का अवसर दे सकती हैं। इससे विभिन्न देशों के शोधकर्ताओं के बीच संपर्क बढ़ाने, वैज्ञानिक अनुभव साझा करने और क्षेत्रीय समस्याओं पर संयुक्त रूप से काम करने में मदद मिल सकती है।
ऐसी पहलों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए फेलोशिप की पात्रता, वित्तपोषण, अनुसंधान विषयों, संस्थागत सहयोग और चयन प्रक्रिया जैसे पहलुओं पर स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक होती है। बैठक में पीएचडी फेलोशिप से संबंधित विषय को चर्चा में शामिल करना क्षेत्रीय शैक्षणिक सहयोग के महत्व को दर्शाता है।
संयुक्त प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम
ICAR और SAC के बीच चर्चा का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय संयुक्त क्षमता निर्माण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम रहा। कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक ज्ञान का प्रभावी उपयोग करने के लिए केवल अनुसंधान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और संबंधित संस्थानों के मानव संसाधन को नवीनतम तकनीकों एवं अनुसंधान पद्धतियों से परिचित कराना भी जरूरी है।
संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से कृषि अनुसंधान की आधुनिक पद्धतियों, प्रयोगशाला तकनीकों, फसल प्रबंधन, कृषि जैव प्रौद्योगिकी और जलवायु-अनुकूल कृषि जैसे क्षेत्रों में ज्ञान का आदान-प्रदान किया जा सकता है। ऐसे कार्यक्रमों से भाग लेने वाले विशेषज्ञों को अपने-अपने देशों में कृषि संबंधी चुनौतियों के समाधान विकसित करने में सहायता मिल सकती है।
दक्षिण एशिया में कृषि प्रणालियों की विविधता को देखते हुए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में स्थानीय जरूरतों और प्राथमिकताओं को शामिल करना महत्वपूर्ण है। इससे विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों और कृषि संस्थानों के बीच व्यावहारिक सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
क्षमता निर्माण का दीर्घकालिक उद्देश्य ऐसी वैज्ञानिक और संस्थागत दक्षता विकसित करना है, जो कृषि अनुसंधान की गुणवत्ता में सुधार करे और उसके परिणामों को किसानों तथा कृषि क्षेत्र के अन्य हितधारकों तक पहुंचाने में मदद करे।
क्षेत्रीय वित्तपोषण और संयुक्त कृषि परियोजनाओं की कार्ययोजना
बैठक में क्षेत्रीय वित्तपोषण के अवसरों और SAARC सदस्य देशों में सहयोगात्मक कृषि परियोजनाओं के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर भी विचार किया गया।
कृषि अनुसंधान परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, तकनीकी विशेषज्ञता और संस्थागत समन्वय आवश्यक होते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग के माध्यम से ऐसे अनुसंधान विषयों की पहचान की जा सकती है, जिनमें एक से अधिक देशों की साझा रुचि और भागीदारी हो।
जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, फसल उत्पादकता, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और कृषि में नई तकनीकों का उपयोग ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दक्षिण एशियाई देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।
संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में अनुसंधान निष्कर्षों का मूल्यांकन किया जा सकता है। इससे यह समझने में सहायता मिल सकती है कि कौन-सी तकनीकें या कृषि पद्धतियां किन परिस्थितियों में अधिक उपयोगी हैं।
हालांकि, किसी भी सहयोगात्मक परियोजना की सफलता स्पष्ट उद्देश्यों, निर्धारित जिम्मेदारियों, वित्तपोषण की उपलब्धता, समयबद्ध क्रियान्वयन और परिणामों के मूल्यांकन पर निर्भर करती है। बैठक में संयुक्त परियोजनाओं के लिए कार्ययोजना पर चर्चा इसी दिशा में संस्थागत सहयोग को व्यवस्थित करने के महत्व को दर्शाती है।
दक्षिण एशिया में कृषि अनुसंधान सहयोग का महत्व
दक्षिण एशिया कृषि और खाद्य उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां बड़ी आबादी की आजीविका कृषि एवं उससे संबंधित गतिविधियों पर निर्भर है। साथ ही, क्षेत्र के कई देश जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव, कृषि उत्पादन की लागत और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
इन परिस्थितियों में कृषि अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग ज्ञान, तकनीक और वैज्ञानिक अनुभवों को साझा करने का अवसर प्रदान करता है। क्षेत्रीय साझेदारी के माध्यम से अनुसंधान की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और साझा चुनौतियों के लिए वैज्ञानिक समाधान विकसित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
SAARC Agriculture Centre, ढाका और ICAR, नई दिल्ली के बीच सहयोग इस व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। संस्थागत स्तर पर नियमित संवाद, प्रशिक्षण और अनुसंधान सहयोग से कृषि विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में संपर्क मजबूत करने की संभावनाएं बनती हैं।
भारत के लिए भी क्षेत्रीय कृषि सहयोग महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैज्ञानिक ज्ञान और अनुसंधान अनुभवों का आदान-प्रदान कृषि नवाचारों को आगे बढ़ाने तथा साझा चुनौतियों के समाधान खोजने में योगदान दे सकता है।
संस्थागत साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में पहल
8 अक्टूबर 2026 को हुई इस बैठक में ICAR और SAARC Agriculture Centre के बीच चल रहे सहयोग तथा संस्थागत तंत्र को मजबूत करने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान, पीएचडी फेलोशिप, संयुक्त प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, क्षेत्रीय वित्तपोषण और सहयोगात्मक परियोजनाओं पर विचार-विमर्श ने क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान में साझेदारी के महत्व को रेखांकित किया।
बैठक ने दक्षिण एशिया में कृषि अनुसंधान, नवाचार और क्षमता विकास को आगे बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता को फिर से स्पष्ट किया। ऐसी साझेदारियां वैज्ञानिक समुदाय के बीच संपर्क मजबूत करने, शोधकर्ताओं को प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराने और साझा कृषि चुनौतियों पर संयुक्त रूप से काम करने का आधार बन सकती हैं।
आगे इन चर्चाओं को ठोस परिणामों में बदलने के लिए प्रस्तावित गतिविधियों की प्राथमिकता तय करना, जिम्मेदार संस्थानों की भूमिका स्पष्ट करना और कार्ययोजना के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा महत्वपूर्ण होगी।
कुल मिलाकर, ICAR और SAARC Agriculture Centre के बीच यह बैठक दक्षिण एशिया में कृषि अनुसंधान सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवाद है। क्षेत्रीय संस्थानों के बीच प्रभावी समन्वय, वैज्ञानिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग और क्षमता निर्माण पर निरंतर ध्यान कृषि नवाचार को बढ़ावा देने तथा क्षेत्र की कृषि संबंधी चुनौतियों के समाधान में योगदान दे सकता है।

