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Fish Farmer Samriddhi Co-Plan: मछली पालकों और छोटे कारोबारियों को मिलेगा बड़ा सहारा, रोजगार और बीमा पर सरकार का जोर

Fish Farmer Samriddhi Co-Plan: Fish farmers and small business owners to receive major support; government focuses on employment and insurance.

Fiza by Fiza
July 9, 2026
in योजना
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Fish Farmer Samriddhi Co-Plan

Fish Farmer Samriddhi Co-Plan

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नई दिल्ली: देश के मत्स्य क्षेत्र को संगठित, मजबूत और अधिक लाभकारी बनाने के लिए केंद्र सरकार ने “प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना” को एक अहम कदम के रूप में आगे बढ़ाया है। यह योजना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Fish Farmer Samriddhi Co-Plan) की एक केंद्रीय क्षेत्र उप-योजना है, जिसका उद्देश्य मछुआरों, मछली पालकों, मछली विक्रेताओं, मत्स्य श्रमिकों और इस क्षेत्र से जुड़े छोटे व सूक्ष्म उद्यमों को बेहतर पहचान, वित्तीय सहायता, बीमा सुरक्षा और बाजार से जोड़ना है। सरकार के अनुसार इस योजना पर चार वर्षों में 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्रस्तावित है। योजना को वित्त वर्ष 2023-24 से 2026-27 तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जाना है।

भारत में मत्स्य पालन अब केवल पारंपरिक आजीविका का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा, निर्यात और रोजगार का बड़ा आधार बनता जा रहा है। समुद्री मत्स्य पालन, अंतर्देशीय मत्स्य पालन, झींगा उत्पादन, एक्वाकल्चर, बायोफ्लॉक, केज कल्चर और मछली प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में लगातार नए अवसर बन रहे हैं। इसके बावजूद इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि बड़ी संख्या में मछुआरे और छोटे मछली उद्यमी असंगठित रूप से काम करते हैं। उनके पास काम आधारित पहचान, बैंकिंग रिकॉर्ड, बीमा कवर, संस्थागत ऋण और आधुनिक बाजार सुविधाओं की कमी रहती है। प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना इन्हीं चुनौतियों को दूर करने के उद्देश्य से लाई गई है।

इस योजना का मुख्य फोकस मत्स्य क्षेत्र के सूक्ष्म और छोटे उद्यमों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ना है। इसके लिए नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया जाएगा, जहां मछुआरों, मछली किसानों, श्रमिकों, विक्रेताओं, प्रोसेसर, सहकारी समितियों, एफएफपीओ, स्वयं सहायता समूहों और स्टार्टअप्स को पंजीकृत किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य 40 लाख छोटे और सूक्ष्म उद्यमों को काम आधारित डिजिटल पहचान उपलब्ध कराना है। इस डिजिटल पहचान से लाभार्थियों को सरकारी योजनाओं, ऋण, बीमा, प्रशिक्षण और अन्य सुविधाओं तक पहुंच आसान हो सकेगी।

योजना के तहत मछली पालन से जुड़े किसानों और उद्यमियों को संस्थागत ऋण तक पहुंच दिलाने पर भी जोर दिया गया है। अभी तक कई छोटे मछली पालक स्थानीय साहूकारों या अनौपचारिक स्रोतों से महंगे ब्याज पर पैसा लेने को मजबूर होते हैं। इससे उनकी लागत बढ़ती है और मुनाफा घट जाता है। प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना के जरिए परियोजना रिपोर्ट तैयार करने, दस्तावेजीकरण, वित्तीय साक्षरता, बैंकिंग प्रक्रिया और ऋण सुविधा को आसान बनाने की दिशा में काम किया जाएगा। इससे छोटे उद्यमी बैंक से कर्ज लेकर तालाब विकास, बीज, चारा, प्रसंस्करण, परिवहन, कोल्ड चेन, बिक्री केंद्र और गुणवत्ता सुधार जैसे काम कर सकेंगे।

योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एक्वाकल्चर बीमा को बढ़ावा देना है। मछली पालन में बीमारी, मौसम, पानी की गुणवत्ता, अचानक ऑक्सीजन की कमी, बाढ़ या अन्य कारणों से किसानों को बड़ा नुकसान हो सकता है। कई बार एक ही फसल चक्र में पूरी पूंजी डूब जाती है। ऐसे जोखिमों से बचाने के लिए सरकार योजना के तहत एक्वाकल्चर बीमा खरीदने पर एक बार का प्रोत्साहन देगी। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 4 हेक्टेयर तक जल क्षेत्र वाले किसानों को बीमा प्रीमियम की लागत का 40 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाएगा, जिसकी सीमा 25,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक है। एक किसान को अधिकतम 1 लाख रुपये तक प्रोत्साहन मिल सकता है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों को अतिरिक्त 10 प्रतिशत प्रोत्साहन का प्रावधान भी है।

सरकार का मानना है कि बीमा सुविधा से मछली किसानों का जोखिम कम होगा और वे आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए अधिक आत्मविश्वास के साथ निवेश कर पाएंगे। अभी देश में फसल बीमा की तुलना में मत्स्य बीमा का दायरा सीमित है। यदि एक्वाकल्चर बीमा का बाजार मजबूत होता है, तो भविष्य में बीमा कंपनियां मछली किसानों के लिए अधिक बेहतर और व्यावहारिक बीमा उत्पाद तैयार कर सकती हैं। इससे छोटे किसानों को बीमारी, प्राकृतिक आपदा और उत्पादन हानि की स्थिति में राहत मिल सकेगी।

प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना में प्रदर्शन आधारित अनुदान यानी परफॉर्मेंस ग्रांट का भी प्रावधान है। इसका उद्देश्य केवल सहायता देना नहीं, बल्कि वास्तविक सुधार, रोजगार सृजन, गुणवत्ता, स्वच्छता और बाजार क्षमता को बढ़ावा देना है। योजना के तहत मत्स्य क्षेत्र की वैल्यू चेन में काम करने वाले सूक्ष्म उद्यमों को निवेश और रोजगार के आधार पर अनुदान मिल सकता है। सामान्य श्रेणी के सूक्ष्म उद्यमों के लिए यह अनुदान कुल निवेश का 25 प्रतिशत या अधिकतम 35 लाख रुपये, जो कम हो, तक हो सकता है। वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला स्वामित्व वाले सूक्ष्म उद्यमों के लिए यह सीमा कुल निवेश का 35 प्रतिशत या अधिकतम 45 लाख रुपये तक रखी गई है।

छोटे उद्यमों के लिए भी गुणवत्ता और सुरक्षा प्रणाली अपनाने पर प्रदर्शन आधारित सहायता का प्रावधान है। सामान्य श्रेणी के छोटे उद्यमों को कुल निवेश का 25 प्रतिशत या अधिकतम 75 लाख रुपये तक अनुदान मिल सकता है, जबकि एससी, एसटी और महिला स्वामित्व वाले छोटे उद्यमों के लिए यह सीमा कुल निवेश का 35 प्रतिशत या अधिकतम 1 करोड़ रुपये तक है। स्वयं सहायता समूहों, फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन, सहकारी समितियों और ग्राम स्तर के संगठनों के लिए यह सीमा 35 प्रतिशत या अधिकतम 2 करोड़ रुपये तक हो सकती है।

इस योजना का एक बड़ा लक्ष्य मछली और मछली उत्पादों की गुणवत्ता सुधारना है। देश में मछली की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन कई जगहों पर स्वच्छता, पैकेजिंग, कोल्ड चेन, ट्रेसबिलिटी और गुणवत्ता मानकों की कमी बनी हुई है। कई छोटे विक्रेता और प्रोसेसर बाजार तक पहुंच तो बना लेते हैं, लेकिन उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखना उनके लिए चुनौती होता है। इस योजना के तहत गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली, सुरक्षित मछली उत्पाद, प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी, कचरा प्रबंधन, रोग प्रबंधन और बेहतर प्रसंस्करण सुविधाओं को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे घरेलू बाजार में सुरक्षित और बेहतर गुणवत्ता वाली मछली उपलब्ध होगी और निर्यात के अवसर भी बढ़ेंगे।

