Moong Farming: देश के कई राज्यों में किसान मूंग की खेती करते हैं। कम समय में तैयार होने वाली यह प्रमुख दलहनी फसल खरीफ के साथ कई क्षेत्रों में गर्मी यानी जायद के मौसम में भी उगाई जा सकती है। सही समय पर बुवाई, बेहतर किस्म का चुनाव और फसल का उचित प्रबंधन किया जाए तो किसान मूंग से अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए मिट्टी, सिंचाई और रोग-कीट प्रबंधन से जुड़ी कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
मूंग को फसल चक्र में शामिल करना भी किसानों के लिए उपयोगी माना जाता है। दलहनी फसल होने के कारण यह मिट्टी में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करती है। यही वजह है कि Moong Cultivation को मिट्टी की सेहत और अतिरिक्त फसल लेने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
Moong Farming के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
मूंग अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली दोमट से बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है। खेत में पानी जमा रहने की स्थिति मूंग की फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
किसानों को बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच भी करवानी चाहिए। इससे मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की जानकारी मिलती है और जरूरत के अनुसार खाद एवं उर्वरक का इस्तेमाल किया जा सकता है। मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरक देने से खेती की लागत को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है।
Moong Farmin के लिए कैसा मौसम है बेहतर?
मूंग गर्म मौसम की फसल है। इसकी अच्छी बढ़वार के लिए गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क मौसम बेहतर रहता है। खरीफ में बहुत अधिक बारिश होने पर खेत में जलभराव नहीं होने देना चाहिए। फूल और फलियां बनने के दौरान जरूरत से ज्यादा बारिश और नमी रोगों की समस्या बढ़ा सकती है। वहीं फसल पकने के समय साफ और शुष्क मौसम बेहतर रहता है।
इन राज्यों में बड़े स्तर पर होती है मूंग की खेती
देश के अलग-अलग हिस्सों में Moong Crop उगाई जाती है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और असम सहित कई राज्यों में किसान मूंग की खेती करते हैं।
अलग-अलग राज्यों की जलवायु और कृषि परिस्थितियों के कारण मूंग की किस्म और बुवाई का समय भी अलग हो सकता है। इसलिए किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र या राज्य कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित किस्म का चयन करें।
कब करें मूंग की बुवाई?
मूंग की खेती मुख्य रूप से खरीफ और ग्रीष्मकालीन मौसम में की जाती है।
खरीफ मूंग की बुवाई: कई क्षेत्रों में मानसून आने के बाद जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के दौरान मूंग की बुवाई की जाती है। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना जरूरी है, लेकिन खेत बहुत ज्यादा गीला नहीं होना चाहिए।
ग्रीष्मकालीन मूंग: सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में रबी फसलों की कटाई के बाद मार्च से अप्रैल के बीच मूंग बोई जा सकती है। गर्मी की मूंग की बुवाई समय पर करना जरूरी है, क्योंकि अधिक देरी होने पर फसल बाद में तेज गर्मी की चपेट में आ सकती है। किसानों को अपने जिले की जलवायु और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार बुवाई की तारीख तय करनी चाहिए।
अच्छे बीज से शुरू करें मूंग की खेती
मूंग की अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित और अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित बीज का चयन जरूरी है। किसान ऐसी किस्म चुनें जो स्थानीय मौसम के अनुकूल हो और प्रमुख रोगों के प्रति बेहतर सहनशीलता रखती हो।
बुवाई से पहले कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार बीज उपचार किया जा सकता है। मूंग दलहनी फसल होने के कारण उपयुक्त राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार भी फायदेमंद हो सकता है। बीज खरीदते समय किसान अधिकृत विक्रेता को प्राथमिकता दें और बीज का बिल तथा पैकेट सुरक्षित रखें।
सिंचाई का रखें खास ध्यान
खरीफ में मूंग की खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर रहती है। पर्याप्त बारिश होने पर अलग से सिंचाई की जरूरत कम पड़ सकती है। लेकिन लंबे समय तक बारिश नहीं होने और खेत में नमी कम होने पर जरूरत के अनुसार सिंचाई करें। ग्रीष्मकालीन मूंग में सिंचाई का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। खासकर फूल और फलियां बनने के समय खेत में पर्याप्त नमी रहना जरूरी है। इस बात का भी ध्यान रखें कि सिंचाई का पानी खेत में जमा न हो। अधिक पानी से पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
मूंग में इन कीटों से हो सकता है नुकसान
मूंग की फसल में सफेद मक्खी, माहू, थ्रिप्स और फलियों को नुकसान पहुंचाने वाले विभिन्न कीट दिखाई दे सकते हैं। इनमें सफेद मक्खी किसानों के लिए खास चिंता का कारण बन सकती है क्योंकि यह पीला मोजेक वायरस के प्रसार में भूमिका निभाती है।
इसलिए किसानों को फसल की नियमित निगरानी करनी चाहिए। पत्तियों के ऊपरी हिस्से के साथ नीचे की सतह को भी देखते रहें। सफेद मक्खी की निगरानी के लिए पीले चिपचिपे ट्रैप जैसे एकीकृत कीट प्रबंधन के उपाय अपनाए जा सकते हैं।
कीट लग जाए तो कौन सी दवा डालें?
