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Home कृषि समाचार

ऊपर सोलर पैनल, नीचे लहलहाएगी फसल, एग्रीवोल्टाइक से किसानों की आय बढ़ाने की तैयारी

Solar panels above, crops below, agrivoltaics to boost farmers' income

Emran Khan by Emran Khan
October 22, 2026
in कृषि समाचार
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Solar panels above, crops below, agrivoltaics to boost farmers' income

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खेती और सौर ऊर्जा को एक साथ जोड़कर किसानों की आय बढ़ाने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दिशा में भारत सरकार ने एग्रीवोल्टाइक तकनीक पर जोर दिया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित तीन दिवसीय 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ किया। उद्घाटन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश का किसान अब केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा के उत्पादन के माध्यम से ऊर्जादाता भी बनने की क्षमता रखता है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि खेती और सौर ऊर्जा का संगम किसानों की आर्थिक समृद्धि और विश्व कल्याण के लिए नए रास्ते खोल सकता है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि एग्रीवोल्टाइक नीति ऐसी होनी चाहिए, जो भारत के 85 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी साबित हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि सौर पैनल लगाने के नाम पर खेती बाधित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसमें एक ही जमीन पर बिजली उत्पादन और फसल उत्पादन दोनों जारी रह सकें।

इस अवसर पर केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने भी एग्रीवोल्टाइक तकनीक की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 308 गीगावाट से अधिक हो चुकी है और सरकार प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) के अगले चरण में बड़े एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम की शुरुआत करने की तैयारी कर रही है।

क्या है एग्रीवोल्टाइक तकनीक?

एग्रीवोल्टाइक ऐसी तकनीक है, जिसमें एक ही कृषि भूमि पर सौर ऊर्जा उत्पादन और खेती को साथ-साथ संचालित किया जाता है। इसके तहत खेतों में सौर पैनल इस तरह लगाए जाते हैं कि उनके नीचे या उनके बीच फसलों की खेती की जा सके। इससे किसान को एक ही जमीन से कृषि उत्पादन के साथ बिजली उत्पादन से भी आय प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है।

उद्घाटन समारोह में श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवधारणा को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि खेत के ऊपर सौर पैनल से बिजली पैदा होगी और नीचे फसलें लहलहाएंगी। उन्होंने इसे ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ जैसा मॉडल बताते हुए कहा कि खेती के साथ ऊर्जा उत्पादन जोड़ना किसानों के हित में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

उन्होंने बिजली के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के दौर में खेती और आधुनिक जीवन दोनों के लिए बिजली अत्यंत आवश्यक है। इसलिए किसानों को केवल खाद्यान्न उत्पादक तक सीमित न रखते हुए ऊर्जा उत्पादन से जोड़ना भी जरूरी है।

हालांकि, एग्रीवोल्टाइक की सफलता के लिए जरूरी है कि सौर पैनलों की संरचना और खेतों की जरूरतों के बीच उचित तालमेल हो। पैनलों की ऊंचाई, खंभों के बीच दूरी और कृषि मशीनों के आवागमन की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि किसान सामान्य खेती कर सके और जरूरत के अनुसार फसल तथा फसल चक्र में बदलाव भी कर सके।

छोटे और सीमांत किसानों के हितों को प्राथमिकता

केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टाइक नीति बनाते समय देश के छोटे और सीमांत किसानों की जरूरतों को केंद्र में रखना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि भारत में औसत भूमि जोत लगभग 0.96 हेक्टेयर है और 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे तथा सीमांत श्रेणी में आते हैं।

ऐसे किसानों के लिए खेती की जमीन का महत्व बहुत अधिक है। वे अपनी सीमित भूमि को पूरी तरह सौर ऊर्जा संयंत्रों में बदलकर कृषि उत्पादन बंद नहीं कर सकते। इसलिए एग्रीवोल्टाइक का ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जिसमें उनकी खेती प्रभावित न हो और उन्हें अतिरिक्त आय का अवसर भी मिले।

