जब बात अधिक दूध और बेहतर फैट वाली भैंसों की होती है, तो मुर्रा भैंस (Murrah Buffalo) का नाम प्रमुखता से सामने आता है। काले चमकदार शरीर, घुमावदार सींगों और मजबूत बनावट वाली यह नस्ल लंबे समय से हरियाणा और पंजाब के पशुपालकों की पसंद रही है। इसकी खासियत केवल दूध की मात्रा नहीं, बल्कि दूध में मौजूद वसा और दूसरे पोषक तत्व भी हैं।
मुर्रा भैंस को लेकर अक्सर ऐसी खबरें देखने को मिलती हैं जिनमें किसी पशु के असाधारण दूध उत्पादन या लाखों रुपये की कीमत का दावा किया जाता है। हालांकि, ऐसी उपलब्धियां हर भैंस में नहीं मिलतीं। किसी पशु की वास्तविक कीमत और कमाई उसकी उम्र, स्वास्थ्य, दूध उत्पादन, प्रजनन क्षमता और स्थानीय बाजार पर निर्भर करती है।
इस बीच, देश के डेयरी क्षेत्र से जुड़े नए सरकारी आंकड़े और पशु प्रजनन तकनीकों में बदलाव मुर्रा जैसी नस्लों को और महत्वपूर्ण बना रहे हैं। खासकर 2025-26 के दौरान नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान और बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया गया है।
मुर्रा भैंस कहां की नस्ल है और इसकी पहचान क्या है?
मुर्रा भारत की प्रमुख देशी दुधारू भैंस नस्लों में शामिल है। इसका मूल क्षेत्र हरियाणा के रोहतक, हिसार और जींद जिलों को माना जाता है। इसके अलावा पंजाब के पटियाला और नाभा क्षेत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली के आसपास भी यह नस्ल लंबे समय से पाली जाती रही है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान, हिसार के मुताबिक मुर्रा नस्ल अपनी अधिक दूध उत्पादन क्षमता और दूध में अच्छे फैट प्रतिशत के लिए जानी जाती है। इसी कारण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नस्ल सुधार के काम में भी उपयोगी माना जाता है।
मुर्रा भैंस की कुछ शारीरिक विशेषताएं इसे दूसरी नस्लों से अलग बनाती हैं। इसका रंग सामान्यतः गहरा काला होता है। शरीर गठीला और मजबूत होता है, जबकि सींग छोटे और कसकर घुमावदार होते हैं। कई भैंसों के सींग सिर के पास गोल आकार में मुड़े दिखाई देते हैं।
इस नस्ल की पहचान करते समय केवल रंग या सींग देखना पर्याप्त नहीं है। मिश्रित नस्ल के पशुओं में भी मिलती-जुलती विशेषताएं दिखाई दे सकती हैं। इसलिए शुद्ध नस्ल का पशु खरीदने वाले किसानों को उसके प्रजनन रिकॉर्ड, माता-पिता की जानकारी और दूध उत्पादन का विवरण देखना चाहिए।
अच्छी मुर्रा भैंस में संतुलित शारीरिक बनावट, स्वस्थ थन, सक्रिय व्यवहार और नियमित प्रजनन क्षमता महत्वपूर्ण मानी जाती है। किसी पशु का शरीर बड़ा होने का अर्थ यह नहीं कि वह अधिक दूध भी देगा।
मुर्रा भैंस के दूध को इतना खास क्यों माना जाता है?