किसान किसी भी कीट को देखकर तुरंत कीटनाशक का छिड़काव न करें। सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि फसल में कौन सा कीट लगा है और उसका प्रकोप कितना है। कीट का प्रकोप बढ़ने की स्थिति में किसान नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी से सलाह लें। इसके बाद मूंग और संबंधित कीट के लिए वर्तमान में पंजीकृत कीटनाशक का इस्तेमाल उसके आधिकारिक लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें। दवा की मात्रा अपने स्तर पर बढ़ाना या कई कीटनाशकों को बिना सलाह के मिलाकर छिड़कना नुकसानदायक हो सकता है।
पीला मोजेक रोग से ऐसे करें बचाव
पीला मोजेक मूंग की प्रमुख समस्याओं में शामिल है। रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर पीले और हरे रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं। गंभीर संक्रमण होने पर पौधों की बढ़वार और उपज प्रभावित हो सकती है।
किसानों को अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित रोग सहनशील किस्म चुननी चाहिए। संक्रमित पौधे दिखाई देने पर उन्हें शुरुआती अवस्था में खेत से हटाया जा सकता है। साथ ही सफेद मक्खी की निगरानी और खेत के आसपास खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी है।
मूंग की कटाई कब करें?
जब फसल की ज्यादातर फलियां पक जाएं और उनका रंग बदलने लगे तो किसान कटाई शुरू कर सकते हैं। बहुत देर से कटाई करने पर कुछ किस्मों में फलियां चटक सकती हैं, जिससे दाने खेत में गिरने और उपज कम होने का खतरा रहता है।
कटाई के बाद फसल और दानों को अच्छी तरह सुखाना चाहिए। पर्याप्त रूप से सूखने के बाद ही मूंग का सुरक्षित भंडारण करें।
क्या मूंग की खेती पर मिलती है सब्सिडी?
दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग योजनाएं चलाती हैं। इन योजनाओं के तहत कुछ राज्यों में किसानों को प्रमाणित या उन्नत बीज, कृषि आदान, फसल प्रदर्शन और तकनीकी सहायता जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। हालांकि मूंग की खेती पर मिलने वाली सहायता की राशि पूरे देश में एक समान नहीं होती। सब्सिडी और पात्रता राज्य, योजना और वित्तीय वर्ष के अनुसार बदल सकती है।
किसान मौजूदा सब्सिडी की जानकारी के लिए अपने राज्य के कृषि विभाग के आधिकारिक पोर्टल, जिला कृषि कार्यालय या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें। सोशल मीडिया या पुराने समाचारों में बताई गई सहायता राशि के आधार पर आवेदन करने से बचें।
किसानों के लिए जरूरी बात
Moong Farming से बेहतर उत्पादन लेने के लिए किसान अपने क्षेत्र के अनुसार उन्नत और प्रमाणित बीज चुनें। बुवाई सही समय पर करें और मिट्टी जांच के आधार पर खाद एवं उर्वरक दें। खरीफ में खेत से अतिरिक्त पानी निकालने की व्यवस्था रखें, जबकि ग्रीष्मकालीन मूंग में समय पर सिंचाई पर ध्यान दें।
इसके साथ ही सफेद मक्खी और पीला मोजेक जैसे रोग-कीटों की शुरुआत से निगरानी करें। समस्या बढ़ने पर बिना सलाह के कीटनाशक डालने के बजाय कृषि विशेषज्ञ की मदद लें। सही समय पर किया गया फसल प्रबंधन मूंग की पैदावार और गुणवत्ता दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
