खरीफ सीजन के बाद अब देश में रबी फसलों की तैयारी शुरू होने लगी है और इसी के साथ फॉस्फेटिक उर्वरकों, खासकर डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), की मांग पर बाजार की नजर टिक गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के लिए DAP की कीमत फिलहाल करीब 915–920 डॉलर प्रति टन CFR के स्तर पर बनी हुई है। बाजार में रबी सीजन के लिए खरीदारी बढ़ने के संकेतों के बीच DAP की कीमतों में मजबूती बनी हुई है। भारतीय आयातकों की सक्रियता का असर वैश्विक फॉस्फेट बाजार पर भी दिखाई दे रहा है।
हालांकि, कीमतों को लेकर तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। अगस्त के अंत में DAP की भारत डिलीवरी कीमत करीब 915–935 डॉलर प्रति टन CFR आंकी गई थी, जो इससे पिछले सप्ताह के 930–935 डॉलर के स्तर से कुछ नरम थी। इसके बावजूद साल की शुरुआत में करीब 668–669 डॉलर प्रति टन के मुकाबले मौजूदा कीमत काफी ऊंची है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP अभी भी वर्ष की शुरुआत की तुलना में काफी महंगा है।
रबी सीजन ने बढ़ाई DAP की भारतीय खरीदारी
भारत दुनिया के प्रमुख DAP आयातकों में शामिल है। खरीफ के बाद अक्टूबर से मार्च तक चलने वाले रबी सीजन में गेहूं, सरसों, चना, मसूर और अन्य फसलों के लिए फॉस्फेटिक उर्वरकों की मांग महत्वपूर्ण रहती है। ऐसे में भारतीय कंपनियों की खरीदारी बाजार के लिए एक बड़ा संकेत बन जाती है।
हाल के सप्ताहों में भारतीय आयातकों की ओर से DAP के लिए टेंडर और खरीद गतिविधियां सामने आई हैं। National Fertilizers Limited (NFL) ने करीब 60,000 टन DAP के लिए खरीद की दिशा में कदम बढ़ाया था। इसके अलावा Fertilizers and Chemicals Travancore (FACT) ने भी करीब 50,000 टन DAP के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी की। इन खरीद गतिविधियों से संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां रबी सीजन से पहले अपने स्टॉक को मजबूत करने की तैयारी कर रही हैं।
यही वजह है कि बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि आने वाले महीनों में भारत की आयात मांग DAP की वैश्विक कीमतों को समर्थन दे सकती है।
DAP महंगा होने की बड़ी वजह क्या है?
DAP की कीमत केवल तैयार उर्वरक की मांग और आपूर्ति से तय नहीं होती। इसके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल की कीमत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इनमें सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड और अमोनिया प्रमुख हैं।
इस समय फॉस्फेटिक उर्वरक उद्योग के लिए सल्फर की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। भारत में DAP उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉस्फोरिक एसिड की लागत में भी तेजी देखने को मिली है। जुलाई–सितंबर 2026 के लिए भारत का एक प्रमुख फॉस्फोरिक एसिड अनुबंध मूल्य करीब 1,700 डॉलर प्रति टन P₂O₅ CFR बताया गया, जो पिछली तिमाही के 1,360 डॉलर के मुकाबले लगभग 25 प्रतिशत अधिक था। इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण सल्फर की ऊंची लागत बताई गई।
फॉस्फोरिक एसिड DAP उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है। इसलिए इसकी कीमत बढ़ने का सीधा असर DAP की उत्पादन लागत पर पड़ता है।
सल्फर सप्लाई बनी अहम चुनौती
फॉस्फेट उर्वरक उद्योग के लिए मौजूदा समय में केवल सल्फर की कीमत ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि इसकी उपलब्धता और आपूर्ति भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।
S&P Global के अनुसार अगस्त में भारत पहुंचने वाली अमोनिया की कीमतें अप्रैल के उच्च स्तर से काफी नीचे आ गई थीं, लेकिन दूसरी ओर सल्फर की कमी ने DAP उत्पादन को प्रभावित करने की चिंता पैदा की। मध्य-पूर्व में परिवहन और आपूर्ति संबंधी जोखिमों ने भी सल्फर बाजार को प्रभावित किया है।
इसका मतलब यह है कि यदि सल्फर की आपूर्ति सामान्य नहीं होती है तो DAP और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों की उत्पादन लागत पर दबाव बना रह सकता है।
