मिथिलेश कुमार सिंह, सुधा नंदिनी, सुमीत कुमार सिंह, पुष्पा सिंह एवं सरिता कुमारी
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
भारत प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश रहा है। यहाँ की सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि रही है। वर्तमान समय में जब पूरा विश्व तीव्र औद्योगीकरण और तकनीकी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में आगे बढ़ रहा है, तब भी भारत की आत्मा उसके गाँवों और खेतों में बसती है। भारतीय मिट्टी केवल अन्न ही नहीं उपजाती, बल्कि यह हमारी परंपराओं, संस्कृति और जीवन मूल्यों को भी पोषित करती है। देश की वास्तविक शक्ति उसके खेतों की उर्वरता और उन किसानों में निहित है, जो अथक परिश्रम से पूरे देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
वेदों से लेकर आधुनिक विज्ञान तक भारतीय कृषि ने लंबी और गौरवशाली यात्रा तय की है। अनेक प्राकृतिक आपदाओं, विदेशी आक्रमणों तथा नीतिगत चुनौतियों के बावजूद कृषि आज भी करोड़ों भारतीयों के जीवन का आधार बनी हुई है। ऐसे समय में जब हम “विकसित भारत” की कल्पना कर रहे हैं, तब अपनी कृषि विरासत को समझना, उसका सम्मान करना और उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
प्राचीन भारत में कृषि की गौरवशाली परंपरा
वैदिक काल में कृषि को ईश्वर प्रदत्त कार्य माना गया। ऋषियों ने भूमि को “माता” और कृषक को उसका “पुत्र” कहा। कृषि केवल जीविका का साधन नहीं थी, बल्कि यह धर्म और संस्कृति का अभिन्न अंग थी। ऋग्वेद में वर्षा, सूर्य, वायु और पृथ्वी की स्तुति यह दर्शाती है कि भारतीय कृषि व्यवस्था प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने पर आधारित थी।
प्राचीन भारत में मौसम और ग्रह-नक्षत्रों के अध्ययन के लिए वेधशालाओं का निर्माण किया गया ताकि कृषि कार्य समयानुसार संपन्न हो सकें। घाघ और भड्डरी जैसे लोक कवियों की कृषि संबंधी कहावतें अनुभव और विज्ञान का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं, जो आज भी ग्रामीण भारत में प्रासंगिक हैं।
मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता की खुदाई में प्राप्त अनाज भंडार, सिंचाई व्यवस्था और हल के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय कृषि प्रणाली अत्यंत विकसित और सुव्यवस्थित थी। सरस्वती क्षेत्र में दोहरी फसल प्रणाली, बैलों द्वारा जुताई तथा जल संरक्षण के उपाय उस समय की वैज्ञानिक कृषि पद्धति को दर्शाते हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कृषि कर, सिंचाई व्यवस्था, बीज भंडारण और उत्पादन मूल्य निर्धारण जैसी नीतियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में मृदा, औषधीय पौधों और खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी गई हैं। उस समय कृषि गौ-आधारित एवं प्रकृति-सम्मत थी, जिसमें रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं होता था। भूमि की गुणवत्ता के अनुसार फसलों का चयन किया जाता था। मनुस्मृति में भी कहा गया है—
“सुबीजं सुक्षेत्रे जायते संपद्यते।”
अर्थात उत्तम बीज और उपजाऊ भूमि समृद्धि का आधार हैं।
मध्यकालीन भारत की कृषि व्यवस्था
मध्यकालीन भारत में भी कृषि समाज और अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनी रही। भक्ति आंदोलन और संत साहित्य में कृषक जीवन का व्यापक वर्णन मिलता है। कबीर, तुलसीदास, रहीम और सूरदास जैसे कवियों ने किसानों के श्रम, संघर्ष और जीवन की वास्तविकता को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।
अकबर के शासनकाल में टोडरमल द्वारा लागू की गई “जाब्ता प्रणाली” ने भूमि मापन और राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित किया। हालांकि समय के साथ बढ़ते करों ने किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ाया।
औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय कृषि को भारी क्षति पहुँची। किसानों को नील, अफीम और कपास जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया, जिसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में अकाल और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हुई। जमींदारी प्रथा, अत्यधिक कर और महाजनों के शोषण ने किसानों की स्थिति को और भी दयनीय बना दिया। इस दौर में संथाल विद्रोह, नील विद्रोह और अनेक किसान आंदोलनों ने जन्म लिया। प्रेमचंद के उपन्यास गोदान तथा दीनबंधु मित्र के नील दर्पण में किसानों की पीड़ा का मार्मिक चित्रण मिलता है।
