पुलवामा जिले का पंपोर इलाका, जिसे भारत की केसर राजधानी कहा जाता है, इस संकट का प्रमुख उदाहरण बन गया है। जिन खेतों में कभी शरद ऋतु के दौरान बैंगनी फूलों की चादर दिखाई देती थी, वहां अब कई जगह मकान, सड़कें और व्यावसायिक इमारतें दिखाई देने लगी हैं।
6 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ अधूरी सिंचाई सुविधाएं भी केसर उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। किसानों की चिंता केवल कम पैदावार तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पारंपरिक खेती को बचाए रखने की भी है।
1. कश्मीर में केसर की खेती क्यों है इतनी खास?
केसर का वैज्ञानिक नाम Crocus sativus है। यह एक बहुमूल्य मसाला फसल है, जिसके फूलों के भीतर मौजूद लाल रंग के तीन वर्तिकाग्रों (Stigmas) को सावधानी से अलग करके सुखाया जाता है। यही सूखे लाल रेशे बाजार में केसर के रूप में बिकते हैं।
कश्मीर में केसर की खेती मुख्य रूप से पुलवामा के पंपोर तथा बडगाम, श्रीनगर और किश्तवाड़ के कुछ क्षेत्रों में की जाती है।
यहां की विशेष करेवा (Karewa) मिट्टी, ठंडी जलवायु और पारंपरिक खेती की तकनीक केसर की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
केसर की खेती से किसानों को अच्छी आमदनी की संभावना रहती है, लेकिन इसके लिए पर्याप्त मेहनत, उपयुक्त मौसम और बेहतर प्रबंधन जरूरी है। फूलों की तुड़ाई से लेकर लाल रेशों को अलग करने तक अधिकतर काम हाथों से होता है।
2. Climate Change बना केसर उत्पादन का सबसे बड़ा दुश्मन
कश्मीर में केसर की खेती के सामने सबसे गंभीर चुनौती Climate Change (जलवायु परिवर्तन) है।केसर की फसल को विकास के अलग-अलग चरणों में उपयुक्त तापमान और मिट्टी की नमी चाहिए। विशेष रूप से फूल आने से पहले की परिस्थितियां उत्पादन को प्रभावित करती हैं।पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर में बारिश का अनियमित वितरण, कम बर्फबारी और लंबे सूखे जैसे हालात किसानों के लिए परेशानी बन रहे हैं।इससे खेतों में नमी की कमी हो जाती है और फूलों की संख्या कम हो सकती है।
जनवरी 2026 में प्रकाशित नेशनल ज्योग्राफिक की रिपोर्ट ने भी जलवायु परिवर्तन, कीटों और पर्यावरणीय बदलावों को कश्मीर की केसर खेती के लिए गंभीर चुनौती बताया था।
बदलते मौसम का फसल पर प्रभाव
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पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर फूलों का विकास प्रभावित हो सकता है।
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अनियमित तापमान से फूल आने के समय और संख्या में बदलाव हो सकता है।
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लंबे सूखे के कारण केसर के भूमिगत कंदों (Corms) की वृद्धि कमजोर पड़ सकती है।
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लगातार खराब मौसम किसानों की लागत और उत्पादन जोखिम बढ़ा सकता है।
किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि केसर की फसल में एक बार फूल आने का महत्वपूर्ण समय निकल जाए, तो उसी मौसम में नुकसान की भरपाई करना मुश्किल होता है।
3. कंक्रीट के जंगल निगल रहे केसर के खेत
केसर की खेती पर संकट सिर्फ मौसम के कारण नहीं है। तेजी से फैलता शहरीकरण (Urbanisation) भी इसके भविष्य के लिए खतरा बन गया है।पंपोर और आसपास के क्षेत्रों में कृषि भूमि का रिहायशी तथा व्यावसायिक उपयोग बढ़ने से पारंपरिक केसर क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं।
अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर में केसर की खेती का क्षेत्र 1990 के दशक के आखिर में लगभग 5,700 हेक्टेयर था, जो 2025 तक करीब 3,665 हेक्टेयर रह गया। ये अलग-अलग अवधियों के क्षेत्रीय अनुमान हैं।
यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि केसर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि आसानी से तैयार नहीं की जा सकती।जब खेतों की जगह पक्के निर्माण हो जाते हैं, तो वहां दोबारा केसर की खेती शुरू करना बेहद कठिन हो जाता है।विशेषज्ञों और किसानों की चिंता है कि यदि खेती योग्य जमीन को संरक्षित नहीं किया गया, तो भविष्य में कश्मीर की इस प्रसिद्ध फसल का उत्पादन क्षेत्र और घट सकता है।
