धान की खेती करने वाले किसानों के लिए खरपतवार प्रबंधन बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। खासकर सांवा और अन्य घास प्रजातियों के खरपतवार कई बार धान की फसल के साथ तेजी से बढ़ते हैं और उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। लगातार एक ही तरह के खरपतवारनाशकों के इस्तेमाल से कुछ खरपतवारों में रसायनों के प्रति प्रतिरोध की समस्या भी बढ़ रही है। ऐसे समय में इप्ट्रियाजोपाइरिड (Iptriazopyrid) नाम का नया खरपतवारनाशक चर्चा में आया है।
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी EPA को जापान की निसान केमिकल कॉरपोरेशन ने इप्ट्रियाजोपाइरिड के दो उत्पादों के पंजीकरण के लिए आवेदन दिया है। इनमें 98.5 प्रतिशत तकनीकी उत्पाद और 100 ग्राम प्रति लीटर एससी फॉर्मूलेशन शामिल है। दोनों उत्पादों को धान की फसल में इस्तेमाल के लिए प्रस्तावित किया गया है।
EPA इन आवेदनों की समीक्षा कर रहा है और इन पर सार्वजनिक टिप्पणियां भी आमंत्रित की गई हैं। हालांकि, अमेरिका में आवेदन की समीक्षा शुरू होना अंतिम बिक्री मंजूरी नहीं है। इसके लिए नियामकीय प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।
भारतीय धान किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?
भारत में धान की खेती बड़े क्षेत्र में होती है और फसल में खरपतवार नियंत्रण किसानों के सामने प्रमुख समस्याओं में शामिल है। शुरुआती अवस्था में अगर खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाए तो वे धान के पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
बार्नयार्ड ग्रास यानी Echinochloa crus-galli जैसी घास खरपतवार धान के खेतों में आम तौर पर पाई जाती हैं। इसके अलावा Leptochloa chinensis जैसी घास प्रजातियां भी कुछ क्षेत्रों में किसानों के लिए परेशानी का कारण बनती हैं।
इन खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए किसान अलग-अलग खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन किसी एक रसायन का लगातार इस्तेमाल करने से समय के साथ कुछ खरपतवारों में उसके प्रति प्रतिरोध विकसित हो सकता है। ऐसे में नई रासायनिक संरचना वाले खरपतवारनाशक भविष्य में किसानों को अतिरिक्त विकल्प दे सकते हैं।
इप्ट्रियाजोपाइरिड क्या है?
इप्ट्रियाजोपाइरिड को जापान की निसान केमिकल ने विकसित किया है। इसे शुरुआती विकास के दौरान NC-656 नाम दिया गया था। जुलाई 2022 में अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) ने इसे इप्ट्रियाजोपाइरिड नाम दिया।
यह HPPD नामक एंजाइम को प्रभावित करने वाले खरपतवारनाशकों की श्रेणी में आता है। HPPD पर काम करने वाले खरपतवारनाशक पहले से बाजार में मौजूद हैं, लेकिन इप्ट्रियाजोपाइरिड की रासायनिक संरचना इन मौजूदा उत्पादों से अलग बताई गई है।
यही इसकी प्रमुख विशेषता मानी जा रही है। इसे एजोल कार्बोक्सामाइड संरचना पर आधारित HPPD अवरोधक के रूप में विकसित किया गया है। यानी इसका लक्ष्य नया नहीं है, लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया गया रासायनिक ढांचा अलग है।
सांवा जैसे खरपतवार पर असर का दावा
इप्ट्रियाजोपाइरिड पर प्रकाशित शोध में इसके खरपतवार नियंत्रण प्रभाव के सकारात्मक परिणाम बताए गए हैं। विशेष रूप से बार्नयार्ड ग्रास यानी सांवा जैसी घास प्रजातियों पर इसके प्रभाव का अध्ययन किया गया है।
शोध में पाया गया कि इप्ट्रियाजोपाइरिड कम मात्रा में भी HPPD एंजाइम की गतिविधि को रोक सकता है। परीक्षणों में बार्नयार्ड ग्रास में पत्तियों के पीले पड़ने यानी क्लोरोसिस का प्रभाव पैदा करने के लिए आवश्यक मात्रा मेसोट्रियोन की तुलना में करीब दसवां हिस्सा बताई गई।
हालांकि, किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि प्रयोगशाला या शोध के परिणाम सीधे खेत में उपयोग की मंजूरी के बराबर नहीं होते। किसी भी नए खरपतवारनाशक का वास्तविक इस्तेमाल संबंधित देश में नियामकीय मंजूरी, फसल-पंजीकरण और लेबल पर दिए निर्देशों के अनुसार ही किया जा सकता है।
धान की फसल को सुरक्षित रखने की क्षमता
किसानों के लिए किसी खरपतवारनाशक की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह खरपतवार को कितना नियंत्रित करता है। यह भी उतना ही जरूरी है कि वह मुख्य फसल को नुकसान न पहुंचाए।