भारत में किसानों पर सीधा असर कितना होगा?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP महंगा होने का अर्थ यह जरूरी नहीं है कि किसानों को भी उसी अनुपात में अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी। भारत में सरकार DAP और अन्य P&K उर्वरकों की उपलब्धता तथा किसानों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सब्सिडी व्यवस्था का इस्तेमाल करती है।
सरकार ने खरीफ 2026 के लिए DAP सहित P&K उर्वरकों पर Nutrient Based Subsidy (NBS) व्यवस्था के तहत सहायता जारी रखी है। सरकार के अनुसार DAP को किसानों के लिए ₹1,350 प्रति 50 किलोग्राम बैग के स्तर पर उपलब्ध रखने के लिए अतिरिक्त प्रावधान भी किए गए हैं। इसमें लॉजिस्टिक्स, GST और उचित रिटर्न जैसे खर्चों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सहायता शामिल है।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का पहला असर किसानों के बजाय सरकार और उर्वरक कंपनियों के वित्तीय गणित पर पड़ सकता है।
सरकार के लिए बढ़ सकता है सब्सिडी का दबाव
DAP, MOP और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल पर दबाव बढ़ा सकती है। हाल की रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई है कि यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट के बावजूद DAP और MOP की ऊंची आयात लागत सरकार के कुल उर्वरक सब्सिडी खर्च को प्रभावित कर सकती है।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में किसानों को अपेक्षाकृत स्थिर कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और घरेलू कीमतों के बीच अंतर को काफी हद तक संभालना पड़ता है।
घरेलू कंपनियों के मार्जिन पर भी असर
DAP की ऊंची आयात लागत भारतीय उर्वरक कंपनियों के लिए भी चुनौती है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू बिक्री कीमतों में उसी अनुपात में बदलाव संभव नहीं होता, तो कंपनियों के प्रति टन मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
यही कारण है कि कंपनियां लंबी अवधि के आपूर्ति समझौतों, विभिन्न देशों से आयात और समय से पहले खरीदारी के जरिए जोखिम कम करने की कोशिश करती हैं।
भारत ने हाल के वर्षों में उर्वरक आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए प्रमुख उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालिक समझौतों पर भी जोर दिया है। सरकार के अनुसार 2025-26 में भारतीय कंपनियों ने सऊदी अरब, मोरक्को और रूस जैसे देशों से DAP/TSP और अन्य उर्वरकों की आपूर्ति के लिए दीर्घकालिक समझौते किए।
रबी में क्या रह सकती है स्थिति?
आने वाले महीनों में DAP बाजार के लिए तीन कारक सबसे महत्वपूर्ण रहेंगे—भारत की आयात मांग, वैश्विक सल्फर एवं फॉस्फोरिक एसिड की उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स।
अगर भारत की रबी खरीदारी तेज रहती है और कच्चे माल की आपूर्ति सीमित बनी रहती है, तो DAP कीमतों पर मजबूती का दबाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर, यदि वैश्विक आपूर्ति में सुधार होता है और कच्चे माल की लागत घटती है, तो DAP की कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है।
फिलहाल बाजार का संकेत यही है कि रबी सीजन से पहले भारत की खरीदारी बढ़ रही है और DAP की कीमत करीब 915–920 डॉलर प्रति टन CFR के आसपास बनी हुई है।
किसानों के लिए क्या मायने?
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता और निर्धारित कीमत पर सरकार की निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी। सरकार पहले ही राज्यों की जरूरत के अनुसार उर्वरक आपूर्ति की योजना बनाती है और उपलब्धता की लगातार निगरानी करती है।
रबी सीजन में किसानों को DAP की जरूरत अचानक बढ़ने की स्थिति में स्थानीय स्तर पर कृत्रिम कमी या जमाखोरी से बचाने के लिए समय पर स्टॉक उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण होगा।
कुल मिलाकर, रबी की दस्तक के साथ DAP बाजार एक बार फिर भारतीय उर्वरक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों का 900 डॉलर प्रति टन से ऊपर बने रहना, कच्चे माल की लागत और सल्फर की आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां भारतीय कंपनियों और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि DAP की कीमतें मौजूदा स्तर पर स्थिर रहती हैं या रबी सीजन की बढ़ती मांग के कारण इनमें और तेजी आती है।
