पहाड़ों पर खेती करना हमेशा आसान नहीं होता। कहीं अत्यधिक वर्षा फसलों की वृद्धि में बाधा बनती है, तो कहीं मिट्टी में अधिक नमी, बदलता मौसम और कीट-रोगों का दबाव किसानों की मेहनत पर पानी फेर देता है। इसके बावजूद यदि वैज्ञानिक तकनीक, किसानों का अनुभव और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप खेती का सही तरीका मिल जाए, तो यही चुनौतियां किसानों के लिए नए अवसरों में बदल सकती हैं। सिक्किम के उत्तर जिले के ड्जोंगू क्षेत्र में लेपचा जनजातीय किसान नोर्बू छेरिंग लेपचा की सफलता इसी बदलाव की एक प्रेरक कहानी है। उन्होंने संरक्षित खेती यानी पॉलीहाउस में जैविक तरीके से ऑफ-सीजन टमाटर उगाकर यह दिखाया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में भी सीमित स्थान का बेहतर उपयोग करके अतिरिक्त उत्पादन और आय की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
नोर्बू छेरिंग लेपचा की यह उपलब्धि केवल एक किसान की सफलता तक सीमित नहीं है। यह पूर्वी हिमालय के जनजातीय क्षेत्रों में जलवायु के अनुरूप खेती, वैज्ञानिक तकनीक के उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र अनुसंधान परिसर के सिक्किम केंद्र (ICAR–NEH Sikkim Centre) ने जनजातीय उपयोजना (Tribal Sub Plan—TSP) के अंतर्गत निचले ड्जोंगू क्षेत्र के लेपचा किसानों के बीच ऑफ-सीजन जैविक टमाटर उत्पादन को बढ़ावा दिया। इस पहल के तहत तकनीकी प्रदर्शन आयोजित किए गए, जिनसे कुल 114 किसानों को लाभ मिला।
अधिक वर्षा बनी चुनौती, संरक्षित खेती ने दिखाया नया रास्ता
सिक्किम हिमालय के कई क्षेत्रों में सालाना लगभग 3,500 मिलीमीटर तक वर्षा होती है। इतनी अधिक वर्षा के कारण खेतों में नमी का स्तर बढ़ जाता है, जिससे टमाटर जैसी उच्च मूल्य वाली सब्जियों की वृद्धि और उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। खुले खेतों में टमाटर की खेती के दौरान अत्यधिक नमी और बारिश के कारण फसल प्रबंधन कठिन हो जाता है। ऐसे वातावरण में पौधों को स्वस्थ बनाए रखना, फल उत्पादन सुनिश्चित करना और बाजार के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली उपज तैयार करना किसानों के सामने बड़ी चुनौती होती है।
दूसरी ओर, गर्मियों और बरसात के मौसम में स्थानीय बाजारों में टमाटर की उपलब्धता सीमित होने से किसानों के लिए बेहतर कीमत पाने का अवसर भी पैदा होता है। ड्जोंगू क्षेत्र में पॉलीहाउस के भीतर उगाए गए टमाटर बरसात के मौसम में लगभग 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक सकते हैं, जबकि सर्दियों में खुले खेतों में उत्पादित टमाटर का मूल्य लगभग 60 रुपये प्रति किलोग्राम बताया गया है।
यह मूल्य अंतर किसानों के लिए ऑफ-सीजन उत्पादन को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाता है। हालांकि, बेहतर कीमत का लाभ लेने के लिए समय पर उत्पादन, गुणवत्ता बनाए रखना और बाजार की मांग के अनुसार उपज उपलब्ध कराना आवश्यक है। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए ICAR–NEH सिक्किम केंद्र ने संरक्षित परिस्थितियों में जैविक टमाटर उत्पादन की तकनीक को किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया।
ICAR की पहल से 114 किसानों तक पहुंची तकनीक
जनजातीय उपयोजना के अंतर्गत शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य लेपचा किसानों को ऐसी उत्पादन तकनीक से परिचित कराना था, जो क्षेत्र की अधिक वर्षा वाली जलवायु के अनुकूल हो और किसानों को सामान्य मौसम से अलग समय में टमाटर उत्पादन का अवसर दे सके।
