केंद्र सरकार ने खेती में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे कीटनाशक कार्बोसल्फान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। मानव और पशु स्वास्थ्य पर इसके संभावित विषैले प्रभावों, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर और आकस्मिक विषाक्तता की स्थिति में किसी विशिष्ट मारक यानी एंटीडोट की उपलब्धता नहीं होने को लेकर सरकार ने चिंता जताई है। प्रस्तावित प्रतिबंध के बाद कृषि क्षेत्र, किसान संगठनों और कृषि रसायन उद्योग के बीच बहस तेज हो गई है।
कृषि मंत्रालय ने भारत में पंजीकृत कार्बोसल्फान के लगातार इस्तेमाल की समीक्षा के लिए 14 जनवरी 2026 को विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। समिति को कार्बोसल्फान के मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना था। विशेषज्ञों ने विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करने के बाद 12 जून 2026 को केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत कार्बोसल्फान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की। रिपोर्ट में कार्बोसल्फान के निर्माण, आयात, परिवहन, वितरण, बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात कही गई है। सरकार ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर अब प्रतिबंध का प्रस्ताव तैयार किया है।
हालांकि, अभी कार्बोसल्फान पर अंतिम प्रतिबंध लागू नहीं हुआ है। प्रस्तावित ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर जनता और संबंधित हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं। नोटिफिकेशन सार्वजनिक होने के बाद 30 दिनों तक सुझाव दिए जा सकते हैं। इसके बाद सरकार प्राप्त सुझावों की समीक्षा करके अंतिम निर्णय ले सकती है।
कार्बोसल्फान को लेकर विशेषज्ञों की चिंता
विशेषज्ञ समिति के अनुसार कार्बोसल्फान कार्बामेट समूह का अत्यधिक विषैला कीटनाशक है। समिति ने पक्षियों, परागणकर्ताओं, जलीय जीवों और अन्य गैर-लक्षित जीवों पर कार्बोसल्फान की विषाक्तता को गंभीर मुद्दा माना है।
समिति के अनुसार कार्बोसल्फान के संपर्क में आने पर मानव स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। आकस्मिक विषाक्तता की स्थिति में लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए एट्रोपिन और अन्य सहायक उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन कार्बोसल्फान के विषैले प्रभाव को समाप्त करने वाला कोई विशिष्ट एंटीडोट उपलब्ध नहीं है।
यही कारण है कि विशेषज्ञों ने कार्बोसल्फान के लगातार इस्तेमाल को सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए संभावित गंभीर खतरा माना है। खेतों में कीटनाशकों का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में होता है और गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर किसान, खेत मजदूर तथा आसपास के लोग इसके संपर्क में आ सकते हैं।
कई प्रमुख फसलों में होता है कार्बोसल्फान का इस्तेमाल
भारत में कार्बोसल्फान का इस्तेमाल कई प्रमुख फसलों में किया जाता है। इनमें चावल, कपास, मिर्च, बैंगन और जीरा प्रमुख हैं। उद्योग के मुताबिक चावल में कार्बोसल्फान का इस्तेमाल गॉल मिज, स्टेम बोरर, लीफ फोल्डर, व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर, ब्राउन प्लांट हॉपर और ग्रीन लीफ हॉपर जैसे कीटों के नियंत्रण के लिए किया जाता है।
बैंगन की खेती में कार्बोसल्फान का इस्तेमाल टहनी और फल छेदक जैसे कीटों के नियंत्रण के लिए किया जाता है। कपास में कार्बोसल्फान का इस्तेमाल बीज उपचार के रूप में भी किया जाता है।
