֍:संविधान में हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन का अधिकार§ֆ:पीठ ने कहा, संविधान की धारा 21 के तहत हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का मौलिक अधिकार है. किसी महिला के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल करना संविधान के अच्छेद 21 के तहत उस महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. इन शब्दों का इस्तेमाल करके किसी महिला का वर्णन करना हमारे संविधान के मूल्यों और आदर्शों के खिलाफ है. §֍:विवाह अमान्य होने पर पत्नी गुजारा भत्ता की हकदार§ֆ:सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जिस दंपति का विवाह हिंदू विवाद अधिनियम की धारा के तहत अमान्य घोषित किया गया है, वह अधिनियम की धारा 25 का हवाला देकर दूसरे पति से स्थायी गुजारा भत्ता या अंतरिम भरण-पोषण मांगने की हकदार है. पीठ ने कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता की राहत दी जा सकती है या नहीं यह हमेशा प्रत्येक मामले के तथ्यों और पक्षों के आचरण पर निर्भर करता है. क्योंकि धारा 25 के तहत राहत प्रदान करना हमाशा विवेक पर निर्भर करता है. भले ही न्यायालय प्रथम दृष्टता इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पक्षकारों के बीच विवाह शून्य हबै लेकिन 1995 के अधिनियम के तहत कार्यवाही के अंतिम निपटान तक न्यायालय को भरण-पोषण देने से रोका नहीं जा सकता है, बशर्ते धारा 24 की शर्तें पूरी हों.§सुप्रीम कोर्ट ने महिला को ‘नाजायज पत्नी या वफादार रखैल’ कहने को स्त्री विरोधी कहा है. साथ ही संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट के अपने आदेश में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने को गलत बताया है. जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि अमान्य विवाह में पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत भरण-पोषण मांगने की हकदार हैं. साथ ही शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से 2004 के फैसले में ‘नाजायज पत्नी’ या ‘वफादार रखैल’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई. एक संदर्भ पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट की फुल कोर्ट बेंच ने भाऊसाहेब बनाम लीलाबाई (2004) मामले में ‘नाजायज पत्नी’ शब्द गढ़ा है. विवाह अमान्य घोषित किए जाने के बाद उक्त मामले में पत्नी को नाजायज पत्नी कहना बहुत अनुचित है. इससे संबंधित महिला की गरिमा प्रभावित होती है.

