केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज सीएसआईआर मुख्यालय में आयोजित “फार्म रेजिड्यू टू रोड्स” प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम में पराली से बायो-बिटुमेन बनाने की पहल को ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम बताया। इस अवसर पर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह, वैज्ञानिकों और किसानों की उपस्थिति में इस नवाचार को देश के विकास, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया गया।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री श्री चौहान ने महावीर जयंती के अवसर पर भगवान महावीर को नमन करते हुए कहा कि आज के वैश्विक माहौल में अहिंसा, सत्य और संयम की शिक्षाएं पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध और संघर्ष की बजाय शांति और सहअस्तित्व का मार्ग अपनाना ही मानवता के हित में है। उन्होंने पराली जलाने को भी अहिंसा के सिद्धांत के विपरीत बताते हुए कहा कि इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं का जीवन भी नष्ट होता है।
मंत्री ने कहा कि पहले ग्रामीण जीवन में पराली के कई उपयोग होते थे, लेकिन आधुनिक कृषि पद्धतियों के चलते इसकी उपयोगिता कम हो गई और किसान मजबूरी में इसे जलाने लगे। अब बायो-बिटुमेन तकनीक इस समस्या का स्थायी समाधान बनकर सामने आई है। इससे पराली को एक मूल्यवान संसाधन में बदला जा सकता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होगी और प्रदूषण भी कम होगा।
बायो-बिटुमेन तकनीक के माध्यम से सड़क निर्माण में उपयोग होने वाले पारंपरिक बिटुमेन का विकल्प तैयार किया जा रहा है। इससे न केवल पराली का प्रभावी उपयोग होगा, बल्कि देश में बिटुमेन के आयात पर निर्भरता भी कम होगी। श्री चौहान ने बताया कि इस पहल से देश को हजारों करोड़ रुपये की बचत होने की संभावना है, जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती देगा।
उन्होंने कहा कि जब नीति स्पष्ट और उद्देश्य मजबूत हो, तो एक ही समाधान से कई समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। बायो-बिटुमेन इसका सशक्त उदाहरण है, जो पर्यावरण संरक्षण, किसानों की आय में वृद्धि और औद्योगिक विकास—तीनों क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डालता है।
इस अवसर पर मंत्री ने भारत की प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा का भी उल्लेख किया और बताया कि देश में विज्ञान और नवाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं। उन्होंने कहा कि आज के वैज्ञानिक उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक तकनीकों के माध्यम से नए समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने वैज्ञानिकों को “राष्ट्र निर्माण के नायक” बताते हुए उनके योगदान की सराहना की।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी इस पहल को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और संसाधनों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बेहद जरूरी हो गई है। उन्होंने कहा कि बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें न केवल आयात कम करेंगी, बल्कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को भी साकार करेंगी।
उन्होंने यह भी बताया कि इस तकनीक से सड़क निर्माण क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादों का उपयोग बढ़ेगा और पर्यावरणीय लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे किसानों को सीधे लाभ पहुंचेगा, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि भारत ने कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है और अब आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वैज्ञानिक संस्थानों, किसानों और सरकार के संयुक्त प्रयासों से नई तकनीकों को जमीन पर उतारकर देश को विकसित बनाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, पराली से बायो-बिटुमेन बनाने की यह पहल न केवल एक तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि यह किसानों, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था—तीनों के लिए लाभकारी समाधान के रूप में उभर रही है। यह कदम भारत को आत्मनिर्भर और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण प्रयास साबित हो सकता है।