तकनीकी प्रदर्शन के माध्यम से किसानों को टमाटर की उपयुक्त किस्मों, जैविक पोषण प्रबंधन, पौधों की देखभाल, परागण, बेलों को सहारा देने और फलों की तुड़ाई से जुड़ी प्रक्रियाओं के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी गई। इस कार्यक्रम में दो किस्मों का उपयोग किया गया—अनिश्चित वृद्धि वाली ‘रोमियो’ और अर्ध-निश्चित वृद्धि वाली ‘अर्का रक्षक’।
इन किस्मों की बुवाई अप्रैल के मध्य में की गई। पौधों को पॉलीहाउस के भीतर उगाया गया और पूरी फसल में जैविक पोषण तथा कीट प्रबंधन की प्रक्रियाएं अपनाई गईं। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल टमाटर उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों में टिकाऊ और व्यावहारिक खेती की संभावनाओं को मजबूत करना भी था।
कार्यक्रम ने किसानों के सामने यह विकल्प रखा कि वे पारंपरिक फसल मौसम पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय संरक्षित खेती के माध्यम से बाजार में कम उपलब्धता वाले समय में भी टमाटर उत्पादन कर सकते हैं।
नोर्बू छेरिंग लेपचा बने सफलता के उदाहरण
ड्जोंगू के ही-ग्याथांग गांव के किसान नोर्बू छेरिंग लेपचा इस पहल के उल्लेखनीय उदाहरण के रूप में सामने आए हैं। उन्होंने वर्ष 2021 से संरक्षित परिस्थितियों में जैविक टमाटर की खेती को अपनाया हुआ है। वे लगभग 180 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाले पॉलीहाउस में टमाटर के 200 पौधे उगाते हैं।
उनकी खेती की विशेषता यह है कि वे उपलब्ध स्थान का अधिकतम उपयोग करने के लिए गर्मियों के टमाटर के साथ सब्जी सरसों की अंतरफसल भी लेते हैं। इससे उन्हें टमाटर की फसल के साथ हरी पत्तेदार सब्जी प्राप्त करने का अवसर मिलता है। इस प्रकार एक ही संरक्षित क्षेत्र से अलग-अलग समय पर उपज हासिल करने की संभावना बनती है।
नोर्बू छेरिंग लेपचा की सफलता के पीछे फसल प्रबंधन की नियमितता और जैविक पोषण व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने खेत की तैयारी के समय वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया और पौधों की वृद्धि को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर समुद्री शैवाल आधारित उत्पाद का छिड़काव किया। उनकी यह पद्धति दिखाती है कि संरक्षित खेती में केवल पॉलीहाउस बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पौधों को सही पोषण देना और उनके विकास की नियमित निगरानी करना भी आवश्यक है।
जैविक पोषण और पौधों की देखभाल पर विशेष ध्यान
नोर्बू छेरिंग लेपचा ने अपने पॉलीहाउस में मिट्टी की तैयारी के दौरान लगभग 5 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से वर्मी कम्पोस्ट का इस्तेमाल किया। वर्मी कम्पोस्ट जैविक खेती में पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए उपयोग किया जाने वाला महत्वपूर्ण साधन है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पौधों की वृद्धि और मजबूती के लिए IFFCO Sagarika समुद्री शैवाल अर्क का लगभग 3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से समय-समय पर पर्णीय छिड़काव किया।
पौधों की नियमित देखभाल के अंतर्गत उन्होंने फूल आने के बाद निचली पत्तियों को हटाने की प्रक्रिया अपनाई। इसका उद्देश्य पौधों में हवा का बेहतर आवागमन बनाए रखना और फलों को मिट्टी के सीधे संपर्क से दूर रखना था। उन्होंने पौधों को सहारा देने के लिए डोरियों का उपयोग किया और बेलों को लगभग 30 सेंटीमीटर की ऊंचाई से डोरियों के चारों ओर लपेटकर प्रशिक्षित किया।