इप्ट्रियाजोपाइरिड के मामले में शोधकर्ताओं ने धान के प्रति अच्छी चयनात्मकता देखी है। इसके पीछे पौधों में रसायन के मेटाबोलाइज होने की अलग-अलग क्षमता को एक महत्वपूर्ण कारण माना गया है।
उपलब्ध शोध के अनुसार, धान का पौधा इप्ट्रियाजोपाइरिड को अपेक्षाकृत तेजी से मेटाबोलाइज कर सकता है, जबकि बार्नयार्ड ग्रास में ऐसा प्रभाव कम देखा गया। इसी अंतर से खरपतवार पर प्रभाव और धान की फसल की सुरक्षा के बीच संतुलन बनने की संभावना बताई गई है।
DSR खेती में हो सकता है उपयोगी
भारत में डायरेक्ट सीडेड राइस यानी DSR पद्धति का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इस पद्धति में धान की पौध तैयार करके खेत में रोपाई करने के बजाय सीधे खेत में बीज बोया जाता है।
DSR खेती में खरपतवार नियंत्रण एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि धान और खरपतवार कई बार एक ही समय के आसपास खेत में उगते हैं। ऐसे में शुरुआती अवस्था में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण जरूरी हो जाता है।
इप्ट्रियाजोपाइरिड को धान में फोलियर यानी पत्तियों पर छिड़काव के लिए विकसित किया जा रहा है। यही विशेषता इसे DSR जैसी खेती प्रणालियों के लिए संभावित रूप से महत्वपूर्ण बना सकती है।
हालांकि, भारत में किसान इसका इस्तेमाल तभी कर सकेंगे जब संबंधित उत्पाद को भारतीय नियामकीय प्रक्रिया के तहत मंजूरी और फसल के लिए पंजीकरण प्राप्त होगा।
भारत में 2021 से चल रही है तैयारी
इप्ट्रियाजोपाइरिड की भारत से जुड़ी कहानी भी नई नहीं है। इसके शुरुआती कोड NC-656 के नाम से 2021 में भारत में इसके परीक्षण और पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रिया शुरू हुई थी।
इंसेक्टिसाइड्स इंडिया लिमिटेड ने NC656 टेक्निकल और इसके विभिन्न फॉर्मूलेशन के लिए आवेदन किए थे। शुरुआती आवेदन में कुछ जानकारी अधूरी होने के कारण समस्या आई थी। बाद में अतिरिक्त जानकारी दिए जाने के बाद नमूने के आयात से संबंधित आवेदन को मंजूरी मिली।
इससे संकेत मिलता है कि भारत में इस रसायन के परीक्षण और संभावित बाजार प्रवेश की तैयारी कई वर्षों से चल रही है।
2027 में भारत में लॉन्च की तैयारी
इप्ट्रियाजोपाइरिड को लेकर सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में भारत में उत्पादन क्षमता विकसित करने की योजना भी शामिल है। निसान केमिकल ने 2026 में भारत में इस उत्पाद के लिए एक समर्पित उत्पादन सुविधा विकसित करने की योजना की घोषणा की है।
यह सुविधा कंपनी की भारतीय इकाई निसान भारत रसायन प्राइवेट लिमिटेड में विकसित की जानी है और इसे वित्त वर्ष 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है।
कंपनी की योजना के अनुसार, इप्ट्रियाजोपाइरिड आधारित उत्पाद को जापान और भारत में 2027 में लॉन्च किया जा सकता है। इसके बाद दूसरे बाजारों में विस्तार की योजना है।
किसानों के लिए अभी क्या मतलब?
भारतीय किसानों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इप्ट्रियाजोपाइरिड अभी एक विकसित हो रहा नया खरपतवारनाशक है। इसके बारे में शोध और विभिन्न देशों में नियामकीय प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
इसलिए किसान अभी केवल इस खबर के आधार पर किसी अनधिकृत उत्पाद का इस्तेमाल न करें। नए खरपतवारनाशक का प्रयोग हमेशा कृषि विभाग या अधिकृत कृषि विशेषज्ञ की सलाह और उत्पाद के आधिकारिक लेबल के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
अगर भारत में इसे धान के लिए मंजूरी मिलती है और खेतों में इसके परिणाम शोध के अनुरूप रहते हैं, तो यह खासकर प्रतिरोधी घास खरपतवारों से परेशान किसानों के लिए एक नया विकल्प बन सकता है।
कुल मिलाकर, इप्ट्रियाजोपाइरिड की कहानी शोध से निकलकर व्यावसायिक स्तर की ओर बढ़ रही है। अमेरिका में EPA की समीक्षा, भारत में उत्पादन की तैयारी और 2027 में संभावित लॉन्च इसे भारतीय धान किसानों के लिए आने वाले वर्षों का महत्वपूर्ण कृषि रसायन बना सकते हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक उपयोगिता का फैसला भारतीय खेतों में होने वाले परीक्षण, नियामकीय मंजूरी और किसानों के बीच इसके प्रदर्शन से ही होगा।

