अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप भारत का एकमात्र कोरल एटोल क्षेत्र है, जो अपनी समृद्ध समुद्री जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वभर में जाना जाता है। यहां के 10 बसे हुए द्वीपों में रहने वाले लोगों की आजीविका मुख्य रूप से टूना मछली पकड़ने और नारियल आधारित उत्पादों पर निर्भर करती है। हालांकि रोजगार और आय के वैकल्पिक स्रोतों की कमी, विशेषकर महिलाओं के लिए, लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है।
इसी चुनौती का समाधान खोजते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (भाकृअनुप-एनबीएफजीआर), लखनऊ ने एक अभिनव पहल शुरू की है, जिसने न केवल समुद्री जैव विविधता संरक्षण का नया रास्ता खोला है बल्कि द्वीप की महिलाओं के लिए आय का एक स्थायी स्रोत भी तैयार किया है।
अगत्ती द्वीप में स्थापित किया गया विशेष जर्मप्लाज्म केंद्र
भाकृअनुप-एनबीएफजीआर ने लक्षद्वीप के अगत्ती द्वीप में समुद्री सजावटी जीवों के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक विशेष सुविधा स्थापित की है। इस केंद्र में समुद्री सजावटी अकशेरुकी जीवों के लिए जर्मप्लाज्म संसाधन केंद्र तथा सामुदायिक जलीय कृषि इकाइयों की स्थापना की गई है।
इस परियोजना का संचालन और रखरखाव स्थानीय महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। यहां समुद्री सजावटी मछलियों, झींगों और समुद्री एनीमोन जैसे जीवों को पालकर विपणन योग्य आकार तक विकसित किया जाता है। इसके माध्यम से स्थानीय महिलाओं को अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है।
यह परियोजना जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), ट्राइबल सब-प्लान (TSP), भाकृअनुप-एनबीएफजीआर तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत समुद्री जीवित संसाधन एवं पारिस्थितिकी केंद्र (CMLRE) के सहयोग से संचालित की जा रही है।
खोजे गए समुद्री झींगों की नई प्रजातियां
परियोजना के तहत विभिन्न द्वीपों पर किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के दौरान समुद्री जैव विविधता से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं। शोधकर्ताओं ने तीन नई समुद्री सजावटी झींगा प्रजातियों की पहचान की, जो पहले वैज्ञानिक अभिलेखों में दर्ज नहीं थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज लक्षद्वीप की समुद्री जैव विविधता के महत्व को और अधिक मजबूत करती है तथा समुद्री संसाधनों के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए नए अवसर प्रदान करती है।
दुनिया में पहली बार विकसित हुई कैप्टिव ब्रीडिंग तकनीक
इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धि दो संभावनाशील समुद्री सजावटी झींगा प्रजातियों – थोर हैनानेन्सिस (Thor hainanensis) और एंकिलोकारिस ब्रेविकार्पलिस (Ancylocaris brevicarpalis) – के लिए कैप्टिव परिस्थितियों में बीज उत्पादन तकनीक का सफल विकास है।
भाकृअनुप-एनबीएफजीआर के वैज्ञानिकों ने इन दोनों प्रजातियों के कृत्रिम प्रजनन और बीज उत्पादन की तकनीक को मानकीकृत किया है। यह उपलब्धि वैश्विक स्तर पर पहली बार हासिल की गई है और इसे समुद्री सजावटी जीव पालन के क्षेत्र में एक बड़ी वैज्ञानिक सफलता माना जा रहा है।
इस तकनीक के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम होगा और समुद्री जीवों के संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
महिलाओं को मिला रोजगार और प्रशिक्षण
परियोजना के अंतर्गत स्थानीय समुदाय को समुद्री सजावटी जीवों के पालन-पोषण और प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया। भाकृअनुप-एनबीएफजीआर ने एक माह का विशेष “हैंड्स-ऑन लर्निंग” प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें कुल 82 द्वीपवासियों ने भाग लिया।
इनमें 77 महिलाएं शामिल थीं, जो इस परियोजना की मुख्य लाभार्थी हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सजावटी झींगा पालन, जल गुणवत्ता प्रबंधन, आहार व्यवस्था, रोग प्रबंधन और विपणन संबंधी तकनीकी जानकारी प्रदान की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं को तकनीकी कौशल प्रदान कर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में यह पहल एक महत्वपूर्ण कदम है।
सामुदायिक जलीय कृषि से बढ़ रही आय
भाकृअनुप-एनबीएफजीआर ने अगत्ती द्वीप में चार सामुदायिक जलीय कृषि इकाइयों की स्थापना की है और अन्य इकाइयों को तकनीकी सहयोग भी प्रदान किया है।
इन इकाइयों में 45 महिला लाभार्थी समुद्री सजावटी झींगा पालन का कार्य कर रही हैं। वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए एक माह आयु के कैप्टिव-ब्रेड झींगा बीज लाभार्थियों को उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बाद महिलाएं लगभग 2.5 से 3 महीने तक उनका पालन-पोषण करती हैं और उन्हें विपणन योग्य आकार तक विकसित करती हैं।
बाजार में इन सजावटी झींगों की कीमत 175 से 200 रुपये प्रति इकाई तक प्राप्त होती है, जिससे महिलाओं को नियमित आय का अवसर मिल रहा है।
वैज्ञानिक लगातार कर रहे हैं निगरानी
परियोजना की सफलता सुनिश्चित करने के लिए लक्षद्वीप में तैनात भाकृअनुप-एनबीएफजीआर के परियोजना कर्मी नियमित रूप से पालन इकाइयों का निरीक्षण करते हैं। वे लाभार्थियों को समय-समय पर तकनीकी सलाह, प्रशिक्षण और समस्या समाधान सहायता भी प्रदान करते हैं।
इस सतत निगरानी और मार्गदर्शन के कारण परियोजना का संचालन प्रभावी ढंग से हो रहा है तथा महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
संरक्षण और विकास का अनूठा संगम
विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना केवल आय सृजन तक सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा उद्देश्य समुद्री जैव विविधता का संरक्षण भी है। कैप्टिव ब्रीडिंग तकनीक के उपयोग से प्राकृतिक समुद्री संसाधनों पर निर्भरता कम होती है और दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण संभव हो पाता है।
यह पहल देश में सामुदायिक स्तर पर समुद्री सजावटी जीवों की जलीय कृषि का एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है, जहां वैज्ञानिक नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
महिलाओं के सशक्तिकरण की नई मिसाल
लक्षद्वीप में शुरू की गई यह पहल महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायक कहानी बनकर उभर रही है। सीमित संसाधनों वाले द्वीपीय क्षेत्रों में समुद्री सजावटी झींगा पालन के माध्यम से रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को अन्य तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में भी अपनाया जाए, तो यह समुद्री जैव विविधता संरक्षण के साथ-साथ हजारों परिवारों की आजीविका सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भाकृअनुप-एनबीएफजीआर की यह अभिनव पहल साबित करती है कि विज्ञान और तकनीक का सही उपयोग न केवल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में मदद करता है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर महिलाओं, के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

