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Home कृषि समाचार

खेत बचाओ अभियान के तहत जोशीमठ के गांवों में कृषक जागरूकता कार्यक्रम, 210 किसानों को दी टिकाऊ खेती की जानकारी

Farmers awareness program in villages of Joshimath under Khet Save Abhiyan,

Emran Khan by Emran Khan
June 13, 2026
in कृषि समाचार
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खेत बचाओ अभियान के तहत जोशीमठ के गांवों में कृषक जागरूकता कार्यक्रम, 210 किसानों को दी टिकाऊ खेती की जानकारी
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राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत भाकृअनुप–विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा जनपद चमोली के जोशीमठ विकासखंड के मेरग, परसारी और मलारी गांवों में व्यापक कृषक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त के मार्गदर्शन में आयोजित इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, टिकाऊ कृषि पद्धतियों, संतुलित उर्वरक उपयोग और कृषि विकास योजनाओं के प्रति जागरूक बनाना था।

कार्यक्रम में कुल 210 किसानों ने भाग लिया, जिनमें बड़ी संख्या में महिला कृषक शामिल रहीं। वैज्ञानिकों ने किसानों को खेती की आधुनिक तकनीकों, प्राकृतिक खेती, मृदा परीक्षण तथा संसाधनों के बेहतर उपयोग की जानकारी देकर उन्हें खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने के लिए प्रेरित किया।

खेत बचाओ अभियान का उद्देश्य

देशभर में चलाया जा रहा खेत बचाओ अभियान कृषि भूमि की उर्वरता बनाए रखने, मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाने और किसानों को टिकाऊ खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है। बढ़ते रासायनिक उर्वरकों के उपयोग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए यह अभियान किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए जागरूक कर रहा है।

इसी कड़ी में विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की वैज्ञानिक टीम ने दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में पहुंचकर किसानों से सीधा संवाद स्थापित किया और उन्हें वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की जानकारी दी।

मेरग और परसारी गांवों में 104 किसानों ने लिया हिस्सा

अभियान के तहत मेरग और परसारी गांवों में आयोजित कार्यक्रमों में कुल 104 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 37 पुरुष और 67 महिला किसान शामिल थे। वैज्ञानिकों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, कृषि भूमि संरक्षण और जलवायु अनुकूल खेती की तकनीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

किसानों को बताया गया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करने से न केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक बनी रहती है। इसके अलावा किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व के बारे में भी जागरूक किया गया।

विशेषज्ञों ने कहा कि मिट्टी की वास्तविक आवश्यकताओं को समझकर ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे खेती की लागत कम हो और फसल उत्पादन बेहतर हो सके।

दलहनी और तिलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने की सलाह

कार्यक्रम के दौरान किसानों को दलहनी और तिलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने के लिए प्रेरित किया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि दालों और तिलहन फसलों की खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करती है।

उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण से किसानों को बाजार जोखिम कम करने में मदद मिलती है और कृषि प्रणाली अधिक टिकाऊ बनती है। साथ ही दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर भूमि की उत्पादकता में सुधार करती हैं।

प्राकृतिक और जैविक खेती पर विशेष जोर

खेत बचाओ अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट और जैव उर्वरकों के उपयोग के फायदे बताए।

विशेषज्ञों के अनुसार जैविक खेती से मिट्टी की संरचना बेहतर होती है, उत्पादन लागत घटती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। वर्तमान समय में बढ़ती रासायनिक निर्भरता को कम करने के लिए प्राकृतिक खेती एक प्रभावी विकल्प बनकर उभर रही है।

किसानों को बताया गया कि जैविक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर वे अपने खेतों की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।

मलारी गांव में 106 किसानों को दी गई विशेष जानकारी

दूसरी ओर मलारी गांव में आयोजित किसान गोष्ठी में 106 किसानों ने सहभागिता की, जिनमें 29 पुरुष और 77 महिला कृषक शामिल थीं। यहां वैज्ञानिकों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य और मृदा परीक्षण आधारित एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

इसके अलावा किसानों को तिलहनी फसलों के महत्व और देश में बढ़ती खाद्य तेल खपत के संदर्भ में उनकी उपयोगिता के बारे में बताया गया। वैज्ञानिकों ने कहा कि तिलहन उत्पादन बढ़ाकर किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं और देश की खाद्य तेल आयात निर्भरता को कम करने में योगदान दे सकते हैं।

हींग की खेती को अतिरिक्त आय का स्रोत बताया

मलारी गांव के कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को हींग की खेती अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया। पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु हींग उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है और इसकी बाजार में अच्छी मांग है।

विशेषज्ञों ने बताया कि हींग एक उच्च मूल्य वाली फसल है, जिसकी खेती किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने किसानों को इसकी खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारियां भी प्रदान कीं।

किसानों ने उठाए जंगली जानवरों से फसल नुकसान के मुद्दे

कार्यक्रम के दौरान आयोजित संवाद सत्र में किसानों ने अपनी प्रमुख समस्याएं वैज्ञानिकों के सामने रखीं। किसानों ने बताया कि बंदर, जंगली सूअर, भालू और साही जैसे जंगली जानवरों के कारण फसलों को भारी नुकसान पहुंचता है।

इसके अलावा किसानों ने राजमाश, टमाटर, शिमला मिर्च, पत्तेदार सब्जियों और समशीतोष्ण फलों की उन्नत किस्मों की उपलब्धता, फसल सुरक्षा के लिए फेंसिंग तथा छोटे पॉलीहाउस की आवश्यकता जैसे मुद्दे भी उठाए।

वैज्ञानिकों ने किसानों की समस्याओं को गंभीरता से सुनते हुए व्यावहारिक और तकनीकी समाधान सुझाए तथा भविष्य में भी सहयोग का भरोसा दिलाया।

सब्जी बीजों का किया गया वितरण

खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रमों में किसानों को सब्जी बीज भी वितरित किए गए। वैज्ञानिकों ने किसानों को उन्नत बीजों के उपयोग और वैज्ञानिक खेती की तकनीकों के बारे में जानकारी दी।

बीज वितरण का उद्देश्य किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री उपलब्ध कराना तथा उन्हें आधुनिक खेती के प्रति प्रोत्साहित करना था।

वैज्ञानिकों ने किसानों से किया सीधा संवाद

इस व्यापक कृषि जागरूकता अभियान में संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. निर्मल हेडाउ, डॉ. पंकज मिश्रा, डॉ. अशोक कुमार, डॉ. रविशंकर सिंह, डॉ. अमित कुमार और डॉ. उत्कर्ष कुमार ने सक्रिय भूमिका निभाई।

वैज्ञानिकों ने किसानों से सीधा संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं को समझा और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान सुझाए। इससे किसानों को वैज्ञानिक सलाह प्राप्त करने का अवसर मिला और कृषि संबंधी कई जिज्ञासाओं का समाधान भी हुआ।

भाकृअनुप–विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा आयोजित खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत जोशीमठ के मेरग, परसारी और मलारी गांवों में आयोजित कृषक जागरूकता कार्यक्रम किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हुए। इन कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरीकरण, प्राकृतिक खेती, फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों की जानकारी प्रदान की गई।

विशेष रूप से महिला किसानों की बड़ी भागीदारी इस बात का संकेत है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। यदि किसान वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई तकनीकों को अपनाते हैं तो इससे न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा बल्कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।

Tags: AgricultureFarmingIndian Agriculture
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