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फसल अवशेष से बनेगा ‘बायो-बिटुमेन’, भारत को हर साल 40,000 करोड़ रुपये की बचत का रास्ता

Fiza by Fiza
March 31, 2026
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फसल अवशेष से बनेगा ‘बायो-बिटुमेन’, भारत को हर साल 40,000 करोड़ रुपये की बचत का रास्ता
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भारत में अब फसल अवशेष (पराली) को जलाने की समस्या का एक बड़ा और टिकाऊ समाधान सामने आया है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्वदेशी रूप से विकसित बायो-बिटुमेन तकनीक के माध्यम से फसल अवशेषों को उपयोग में लाकर देश हर साल करीब 40,000 करोड़ रुपये के आयात में बचत कर सकता है। यह तकनीक वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी CSIR के संस्थानों द्वारा विकसित की गई है।

उन्होंने बताया कि देश में हर साल लगभग 6 करोड़ टन फसल अवशेष उत्पन्न होते हैं, जिनमें से बड़ी मात्रा को किसान जला देते हैं। इससे वायु प्रदूषण गंभीर स्तर तक बढ़ जाता है। अब यही अवशेष बायो-बिटुमेन में बदलकर सड़क निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में उपयोग किए जा सकते हैं। यह पारंपरिक बिटुमेन का आंशिक विकल्प बन सकता है और पर्यावरण के लिए भी बेहतर है।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत में हर साल लगभग 88 लाख टन बिटुमेन की जरूरत होती है, जिसमें से करीब 50-58 प्रतिशत आयात किया जाता है। इस पर 25,000 से 30,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में बायो-बिटुमेन का इस्तेमाल न केवल आयात पर निर्भरता घटाएगा बल्कि देश की आर्थिक मजबूती को भी बढ़ाएगा।

यह तकनीक नई दिल्ली स्थित CSIR-Central Road Research Institute और देहरादून स्थित CSIR-Indian Institute of Petroleum द्वारा विकसित की गई है। “लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास से बायो-बिटुमेन” तकनीक को उद्योग में अपनाने के लिए सीएसआईआर द्वारा एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया।

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी सहित कई वैज्ञानिक, उद्योग प्रतिनिधि और हितधारक उपस्थित रहे। इस दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस पहल को “अपशिष्ट से धन” का बेहतरीन उदाहरण बताया।

उन्होंने कहा, “आधुनिक अर्थव्यवस्था में अपशिष्ट जैसी कोई चीज नहीं होती। विज्ञान और तकनीक के जरिए हर संसाधन को मूल्यवान बनाया जा सकता है।” उनके अनुसार, धान और गेहूं के अवशेष अब किसानों के लिए आय का नया स्रोत बन सकते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी भी मिलेगी।

यह तकनीक पायरोलिसिस (थर्मोकेमिकल प्रक्रिया) के जरिए कृषि अवशेषों को एक नवीकरणीय बाइंडर में बदलती है, जो सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक बिटुमेन का लगभग 30 प्रतिशत तक स्थान ले सकता है। परीक्षणों में यह तकनीक न केवल प्रभावी साबित हुई है, बल्कि इससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी देखी गई है और सड़क की गुणवत्ता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।

डॉ. सिंह ने बताया कि यह पहल कई राष्ट्रीय लक्ष्यों को एक साथ पूरा करती है—पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण में कमी, आयात बिल में कमी, किसानों की आय में वृद्धि, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा और नेट ज़ीरो लक्ष्यों की दिशा में प्रगति। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के विजन को आगे बढ़ाने वाला कदम है।

उन्होंने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को और मजबूत करने पर भी जोर दिया। साथ ही यह भी कहा कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को डिजिटल माध्यमों के जरिए किसानों, उद्योग और आम जनता तक सरल भाषा में पहुंचाना जरूरी है।

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस पहल को कृषि, विज्ञान और उद्योग का “ऐतिहासिक संगम” बताया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक पराली जलाने की समस्या का व्यावहारिक समाधान है, जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि बायो-बिटुमेन तकनीक भारत को सतत और पर्यावरण-अनुकूल अवसंरचना विकास की दिशा में अग्रणी बना सकती है। आने वाले समय में इसके बड़े पैमाने पर उपयोग से सड़क निर्माण की तस्वीर बदल सकती है और भारत “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर एक मजबूत कदम बढ़ा सकता है।

 

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