“मुश्किलें इंसान को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे नई राह दिखाने आती हैं।” उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के द्वारीखाल ब्लॉक के छोटे से गांव ग्वीन छोटा के रहने वाले कमल सिंह उनियाल की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है। कभी दिल्ली की एक फैक्ट्री में नौकरी करने वाले कमल सिंह आज एक सफल प्रगतिशील किसान हैं। एकीकृत खेती (इंटीग्रेटेड फार्मिंग) के जरिए उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति बदली, बल्कि गांव के युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।
नौकरी से खेती तक का कठिन सफर
54 वर्षीय कमल सिंह उनियाल का जीवन हमेशा से आसान नहीं रहा। अपने परिवार की बेहतर आजीविका के लिए उन्होंने दिल्ली की सूर्या बल्ब फैक्ट्री में नौकरी की। कुछ समय बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर छोटे-छोटे व्यवसाय भी शुरू किए, लेकिन हर प्रयास असफल रहा। लगातार नुकसान और आर्थिक कठिनाइयों ने उन्हें निराश जरूर किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
आखिरकार उन्होंने अपने पैतृक गांव लौटने का फैसला किया। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि अब आगे क्या किया जाए? गांव में खेती थी, लेकिन आधुनिक कृषि का अनुभव नहीं था। फिर भी उन्होंने तय कर लिया कि अब भविष्य खेती में ही तलाशेंगे।
प्रशिक्षण बना सफलता की पहली सीढ़ी
खेती की शुरुआत आसान नहीं थी। कमल सिंह जानते थे कि केवल पारंपरिक तरीकों से बेहतर आय संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने कृषि विभाग से संपर्क किया। उनकी सीखने की इच्छा और मेहनत को देखते हुए विभाग ने वर्ष 2015-16 में उन्हें स्टेट एग्रीकल्चरल मैनेजमेंट एंड एक्सटेंशन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (SAMETI), पंतनगर में प्रशिक्षण के लिए नामांकित किया।
यह प्रशिक्षण उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। यहां उन्होंने आधुनिक खेती, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन, पशुपालन, संसाधनों के बेहतर उपयोग और कृषि व्यवसाय से जुड़ी नई तकनीकों की जानकारी हासिल की। प्रशिक्षण के बाद उनका खेती को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया।
पारंपरिक खेती से नहीं मिली उम्मीद
प्रशिक्षण के बाद कमल सिंह ने अपने खेतों में धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलें उगानी शुरू कीं। हालांकि मेहनत तो खूब हुई, लेकिन आमदनी सीमित रही। उन्हें जल्द ही समझ में आ गया कि यदि खेती को लाभ का व्यवसाय बनाना है तो केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
उन्होंने बाजार की मांग को समझा और आय के नए स्रोत तलाशने शुरू किए।
डेयरी फार्मिंग ने बदल दी आर्थिक तस्वीर
कमल सिंह ने पशुपालन को खेती के साथ जोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने पशुपालन विभाग की सहायता से चार साहीवाल नस्ल की गायें खरीदीं। यह निर्णय उनकी जिंदगी का दूसरा बड़ा मोड़ साबित हुआ।
धीरे-धीरे उनका डेयरी व्यवसाय मजबूत होता गया। आज उनके पास—
- 2 साहीवाल गाय
- 1 सिंधी गाय
- 1 बद्री गाय
- 1 जर्सी गाय
- 1 पहाड़ी भैंस
है।
इन पशुओं से प्रतिदिन 20 से 25 लीटर दूध का उत्पादन होता है। दूध की नियमित बिक्री से घर में स्थायी आय आने लगी। इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और उन्होंने खेती में नए प्रयोग करने का आत्मविश्वास भी हासिल किया।
एकीकृत खेती अपनाकर बढ़ाई आय
कमल सिंह यहीं नहीं रुके। उन्होंने समझ लिया कि खेती में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र विविधीकरण (Diversification) है। इसलिए उन्होंने अपने खेत को एक इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल में बदलना शुरू किया।
उन्होंने डेयरी के साथ-साथ—
- ऑफ-सीजन सब्जियों की खेती
- मत्स्य पालन
- मशरूम उत्पादन
भी शुरू किया।
आज उनके खेत में अलग-अलग गतिविधियां पूरे वर्ष चलती रहती हैं। इससे किसी एक फसल पर निर्भरता कम हो गई और जोखिम भी काफी घट गया।
मछली पालन से बढ़ी अतिरिक्त कमाई