मुर्रा भैंस के दूध की सबसे बड़ी विशेषताओं में उसका अधिक फैट प्रतिशत शामिल है। आम तौर पर इस नस्ल के दूध में लगभग 6.9 से 8.3 प्रतिशत तक फैट पाया जा सकता है। हालांकि, यह मात्रा सभी पशुओं में एक जैसी नहीं होती।पशु की उम्र, खानपान, दूध देने की अवस्था, मौसम और आनुवंशिक गुणों के अनुसार दूध की गुणवत्ता बदलती रहती है।
भैंस के दूध में फैट अधिक होने से उसकी बनावट अपेक्षाकृत गाढ़ी और मलाईदार होती है। यही गुण इसे घी, मक्खन, पनीर, दही, खोया और कई दूसरे डेयरी उत्पाद बनाने के लिए उपयोगी बनाता है।डेयरी कारोबार में दूध के फैट और एसएनएफ यानी वसा रहित ठोस पदार्थों का विशेष महत्व होता है। कई दुग्ध सहकारी समितियों और निजी खरीदारों के यहां दूध की कीमत तय करते समय इनकी जांच की जाती है।इसका मतलब है कि कुछ परिस्थितियों में बेहतर फैट वाला दूध बेचने पर किसान को प्रति लीटर अधिक कीमत मिल सकती है। लेकिन हर बाजार में मुर्रा भैंस के दूध का एक समान भाव नहीं मिलता।
कर्नाल स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के उपलब्ध फार्म रिकॉर्ड में मुर्रा दूध का फैट लगभग 7.65 प्रतिशत दर्ज है। यह आंकड़ा दिखाता है कि उच्च वसा वाला दूध इस नस्ल की एक प्रमुख विशेषता है।
2026 की नई जानकारी: शोध में दूध के फैट का आंकड़ा 8 प्रतिशत से अधिक
मुर्रा भैंस की दूध उत्पादन क्षमता को समझने के लिए केवल पारंपरिक जानकारी ही नहीं, वैज्ञानिक संस्थानों के नए अध्ययन भी महत्वपूर्ण हैं।आईसीएआर के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, कर्नाल की वर्ष 2024 की वार्षिक शोध रिपोर्ट में मुर्रा भैंसों के एक अध्ययन समूह के दूध में औसतन 8.31 प्रतिशत फैट दर्ज किया गया।इसी समूह में एसएनएफ 10.13 प्रतिशत और प्रोटीन की मात्रा 3.56 प्रतिशत दर्ज हुई।रिपोर्ट के अनुसार अध्ययन समूह में औसत कुल दुग्ध उत्पादन एक ब्यांत में 2,746.6 किलोग्राम रहा। यह परिणाम संस्थान के शोध समूह का है, इसे देश की हर मुर्रा भैंस की सामान्य उत्पादन क्षमता नहीं समझना चाहिए।
इन वैज्ञानिक आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। डेयरी फार्म में पशुओं का सही चयन, पोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन और व्यवस्थित प्रजनन कार्यक्रम दूध उत्पादन की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
आज agriculture और पशुपालन से जुड़े विशेषज्ञ केवल यह नहीं देख रहे कि कोई भैंस एक दिन में कितना दूध देती है। वे यह भी समझने का प्रयास कर रहे हैं कि उसका दूध कितने दिनों तक मिलता है, उसमें कितना फैट रहता है और उसे पालने में कितनी लागत आती है।इसी आधार पर किसी नस्ल की वास्तविक आर्थिक उपयोगिता का बेहतर मूल्यांकन किया जा सकता है।
एक दिन में कितना दूध देती है मुर्रा भैंस?
मुर्रा भैंस के बारे में सबसे अधिक पूछा जाने वाला सवाल यही है कि वह प्रतिदिन कितना दूध दे सकती है।इस सवाल का एक निश्चित जवाब देना कठिन है, क्योंकि एक ही नस्ल के अलग-अलग पशुओं के उत्पादन में काफी अंतर हो सकता है।राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के फार्म रिकॉर्ड में दूध दे रही मुर्रा भैंसों का औसत उत्पादन लगभग 7.5 किलोग्राम प्रतिदिन दर्ज है। वहीं संस्थान के रिकॉर्ड में एक पशु का सर्वश्रेष्ठ दैनिक उत्पादन 22.5 किलोग्राम तक बताया गया है।ये दोनों आंकड़े अलग-अलग बातों को दर्शाते हैं। पहला समूह का औसत है, जबकि दूसरा किसी विशेष पशु की उत्कृष्ट उपलब्धि।
इसी तरह केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान ने मुर्रा नस्ल की 305 दिन की दुग्ध उत्पादन क्षमता की सामान्य सीमा लगभग 1,003 से 2,057 किलोग्राम बताई है। विशेष रूप से उच्च क्षमता वाले पशु इससे कहीं ज्यादा उत्पादन कर सकते हैं। किसानों को यह समझना जरूरी है कि अत्यधिक दूध देने वाली भैंसें पूरी नस्ल का औसत नहीं होतीं। खरीदारी से पहले कई दिनों का दूध रिकॉर्ड देखकर ही उत्पादन क्षमता का अनुमान लगाना बेहतर रहता है।
किसी भैंस का आज 12 लीटर दूध देना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह आने वाले पूरे साल रोज इतना ही दूध देगी। ब्यांत के बाद दूध बढ़ने और फिर धीरे-धीरे घटने की एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है।
विदेशों में भी क्यों है मुर्रा नस्ल की पहचान?