रोजगार के मोर्चे पर भी यह योजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सरकार के अनुसार योजना से 1.7 लाख नए रोजगार बनने का अनुमान है, जिनमें 75,000 रोजगार महिलाओं के लिए केंद्रित होंगे। इसके अलावा मत्स्य क्षेत्र की सूक्ष्म और छोटी उद्यम वैल्यू चेन में 5.4 लाख निरंतर रोजगार अवसरों को समर्थन देने का लक्ष्य रखा गया है। यह ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, क्योंकि मछली पालन से जुड़ी कई गतिविधियां स्थानीय स्तर पर शुरू की जा सकती हैं। इनमें मछली बीज उत्पादन, चारा बिक्री, तालाब प्रबंधन, मछली प्रोसेसिंग, पैकिंग, फिश कटलेट, फिश अचार, ड्राई फिश, फिश फीड, आइस बॉक्स, परिवहन और खुदरा बिक्री जैसे काम शामिल हैं।

मत्स्य क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कई राज्यों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से मछली प्रसंस्करण, सूखी मछली, मूल्य संवर्धित उत्पाद, बिक्री और पैकिंग का काम कर रही हैं। योजना में महिलाओं को अतिरिक्त प्रोत्साहन और रोजगार सृजन में प्राथमिकता देने की व्यवस्था की गई है। इससे ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय स्तर पर आय का नया स्रोत मिल सकता है। यदि प्रशिक्षण, बाजार संपर्क और वित्तीय सहायता सही तरीके से उपलब्ध हो, तो महिला समूह मत्स्य आधारित छोटे कारोबार को सफल मॉडल में बदल सकते हैं।

योजना का लाभ सीधे मछली किसानों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल पंजीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण होने से लाभार्थी की पहचान स्पष्ट होगी और योजनाओं का लाभ लक्षित तरीके से दिया जा सकेगा। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और फर्जी लाभार्थियों की संभावना कम होगी। पंजीकृत लाभार्थियों को भविष्य में प्रशिक्षण, ऋण, बीमा, बाजार सूचना, परियोजना तैयारी और सरकारी सहायता से जोड़ना आसान होगा।

मत्स्य क्षेत्र में सहकारी समितियों और एफएफपीओ की भूमिका भी बढ़ाई जाएगी। अकेला किसान अक्सर बाजार में कमजोर स्थिति में रहता है। उसे बीज, चारा, दवा, तालाब किराया, बिजली, परिवहन और बिक्री में अधिक लागत लगती है। लेकिन यदि किसान समूह या उत्पादक संगठन के रूप में काम करें, तो सामूहिक खरीद, सामूहिक बिक्री और बेहतर मोलभाव संभव होता है। योजना के तहत 5,500 मत्स्य सहकारी समितियों को समर्थन देने और 6.4 लाख सूक्ष्म उद्यमों को संस्थागत ऋण तक पहुंच दिलाने का लक्ष्य है।

यह योजना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के व्यापक लक्ष्य को भी आगे बढ़ाती है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र का टिकाऊ, आर्थिक रूप से सक्षम और समावेशी विकास करना है। इसमें उत्पादन, उत्पादकता, आधुनिक तकनीक, बाजार, गुणवत्ता, निर्यात और रोजगार पर ध्यान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना इसी ढांचे के भीतर छोटे किसानों और उद्यमों को औपचारिक पहचान, वित्तीय पहुंच और बाजार मजबूती देने पर केंद्रित है।

मत्स्य क्षेत्र में पिछले वर्षों में उत्पादन और निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकारी जानकारी के अनुसार 2013-14 से 2023-24 के बीच मछली उत्पादन में 79.66 लाख टन की वृद्धि हुई। झींगा उत्पादन और निर्यात में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। इसी अवधि में मत्स्य क्षेत्र में लाखों मछुआरों और मछली किसानों के लिए आजीविका के अवसर बने हैं। साथ ही मत्स्य पालन को किसान क्रेडिट कार्ड के दायरे में लाने के बाद कई किसानों को सस्ता ऋण मिलने का रास्ता खुला है।

हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। छोटे मछली पालकों को सबसे अधिक दिक्कत गुणवत्तापूर्ण मछली बीज, संतुलित चारा, पानी की जांच, रोग प्रबंधन, तकनीकी सलाह, बाजार भाव, कोल्ड स्टोरेज और परिवहन में आती है। कई किसान पारंपरिक तरीके से तालाब में मछली छोड़ देते हैं, लेकिन वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं कर पाते। इससे उत्पादन कम होता है और बीमारी का खतरा बढ़ता है। ऐसे में योजना के तहत प्रशिक्षण और विस्तार सेवाएं बहुत जरूरी होंगी। यदि किसानों को तालाब की तैयारी, सही प्रजाति चयन, स्टॉकिंग डेंसिटी, फीड मैनेजमेंट, पानी की गुणवत्ता और हार्वेस्टिंग के बारे में सही मार्गदर्शन मिले, तो उनकी आय में अच्छा सुधार हो सकता है।

ग्रामीण भारत में मत्स्य पालन किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी साधन बन सकता है। जिन किसानों के पास खेत के साथ तालाब, जलाशय, खाली गड्ढे या पानी उपलब्ध है, वे कृषि के साथ मत्स्य पालन को जोड़कर अतिरिक्त आय ले सकते हैं। धान वाले क्षेत्रों में भी एकीकृत खेती के मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। मछली के साथ बतख पालन, सब्जी, बागवानी और जैविक खाद उत्पादन जैसे मॉडल किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना ऐसे किसानों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़कर उनकी आय को स्थिर करने में मदद कर सकती है।

बाजार के स्तर पर भी योजना का असर दिख सकता है। यदि मछली उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होती है, स्वच्छ पैकिंग होती है और कोल्ड चेन मजबूत होती है, तो उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ेगा। इससे घरेलू मांग बढ़ेगी और किसानों को बेहतर कीमत मिल सकती है। वर्तमान में कई क्षेत्रों में किसान तालाब से मछली निकालने के बाद तुरंत बेचने को मजबूर होते हैं, क्योंकि उनके पास भंडारण या परिवहन की सुविधा नहीं होती। इस वजह से उन्हें व्यापारी द्वारा तय कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। यदि योजना के तहत स्थानीय स्तर पर संग्रहण, आइस बॉक्स, मिनी कोल्ड चेन, प्रसंस्करण और बाजार संपर्क बढ़े, तो किसान की सौदेबाजी क्षमता मजबूत होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना की सफलता राज्यों के क्रियान्वयन, जिला स्तर पर जागरूकता, बैंकिंग सहयोग और डिजिटल पंजीकरण की गति पर निर्भर करेगी। कई छोटे किसान सरकारी योजनाओं की जानकारी न होने के कारण लाभ से वंचित रह जाते हैं। इसलिए मत्स्य विभाग, पंचायत, सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों को मिलकर जागरूकता अभियान चलाना होगा। योजना की जानकारी स्थानीय भाषा में सरल तरीके से किसानों तक पहुंचनी चाहिए।

प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना केवल आर्थिक सहायता की योजना नहीं है, बल्कि यह मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक, संगठित और बाजार आधारित बनाने की दिशा में बड़ा प्रयास है। इससे मछली किसान को पहचान मिलेगी, बीमा से जोखिम घटेगा, बैंकिंग सहायता से निवेश बढ़ेगा, गुणवत्ता सुधार से बाजार मजबूत होगा और रोजगार के नए अवसर बनेंगे। यदि योजना का लाभ सही लाभार्थियों तक पारदर्शी तरीके से पहुंचता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ब्लू इकोनॉमी दोनों को गति दे सकती है।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कितने मछली किसान डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ते हैं, बीमा का दायरा कितना बढ़ता है, कितने सूक्ष्म उद्यम संस्थागत ऋण लेते हैं और कितने महिला समूह मत्स्य आधारित कारोबार में आगे आते हैं। सरकार की यह योजना उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद बन सकती है, जिनकी आजीविका पानी, तालाब, नदी, झील और समुद्र से जुड़ी है। सही प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और बाजार व्यवस्था के साथ मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना देश के मछली पालन क्षेत्र को नई दिशा दे सकती है।

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