दक्षिणी और पूर्वी भारत के कई चावल उत्पादक क्षेत्रों में गॉल मिज का प्रकोप किसानों के लिए चुनौती रहा है। कृषि रसायन उद्योग का कहना है कि इन क्षेत्रों में कार्बोसल्फान किसानों के लिए उपलब्ध प्रभावी विकल्पों में से एक है।
इसी तरह कपास उत्पादन में बीज उपचार के रूप में कार्बोसल्फान के इस्तेमाल का उल्लेख किया जाता रहा है। उद्योग का दावा है कि कार्बोसल्फान के इस्तेमाल से शुरुआती अवस्था में कुछ कीटों के प्रबंधन में मदद मिलती है।
कार्बोसल्फान पर उद्योग का अलग नजरिया
कृषि रसायन उद्योग प्रस्तावित प्रतिबंध से सहमत नहीं है। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि कार्बोसल्फान भारतीय किसानों के लिए महत्वपूर्ण कीटनाशक है और कई आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के खिलाफ प्रभावी नियंत्रण प्रदान करता है।
उद्योग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार भारत में कीटों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई कीटों में अलग-अलग रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित हो रही है। ऐसे समय में कार्बोसल्फान जैसे एक और कीटनाशक को पूरी तरह हटाने से किसानों के पास उपलब्ध विकल्प और कम हो सकते हैं।
अधिकारी के मुताबिक कार्बोसल्फान कार्बामेट समूह का कीटनाशक है और मुख्य रूप से लक्षित कीटों में एसिटाइलकोलिनेस्टरेज गतिविधि को बाधित करता है। इसके कारण कीटों का तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है और कीट मर जाते हैं।
उद्योग का कहना है कि कार्बोसल्फान संपर्क और सिस्टमिक कार्रवाई के कारण कई तरह के कीटों पर प्रभाव डाल सकता है। यही वजह है कि चूसने वाले कीटों, तना छेदक, पत्तियां खाने वाले कीटों और मिट्टी में रहने वाले कीटों के नियंत्रण में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
कार्बोसल्फान की कीमत और किसानों की लागत
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि कार्बोसल्फान किसानों के लिए एक किफायती कीट नियंत्रण विकल्प रहा है। उनका तर्क है कि यदि कार्बोसल्फान पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो किसानों को दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जिनकी कीमत कुछ मामलों में अधिक हो सकती है।
किसानों की लागत पहले से ही बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और डीजल जैसी चीजों के कारण बढ़ रही है। ऐसे में कार्बोसल्फान का विकल्प महंगा होने पर फसल सुरक्षा लागत में भी वृद्धि हो सकती है।
हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि कार्बोसल्फान के विकल्प केवल कीमत के आधार पर नहीं बल्कि उनकी प्रभावशीलता, सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव के आधार पर तय किए जाएं।
कार्बोसल्फान का घरेलू बाजार
उद्योग के अनुमान के अनुसार भारत में कार्बोसल्फान आधारित उत्पादों का घरेलू बाजार तकनीकी और फॉर्मूलेशन बिक्री को मिलाकर लगभग 250 से 400 करोड़ रुपये सालाना का है।
कार्बोसल्फान के निर्माण और मार्केटिंग से बड़ी संख्या में कंपनियां जुड़ी हुई हैं। उद्योग के अनुसार 30 से 50 से अधिक कंपनियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कार्बोसल्फान के तकनीकी निर्माण, फॉर्मूलेशन, रीपैकिंग, वितरण और मार्केटिंग से जुड़ी हैं।
यदि कार्बोसल्फान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। निर्माता, फॉर्मूलेशन कंपनियां, वितरक, खुदरा विक्रेता और अन्य सहायक कारोबार भी प्रभावित हो सकते हैं।
कृषि रसायन उद्योग पहले से ही कई नियामकीय बदलावों से गुजर रहा है। ऐसे में कार्बोसल्फान जैसे पुराने और व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद पर प्रतिबंध का असर पूरी वैल्यू चेन पर पड़ने की संभावना है।
32 लाख एकड़ जमीन पर इस्तेमाल का दावा
एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी ACFI के डायरेक्टर जनरल डॉ. कल्याण गोस्वामी ने कहा है कि कार्बोसल्फान लगभग 32 लाख एकड़ कृषि भूमि पर कीट प्रबंधन में मदद करता है। उनके अनुसार इसका घरेलू बाजार करीब 400 करोड़ रुपये का है।
डॉ. गोस्वामी का कहना है कि कार्बोसल्फान पर प्रतिबंध लगने से उन किसानों की लागत बढ़ सकती है जो वर्तमान में इसका इस्तेमाल करते हैं। उनका यह भी कहना है कि जिन फसलों में कार्बोसल्फान के प्रभावी विकल्प कम हैं, वहां कीट नियंत्रण की समस्या बढ़ सकती है।
उद्योग का मानना है कि कार्बोसल्फान को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय वैज्ञानिक समीक्षा के आधार पर इसके इस्तेमाल के लिए कड़े सुरक्षा नियम बनाए जा सकते हैं।
कार्बोसल्फान और पर्यावरण को लेकर सवाल
कार्बोसल्फान पर बहस केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ समिति ने इसके पर्यावरणीय प्रभावों को भी महत्वपूर्ण माना है।
पक्षी, मधुमक्खियां और अन्य परागणकर्ता कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इसी तरह जलीय जीव भी पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि कोई कीटनाशक गैर-लक्षित जीवों के लिए अधिक विषैला है तो उसके इस्तेमाल को लेकर नियामकीय चिंता स्वाभाविक है।
दूसरी ओर उद्योग का कहना है कि कार्बोसल्फान पर्यावरण में तेजी से टूटता है। उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार मिट्टी और पानी में इसका आधा जीवन लगभग 7 से 10 दिन के आसपास रहता है और यह महत्वपूर्ण रूप से जैव-संचय नहीं करता।
उद्योग का तर्क है कि स्वीकृत लेबल और निर्धारित निर्देशों के अनुसार कार्बोसल्फान का इस्तेमाल किया जाए तो मानव और पर्यावरणीय जोखिम को नियंत्रित किया जा सकता है।
WHO टॉक्सिसिटी कैटेगरी को लेकर भी बहस
उद्योग से जुड़े अधिकारी ने कार्बोसल्फान को WHO टॉक्सिसिटी कैटेगरी II में रखे जाने का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इस श्रेणी में कई ऐसे कीटनाशक शामिल हैं जो विभिन्न देशों में नियामकीय शर्तों के तहत पंजीकृत और इस्तेमाल किए जाते हैं।
उद्योग का यह भी दावा है कि कई वैज्ञानिक अध्ययनों में कार्बोसल्फान को कैंसरकारी, उत्परिवर्तजन, टेराटोजेनिक, प्रजनन विष या अंतःस्रावी व्यवधान पैदा करने वाला नहीं पाया गया है।
हालांकि, सरकार की विशेषज्ञ समिति ने कार्बोसल्फान से जुड़े व्यापक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अलग निष्कर्ष निकाला है। इसलिए अब अंतिम फैसला सरकार द्वारा उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों और प्राप्त सार्वजनिक टिप्पणियों के आधार पर किया जाना है।
कार्बोसल्फान पर प्रतिबंध से बढ़ेगा विकल्पों का महत्व
यदि कार्बोसल्फान पर प्रतिबंध लागू होता है तो वैकल्पिक कीटनाशकों की भूमिका बढ़ जाएगी। लेकिन किसानों के लिए केवल दूसरा रासायनिक विकल्प उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा।
कृषि विभागों को किसानों को फसलवार और कीटवार सलाह देनी होगी। किसानों को यह बताया जाना जरूरी होगा कि किस कीट के लिए कौन सा विकल्प प्रभावी है, उसका इस्तेमाल किस समय करना है और कितनी मात्रा में करना है।
इसके साथ ही एकीकृत कीट प्रबंधन को बढ़ावा देना भी जरूरी होगा। इसमें जैविक नियंत्रण, फेरोमोन ट्रैप, प्रकाश प्रपंच, प्रतिरोधी किस्मों और अन्य गैर-रासायनिक तरीकों को शामिल किया जा सकता है।
अगर किसानों को कार्बोसल्फान के विकल्प समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए तो प्रतिबंध का असर उत्पादन लागत और फसल नुकसान के रूप में दिखाई दे सकता है।
कीटों में प्रतिरोधक क्षमता भी बड़ी चुनौती