भारत की मुर्रा भैंस (Murrah Buffalo) की पहचान केवल घरेलू डेयरी उद्योग तक सीमित नहीं है। इस नस्ल के आनुवंशिक गुणों का उपयोग दूसरे देशों में भैंसों की उत्पादन क्षमता सुधारने के लिए भी किया गया है।आईसीएआर के वैज्ञानिक साहित्य के अनुसार स्थानीय और कम उत्पादक भैंसों के नस्ल सुधार में मुर्रा जैसी नस्लों का इस्तेमाल दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी किया गया है। इसका उद्देश्य स्थानीय पशुओं की दूध उत्पादन क्षमता को बेहतर बनाना रहा है।

की विदेशों में पहचान मुख्य रूप से नस्ल सुधार, पशु आनुवंशिकी और डेयरी उत्पादन से जुड़ी है। यह कहना सही नहीं होगा कि भारत से मुर्रा भैंस का दूध हर देश में बड़े पैमाने पर भेजा जाता है।दूध और डेयरी उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में गुणवत्ता जांच, पशु स्वास्थ्य मानक, प्रसंस्करण, परिवहन और आयात करने वाले देश के नियम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।मुर्रा जैसी भारतीय नस्लों की वैश्विक उपयोगिता यह दिखाती है कि देश का पशुधन केवल घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पशु प्रजनन शोध के लिए भी महत्वपूर्ण है।
भारत में दूध उत्पादन का नया रिकॉर्ड, भैंसों की बड़ी भागीदारी
देश के डेयरी क्षेत्र को समझने के लिए नवीनतम सरकारी आंकड़े महत्वपूर्ण हैं।पशुपालन एवं डेयरी विभाग के बुनियादी पशुपालन सांख्यिकी 2025 के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल दूध उत्पादन लगभग 247.87 मिलियन टन रहा। यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में करीब 3.58 प्रतिशत अधिक था।इसी अवधि में देश में प्रति व्यक्ति दूध की अनुमानित उपलब्धता बढ़कर 485 ग्राम प्रतिदिन पहुंच गई।
सरकारी आंकड़ों में देशी नस्ल की भैंसों का कुल दूध उत्पादन में योगदान 31.18 प्रतिशत और अन्य अवर्गीकृत भैंसों का योगदान 11.97 प्रतिशत दर्ज किया गया।इस तरह दोनों श्रेणियों को मिलाकर भैंसों की भागीदारी लगभग 43.15 प्रतिशत रही।यह आंकड़ा बताता है कि भारत में दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल गायों की उत्पादकता सुधारना पर्याप्त नहीं है। भैंसों का स्वास्थ्य, बेहतर नस्ल संरक्षण, गुणवत्तापूर्ण चारा और दूध की खरीद व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। विशेषकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दूसरे राज्यों में मुर्रा जैसी नस्लें ग्रामीण डेयरी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई हैं।
2025-26 का बड़ा अपडेट: नस्ल सुधार पर सरकार का नया जोर
भारत सरकार की राष्ट्रीय गोकुल मिशन योजना के अंतर्गत देशी गाय और भैंस नस्लों के संरक्षण एवं उत्पादकता सुधार पर काम किया जा रहा है।पशुपालन एवं डेयरी विभाग की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक इस मिशन के लिए 2021-22 से 2025-26 की अवधि में कुल परिव्यय को संशोधित कर 3,400 करोड़ रुपये किया गया था। मार्च 2025 में पहले से निर्धारित 2,400 करोड़ रुपये के बजट में 1,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त जोड़ने का निर्णय लिया गया था।योजना के तहत आधुनिक प्रजनन तकनीक और बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया गया।किसानों के लिए इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि डेयरी व्यवसाय में दूध की मात्रा के साथ पशु की प्रजनन क्षमता भी जरूरी होती है।यदि भैंस समय पर गर्भधारण नहीं करती या दो ब्यांत के बीच अधिक अंतर रहता है, तो दूध उत्पादन और कमाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
नई प्रजनन तकनीकों का उद्देश्य इसी तरह की समस्याओं को कम करने और बेहतर संतति तैयार करने में सहायता करना है।
सेक्स-सॉर्टेड सीमन तकनीक से क्या फायदा?
राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत सेक्स-सॉर्टेड सीमन तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका उपयोग मादा बछड़े या कटड़े के जन्म की संभावना बढ़ाने के उद्देश्य से किया जाता है।सरकार की अप्रैल 2025 की जानकारी के अनुसार इस तकनीक से लगभग 90 प्रतिशत तक मादा संतति प्राप्त होने की संभावना बताई गई है। यह निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं है।
योजना के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार पात्र किसानों को सेक्स-सॉर्टेड सीमन की लागत पर 50 प्रतिशत तक सहायता दी जा सकती है। वास्तविक उपलब्धता राज्य और स्थानीय कार्यक्रम पर निर्भर करती है।
मुर्रा नस्ल के पशुपालकों के लिए बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले प्रजनन पशुओं की उपलब्धता भविष्य में उपयोगी हो सकती है। हालांकि, तकनीक का इस्तेमाल केवल प्रशिक्षित पशु चिकित्सा कर्मियों की देखरेख में ही कराना चाहिए।
मुर्रा भैंस से कितनी हो सकती है कमाई?
मुर्रा भैंस खरीदने की योजना बना रहे किसान सबसे पहले यह जानना चाहते हैं कि महीने में कितना पैसा कमाया जा सकता है।कमाई का सही अनुमान लगाने के लिए दूध उत्पादन, बिक्री मूल्य और रोजाना के खर्च को अलग-अलग समझना जरूरी है।मान लीजिए किसी किसान की भैंस एक निश्चित अवधि में औसतन 10 लीटर दूध प्रतिदिन देती है। यदि स्थानीय बाजार में उसे 60 रुपये प्रति लीटर का भाव मिलता है, तो प्रतिदिन दूध की सकल बिक्री 600 रुपये होगी।इस हिसाब से 30 दिन में सकल बिक्री 18,000 रुपये होगी।यह केवल एक काल्पनिक उदाहरण है। इसमें चारा, पशु चिकित्सा, बिजली, श्रम, परिवहन और दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं।यदि उसी अवधि में औसतन 250 रुपये प्रतिदिन संचालन खर्च आता है, तो 30 दिनों में 7,500 रुपये खर्च होंगे। इसके बाद 10,500 रुपये बचेंगे।लेकिन यह राशि भी पूरे व्यवसाय का शुद्ध लाभ नहीं कही जा सकती, क्योंकि पशु की खरीद लागत, ब्याज, बीमा, उपकरणों की लागत और दूध न देने वाले दिनों का खर्च अभी बाकी है।डेयरी व्यवसाय की वास्तविक आर्थिक स्थिति समझने के लिए सालाना हिसाब रखना अधिक उपयोगी होता है।

मुर्रा भैंस खरीदते समय किन बातों पर ध्यान दें?
डेयरी व्यवसाय शुरू करने में पशु का चयन सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में एक है।कई बार किसान केवल विक्रेता के बताए दूध उत्पादन पर भरोसा कर लेते हैं। बाद में पता चलता है कि पशु का उत्पादन कम है या उसके प्रजनन से जुड़ी समस्याएं हैं।इसलिए मुर्रा भैंस खरीदने से पहले उसके हालिया दूध उत्पादन का रिकॉर्ड देखना चाहिए। संभव हो तो सुबह और शाम दोनों समय दूध की मात्रा की जांच की जाए।पशु ने कितनी बार बच्चे दिए हैं, पिछला ब्यांत कब हुआ था और कितने समय से वह दूध दे रही है, इसकी जानकारी लेना भी जरूरी है।भैंस के थन में कोई असामान्यता, चलने-फिरने में परेशानी या खाने की इच्छा में कमी जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।पशु चिकित्सक से स्वास्थ्य परीक्षण कराना समझदारी भरा कदम होगा। इसके साथ टीकाकरण, कृमिनाशक उपचार और बीमारी के पुराने रिकॉर्ड भी जांचने चाहिए।यदि किसान उच्च आनुवंशिक क्षमता वाली मुर्रा भैंस लेना चाहता है, तो विश्वसनीय प्रजनन केंद्र या प्रमाणित विक्रेता से जानकारी लेना उपयोगी रहता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पशु खरीदते समय अनुमानित भविष्य की कमाई के बजाय उपलब्ध वास्तविक रिकॉर्ड को प्राथमिकता दें।
गर्मियों में मुर्रा भैंस की देखभाल क्यों जरूरी है?
