गुजरात में Kapas ki kheti करने वाले किसानों के लिए नई आर्थिक सहायता शुरू की गई है। Mission for Cotton Productivity के अंतर्गत आधुनिक तकनीक से कपास की खेती अपनाने वाले पात्र किसानों को प्रति हेक्टेयर अधिकतम ₹14,000 तक इनपुट सहायता मिल सकती है। यह सामान्य नकद योजना नहीं है, जिसमें कपास बोने वाले प्रत्येक किसान के खाते में एक समान राशि भेजी जाए। Kapas ki kheti के लिए मिलने वाली सहायता आधुनिक कृषि तकनीक, पौधों की निर्धारित दूरी, स्वीकृत क्षेत्र, दस्तावेजों की जांच और खेत के सत्यापन के आधार पर दी जाएगी।
क्लोजर स्पेसिंग तकनीक से कपास की खेती करने वाले किसान ₹14,000 प्रति हेक्टेयर तक सहायता प्राप्त कर सकते हैं। वहीं निर्धारित दूरी के साथ एकीकृत फसल प्रबंधन अपनाने वाले किसानों के लिए ₹7,500 प्रति हेक्टेयर तक सहायता का प्रावधान बताया गया है।
₹14,000 सहायता की खबर का सही मतलब क्या है?
₹14,000 की राशि गुजरात में Kapas ki kheti करने वाले प्रत्येक किसान को बिना किसी शर्त के नहीं मिलेगी। यह प्रति हेक्टेयर दी जाने वाली अधिकतम इनपुट सहायता है, जिसके लिए किसान को सरकार द्वारा निर्धारित खेती पद्धति अपनानी होगी। जो किसान 90 सेंटीमीटर गुणा 30 सेंटीमीटर की दूरी पर कपास लगाकर क्लोजर स्पेसिंग तकनीक से Kapas ki kheti करेंगे, वे ₹14,000 प्रति हेक्टेयर तक सहायता के पात्र हो सकते हैं। वहीं 90 सेंटीमीटर गुणा 60 सेंटीमीटर की दूरी पर बुवाई के साथ Integrated Crop Management अपनाकर कपास की खेती करने वाले किसानों को अधिकतम ₹7,500 प्रति हेक्टेयर सहायता मिल सकती है। अंतिम भुगतान कृषि विभाग की जांच, सत्यापन और स्वीकृति पर निर्भर करेगा।
कपास उत्पादकता मिशन क्यों शुरू किया गया?
भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन कई क्षेत्रों में Kapas ki kheti से प्रति हेक्टेयर मिलने वाली उत्पादकता अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ पाई है। खेती की बढ़ती लागत, कीटों का प्रकोप, पौधों की असमान संख्या, कपास की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएं और बदलते मौसम का असर किसानों की आमदनी को प्रभावित कर रहा है।
इन चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने Mission for Cotton Productivity को मंजूरी दी है। इस मिशन का उद्देश्य Kapas ki kheti को अधिक आधुनिक, टिकाऊ और लाभकारी बनाना है। इसके लिए ₹5,659.22 करोड़ का कुल परिव्यय निर्धारित किया गया है और इसे वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक लागू किया जाना है। मिशन के अंतर्गत बेहतर बीज, आधुनिक खेती तकनीक, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, ट्रेसबिलिटी, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और किसानों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर इसका लक्ष्य कपास उत्पादन को वर्ष 2030-31 तक 498 लाख गांठ तक पहुंचाना है।
गुजरात को मिशन में क्यों दी गई प्राथमिकता?