इस तरह पौधों को व्यवस्थित ढंग से ऊपर की ओर बढ़ने में मदद मिली। पौधों के बीच उचित वायु संचार बनाए रखने और फलों को जमीन से ऊपर रखने से फसल की देखभाल आसान हुई। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में इस तरह की प्रबंधन प्रक्रियाएं विशेष महत्व रखती हैं, क्योंकि वहां नमी और फसल के स्वास्थ्य पर लगातार ध्यान देना पड़ता है।
फसल में फूल आने के समय हाथ से हल्के-हल्के पौधों को हिलाकर परागण में सहायता भी की गई। इस प्रक्रिया का उद्देश्य फूलों में परागण को बढ़ावा देना था, जिससे फल बनने की प्रक्रिया में मदद मिल सके।
सर्दियों की तुलना में गर्मियों में अधिक उत्पादन
इस तकनीक का सबसे उल्लेखनीय परिणाम टमाटर की पैदावार में देखने को मिला। नोर्बू छेरिंग लेपचा के पॉलीहाउस में गर्मियों के दौरान प्रति पौधा लगभग 6 से 8 किलोग्राम टमाटर उत्पादन दर्ज किया गया। इसके मुकाबले खुले खेतों में सर्दियों के दौरान सामान्यतः प्रति पौधा लगभग 4 से 5 किलोग्राम उत्पादन प्राप्त होने की जानकारी दी गई है।
नोर्बू छेरिंग लेपचा ने अपने पॉलीहाउस से कुल 180 से 210 किलोग्राम टमाटर की कटाई की। इसके विपरीत, समान क्षेत्रफल के संदर्भ में सर्दियों के दौरान लगभग 90 से 100 किलोग्राम उत्पादन का उल्लेख किया गया है।
ये आंकड़े संरक्षित खेती के माध्यम से ऑफ-सीजन टमाटर उत्पादन की संभावनाओं को रेखांकित करते हैं। गर्मियों में अधिक उपज के साथ बाजार में अपेक्षाकृत बेहतर कीमत मिलने की संभावना किसानों के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता खोल सकती है।
हालांकि, वास्तविक लाभ का आकलन करते समय पॉलीहाउस की स्थापना और रखरखाव, जैविक खाद, श्रम, सिंचाई, पौधों की देखभाल, परिवहन तथा बाजार तक पहुंच जैसी लागतों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। उपलब्ध जानकारी उत्पादन और बाजार मूल्य की संभावनाओं को दर्शाती है, लेकिन इसमें किसान की कुल लागत, शुद्ध लाभ या निवेश पर प्रतिफल का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
जून से नवंबर तक तुड़ाई, बाजार की मांग का लाभ
ऑफ-सीजन जैविक टमाटर उत्पादन की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी तुड़ाई का समय रहा। अप्रैल के मध्य में बुवाई के बाद फलों की कटाई जून के अंतिम सप्ताह से शुरू हुई और नवंबर के मध्य तक जारी रही।
फलों की तुड़ाई प्रत्येक चार से छह दिन के अंतराल पर की गई। नियमित अंतराल पर तुड़ाई करने से पके हुए फलों को समय पर तोड़ने और कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।
ड्जोंगू क्षेत्र में उत्पादित टमाटरों के लिए मंगन और दिक्चू जैसे नजदीकी बाजार महत्वपूर्ण हैं। बरसात के मौसम में स्थानीय आपूर्ति सीमित होने पर पॉलीहाउस से प्राप्त ताजा टमाटर इन बाजारों में बेहतर कीमत पाने का अवसर प्रदान करते हैं।
स्थानीय बाजारों के साथ संपर्क बनाए रखना और मांग के अनुसार नियमित आपूर्ति करना छोटे किसानों के लिए उपयोगी रणनीति हो सकती है। इससे उन्हें केवल उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय फसल की तुड़ाई और बिक्री के समय को भी बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने में सहायता मिलती है।
फसल चक्र से मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने का प्रयास
जैविक खेती में मिट्टी का स्वास्थ्य बनाए रखना और कीट एवं रोगों के दबाव को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण होता है। नोर्बू छेरिंग लेपचा ने इस दिशा में फसल चक्र की रणनीति अपनाई। वे वैकल्पिक वर्षों में पॉलीहाउस के भीतर ऊंचे बांस के मचान पर लौकी की खेती करते हैं। इसके लिए ‘काशी बहार’ किस्म का उपयोग किया गया।