वर्तमान भारतीय कृषि की चुनौतियाँ
आज भारतीय कृषि अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण असामयिक वर्षा, सूखा, बाढ़ और तापमान में वृद्धि जैसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। देश के लगभग 85 प्रतिशत किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं, जिनके पास सीमित भूमि, संसाधन और पूंजी होती है।
किसानों को समय पर सिंचाई, उर्वरक, बीज और तकनीकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। कृषि बाजारों में मूल्य निर्धारण पर किसानों का नियंत्रण नहीं होता और उन्हें बिचौलियों तथा आढ़तियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इन आर्थिक और सामाजिक दबावों के कारण किसान मानसिक तनाव और असुरक्षा का सामना करते हैं। देश में किसानों की आत्महत्याएँ केवल आँकड़े नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यदि अन्नदाता सुरक्षित नहीं है, तो समावेशी और न्यायपूर्ण विकास की कल्पना अधूरी रह जाएगी।
स्वतंत्र भारत में कृषि का पुनर्निर्माण
स्वतंत्रता के बाद भारत ने कृषि विकास की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। जनसंख्या वृद्धि और खाद्यान्न संकट को देखते हुए कृषि में वैज्ञानिक तकनीकों का समावेश किया गया। हरित क्रांति के माध्यम से उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ, जिससे भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।
इसके बाद श्वेत क्रांति, नीली क्रांति और पीली क्रांति जैसी पहलों ने कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों को नई दिशा दी। हालांकि इन क्रांतियों के लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुँच सके और इसके साथ भूजल स्तर में गिरावट, मृदा प्रदूषण तथा पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएँ भी सामने आईं।
विकसित भारत और कृषि की नई संभावनाएँ
वर्तमान समय में भारतीय कृषि तेजी से आधुनिक तकनीकों को अपना रही है। मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जलवायु अनुकूल खेती, फसल विविधीकरण, प्राकृतिक खेती और सटीक कृषि (Precision Farming) जैसे उपाय कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बना रहे हैं।
भारत ने जीनोम एडिटिंग तकनीक के माध्यम से उन्नत फसल किस्मों के विकास में भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं। विश्व की पहली जीनोम संपादित धान की किस्मों—डीआरआर धान-100 और पूसा डीएसटी धान-1—का विकास भारतीय कृषि विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है।
जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए श्री अन्न (मोटे अनाज), हाइड्रोपोनिक्स, एरोपोनिक्स और जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए भौगोलिक संकेतक (GI Tag), किसान उत्पादक संगठन (FPO) तथा कृषि आधारित उद्यमों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
आज भारतीय कृषि में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिमोट सेंसिंग और रोबोटिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। डिजिटल कृषि के माध्यम से खेती को अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बनाया जा रहा है।
भारत अब अंतरिक्ष कृषि की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है। इसरो के एक्सिओम-4 मिशन के अंतर्गत मूंग, मेथी, टमाटर, बैंगन और चावल जैसी फसलों के बीजों पर माइक्रोग्रैविटी में अध्ययन किया जा रहा है। स्पिरुलिना और क्लोरेला जैसे सूक्ष्म शैवालों पर भी शोध जारी है, ताकि भविष्य में अंतरिक्ष में जीवन-सहायक कृषि प्रणाली विकसित की जा सके।
निष्कर्ष
भारतीय कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक नवाचारों के साथ यदि हम अपनी पारंपरिक कृषि विरासत को जोड़ सकें, तो भारत पुनः कृषि क्षेत्र में विश्वगुरु बन सकता है।
वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। यह आवश्यक है कि हम किसानों को सम्मान, सुरक्षा और आधुनिक संसाधन प्रदान करें, ताकि भारत की कृषि पुनः अपनी स्वर्णिम ऊँचाइयों को प्राप्त कर सके। भारतीय कृषि की जड़ें हमारी प्राचीन विरासत में हैं और यही विरासत भविष्य के विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव बनेगी।

