Bundelkhand Women Dairy Business: बुंदेलखंड का नाम आते ही लंबे समय तक सूखा, पानी की कमी, खेती की मुश्किलें, कम रोजगार और पलायन जैसी तस्वीरें सामने आती रही हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले इस क्षेत्र में खेती हमेशा आसान नहीं रही। कम वर्षा और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हजारों ग्रामीण परिवारों के लिए स्थायी आमदनी हासिल करना बड़ी चुनौती रही है।लेकिन इसी बुंदेलखंड में पिछले कुछ वर्षों में एक अलग कहानी लिखी गई है। इस कहानी की नायक किसी बड़े शहर के उद्योगपति या कॉरपोरेट अधिकारी नहीं, बल्कि गांवों में पशुपालन करने वाली महिलाएं हैं।
घर में एक या दो गाय-भैंस पालने से शुरू होने वाला दूध का काम अब संगठित Bundelkhand Women Dairy Business का रूप ले चुका है। हजारों महिलाएं दूध उत्पादन, संग्रह, गुणवत्ता जांच, पशु प्रबंधन और वित्तीय लेनदेन से जुड़ रही हैं। इससे केवल दूध का बाजार नहीं बदला, बल्कि महिलाओं की आमदनी, बैंकिंग भागीदारी और परिवार के आर्थिक फैसलों में उनकी भूमिका भी बढ़ी है।
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में काम कर रही बलिनी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी से मार्च 2026 की मीडिया रिपोर्टों में करीब 90 हजार महिला दुग्ध उत्पादकों के जुड़े होने की जानकारी दी गई। वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सक्रिय Muktaa Mahila Milk Producer Company अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर 15 हजार से अधिक महिला सदस्यों का उल्लेख करती है। दोनों प्रमुख महिला-नेतृत्व वाले नेटवर्क को मिलाकर यह संख्या करीब 1.05 लाख महिलाओं तक पहुंचती है। यह आंकड़ा बताता है कि बुंदेलखंड में डेयरी अब केवल पशुपालन का पारंपरिक काम नहीं रही। यह ग्रामीण महिलाओं के लिए नियमित आय और उद्यमिता का संगठित माध्यम बन रही है।
गांव की महिलाओं से शुरू हुआ Women Led Dairy Business
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन नया काम नहीं है। गाय और भैंस पालना लंबे समय से कृषि आधारित परिवारों की जीवनशैली का हिस्सा रहा है। समस्या यह थी कि पशुओं की देखभाल में महिलाओं की भूमिका बहुत बड़ी होने के बावजूद दूध बेचने और उससे होने वाली कमाई पर उनका नियंत्रण अक्सर सीमित था। बुंदेलखंड के नए डेयरी मॉडल ने इसी व्यवस्था को बदलने की कोशिश की। महिलाओं को सीधे दुग्ध उत्पादक कंपनी का सदस्य बनाया गया। गांवों में दूध संग्रह केंद्र बनाए गए। दूध की मात्रा और गुणवत्ता को मशीनों से जांचने की व्यवस्था की गई और भुगतान सीधे महिला सदस्यों के बैंक खाते में पहुंचने लगा। यही Women Empowerment Through Dairy Farming मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। महिला केवल पशु को चारा देने या दूध निकालने वाली व्यक्ति नहीं रही। वह दूध बेचने वाली उत्पादक, कंपनी की सदस्य और कमाई हासिल करने वाली आर्थिक भागीदार बनी।
बलिनी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी ने कैसे बदली तस्वीर?