गुजरात देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य के सौराष्ट्र, कच्छ, उत्तर गुजरात और मध्य गुजरात के कई जिलों में बड़ी संख्या में किसान Kapas ki kheti पर निर्भर हैं। इसलिए मिशन के कार्यान्वयन में गुजरात को विशेष प्राथमिकता दी गई है। मिशन के अंतर्गत गुजरात के लिए ₹134.80 करोड़ आवंटित किए जाने की जानकारी सामने आई है। राज्य के 21 कपास उत्पादक जिलों में एक लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को आधुनिक कपास की खेती और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन तकनीकों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। यह सहायता केवल किसानों की कृषि लागत कम करने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य प्रति हेक्टेयर पौधों की उचित संख्या बनाए रखना, कपास की गुणवत्ता सुधारना, उत्पादन बढ़ाना और किसानों को वैज्ञानिक कपास की खेती से जोड़ना भी है।
किस तकनीक पर मिलेंगे ₹14,000 प्रति हेक्टेयर?
अधिकतम ₹14,000 प्रति हेक्टेयर सहायता पाने के लिए किसान को क्लोजर स्पेसिंग तकनीक से कपास की खेती करनी होगी। इस पद्धति में कपास की कतारों के बीच लगभग 90 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे के बीच 30 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है।
कम दूरी पर बुवाई करने से प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या बढ़ जाती है। सही किस्म, उचित बीज दर और समय पर फसल प्रबंधन के साथ यह तकनीक उपलब्ध भूमि, धूप, नमी और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग करने में मदद कर सकती है। इससे कपास की खेती को अधिक व्यवस्थित बनाने और प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने की संभावना रहती है। हालांकि केवल अधिक पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। घनी बुवाई में पोषण, सिंचाई, जल निकासी, खरपतवार, रोग और कीट प्रबंधन पर अधिक ध्यान देना पड़ता है। पौधों की दूरी गलत होने या खेत में निर्धारित तकनीक का पालन न मिलने पर सहायता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण योजना में खेत के निरीक्षण और तकनीकी सत्यापन को महत्वपूर्ण माना गया है।
₹7,500 सहायता वाली ICM पद्धति कैसे अलग है?
Integrated Crop Management यानी ICM एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें कपास की खेती के सभी चरणों का समन्वित तरीके से प्रबंधन किया जाता है। इसमें बीज और किस्म का चयन, खेत की तैयारी, संतुलित उर्वरक, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, रोग-कीट निगरानी, चुनाई और फसल अवशेष प्रबंधन शामिल हैं।
इस श्रेणी में 90 सेंटीमीटर गुणा 60 सेंटीमीटर की दूरी पर कपास बोने वाले पात्र किसानों को ₹7,500 प्रति हेक्टेयर तक सहायता मिल सकती है। किसान को केवल निर्धारित दूरी पर बुवाई ही नहीं करनी होगी, बल्कि फसल की जरूरत के अनुसार पोषण, पानी और कीट नियंत्रण के उपाय भी अपनाने होंगे। ICM पद्धति का मुख्य उद्देश्य अनावश्यक रसायनों के उपयोग को कम करना और सही समय पर जरूरत के अनुसार कृषि उपाय अपनाना है। इससे कपास की खेती की लागत नियंत्रित करने, फसल को स्वस्थ रखने, पर्यावरण पर दबाव कम करने और कपास की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल सकती है।
दो हेक्टेयर पर कितनी सहायता मिल सकती है?
योजना के उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार एक किसान को अधिकतम दो हेक्टेयर क्षेत्र तक सहायता दी जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि किसान के पास इससे अधिक भूमि होने पर भी आर्थिक सहायता केवल योजना में स्वीकृत क्षेत्र के आधार पर ही तय की जाएगी।
क्लोजर स्पेसिंग तकनीक से कपास की खेती करने वाले किसान को अधिकतम ₹14,000 प्रति हेक्टेयर तक सहायता मिल सकती है। इस हिसाब से दो हेक्टेयर क्षेत्र के लिए कुल सहायता ₹28,000 तक बन सकती है। वहीं Integrated Crop Management यानी ICM पद्धति अपनाने पर ₹7,500 प्रति हेक्टेयर की दर से दो हेक्टेयर पर अधिकतम ₹15,000 तक सहायता मिल सकती है। हालांकि यह केवल अधिकतम राशि की गणना है। किसान को वास्तविक भुगतान स्वीकृत भूमि क्षेत्र, निर्धारित तकनीक के पालन, उपलब्ध बजट, जिले के लक्ष्य और कृषि विभाग द्वारा किए गए सत्यापन के आधार पर मिलेगा। इसलिए आवेदन करने के बाद पूरी राशि मिलने की गारंटी नहीं मानी जानी चाहिए।
कौन से किसान आवेदन के पात्र हो सकते हैं?