गर्मियों में बढ़ता तापमान दुधारू पशुओं के लिए चुनौती बन सकता है। भैंसों में शरीर का तापमान नियंत्रित करने की क्षमता सीमित होती है, इसलिए तेज गर्मी और उमस उनके आराम, चारा खाने की मात्रा और दूध उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
मुर्रा भैंस को रखने के लिए हवादार और छायादार स्थान होना चाहिए। पीने के लिए साफ पानी हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए। गर्मियों में पशुओं को ठंडक पहुंचाने की उपयुक्त व्यवस्था भी जरूरी है।पशुशाला में पानी का जमाव, गंदगी और कीचड़ बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं। इसलिए सफाई और जल निकासी का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
आईसीएआर से जुड़े शोध में पाया गया है कि मौसम और दूध देने की अवस्था का मुर्रा भैंस के दूध की मात्रा और उसके घटकों पर असर पड़ सकता है। इसका मतलब है कि दूध उत्पादन में बदलाव हमेशा नस्ल की खराब गुणवत्ता का संकेत नहीं होता।Agriculture और पशुपालन के क्षेत्र में बदलते मौसम को देखते हुए अब पशु आवास, पानी की उपलब्धता और तापमान प्रबंधन को भी आर्थिक उत्पादकता से जोड़कर देखा जा रहा है।
पशुपालकों के लिए चारे का सही प्रबंधन
मुर्रा भैंस की दूध उत्पादन क्षमता बनाए रखने में संतुलित पोषण की बड़ी भूमिका होती है। केवल अधिक हरा चारा देने या दाना बढ़ा देने से दूध उत्पादन बढ़ने की गारंटी नहीं होती।पशु के वजन, उम्र, गर्भावस्था और दूध उत्पादन के आधार पर उसके आहार की जरूरत बदलती है।हरे चारे के साथ उपयुक्त सूखा चारा, संतुलित दाना मिश्रण और जरूरी खनिज उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। आहार में अचानक बड़ा बदलाव करने से बचना चाहिए।पशुओं को खराब, फफूंद लगा या सड़ा हुआ चारा नहीं खिलाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
पशुपालकों को स्थानीय पशु चिकित्सा विशेषज्ञ या पशु पोषण विशेषज्ञ की सहायता से आहार योजना तैयार करनी चाहिए। इससे अनावश्यक दाना खर्च कम करने और पशु की जरूरत के अनुसार पोषण देने में मदद मिल सकती है।
क्या छोटे किसान भी मुर्रा भैंस से डेयरी कारोबार शुरू कर सकते हैं?