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में इस परिवर्तन के केंद्र में Balinee Milk Producer Company Limited का नाम प्रमुखता से आता है। बलिनी की आधिकारिक जानकारी के अनुसार कंपनी को 2019 में Companies Act, 2013 के तहत स्थापित किया गया। इसका मुख्यालय झांसी में है। इसे National Rural Livelihood Mission और Uttar Pradesh State Rural Livelihood Mission के सहयोग तथा NDDB Dairy Services के तकनीकी मार्गदर्शन से विकसित किया गया। कंपनी का मुख्य उद्देश्य महिला दुग्ध उत्पादकों को पूरे वर्ष पारदर्शी बाजार उपलब्ध कराना, समय पर भुगतान करना और पशुपालन से जुड़ी जरूरी सेवाएं प्रदान करना है। बलिनी की शुरुआत कुछ जिलों और गांवों से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका नेटवर्क झांसी, हमीरपुर, बांदा, जालौन, चित्रकूट, ललितपुर और महोबा सहित उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सभी सात जिलों तक फैल गया।
मार्च 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक बलिनी मॉडल से जुड़े करीब 90 हजार महिला दुग्ध उत्पादक 1,143 गांवों के नेटवर्क के माध्यम से लगभग तीन लाख लीटर दूध प्रतिदिन संग्रह कर रहे थे। रिपोर्ट में महिलाओं से जुड़े इस नेटवर्क का सामूहिक कारोबार 2,000 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया।
बलिनी की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़े कुछ अलग समय के हैं। वहां करीब 80 हजार महिला दुग्ध उत्पादकों, लगभग 1,250 गांवों और प्रतिदिन करीब 3.25 लाख लीटर दूध आपूर्ति का उल्लेख है। अलग-अलग तारीखों के कारण सदस्य संख्या और संग्रह के आंकड़ों में अंतर दिखाई देना स्वाभाविक है।
केवल दूध बेचना नहीं, पूरा सिस्टम तैयार हुआ
Bundelkhand Women Dairy Business की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि महिलाओं ने अधिक दूध बेचना शुरू कर दिया।असल परिवर्तन बाजार व्यवस्था में हुआ।पहले किसी ग्रामीण महिला के पास गाय या भैंस होने के बावजूद यह जरूरी नहीं था कि उसे दूध का उचित मूल्य मिल जाए। कई क्षेत्रों में स्थानीय दूध व्यापारी या बिचौलिए ही बाजार तक पहुंच का मुख्य माध्यम होते थे। संगठित डेयरी नेटवर्क ने इस व्यवस्था में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए।
गांव स्तर पर दूध संग्रह केंद्र बनाए गए। दूध को महिला उत्पादक की मौजूदगी में तौला जाता है और गुणवत्ता की जांच की जाती है। इसके बाद भुगतान डिजिटल प्रणाली के माध्यम से सीधे संबंधित महिला के बैंक खाते में पहुंचाया जाता है। बलिनी के अनुसार सदस्य महिलाओं को लगभग हर दस दिन में सीधे बैंक खाते में भुगतान किया जाता है। इससे एक महिला को दो स्तर पर फायदा मिलता है। पहला, दूध के लिए संगठित बाजार मिलता है। दूसरा, कमाई सीधे उसके नाम के बैंक खाते में पहुंचती है। इसी वजह से Rural Women Entrepreneurship जैसे विषयों में बुंदेलखंड का डेयरी मॉडल महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
11 महिलाओं की शुरुआती पहल से हजारों सदस्य
बलिनी की शुरुआती यात्रा भी दिलचस्प रही है। कुछ शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कंपनी के निर्माण में एक छोटे महिला समूह से शुरुआत हुई और कुछ ही वर्षों में इससे हजारों सदस्य जुड़ गए।2022 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक उस समय बलिनी लगभग 40 हजार महिला सदस्यों और 800 से अधिक गांवों तक पहुंच चुकी थी। मार्च 2022 में औसत दूध खरीद करीब 1.04 लाख किलोग्राम प्रतिदिन बताई गई थी।2021 में भारत सरकार की प्रेस सूचना ब्यूरो की एक रिपोर्ट में कंपनी के साथ 25 हजार से अधिक महिला दूध उत्पादकों के जुड़ने का उल्लेख था। वे 602 गांवों में फैली हुई थीं।इन आंकड़ों की तुलना करने पर इस नेटवर्क के विस्तार को समझा जा सकता है।2021 में 25 हजार से अधिक महिलाएं, 2022 में लगभग 40 हजार, 2023 में करीब 63 हजार और बाद के वर्षों में यह संख्या और बढ़ती गई।यह वृद्धि दिखाती है कि किसी ग्रामीण कारोबार को सफल बनाने के लिए केवल उत्पाद पर्याप्त नहीं होता। भरोसेमंद बाजार, भुगतान प्रणाली और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सेवाएं भी उतनी ही जरूरी होती हैं।