उद्योग ने कार्बोसल्फान के पक्ष में एक और तर्क कीटों में विकसित हो रही प्रतिरोधक क्षमता को लेकर दिया है। किसी एक ही प्रकार के रसायन का लगातार इस्तेमाल करने से कीटों में उसके प्रति प्रतिरोध पैदा हो सकता है।
ऐसे में कीट प्रबंधन में अलग-अलग कार्यप्रणाली वाले रसायनों का सही तरीके से इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना जाता है। उद्योग का कहना है कि कार्बोसल्फान को हटाने से किसानों के पास उपलब्ध रासायनिक विकल्पों की संख्या और कम हो सकती है।
हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टि से कीटनाशकों का इस्तेमाल केवल उपलब्धता के आधार पर नहीं बल्कि जोखिम और लाभ के व्यापक मूल्यांकन के आधार पर किया जाना जरूरी है।
किसानों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण
कार्बोसल्फान के मामले में किसानों की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण पहलू है। कीटनाशक का छिड़काव करते समय सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल, निर्धारित मात्रा का पालन, हवा की दिशा का ध्यान और कटाई से पहले निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन जरूरी होता है।
गलत मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल फसल, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य के लिए समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए कार्बोसल्फान के इस्तेमाल को लेकर उद्योग और कृषि विभाग दोनों किसानों को सुरक्षित उपयोग की जानकारी देने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।
यदि सरकार अंतिम रूप से कार्बोसल्फान पर प्रतिबंध नहीं लगाती है तो भी इसके उपयोग के नियमों को और मजबूत किया जा सकता है।
30 दिन की आपत्ति अवधि के बाद क्या होगा?
ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के सार्वजनिक होने के बाद 30 दिनों की अवधि में किसान संगठन, कृषि वैज्ञानिक, कंपनियां, राज्य सरकारें और आम नागरिक अपनी टिप्पणियां दे सकते हैं।
इसके बाद सरकार इन सुझावों का अध्ययन करेगी। यदि सरकार विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार करती है तो कार्बोसल्फान पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया जा सकता है। दूसरी स्थिति में सरकार प्रतिबंध में बदलाव कर सकती है या कुछ शर्तों के साथ इसके इस्तेमाल की अनुमति बनाए रख सकती है।
इसलिए फिलहाल कार्बोसल्फान के बारे में अंतिम स्थिति सामने आना बाकी है।
आगे की राह
कार्बोसल्फान को लेकर सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसान हित और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की है। यदि कार्बोसल्फान मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है तो उसकी समीक्षा और नियमन जरूरी है। वहीं लाखों एकड़ में इस्तेमाल होने वाले किसी उत्पाद को हटाने से पहले किसानों के लिए प्रभावी और किफायती विकल्प सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कार्बोसल्फान पर अंतिम फैसला भारतीय कृषि रसायन नीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत देगा। यदि प्रतिबंध लागू होता है तो दूसरे कीटनाशकों, जैविक विकल्पों और एकीकृत कीट प्रबंधन की भूमिका बढ़ेगी। यदि कार्बोसल्फान को कुछ शर्तों के साथ जारी रखा जाता है तो सुरक्षा मानकों और निगरानी को मजबूत करने की जरूरत होगी।
फिलहाल कार्बोसल्फान को लेकर सरकार की प्रक्रिया जारी है। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट, उद्योग की आपत्तियां और जनता से प्राप्त सुझावों को देखते हुए अंतिम निर्णय लिया जाएगा। आने वाले दिनों में यह फैसला किसानों, कृषि रसायन उद्योग और पर्यावरण—तीनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