इस व्यवस्था का उद्देश्य लगातार एक ही फसल उगाने के बजाय फसल में विविधता लाना और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करना था। फसल चक्र अपनाने से खेती की व्यवस्था में विविधता आती है और लंबे समय तक जैविक उत्पादन बनाए रखने के प्रयासों को समर्थन मिल सकता है।
बांस के ऊंचे मचान पर लौकी उगाने से संरक्षित क्षेत्र का अलग तरीके से उपयोग करने का अवसर भी मिलता है। यह उदाहरण बताता है कि किसानों के स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक तकनीक का संयोजन सीमित कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रबंधन में उपयोगी हो सकता है।
एक किसान की सफलता से दूसरे किसानों को मिली प्रेरणा
नोर्बू छेरिंग लेपचा के खेत में बेहतर उत्पादन, स्थानीय बाजार में मांग और अतिरिक्त आय की संभावना के सकारात्मक परिणामों ने आसपास के गांवों के किसानों को भी प्रेरित किया। ICAR–NEH सिक्किम केंद्र की जानकारी के अनुसार, जनजातीय उपयोजना के अंतर्गत आने वाले पड़ोसी गांवों के अनेक किसानों ने भी संरक्षित जैविक टमाटर उत्पादन की पद्धति को अपनाना और उसका विस्तार करना शुरू किया है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी नई कृषि तकनीक को अपनाने में किसानों के लिए दूसरे किसानों के व्यावहारिक अनुभव की बड़ी भूमिका होती है। जब किसी गांव में किसान स्वयं नई पद्धति के परिणाम देखते हैं, तो उन्हें उसकी उपयोगिता, चुनौतियों और प्रबंधन की आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिलता है।
नोर्बू छेरिंग लेपचा का अनुभव इस बात को सामने लाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि विकास के लिए केवल तकनीक उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। किसानों को स्थानीय जलवायु के अनुरूप उत्पादन प्रणाली, नियमित फसल प्रबंधन और बाजार से जुड़ाव के महत्व को समझना भी जरूरी है।
टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
ड्जोंगू के लेपचा किसानों के बीच ऑफ-सीजन जैविक टमाटर उत्पादन की यह पहल पूर्वी हिमालय के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अत्यधिक वर्षा जैसी प्राकृतिक चुनौती के बीच संरक्षित खेती का उपयोग करके उत्पादन बढ़ाने, फसल के मौसम का बेहतर प्रबंधन करने और स्थानीय बाजारों की मांग का लाभ उठाने की संभावनाएं सामने आई हैं।
इस पहल में वैज्ञानिक अनुसंधान, जनजातीय किसानों के अनुभव और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक को अपनाने का समन्वय दिखाई देता है। वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग, पौधों को सहारा देना, हाथ से परागण में सहायता, नियमित तुड़ाई और फसल चक्र जैसी प्रक्रियाएं उत्पादन प्रणाली को व्यवस्थित बनाने में योगदान देती हैं।
यह सफलता कहानी यह भी दर्शाती है कि छोटे और सीमित क्षेत्र वाले किसान यदि अपनी परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक अपनाएं, तो वे पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त उत्पादन के विकल्प विकसित कर सकते हैं। हालांकि, इस मॉडल को दूसरे क्षेत्रों में अपनाने से पहले स्थानीय वर्षा, तापमान, बाजार की मांग, पॉलीहाउस की लागत और किसानों की उपलब्ध संसाधन क्षमता का मूल्यांकन करना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, नोर्बू छेरिंग लेपचा की उपलब्धि और ICAR–NEH सिक्किम केंद्र की पहल यह संदेश देती है कि वैज्ञानिक तकनीक और किसान-केंद्रित नवाचार मिलकर जनजातीय समुदायों की आजीविका को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ड्जोंगू में संरक्षित जैविक टमाटर उत्पादन का बढ़ता प्रसार टिकाऊ कृषि, बेहतर बाजार अवसरों और जलवायु-अनुकूल खेती की दिशा में एक प्रेरक कदम है।