कमल सिंह ने अपने खेत में तालाब बनाकर मत्स्य पालन शुरू किया। उन्होंने इसमें ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प और पंगासियस जैसी व्यावसायिक प्रजातियों का पालन किया।
मछली पालन से उन्हें हर वर्ष अतिरिक्त आय मिलने लगी। साथ ही तालाब का पानी सिंचाई में भी उपयोग होने लगा, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हुआ।
मशरूम उत्पादन बना नया व्यवसाय
कमल सिंह ने खेती में नवाचार जारी रखते हुए ढिंगरी (ऑयस्टर) मशरूम का उत्पादन भी शुरू किया। कम लागत और कम जगह में होने वाला यह व्यवसाय जल्दी ही लाभदायक साबित हुआ।
आज मशरूम उत्पादन उनके फार्म की आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
सोशल मीडिया से भी मिला तकनीकी सहयोग
कमल सिंह की सफलता में SAMETI उत्तराखंड की लगातार भूमिका रही। प्रशिक्षण के बाद भी संस्थान समय-समय पर उन्हें नई तकनीकों की जानकारी देता रहा।
विशेष रूप से “SAMETI-Uttarakhand” व्हाट्सएप समूह उनके लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ। इस मंच के माध्यम से उन्हें विशेषज्ञों से तुरंत सलाह मिलती रही। खेतों में आने वाली समस्याओं का समाधान ऑनलाइन उपलब्ध होने लगा। साथ ही वे अन्य किसानों से अनुभव भी साझा करते रहे।
ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों से लगातार जोड़कर रखा।
मेहनत को मिले कई सम्मान
कमल सिंह की सफलता ने जल्द ही पूरे जिले का ध्यान आकर्षित किया।
वर्ष 2017 में उन्हें ATMA द्वारा प्रतिष्ठित “किसान श्री” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इसके बाद उन्हें—
- मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, पौड़ी द्वारा “सर्वश्रेष्ठ किसान”
- सब्जी उत्पादन में उत्कृष्ट कार्य के लिए पुनः “किसान श्री” पुरस्कार
से सम्मानित किया गया।
उनकी पशुपालन में रुचि को देखते हुए पशुपालन विभाग ने उन्हें 11 पहाड़ी बकरियां भी उपलब्ध कराईं। इससे उनका एकीकृत कृषि मॉडल और अधिक मजबूत हो गया।
72 हजार से 3.6 लाख रुपये तक पहुंची आय
कमल सिंह की मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम उनकी आय में दिखाई देता है।
वर्ष 2017 में उनकी वार्षिक आय लगभग 72 हजार रुपये थी।
आज डेयरी, सब्जी उत्पादन, मत्स्य पालन, मशरूम और पशुपालन को मिलाकर उनकी शुद्ध वार्षिक आय लगभग 3.6 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है।
यानी कुछ ही वर्षों में उनकी आय लगभग पांच गुना बढ़ गई।
गांव के युवाओं के लिए बने प्रेरणा स्रोत
आज कमल सिंह केवल सफल किसान नहीं हैं, बल्कि अपने क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा भी हैं। वे गांव के युवाओं को बताते हैं कि यदि वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं, नई तकनीकों का उपयोग किया जाए और खेती को व्यवसाय की तरह चलाया जाए, तो कृषि भी सम्मानजनक और लाभकारी रोजगार बन सकती है।
वे आसपास के किसानों को डेयरी, सब्जी उत्पादन, मशरूम और मत्स्य पालन जैसे विविध व्यवसाय अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका मानना है कि यदि गांव के युवा आधुनिक खेती की ओर लौटें, तो पलायन भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
संघर्ष, सीख और सफलता की मिसाल
कमल सिंह उनियाल की कहानी यह साबित करती है कि सफलता केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि सही सोच, निरंतर सीखने की इच्छा और कठिन परिश्रम से हासिल होती है। नौकरी और व्यवसाय में असफलता के बाद उन्होंने खेती को अपनाया, आधुनिक तकनीकों को सीखा और एकीकृत खेती के माध्यम से अपनी जिंदगी बदल दी।
आज उनका खेत केवल उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि आधुनिक कृषि का एक जीवंत मॉडल है। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि यदि किसानों को सही प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग मिले, तो छोटी जोत वाले किसान भी खेती को लाभदायक उद्यम में बदल सकते हैं।
कमल सिंह उनियाल की प्रेरणादायी यात्रा उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए एक मिसाल है। यह कहानी बताती है कि आधुनिक तकनीक, विविधीकृत खेती और अटूट आत्मविश्वास के बल पर कृषि को समृद्धि का सबसे मजबूत माध्यम बनाया जा सकता है।