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में Muktaa की कहानी
बुंदेलखंड केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश में भी आता है।यहां Muktaa Mahila Milk Producer Company Limited ग्रामीण महिलाओं को डेयरी कारोबार से जोड़ने का काम कर रही है।कंपनी की आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना 1 अगस्त 2017 को हुई और इसने अगस्त 2018 से सागर जिले में अपना संचालन शुरू किया। बाद में कंपनी ने अपना कार्यक्षेत्र छतरपुर तक बढ़ाया।Muktaa की खास बात यह है कि इसके सदस्य पूरी तरह महिला किसान हैं।कंपनी के अनुसार वर्तमान में 15 हजार से अधिक सदस्य इससे जुड़ी हैं और इसका कार्यक्षेत्र लगभग 700 से 800 गांवों तक फैला है।महिलाओं को दूध बिक्री के अलावा पशु आहार, मिनरल मिश्रण, कृत्रिम गर्भाधान, चारे के बीज और पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की गई है।इस तरह उत्तर प्रदेश की Balinee और मध्य प्रदेश की Muktaa मिलकर Women Dairy Farmers in Bundelkhand की उस बड़ी तस्वीर को सामने लाती हैं जिसमें करीब 1.05 लाख महिलाएं विभिन्न संगठित नेटवर्क का हिस्सा बन चुकी हैं।

छोटे पशुपालक के लिए डेयरी क्यों महत्वपूर्ण है?
खेती की आय मौसम पर काफी निर्भर होती है।अगर बारिश कम हुई, फसल खराब हुई या बाजार भाव गिर गया तो किसान की पूरे मौसम की आय प्रभावित हो सकती है। इसके विपरीत दूध का उत्पादन परिवार को दैनिक या नियमित नकदी उपलब्ध करा सकता है।इसी कारण बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में डेयरी आर्थिक सुरक्षा का अतिरिक्त साधन बन सकती है।ICAR से जुड़े एक अध्ययन में भी बुंदेलखंड में डेयरी को आजीविका सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया। अध्ययन में कम दूध देने वाले पशु, पशु चिकित्सा सेवाओं की कमी, वैज्ञानिक जानकारी की कमी और दूध बाजार में बिचौलियों की भूमिका जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया था।संगठित महिला डेयरी कंपनियां इसी तरह की कई समस्याओं को एक साथ संबोधित करने की कोशिश करती हैं।महिला को केवल दूध खरीदने वाला केंद्र नहीं मिलता, बल्कि पशु की उत्पादकता बढ़ाने के लिए तकनीकी सहायता भी मिलती है।यही कारण है कि Dairy Farming Business को ग्रामीण आय के महत्वपूर्ण स्रोतों में गिना जाता है।
पशु की सेहत सुधरी तो महिला की आय भी बढ़ी
डेयरी कारोबार का एक सामान्य नियम है कि केवल पशुओं की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होता। पशु कितना दूध दे रहा है और उस पर कितना खर्च हो रहा है, यह अधिक महत्वपूर्ण है।इसी कारण बलिनी अपने सदस्य परिवारों को संतुलित पशु आहार, क्षेत्र के अनुसार मिनरल मिश्रण, हरे चारे से संबंधित सहायता और कृत्रिम गर्भाधान जैसी सेवाएं उपलब्ध कराने की बात कहती है।इसका उद्देश्य दूध उत्पादन बढ़ाते हुए उत्पादन लागत को नियंत्रित करना है।
मान लीजिए किसी महिला के पास दो दुधारू पशु हैं। अगर उचित आहार, समय पर इलाज और बेहतर पशु प्रबंधन के कारण प्रत्येक पशु का दूध उत्पादन बढ़ता है तो बिना बहुत अधिक पशु जोड़ने के भी परिवार की आमदनी बढ़ सकती है।यही छोटे स्तर की डेयरी को व्यवसाय में बदलने की शुरुआत है।
गांव में डिजिटल मशीन ने कैसे बढ़ाया भरोसा?
