किसानों को वैज्ञानिक खेती, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक बनाने के उद्देश्य से शिमला जिले के बलावग गांव में एक विशेष कृषि जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) के क्षेत्रीय केंद्र शिमला के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में स्थानीय किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और आधुनिक खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं।
“मेरा गांव मेरा गौरव” अभियान के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में करीब 25 किसानों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ कृषि तकनीकों के बारे में जागरूक करना था ताकि खेती को अधिक लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सके।
मृदा स्वास्थ्य संरक्षण पर दिया गया विशेष बल
कार्यक्रम के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि बेहतर उत्पादन और दीर्घकालिक कृषि विकास के लिए मिट्टी का स्वास्थ्य बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन क्षमता में कमी आ सकती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी कि वे नियमित रूप से मिट्टी की जांच करवाएं और उसी के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करें। संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने से फसल उत्पादन में वृद्धि होने के साथ-साथ लागत में भी कमी लाई जा सकती है।
किसानों को यह भी बताया गया कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं का लाभ उठाकर वे अपनी भूमि की वास्तविक स्थिति जान सकते हैं और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती कर सकते हैं।
टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की अपील
कार्यक्रम में टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती की आवश्यकता पर भी विस्तार से चर्चा की गई। कृषि विशेषज्ञों ने कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए किसानों को ऐसी कृषि पद्धतियां अपनानी होंगी जो लंबे समय तक लाभकारी साबित हों।
इस दौरान जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, मल्चिंग और जल संरक्षण तकनीकों के बारे में जानकारी दी गई। किसानों को बताया गया कि इन उपायों के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के साथ-साथ उत्पादन लागत को भी कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को भविष्य की खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए जल और मिट्टी के समुचित उपयोग पर जोर दिया।
वैज्ञानिक खेती से बढ़ेगी किसानों की आय
कार्यक्रम में उपस्थित वैज्ञानिकों ने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खेती अपनाने से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है।
किसानों को उन्नत बीजों के चयन, फसल चक्र अपनाने, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और एकीकृत कीट प्रबंधन जैसी तकनीकों के बारे में बताया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर किसान कम संसाधनों में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
इसके अलावा बागवानी फसलों के प्रबंधन, पौध संरक्षण और मौसम आधारित कृषि सलाह की भी जानकारी किसानों को दी गई।
किसानों ने विशेषज्ञों से पूछे सवाल
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच संवाद रहा। किसानों ने कृषि और बागवानी से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपनी जिज्ञासाएं विशेषज्ञों के सामने रखीं और उनके समाधान प्राप्त किए।
किसानों ने उर्वरक प्रबंधन, रोग एवं कीट नियंत्रण, जल संरक्षण, फलदार पौधों की देखभाल और फसल उत्पादन बढ़ाने से जुड़े कई सवाल पूछे। विशेषज्ञों ने स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किसानों को व्यावहारिक सुझाव दिए।
इस प्रकार का प्रत्यक्ष संवाद किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हुआ, क्योंकि उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान सीधे वैज्ञानिकों से प्राप्त करने का अवसर मिला।
ग्रामीण स्तर पर कृषि जागरूकता की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन बेहद आवश्यक है। नई तकनीकों और वैज्ञानिक जानकारियों की पहुंच गांव स्तर तक सुनिश्चित करने से किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है।
कृषि विशेषज्ञों ने कहा कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसानों को पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों को भी अपनाना होगा। इससे उत्पादन बढ़ेगा, लागत कम होगी और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी संभव होगा।
पंचायत प्रतिनिधियों की रही सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। नवनिर्वाचित पंचायत प्रधान उमा देवी और उपप्रधान देश राज ने कार्यक्रम में भाग लेकर किसानों को कृषि विकास गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि गांव के समग्र विकास में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है और किसानों को नई तकनीकों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। पंचायत स्तर पर भी कृषि और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का आश्वासन दिया गया।
कृषि वैज्ञानिकों ने साझा किए महत्वपूर्ण सुझाव
आईसीएआर-एनबीपीजीआर क्षेत्रीय केंद्र शिमला के वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र नेगी और वरिष्ठ वैज्ञानिक सुखदेव ने किसानों को आधुनिक खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां दीं।
उन्होंने किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, उर्वरकों के संतुलित उपयोग, कृषि आदानों के कुशल प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती के लाभों के बारे में विस्तार से बताया। वैज्ञानिकों ने कहा कि कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और अनुसंधान आधारित समाधानों को अपनाकर किसानों की उत्पादकता और आय दोनों में वृद्धि की जा सकती है।
कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में पहल
बलावग गांव में आयोजित यह कार्यक्रम किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि जागरूकता बढ़ाने, किसानों को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने और कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
किसानों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए भविष्य में ऐसे और कार्यक्रम आयोजित किए जाने की मांग की, ताकि उन्हें खेती से जुड़ी नवीनतम जानकारियां और तकनीकी सहायता नियमित रूप से मिलती रहे।