यह सहायता मुख्य रूप से गुजरात में कपास की खेती करने वाले किसानों के लिए उपलब्ध है। आवेदन करने वाले किसान के पास संबंधित कृषि भूमि का वैध रिकॉर्ड होना चाहिए और जिस खेत के लिए सहायता मांगी जा रही है, वहां वास्तव में कपास की फसल बोई गई होनी चाहिए।
किसान को योजना के तहत निर्धारित पौध दूरी, बीज से जुड़ी शर्तों और अनुशंसित खेती तकनीक का पालन करना होगा। भूमि रिकॉर्ड, आधार कार्ड, बैंक खाता और आवेदन फॉर्म में दर्ज किसान का नाम एक समान होना जरूरी है। इन जानकारियों में अंतर होने पर आवेदन की जांच, स्वीकृति या भुगतान प्रक्रिया में देरी हो सकती है। Kapas ki kheti के लिए सरकार द्वारा मान्य किस्म या प्रमाणित Bt कपास बीज का उपयोग जरूरी हो सकता है। किसान को बीज खरीद की रसीद, पैकेट पर लगा प्रमाणित टैग और अन्य संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए, क्योंकि खेत के निरीक्षण या दस्तावेज सत्यापन के दौरान इन्हें मांगा जा सकता है।
पात्रता की शर्तें जिले, किसान वर्ग, उपलब्ध लक्ष्य और योजना के दिशा-निर्देशों के आधार पर अलग हो सकती हैं। इसलिए आवेदन करने से पहले आधिकारिक i-Khedut Portal या नजदीकी कृषि कार्यालय से नवीनतम पात्रता नियम, आवेदन की अंतिम तिथि और जरूरी दस्तावेजों की सूची जरूर जांच लें।
आवेदन से पहले तैयार रखें ये दस्तावेज
आवेदन करते समय किसान को अपनी पहचान, भूमि और बैंक खाते से जुड़ी जानकारी देनी होगी। दस्तावेज साफ, वर्तमान और पढ़ने योग्य होने चाहिए। आमतौर पर आधार कार्ड, 7/12 और 8-A भूमि रिकॉर्ड, बैंक पासबुक, मोबाइल नंबर तथा कपास के क्षेत्र का विवरण मांगा जा सकता है। संयुक्त भूमि होने पर अन्य खातेदारों की सहमति भी जरूरी हो सकती है। प्रमाणित बीज की खरीद रसीद, बीज पैकेट का टैग, किसान पंजीकरण संख्या और पासपोर्ट आकार का फोटो भी तैयार रखा जा सकता है। आरक्षित श्रेणी के आवेदक से संबंधित प्रमाणपत्र मांगा जा सकता है। दस्तावेजों की अंतिम सूची पोर्टल पर उपलब्ध आवेदन फॉर्म से ही सुनिश्चित करें। किसी गैर-आधिकारिक सूची को अंतिम मानकर आवेदन न करें।
i-Khedut Portal से आवेदन करने की प्रक्रिया
गुजरात के पात्र किसान i-Khedut Portal पर उपलब्ध कृषि योजनाओं के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। योजना के लिए आवेदन 10 जुलाई 2026 से स्वीकार किए जाने की सूचना दी गई है। सबसे पहले आधिकारिक i-Khedut Portal खोलें और कृषि योजनाओं का विकल्प चुनें। इसके बाद Cotton Productivity Mission या कपास से संबंधित इनपुट सहायता योजना खोजें। नया आवेदन खोलकर किसान का नाम, आधार विवरण, मोबाइल नंबर और बैंक खाते की जानकारी भरें। इसके बाद जिला, तालुका, गांव, सर्वे नंबर और कपास के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र दर्ज करें। किसान वही खेती तकनीक चुने जिसे वह खेत में वास्तव में अपना रहा है। क्लोजर स्पेसिंग अपनाए बिना ₹14,000 वाली श्रेणी चुनने पर सत्यापन के दौरान आवेदन अस्वीकृत हो सकता है। जरूरी दस्तावेज अपलोड करने के बाद पूरा फॉर्म दोबारा जांचें। आवेदन जमा होने पर प्राप्त रसीद या आवेदन संख्या डाउनलोड करके सुरक्षित रखें।
ऑनलाइन आवेदन में परेशानी हो तो क्या करें?
