कृषि एवं बागवानी फसलों में माइट्स (सूक्ष्म कणों) के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए किसानों और शोधकर्ताओं को इनके वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन के प्रति जागरूक बनाने की दिशा में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के अंतर्गत संचालित ऑल इंडिया नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन एग्रीकल्चरल एकरोलॉजी द्वारा ‘माइट्स की पहचान एवं जैव-तर्कसंगत (बायोरेशनल) प्रबंधन’ विषय पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य प्रतिभागियों को माइट्स की पहचान, उनके जीवन चक्र, फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव तथा टिकाऊ एवं सुरक्षित प्रबंधन तकनीकों से अवगत कराना था।
आज के समय में माइट्स कृषि और बागवानी फसलों के लिए एक गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। इनके कारण सब्जियों, फलों, फूलों और अन्य फसलों की गुणवत्ता एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में इनकी सही पहचान और समय रहते वैज्ञानिक नियंत्रण किसानों की आय और उत्पादन बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आयोजित इस प्रशिक्षण में माइट्स की संरचना, वर्गीकरण, व्यवहार, मौसमी प्रकोप तथा उनके नियंत्रण की आधुनिक तकनीकों पर विस्तार से जानकारी दी गई।
प्रशिक्षण कार्यक्रम की समन्वयक एवं प्रधान एकरोलॉजिस्ट डॉ. मनमीत बराड़ भुल्लर ने प्रतिभागियों को माइट्स की मॉर्फोलॉजी, टैक्सोनॉमिक पहचान तथा विभिन्न प्रकार के फाइटोफेगस (फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले) और प्रिडेटरी (लाभकारी शिकारी) माइट्स के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि माइट्स की सही पहचान किए बिना उनका प्रभावी प्रबंधन संभव नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों और शोधार्थियों को उनकी पहचान की तकनीकों में दक्ष होना चाहिए।
डॉ. मनमीत बराड़ भुल्लर ने कृषि एवं बागवानी फसलों में पाए जाने वाले प्रमुख माइट्स की वर्तमान स्थिति, उनके प्राकृतिक शत्रुओं की पहचान तथा समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) के अंतर्गत अपनाई जाने वाली बायोरेशनल तकनीकों पर विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि रासायनिक कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं। इसलिए किसानों को अनुशंसित वनस्पति आधारित उत्पादों (बॉटनिकल्स), जैविक उपायों तथा सुरक्षित एकरिसाइड्स (Acaricides) का संतुलित उपयोग करना चाहिए। उन्होंने सब्जी फसलों में माइट्स नियंत्रण की वैज्ञानिक रणनीतियों के साथ-साथ मधुमक्खियों और भंडारित अनाजों में पाए जाने वाले माइट्स की पहचान एवं उनसे होने वाले नुकसान की भी जानकारी साझा की।
कार्यक्रम की सह-समन्वयक एवं वरिष्ठ एकरोलॉजिस्ट डॉ. परमजीत कौर ने माइट्स के जीवन चक्र, मौसमी प्रकोप, विभिन्न फसलों में उनके नुकसान के लक्षण तथा खुले एवं संरक्षित खेती (प्रोटेक्टेड कल्टीवेशन) में माइट्स की समस्या पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि संरक्षित खेती में तापमान और आर्द्रता की अनुकूल परिस्थितियों के कारण माइट्स का प्रकोप तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए समय-समय पर निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है। उन्होंने प्रतिभागियों को माइट्स के संग्रह, संरक्षण तथा माइक्रोस्कोपिक अध्ययन के लिए स्लाइड तैयार करने की व्यावहारिक विधियां भी सिखाईं, जिससे शोध कार्य में सटीक पहचान संभव हो सके।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में महाराष्ट्र के बारामती स्थित तुलजाराम चतुर्चंद कॉलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स (सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) की दो स्नातकोत्तर छात्राओं ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें विशेषज्ञ वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में आधुनिक प्रयोगशाला तकनीकों और अनुसंधान विधियों का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ। प्रतिभागियों ने इसे अपने शोध कार्य के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को पीएयू के एंटोमोलॉजिकल रिसर्च फार्म का भ्रमण भी कराया गया, जहां उन्हें फसलों में माइट्स की पहचान, निगरानी तथा उनके जैव-तर्कसंगत प्रबंधन की तकनीकों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन दिखाया गया। इसके अलावा उन्होंने विश्वविद्यालय की एपियरी (मधुमक्खी पालन इकाई), बायोकंट्रोल प्रयोगशालाओं तथा नेशनल पीएयू इंसेक्ट म्यूजियम का भी दौरा किया। इस भ्रमण के माध्यम से प्रतिभागियों को लाभकारी कीटों, प्राकृतिक शत्रुओं तथा जैविक नियंत्रण की विभिन्न तकनीकों की जानकारी मिली, जो भविष्य में टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
प्रशिक्षण के अंतिम दिन आयोजित संवादात्मक सत्र में प्रतिभागियों ने अपने शोध कार्यों के दौरान आने वाली समस्याओं और चुनौतियों पर विशेषज्ञों के साथ विस्तार से चर्चा की। वैज्ञानिकों ने उनके प्रश्नों का समाधान करते हुए शोध की नई संभावनाओं और उन्नत तकनीकों के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर डॉ. मनमीत बराड़ भुल्लर और डॉ. परमजीत कौर ने कहा कि माइट्स का पर्यावरण-अनुकूल एवं वैज्ञानिक प्रबंधन समय की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि रासायनिक नियंत्रण के साथ-साथ प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण और समेकित कीट प्रबंधन तकनीकों को अपनाकर माइट्स की समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर पीएयू के अनुसंधान निदेशक डॉ. अजमेर सिंह धट्ट तथा कृषि महाविद्यालय के डीन डॉ. चरणजीत सिंह औलख ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के कौशल विकास कार्यक्रम युवा शोधार्थियों और वैज्ञानिकों को आधुनिक अनुसंधान तकनीकों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में बदलती चुनौतियों का सामना करने के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण, व्यावहारिक अनुभव और संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम भविष्य में कृषि अनुसंधान को नई दिशा देने के साथ-साथ किसानों तक वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