4. Saffron Production में गिरावट, क्या कहते हैं आंकड़े?
केसर की पैदावार में गिरावट को सरकारी आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। दिसंबर 2024 में संसद में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने बताया था कि जम्मू-कश्मीर में केसर उत्पादन 2010-11 के 8 मीट्रिक टन से घटकर 2023-24 के तीसरे अग्रिम अनुमान में 2.7 मीट्रिक टन रह गया था।
हालांकि, उत्पादन के अलग-अलग सरकारी प्रकाशनों में आंकड़ों और उनके दायरे में अंतर भी मिलता है। इसलिए विभिन्न वर्षों के आंकड़ों की तुलना करते समय आंकड़ों का स्रोत और पद्धति देखना जरूरी है।
दिसंबर 2024 में संसद में प्रस्तुत अनुमान के आधार पर
स्रोत: लोकसभा में कृषि मंत्रालय का उत्तर, 17 दिसंबर 2024। 2023-24 का आंकड़ा तीसरा अग्रिम अनुमान है। उत्पादन में ऐसी गिरावट से किसानों की आमदनी प्रभावित होती है। खासकर उन परिवारों के लिए समस्या बढ़ जाती है, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा केसर की खेती पर निर्भर है।
5. National Saffron Mission: करोड़ों रुपये खर्च, फिर भी अधूरी सिंचाई व्यवस्था
कश्मीर में केसर की खेती को बचाने और उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने वर्ष 2010 में National Saffron Mission (NSM) शुरू किया था।इस मिशन के लिए शुरुआती तौर पर लगभग 371.18 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था।
योजना का मुख्य उद्देश्य आधुनिक सिंचाई व्यवस्था विकसित करना, बेहतर रोपण सामग्री उपलब्ध कराना, पुराने खेतों का पुनरुद्धार करना और किसानों को नई कृषि तकनीकों से जोड़ना था। लेकिन 6 नवंबर 2026 की रिपोर्ट में योजना के क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित 126 बोरवेल में से 101 बनने और केवल 8 से 10 स्प्रिंकलर चालू होने की बात सामने आई है। ये रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े हैं, स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम सरकारी स्थिति नहीं।
किसानों का कहना है कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी समय पर उपलब्ध नहीं होने से फसल प्रभावित होती है।इसलिए जरूरी है कि सरकार केवल नई योजनाओं की घोषणा न करे, बल्कि पहले से तैयार सिंचाई ढांचे को पूरी क्षमता से चालू कराए।
6. किसानों की कमाई और रोजगार पर भी मंडराया संकट
केसर की खेती कश्मीर के हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है।इस व्यवसाय में खेती करने वाले किसानों के अलावा फूल तोड़ने वाले श्रमिक, केसर के रेशे अलग करने वाली महिलाएं, प्रसंस्करण करने वाले लोग और स्थानीय व्यापारी भी शामिल हैं।जब केसर की पैदावार घटती है, तो इसका सीधा प्रभाव इन सभी पर पड़ता है।कम उत्पादन के कारण किसानों की प्रति किलो लागत बढ़ सकती है। वहीं, बाजार में कीमत अधिक होने के बावजूद जरूरी नहीं कि किसान का मुनाफा भी बढ़े।
जुलाई 2026 की एक रिपोर्ट में विशेष रूप से बताया गया कि केसर अर्थव्यवस्था में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है और खेती में गिरावट से उनकी आजीविका भी प्रभावित हो रही है।
