भारत ने चीन से आयात होने वाले ग्लाइसिन (Glycine) के मामले में एक बार फिर एंटी-डंपिंग जांच शुरू की है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 22 सितंबर 2026 को घरेलू उत्पादक कंपनी एविड ऑर्गेनिक्स प्राइवेट लिमिटेड (Avid Organics Private Limited) के अनुरोध पर यह जांच शुरू करने की घोषणा की। इस कार्रवाई का उद्देश्य यह पता लगाना है कि चीन से आयातित ग्लाइसिन की कीमतें भारतीय उद्योग को नुकसान पहुंचा रही हैं या नहीं। ग्लाइसिन का इस्तेमाल खरपतवारनाशक ग्लाइफोसेट के उत्पादन के साथ-साथ पशु आहार, खाद्य पोषण उत्पादों और दवा उद्योग में भी किया जाता है। ऐसे में इस जांच का परिणाम केवल रसायन उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे जुड़े कई क्षेत्रों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
भारत में ग्लाइसिन का इस्तेमाल विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है। यह ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवारनाशकों के उत्पादन में महत्वपूर्ण मध्यवर्ती रसायन है। इसके अलावा, पशु आहार में इस्तेमाल होने वाले पोषक तत्वों, खाद्य पदार्थों में पोषण बढ़ाने वाले घटकों और दवा उद्योग में कच्चे माल तथा सहायक पदार्थों के निर्माण में भी इसकी भूमिका है। इस वजह से ग्लाइसिन की कीमत और उपलब्धता कृषि रसायन, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण तथा औषधि उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है।
1 अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक की कीमतों की जांच
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की घोषणा के अनुसार, जांच में भारतीय सीमा शुल्क कोड 29224910 और 29224990 के अंतर्गत आने वाले संबंधित ग्लाइसिन उत्पाद शामिल हैं। जांच के दौरान यह आकलन किया जाएगा कि चीन से भारत में आयात किए जाने वाले उत्पादों की कीमतों में डंपिंग की स्थिति है या नहीं और उससे घरेलू उत्पादकों को नुकसान हुआ है या नहीं।
डंपिंग की जांच के लिए 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 तक की 12 महीने की अवधि निर्धारित की गई है। वहीं, घरेलू उद्योग को संभावित नुकसान का आकलन करने के लिए चार वित्तीय अवधियों के आंकड़ों को शामिल किया गया है। इनमें 1 अप्रैल 2022 से 31 मार्च 2023, 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2024, 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 और 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 तक की अवधि शामिल है।
इन आंकड़ों के आधार पर जांच प्राधिकरण आयात की कीमतों, घरेलू उद्योग की स्थिति और संभावित नुकसान के बीच संबंध का आकलन करेगा। हालांकि, जांच शुरू होने का अर्थ यह नहीं है कि चीन से आयातित ग्लाइसिन पर डंपिंग का आरोप पहले ही साबित हो गया है। अंतिम निष्कर्ष जांच के दौरान उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों और संबंधित तथ्यों के मूल्यांकन के बाद सामने आएंगे।
चीन ग्लाइसिन का प्रमुख वैश्विक उत्पादक
चीन दुनिया में ग्लाइसिन के प्रमुख उत्पादकों में शामिल है और भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है। भारतीय उद्योग की आयात पर निर्भरता के कारण चीन से आने वाले ग्लाइसिन की कीमतों में बदलाव का असर घरेलू कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है।
यदि जांच में यह पाया जाता है कि चीन से ग्लाइसिन का आयात अनुचित रूप से कम कीमतों पर हो रहा है और इससे भारतीय उत्पादकों को नुकसान पहुंच रहा है, तो एंटी-डंपिंग शुल्क लगाने की सिफारिश की जा सकती है। हालांकि, शुल्क लगाने का अंतिम निर्णय संबंधित सरकारी प्राधिकरणों के निष्कर्षों और लागू प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
एंटी-डंपिंग जांच का उद्देश्य घरेलू उद्योग को अनुचित व्यापारिक प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा देना होता है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी संभावित व्यापारिक उपाय से उन उद्योगों पर अनावश्यक लागत का दबाव न पड़े, जो संबंधित रसायन को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ग्लाइसिन के मामले में यही संतुलन महत्वपूर्ण रहने वाला है।
कीटनाशक और खरपतवारनाशक उद्योग की लागत पर नजर