जिन किसानों को स्वयं ऑनलाइन आवेदन करने में समस्या आती है, वे नजदीकी ई-ग्राम केंद्र या अधिकृत सरकारी सहायता केंद्र की मदद ले सकते हैं। आवेदन के दौरान अपना मोबाइल नंबर किसान के पास रहना चाहिए, क्योंकि सत्यापन या आवेदन संबंधी संदेश उसी नंबर पर आ सकते हैं। बैंक खाता संख्या और IFSC कोड भरते समय विशेष सावधानी बरतें। किसी अनजान एजेंट को योजना की स्वीकृति दिलाने के नाम पर भुगतान न करें। सरकारी सहायता का आवेदन केवल आधिकारिक पोर्टल या अधिकृत केंद्र के माध्यम से करें।
फॉर्म जमा होने के बाद खेत की जांच क्यों जरूरी है?
ऑनलाइन आवेदन जमा होना सहायता मिलने की गारंटी नहीं है। कृषि विभाग पहले किसान के दस्तावेज, भूमि रिकॉर्ड और कपास के क्षेत्र की जांच कर सकता है। जरूरत पड़ने पर विभागीय अधिकारी खेत का भौतिक निरीक्षण भी कर सकते हैं। निरीक्षण में फसल, पौध दूरी, बीज, स्वीकृत क्षेत्र और अपनाई गई तकनीक देखी जा सकती है। क्लोजर स्पेसिंग के लिए आवेदन करने वाले किसान के खेत में 90 गुणा 30 सेंटीमीटर की निर्धारित दूरी नहीं मिलने पर ₹14,000 सहायता स्वीकृत नहीं हो सकती। सत्यापन और प्रशासनिक मंजूरी पूरी होने के बाद राशि पात्र किसान के पंजीकृत बैंक खाते में DBT के माध्यम से भेजी जा सकती है।
क्लोजर स्पेसिंग अपनाने से पहले मिट्टी और किस्म को समझें
कम दूरी पर अधिक पौधे लगाना हर खेत और हर कपास किस्म के लिए समान परिणाम नहीं देता। मिट्टी की उर्वरता, वर्षा, सिंचाई सुविधा और किस्म की बढ़वार का स्वभाव महत्वपूर्ण होता है। हुत अधिक फैलने वाली कपास किस्म को घनी दूरी पर लगाने से पौधों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इससे हवा का आवागमन कम होने और रोगों का खतरा बढ़ने की आशंका रहती है। किसान बुवाई से पहले स्थानीय कृषि अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र से अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म और बीज दर की जानकारी लें। केवल सहायता राशि देखकर पौध दूरी बदलना उचित नहीं होगा।
अधिक पौध संख्या में पोषण कैसे संभालें?
घनी बुवाई में पौधों की संख्या अधिक होने के कारण पोषक तत्वों की मांग बदल सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसान बिना जांच के यूरिया या दूसरे उर्वरकों की मात्रा बढ़ा दें। मिट्टी जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित प्रयोग बेहतर रहता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दिखाई देने पर पहले उसके वास्तविक कारण की पहचान करनी चाहिए। अधिक नाइट्रोजन से पौधे अनावश्यक रूप से लंबे और घने हो सकते हैं। इससे फूल तथा टिंडे बनने की प्रक्रिया प्रभावित होने के साथ कीट प्रबंधन कठिन हो सकता है।
जलभराव से बचाना क्यों होगा जरूरी?