ग्रामीण दूध कारोबार में एक बड़ी शिकायत यह होती थी कि पशुपालक को पता नहीं चलता था कि उसके दूध की गुणवत्ता किस आधार पर तय की गई और कीमत कैसे निकाली गई।Automated Milk Collection System इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।बलिनी के संग्रह केंद्रों में दूध को तौलने और जांचने की स्वचालित व्यवस्था इस्तेमाल की जाती है। कंपनी के अनुसार प्रक्रिया उत्पादक की मौजूदगी में पूरी की जाती है।इसका अर्थ यह है कि किसी महिला के दूध की मात्रा, फैट और अन्य गुणवत्ता मानकों के आधार पर मूल्य तय किया जा सकता है।ऐसी पारदर्शिता से कंपनी और उत्पादक के बीच भरोसा बढ़ता है।यही women-led milk producer company in Bundelkhand मॉडल की ताकत है। गांव के छोटे उत्पादकों को बड़े बाजार की प्रणाली से जोड़ा जाता है, लेकिन उनकी सदस्यता और पहचान बनी रहती है।
बैंक खाते में आया पैसा, बदली आर्थिक भूमिका
इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दूध की मात्रा या कंपनी के टर्नओवर से भी आगे जाता है।यह बदलाव महिलाओं के आर्थिक नियंत्रण से जुड़ा है।पहले कई ग्रामीण महिलाओं के बैंक खाते होने के बावजूद उनका नियमित इस्तेमाल नहीं होता था। दूध की कीमत सीधे बैंक खाते में आने के कारण बैंकिंग से उनका संबंध मजबूत हुआ।2023 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि बलिनी से जुड़ी कई महिलाएं बैंक जाकर स्वयं पैसे निकालने और अपने खर्च का प्रबंधन करने लगी थीं।यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण है।कमाई का पैसा जब सीधे महिला के खाते में आता है तो उसकी आर्थिक पहचान मजबूत होती है। बच्चों की पढ़ाई, घरेलू खर्च, पशुओं के लिए चारा या छोटी बचत जैसे फैसलों में उसकी भागीदारी बढ़ सकती है। यही Women Empowerment Through Dairy Farming in Bundelkhand का सामाजिक पहलू है।
डेयरी ने महिलाओं को उद्यमी बनाया
डेयरी व्यवसाय में हर दिन कई छोटे निर्णय लेने होते हैं।पशु के लिए कितना चारा खरीदना है, दूध उत्पादन कितना हुआ, किस पशु का इलाज कराना है, नई गाय या भैंस खरीदना फायदेमंद होगा या नहीं, आय और खर्च का संतुलन क्या है, ये सभी कारोबारी निर्णय हैं।जब महिला स्वयं इन फैसलों में शामिल होती है तो धीरे-धीरे उसका अनुभव बढ़ता है।इस तरह एक पारंपरिक पशुपालक महिला Rural Women Entrepreneur में बदल सकती है।यही वजह है कि बुंदेलखंड की कहानी को सिर्फ महिला कल्याण योजना के नजरिए से देखना अधूरा होगा। यहां महिलाएं आर्थिक गतिविधि की सक्रिय उत्पादक और कारोबारी भागीदार हैं।
परिवार पर क्या असर पड़ा?
नियमित आय का सीधा प्रभाव परिवार पर पड़ता है।मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक बलिनी मॉडल से जुड़ी महिलाएं अपनी आमदनी का इस्तेमाल बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और घरेलू जरूरतों के लिए कर रही हैं। आर्थिक मजबूती के कारण कई महिलाओं की सामाजिक गतिविधियों और स्थानीय बैठकों में भागीदारी भी बढ़ी है।हर परिवार का अनुभव अलग हो सकता है, लेकिन संगठित आय का एक सामान्य फायदा आर्थिक अनिश्चितता कम होना है।खेती से पैसा साल में कुछ खास समय पर आता है। दूध से भुगतान अपेक्षाकृत कम अंतराल पर मिलता है।ऐसे में परिवार को स्कूल फीस, दवा, राशन और पशुओं के चारे जैसे नियमित खर्च पूरे करने में मदद मिल सकती है।
बुंदेलखंड में डेयरी की सफलता आसान नहीं थी
यह सफलता ऐसे क्षेत्र में बनी है जहां डेयरी कारोबार पहले से कई समस्याओं से जूझ रहा था।ICAR के अध्ययन में बुंदेलखंड के डेयरी क्षेत्र में कम उत्पादक पशु, चराई और फसल अवशेषों पर अधिक निर्भरता, पशु चिकित्सा सुविधाओं की कमी, बिचौलियों का प्रभाव और वैज्ञानिक पशुपालन संबंधी जानकारी की कमी जैसी चुनौतियां दर्ज की गई थीं।इसके अलावा पानी की कमी और चारे की उपलब्धता भी क्षेत्र में पशुपालन को प्रभावित करती है।यानी Bundelkhand women dairy business success story केवल दूध इकट्ठा करने की कहानी नहीं है। यह ऐसे क्षेत्र में सप्लाई चेन खड़ी करने की कहानी भी है जहां उत्पादन की अपनी प्राकृतिक और आर्थिक चुनौतियां हैं।
करोड़ों का कारोबार कैसे खड़ा हुआ?