छोटे किसानों के लिए एक या दो दुधारू पशुओं से शुरुआत करना व्यावहारिक विकल्प हो सकता है, बशर्ते उनके पास चारे, पानी, पशु आवास और दूध बेचने की व्यवस्था हो।
किसी भी किसान को सबसे पहले अपने क्षेत्र में दूध की मांग और खरीद मूल्य का पता करना चाहिए। इसके बाद पशु खरीदने की लागत तथा सालभर के संचालन खर्च का अनुमान लगाना चाहिए।
यदि गांव में दुग्ध सहकारी समिति उपलब्ध है, तो वहां दूध की गुणवत्ता के आधार पर भुगतान की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।डेयरी कारोबार में महिलाओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। पशुओं की देखभाल, चारा प्रबंधन, दूध दुहने और स्थानीय बिक्री जैसे कार्यों में ग्रामीण महिलाओं की बड़ी भूमिका रहती है।अच्छी बात यह है कि आज पशुपालन विभाग, कृषि विज्ञान केंद्रों और पशु चिकित्सा संस्थानों के माध्यम से वैज्ञानिक पशुपालन की जानकारी उपलब्ध है।किसानों को नई नस्ल खरीदने से पहले प्रशिक्षण, पशु स्वास्थ्य सुविधाओं और दूध बेचने के स्थायी विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए।
आने वाले समय में मुर्रा नस्ल का भविष्य
भारत में बढ़ते दूध उत्पादन और डेयरी उत्पादों की मांग को देखते हुए मुर्रा जैसी देशी नस्लों का महत्व बना रह सकता है।आने वाले वर्षों में नस्ल सुधार के साथ डिजिटल पशु रिकॉर्ड, बेहतर स्वास्थ्य निगरानी, वैज्ञानिक पोषण और गुणवत्तापूर्ण प्रजनन सेवाओं की भूमिका बढ़ने की संभावना है।हालांकि, इन तकनीकों का फायदा तभी होगा जब छोटे और सीमांत पशुपालकों तक इनकी पहुंच बने और उनकी लागत वहन करने योग्य रहे।
भारत के agriculture क्षेत्र में खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। खेत से मिलने वाला चारा पशुओं के काम आता है, जबकि पशुओं से प्राप्त गोबर का उपयोग जैविक खाद बनाने में किया जा सकता है। इस तरह दोनों गतिविधियां एक-दूसरे को सहारा देती हैं।
मुर्रा भैंस की असली उपयोगिता इसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में दिखाई देती है, जहां दूध उत्पादन, पशु की सेहत, किसानों की मेहनत और बाजार की उपलब्धता मिलकर आय का आधार बनते हैं।
मुर्रा भैंस भारत की उन प्रमुख देशी नस्लों में शामिल है, जिनकी पहचान दूध की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता से भी जुड़ी है। अधिक फैट वाला दूध, नस्ल सुधार में उपयोगिता और विभिन्न परिस्थितियों में पालन की क्षमता इसे डेयरी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।
2025-26 की सरकारी रिपोर्ट और वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि भविष्य में डेयरी उत्पादन बढ़ाने के लिए बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं, आधुनिक प्रजनन सेवाओं और वैज्ञानिकपशुपालन का महत्व बढ़ रहा है।लेकिन पशुपालकों के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि किसी भैंस की लोकप्रियता या उसके बारे में सुनी गई रिकॉर्ड दूध उत्पादन की खबर के आधार पर निवेश का फैसला न करें।स्वस्थ पशु, भरोसेमंद दूध रिकॉर्ड, उचित खरीद मूल्य और नियंत्रित खर्च ही सफल डेयरी व्यवसाय की मजबूत बुनियाद हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. मुर्रा भैंस किस राज्य की नस्ल है?
मुर्रा भैंस मुख्य रूप से हरियाणा की देशी नस्ल है। इसका मूल क्षेत्र रोहतक, हिसार और जींद माना जाता है।
2. मुर्रा भैंस के दूध में कितना फैट होता है?
सामान्यतः 6.9 से 8.3 प्रतिशत तक फैट पाया जा सकता है। वास्तविक मात्रा पशु, आहार और दूध देने की अवस्था पर निर्भर करती है।
3. क्या मुर्रा भैंस रोज 20 लीटर दूध दे सकती है?
कुछ उच्च उत्पादन क्षमता वाली भैंसें इतना या इससे अधिक दूध दे सकती हैं, लेकिन यह सभी मुर्रा भैंसों का सामान्य उत्पादन नहीं है।
4. मुर्रा भैंस की कीमत कितनी होती है?
इसकी कोई निश्चित कीमत नहीं होती। बाजार भाव पशु की उम्र, स्वास्थ्य, उत्पादन क्षमता, प्रजनन रिकॉर्ड और स्थानीय मांग के अनुसार तय होता है।
5. क्या मुर्रा भैंस विदेशों में भी प्रसिद्ध है?
हां। मुर्रा नस्ल की अंतरराष्ट्रीय पहचान मुख्य रूप से बेहतर दूध उत्पादन क्षमता और भैंसों की नस्ल सुधार में उसकी उपयोगिता से जुड़ी है।