कपास की जड़ें लंबे समय तक पानी जमा रहने पर प्रभावित हो सकती हैं। मानसून में खेत में जल निकासी नहीं होने से पौधे पीले पड़ सकते हैं और जड़ों की सक्रियता कम हो सकती है। क्लोजर स्पेसिंग वाले खेत में पौधे अधिक होने से नमी और हवा का संतुलन बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। बुवाई से पहले नालियां और जल निकासी का रास्ता तैयार करना उपयोगी रहेगा। बारिश के तुरंत बाद खेत में जाने से मिट्टी दब सकती है। किसान मिट्टी की स्थिति सामान्य होने के बाद ही निराई, खाद या दूसरे कृषि कार्य करें।
गुलाबी सुंडी की निगरानी को योजना से जोड़कर देखें
गुलाबी सुंडी कपास की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में शामिल है। इसके नियंत्रण के लिए केवल बार-बार कीटनाशक छिड़कना प्रभावी रणनीति नहीं माना जा सकता। किसान फेरोमोन ट्रैप लगाकर वयस्क कीटों की गतिविधि पर नजर रख सकते हैं। फूलों और टिंडों का नियमित निरीक्षण करने से संक्रमण की शुरुआती पहचान में मदद मिलती है। कीटनाशक का चयन स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और कीट की वास्तविक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। एक ही रसायन का बार-बार प्रयोग करने से कीट में प्रतिरोध विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। फसल की अंतिम चुनाई के बाद खेत में संक्रमित टिंडे और पुराने पौधे लंबे समय तक छोड़ना अगले मौसम में समस्या बढ़ा सकता है।
योजना से किसानों को वास्तविक लाभ कैसे मिलेगा?
Kapas ki kheti करने वाले किसानों के लिए यह योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक खेती अपनाने का अवसर भी देती है। सरकारी सहायता पूरी उत्पादन लागत नहीं उठाएगी, लेकिन बीज, संतुलित पोषण, खरपतवार नियंत्रण और शुरुआती कृषि कार्यों पर होने वाले खर्च का कुछ हिस्सा कम करने में मदद कर सकती है। यदि किसान Kapas ki kheti में अनुशंसित पौध दूरी, गुणवत्तापूर्ण बीज और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाते हैं, तो खेत में पौधों का विकास अधिक संतुलित हो सकता है। इससे उपलब्ध भूमि, धूप, पानी और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग संभव होता है, जो बेहतर उत्पादन और गुणवत्ता में सहायक बन सकता है।
योजना के तहत आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम Kapas ki kheti से जुड़े किसानों को बीज चयन, पोषक तत्व प्रबंधन, सिंचाई तकनीक, कीट एवं रोग नियंत्रण जैसी आधुनिक जानकारी प्रदान कर सकते हैं। इन तकनीकों का लाभ किसानों को भविष्य की फसलों में भी मिलता है और खेती अधिक लाभदायक बन सकती है। राष्ट्रीय कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन के तहत Kapas ki kheti में गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी और टिकाऊ उत्पादन प्रणाली पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य भारतीय कपास की गुणवत्ता सुधारना और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धा को मजबूत बनाना है।
इन गलतियों से रुक सकती है सहायता
Kapas ki kheti के लिए आवेदन करते समय भूमि का गलत क्षेत्र दर्ज करना सबसे बड़ी गलतियों में से एक है। किसान केवल उसी खेत और वास्तविक रकबे की जानकारी दें, जहां वास्तव में कपास की बुवाई की गई हो।
यदि आधार कार्ड, बैंक खाते और भूमि रिकॉर्ड में नाम या अन्य व्यक्तिगत विवरण अलग-अलग हैं, तो सत्यापन प्रक्रिया में परेशानी आ सकती है। इसलिए आवेदन करने से पहले सभी दस्तावेजों की जानकारी का मिलान अवश्य कर लें। गलत बैंक खाता संख्या या IFSC कोड दर्ज होने पर सहायता राशि मिलने में देरी हो सकती है। Kapas ki kheti से जुड़ी इस योजना के लिए आवेदन भरते समय बैंक पासबुक देखकर ही सही जानकारी दर्ज करें और किसी भी विवरण का अनुमान न लगाएं। इसके अलावा, अस्पष्ट दस्तावेज अपलोड करना, आवेदन अधूरा छोड़ना, गलत खेती तकनीक का चयन करना या Kapas ki kheti में निर्धारित पौध दूरी और वैज्ञानिक मानकों का पालन न करना भी आवेदन अस्वीकृत होने का कारण बन सकता है। इसलिए आवेदन करने से पहले सभी दिशा-निर्देशों को ध्यान से पढ़ें और आवश्यक शर्तों का पालन करें।
दूसरे राज्यों के किसान क्या करें?