जब एक महिला प्रतिदिन कुछ लीटर दूध बेचती है तो उसकी मात्रा छोटी दिखाई देती है।लेकिन हजारों महिलाएं एक नेटवर्क में जुड़ जाएं तो वही छोटी मात्रा विशाल कारोबारी आकार ले सकती है।उदाहरण के तौर पर अगर 80 या 90 हजार महिलाएं दूध उत्पादन और संग्रह नेटवर्क का हिस्सा हों और लाखों लीटर दूध प्रतिदिन एक संगठित सप्लाई चेन में आए, तो कारोबार स्वाभाविक रूप से बड़े स्तर पर पहुंच जाता है।यही सहकारी या producer-owned business model का मूल सिद्धांत है।छोटे उत्पादकों की मात्रा को एक साथ जोड़कर उन्हें बड़े बाजार तक पहुंच दी जाती है।मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में बलिनी से जुड़े नेटवर्क द्वारा 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के सामूहिक कारोबार का उल्लेख किया गया।यह आंकड़ा बताता है कि ग्रामीण महिलाओं का छोटा-छोटा उत्पादन जब एक संगठित बाजार व्यवस्था से जुड़ता है तो उसका आर्थिक आकार कितना बड़ा हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच रहा मॉडल
बुंदेलखंड के अनुभव के बाद उत्तर प्रदेश में महिला डेयरी उत्पादक संगठनों का विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हुआ है।2026 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 31 जिलों में महिला समूह प्रतिदिन करीब 10 लाख लीटर दूध का संग्रह कर रहे थे और फरवरी 2026 तक महिला समूहों तथा दुग्ध उत्पादक कंपनियों का कुल कारोबार 5,000 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंचने की जानकारी दी गई थी। करीब चार लाख महिला किसानों के विभिन्न Milk Producer Companies से जुड़े होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई।इससे स्पष्ट है कि Women Led Dairy Business को अब केवल बुंदेलखंड तक सीमित प्रयोग के रूप में नहीं देखा जा रहा।बलिनी मॉडल के बाद दूसरे क्षेत्रों में भी महिला-नेतृत्व वाली कंपनियां विकसित हुई हैं।
इस मॉडल से भारत के दूसरे गांव क्या सीख सकते हैं?
इस मॉडल के पीछे संगठन, तकनीक और बाजार तीनों की भूमिका है।पहली सीख है कि उत्पादन के साथ बाजार जरूरी है। किसान कितना भी अच्छा दूध तैयार करे, अगर खरीदने वाला भरोसेमंद बाजार नहीं है तो उसकी आय स्थिर नहीं होगी।दूसरी सीख पारदर्शिता की है। डिजिटल तौल, गुणवत्ता जांच और सीधे बैंक भुगतान से उत्पादक का भरोसा बढ़ता है।तीसरी सीख पशु स्वास्थ्य से जुड़ी है। पशु चिकित्सा, सही आहार और नस्ल सुधार उपलब्ध होने पर उत्पादकता बढ़ सकती है।चौथी और सबसे महत्वपूर्ण सीख महिलाओं के स्वामित्व की है। महिला के नाम सदस्यता और महिला के बैंक खाते में भुगतान आर्थिक सशक्तीकरण को व्यावहारिक रूप देता है।
अभी भी किन चुनौतियों पर काम करना जरूरी है?