ग्लाइसिन का एक प्रमुख उपयोग ग्लाइफोसेट के उत्पादन में होता है। ग्लाइफोसेट एक खरपतवारनाशक है, जिसका इस्तेमाल कृषि में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए किया जाता है। इसलिए ग्लाइसिन की कीमत में किसी भी तरह का बदलाव कृषि रसायन उद्योग की उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकता है।
यदि भविष्य में ग्लाइसिन पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया जाता है, तो आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ने की संभावना पर विचार करना होगा। इसका प्रभाव उन कंपनियों पर पड़ सकता है, जो ग्लाइसिन का इस्तेमाल ग्लाइफोसेट या अन्य संबंधित औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में करती हैं। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि शुल्क लगाया जाता है या नहीं, उसकी दर क्या रहती है और कंपनियों के पास कच्चे माल की खरीद के कितने विकल्प उपलब्ध हैं।
कृषि रसायन उद्योग के लिए कच्चे माल की लागत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसका संबंध उत्पादन खर्च और उत्पादों की बाजार कीमतों से हो सकता है। फिर भी, जांच शुरू होने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि किसानों के लिए खरपतवारनाशक महंगे हो जाएंगे। ऐसा कोई भी प्रभाव अंतिम शुल्क, कंपनियों की लागत संरचना और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
पशु आहार, खाद्य और दवा उद्योग भी जांच के दायरे में महत्वपूर्ण
ग्लाइसिन का इस्तेमाल केवल कृषि रसायनों के निर्माण तक सीमित नहीं है। पशु आहार में पोषण संबंधी घटकों, खाद्य उद्योग में पोषण संवर्धकों और दवा उद्योग में कच्चे माल तथा सहायक पदार्थों के रूप में भी इसका उपयोग होता है।
इस कारण ग्लाइसिन पर कोई भी व्यापारिक उपाय उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जो इस रसायन का इस्तेमाल अपनी उत्पादन प्रक्रिया में करती हैं। यदि आयात की लागत बढ़ती है, तो इन कंपनियों को अपने कच्चे माल की खरीद और उत्पादन खर्च का दोबारा आकलन करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, घरेलू उत्पादन को प्रतिस्पर्धी परिस्थितियां मिलने से भारतीय उत्पादकों को लाभ मिलने की संभावना भी जांच के प्रमुख पहलुओं में शामिल हो सकती है।
इस मामले में नीति निर्धारण की चुनौती घरेलू उत्पादकों के हितों और ग्लाइसिन पर निर्भर उद्योगों की लागत संबंधी जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।
वर्ष 2022 में भी हुई थी कार्रवाई की सिफारिश
भारत इससे पहले भी चीन से आयातित ग्लाइसिन के खिलाफ एंटी-डंपिंग जांच कर चुका है। वर्ष 2021 में एविड ऑर्गेनिक्स और पारस इंटरमीडिएट्स ने संयुक्त रूप से चीन से आयातित ग्लाइसिन के मामले में जांच शुरू करने की मांग की थी।
इसके बाद वर्ष 2022 में व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) ने मामले में सकारात्मक अंतिम निष्कर्ष जारी करते हुए 0.74 से 1.39 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम तक एंटी-डंपिंग शुल्क लगाने की सिफारिश की थी। हालांकि, शुल्क लगाने की सिफारिश और उसे वास्तव में लागू करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
उस समय भारत के वित्त मंत्रालय ने डाउनस्ट्रीम उद्योगों पर संभावित लागत दबाव को ध्यान में रखते हुए शुल्क लगाने की सिफारिश स्वीकार नहीं की थी। परिणामस्वरूप, मामला बिना एंटी-डंपिंग शुल्क लगाए बंद हो गया था।
पिछले मामले से स्पष्ट होता है कि ऐसे मामलों में केवल घरेलू उत्पादकों को संभावित नुकसान का आकलन ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि प्रस्तावित शुल्क का इस्तेमाल करने वाले अन्य उद्योगों पर क्या असर पड़ सकता है।
नई जांच के नतीजों पर उद्योग की नजर
22 सितंबर 2026 को शुरू हुई नई जांच के दौरान चीन से आयातित ग्लाइसिन की कीमतों, घरेलू उद्योग की स्थिति और संभावित नुकसान से जुड़े पहलुओं का आकलन किया जाएगा। जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहेगा कि क्या जांच में डंपिंग और घरेलू उद्योग को हुए नुकसान के बीच आवश्यक संबंध स्थापित होता है। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि किसी संभावित शुल्क से ग्लाइसिन का इस्तेमाल करने वाले कृषि रसायन, पशु आहार, खाद्य और दवा उद्योगों पर कितना असर पड़ सकता है।
फिलहाल, जांच शुरू होने को अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। आगे आने वाले निष्कर्ष ही स्पष्ट करेंगे कि चीन से आयातित ग्लाइसिन पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाने की जरूरत बनती है या नहीं।