Mission for Cotton Productivity राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम है, लेकिन ₹14,000 प्रति हेक्टेयर की यहां बताई गई सहायता गुजरात के कार्यान्वयन से संबंधित है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना या दूसरे कपास उत्पादक राज्यों में सहायता राशि और आवेदन की शर्तें अलग हो सकती हैं। दूसरे राज्यों के किसानों को अपने राज्य के कृषि विभाग, किसान पोर्टल या जिला कृषि कार्यालय से स्थानीय कार्यक्रम की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या प्रत्येक कपास किसान को ₹14,000 मिलेंगे?
नहीं। यह अधिकतम प्रति हेक्टेयर सहायता है। इसके लिए पात्र किसान को निर्धारित क्लोजर स्पेसिंग तकनीक अपनानी और विभागीय सत्यापन पूरा करना होगा।
2. ₹14,000 के लिए पौधों की दूरी कितनी रखनी होगी?
क्लोजर स्पेसिंग श्रेणी में कतार से कतार की दूरी 90 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाएगी।
3. ICM अपनाने पर कितनी सहायता मिलेगी?
90 सेंटीमीटर गुणा 60 सेंटीमीटर की दूरी के साथ Integrated Crop Management अपनाने वाले पात्र किसान को ₹7,500 प्रति हेक्टेयर तक सहायता मिल सकती है।
4. अधिकतम कितनी भूमि पर लाभ दिया जाएगा?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक किसान को एक वर्ष में अधिकतम दो हेक्टेयर क्षेत्र तक योजना का लाभ मिल सकता है।
5. क्या दो हेक्टेयर पर ₹28,000 मिल सकते हैं?
क्लोजर स्पेसिंग श्रेणी में अधिकतम दर के अनुसार दो हेक्टेयर पर सहायता ₹28,000 तक बन सकती है। वास्तविक भुगतान स्वीकृत क्षेत्र और सत्यापन पर निर्भर करेगा।
6. आवेदन कहां किया जा सकता है?
गुजरात के पात्र किसान i-Khedut Portal के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
7. क्या आवेदन जमा होते ही पैसा मिल जाएगा?
नहीं। आवेदन के बाद भूमि रिकॉर्ड, फसल क्षेत्र और खेती की तकनीक की जांच की जा सकती है। मंजूरी मिलने के बाद ही भुगतान आगे बढ़ेगा।
निष्कर्ष
Mission for Cotton Productivity के तहत गुजरात में Kapas ki kheti करने वाले किसानों को क्लोजर स्पेसिंग पर ₹14,000 और ICM पद्धति पर ₹7,500 प्रति हेक्टेयर तक सहायता मिल सकती है। योजना का लाभ तभी बेहतर होगा, जब किसान Kapas ki kheti में सही बीज, संतुलित पोषण, जल निकासी, कीट निगरानी और समय पर प्रबंधन अपनाएं। आवेदन से पहले पात्रता, अंतिम तारीख और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी i-Khedut Portal या स्थानीय कृषि विभाग से जरूर जांच लें।