7. Saffron Farming को बचाने के लिए किसान क्या करें?
कश्मीर में केसर की खेती को बचाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों और पारंपरिक अनुभव का सही मेल जरूरी है।मिट्टी की नमी का संरक्षण: केसर की खेती में मिट्टी की नमी बनाए रखना महत्वपूर्ण है। किसानों को मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के आधार पर खेत का प्रबंधन करना चाहिए। वैज्ञानिक सिंचाई: जहां पर्याप्त सुविधा उपलब्ध हो, वहां जरूरत के अनुसार Sprinkler Irrigation अपनाई जा सकती है। हालांकि, केसर के कंदों के आसपास अत्यधिक पानी जमा होने से नुकसान हो सकता है।
स्वस्थ कंदों का चयन: केसर बीज के बजाय मुख्य रूप से कंदों से उगाया जाता है। इसलिए स्वस्थ, रोगमुक्त और उपयुक्त आकार के कंदों का इस्तेमाल करना चाहिए।खेतों में जल निकासी: लगातार जलभराव से कंद सड़ने की आशंका रहती है। खेत में पानी निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।मिट्टी की जांच: Soil Testing के माध्यम से पोषक तत्वों की स्थिति जानकर संतुलित खाद और उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।
प्रशिक्षण और सामूहिक प्रयास: किसान कृषि विज्ञान केंद्र, स्थानीय कृषि विभाग और केसर अनुसंधान संस्थानों के संपर्क में रहकर नई तकनीकों की जानकारी ले सकते हैं।
8. Indoor Saffron Farming क्या बन सकती है नई उम्मीद?
जलवायु परिवर्तन के कारण कश्मीर में Indoor Saffron Farming पर भी प्रयोग किए जा रहे हैं।इस तकनीक में नियंत्रित वातावरण के भीतर तापमान, नमी और अन्य जरूरी परिस्थितियों का प्रबंधन करके केसर के फूल प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।जनवरी 2025 में Reuters ने बताया था कि शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता नियंत्रित वातावरण में केसर उत्पादन की तकनीकों पर काम कर रहे हैं। कुछ किसानों ने भी प्रयोग के तौर पर इसे अपनाया है।हालांकि, Indoor Farming को पारंपरिक खेती का पूरी तरह विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी।
इसमें उपकरण, ऊर्जा, तकनीकी जानकारी और अच्छी गुणवत्ता वाले कंदों की आवश्यकता होती है। किसानों को बड़े निवेश से पहले कृषि विशेषज्ञों से तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता की जांच करानी चाहिए।
9. GI Tag से केसर किसानों को कैसे मिल सकता है फायदा?
कश्मीरी केसर को वर्ष 2020 में Geographical Indication (GI) Tag मिला था।GI Tag इसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान और प्रमाणिकता को स्थापित करने में मदद करता है।यदि किसान गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, उचित सुखाने की तकनीक, प्रमाणित पैकिंग और बेहतर बाजार व्यवस्था अपनाएं, तो उन्हें अपनी उपज का अच्छा मूल्य मिलने की संभावना बढ़ सकती है।किसानों के लिए Farmer Producer Organisation (FPO) और सामूहिक विपणन भी उपयोगी हो सकता है।इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और खरीदारों तक सीधे पहुंच बनाने में सहायता मिल सकती है।
10. सरकार को किन कदमों पर ध्यान देना चाहिए?
कश्मीर के केसर उत्पादन को बचाने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है। सबसे पहले केसर की खेती वाली जमीन को अनियंत्रित निर्माण से बचाना होगा। इसके साथ मौजूदा सिंचाई परियोजनाओं की समीक्षा, समय पर मरम्मत और किसानों तक पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
सरकार को जलवायु अनुकूल खेती (Climate-Resilient Agriculture), गुणवत्तापूर्ण कंद उत्पादन, किसान प्रशिक्षण और अनुसंधान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा केसर उत्पादकों को बेहतर बाजार, भंडारण, प्रसंस्करण और प्रमाणन सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
केसर की खेती बचाना कश्मीर की विरासत बचाना है
कश्मीर का केसर केवल एक महंगा मसाला नहीं है। यह स्थानीय किसानों की मेहनत, पारंपरिक कृषि ज्ञान और घाटी की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।आज Climate Change, पानी की कमी और बढ़ता निर्माण इसके भविष्य के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं।
यदि समय रहते केसर उत्पादक क्षेत्रों की रक्षा की जाए, वैज्ञानिक सिंचाई व्यवस्था मजबूत बनाई जाए और किसानों को उचित तकनीकी सहायता मिले, तो इस अनमोल फसल के भविष्य को सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
कश्मीर के केसर को बचाना केवल उत्पादन बढ़ाने का सवाल नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका और सदियों पुरानी कृषि विरासत को बचाने की जिम्मेदारी भी है।
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