इस सफलता के बावजूद चुनौतियां समाप्त नहीं हुई हैं।पशु चारे की बढ़ती लागत डेयरी किसान की आमदनी को प्रभावित कर सकती है। गर्मी और पानी की कमी पशुओं की उत्पादकता कम कर सकती है। पशु रोगों से बचाव के लिए गांव स्तर तक मजबूत veterinary services जरूरी हैं।साथ ही दूध का कारोबार केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकता।
भविष्य में दूध से दही, पनीर, घी और दूसरे value-added dairy products तैयार करने की क्षमता बढ़ाने से उत्पादक कंपनियों को अतिरिक्त आमदनी के अवसर मिल सकते हैं।Cold chain, processing facilities और मजबूत branding भी महत्वपूर्ण होंगी।अगर उत्पादन बढ़ता है लेकिन बाजार उतनी तेजी से नहीं बढ़ता तो कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए अगले चरण में Rural Women Dairy Farming Business in India को उत्पादन के साथ processing और marketing पर भी ध्यान देना होगा।
1.05 लाख महिलाओं की कहानी का असली मतलब
बुंदेलखंड में करीब 1.05 लाख महिलाओं से जुड़ा यह डेयरी नेटवर्क केवल बड़ी संख्या का रिकॉर्ड नहीं है।इस कहानी की असली ताकत गांव की उस महिला में दिखाई देती है जिसके घर में मौजूद गाय या भैंस अब केवल घरेलू जरूरत पूरी करने वाला पशु नहीं, बल्कि नियमित आय का साधन बन गया है।जब दूध संग्रह केंद्र गांव के पास हो, कीमत पारदर्शी तरीके से तय हो, पैसा सीधे खाते में आए और जरूरत पड़ने पर पशु चिकित्सा तथा चारे की सहायता मिले, तब छोटे पशुपालक के लिए डेयरी व्यवसाय करना आसान होता है।यही कारण है कि how dairy business is changing rural women lives जैसे सवाल का जवाब बुंदेलखंड के गांवों में दिखाई देता है।यहां डेयरी ने महिलाओं को रातों-रात अमीर नहीं बनाया। बल्कि छोटी और नियमित आय को संगठित व्यवस्था से जोड़कर आर्थिक स्थिरता की दिशा में रास्ता तैयार किया है।
दूध से शुरू हुई कहानी अब आत्मनिर्भरता तक पहुंची
बुंदेलखंड की महिला डेयरी किसानों की कहानी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हो रहे एक महत्वपूर्ण बदलाव को सामने लाती है।एक तरफ उत्तर प्रदेश में Balinee Milk Producer Company के माध्यम से करीब 90 हजार महिलाओं का बड़ा नेटवर्क विकसित हुआ है। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में Muktaa Mahila Milk Producer Company से 15 हजार से अधिक महिला किसान जुड़ी हैं। इस तरह दोनों प्रमुख नेटवर्कों को मिलाकर लगभग 1.05 लाख ग्रामीण महिलाएं संगठित डेयरी व्यवस्था का हिस्सा बनती हैं।कभी व्यक्तिगत स्तर पर कुछ लीटर दूध बेचने वाला काम आज लाखों लीटर दूध की संगठित सप्लाई चेन में बदल चुका है।बलिनी का विस्तार यह भी दिखाता है कि जब छोटे उत्पादकों को तकनीक, बाजार, प्रशिक्षण और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था मिलती है तो छोटे गांवों से भी बड़े कारोबारी नेटवर्क तैयार किए जा सकते हैं।Bundelkhand Women Dairy Business की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि केवल करोड़ों रुपये का कारोबार नहीं है। इसकी बड़ी उपलब्धि यह है कि पशुपालन में वर्षों से काम करती आ रही ग्रामीण महिलाओं की मेहनत को अब औपचारिक आर्थिक पहचान मिल रही है।
उनके नाम पर सदस्यता है। उनके बैंक खातों में भुगतान पहुंच रहा है। वे पशुपालन को आय के साधन के रूप में देख रही हैं और संगठित बाजार का हिस्सा बन रही हैं।इसलिए बुंदेलखंड की यह कहानी केवल दूध की नहीं है।यह गांव, महिला, तकनीक, बाजार और आत्मनिर्भरता के एक साथ जुड़ने की कहानी है।
और शायद यही कारण है कि Balinee Milk Producer Company women success story और बुंदेलखंड की महिला डेयरी किसानों का मॉडल आने वाले वर्षों में भारत की ग्रामीण महिला उद्यमिता के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक बना रह सकता है।