श्री चौहान ने कहा कि प्रयोगशालाओं और सरकारी संस्थानों में किसी तकनीक पर निवेश करना एक बात है, लेकिन किसान को अपने संसाधन और मेहनत लगानी पड़ती है। इस कारण तकनीक का मूल्यांकन खेत की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सौर पैनलों के नीचे कुछ पौधे लगा देना एग्रीवोल्टाइक का उद्देश्य पूरा नहीं करता। पैनलों की डिजाइन, ऊंचाई और उनके बीच की दूरी ऐसी होनी चाहिए कि किसान जुताई, बुवाई, निराई और कटाई जैसे कार्य कर सके। साथ ही, खेती में बदलाव करने और अलग-अलग मौसमों में उपयुक्त फसलें उगाने की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए।

बारिश के पानी का प्रबंधन और पारदर्शी भुगतान जरूरी

एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं को व्यावहारिक बनाने के लिए केंद्रीय मंत्री ने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सौर पैनलों से गिरने वाले वर्षा जल के सुरक्षित निकास और संचयन की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए। यदि पानी का प्रवाह सही तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया, तो खेतों में मिट्टी का कटाव हो सकता है। इसलिए पानी की हर बूंद का सदुपयोग करने के लिए उचित प्रबंधन आवश्यक है।

उन्होंने बिजली की खरीद, ग्रिड तक पहुंच और किसानों को समय पर पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित करने की जरूरत भी बताई। एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में किसानों की भागीदारी तभी मजबूत हो सकती है, जब उत्पादित बिजली के बदले मिलने वाले भुगतान और अन्य व्यावसायिक व्यवस्थाओं में स्पष्टता हो।

केंद्रीय मंत्री ने किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को भी एग्रीवोल्टाइक से जोड़ने का सुझाव दिया। उनके अनुसार, स्थानीय ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को सौर उपकरणों के संचालन, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार के अवसर तैयार हो सकते हैं और तकनीकी कार्यों के लिए स्थानीय स्तर पर कुशल लोगों की उपलब्धता बढ़ेगी।

उन्होंने एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि यदि कोई कंपनी परियोजना बीच में छोड़ देती है या अनुबंध समाप्त होने पर सौर पैनल हटाने की जरूरत पड़ती है, तो उसका वित्तीय अथवा भौतिक बोझ किसान पर नहीं आना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में जिम्मेदारियों को परियोजना की शुरुआत में ही स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाना जरूरी है।

कृषि और ऊर्जा मंत्रालय मिलकर करेंगे काम

श्री शिवराज सिंह चौहान ने नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी के नेतृत्व की सराहना करते हुए आश्वासन दिया कि एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कृषि मंत्रालय ऊर्जा मंत्रालय के साथ मिलकर काम करेगा।

इस सहयोग का उद्देश्य कृषि उत्पादन और ऊर्जा उत्पादन के बीच संतुलन बनाना है। एग्रीवोल्टाइक तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए केवल सौर ऊर्जा संबंधी बुनियादी ढांचा पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों, ऊर्जा विशेषज्ञों, किसानों और नीति-निर्माताओं के बीच समन्वय भी जरूरी होगा।

किसानों की भूमि, फसलों की जरूरतों और स्थानीय जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तकनीकी मॉडल विकसित करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। साथ ही, किसानों को परियोजनाओं में भागीदारी के लिए उपयुक्त जानकारी और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 308 गीगावाट के पार

केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि 7वां एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस अब तक आयोजित छह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की तुलना में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक है। रिकॉर्ड भागीदारी के कारण आयोजन में अतिरिक्त हॉल की व्यवस्था करनी पड़ी।

उन्होंने भारत की आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा क्षेत्र की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत रही। उनके अनुसार, वर्ष 2014 से पहले देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 249 गीगावाट थी, जो अब बढ़कर 560 गीगावाट से अधिक हो चुकी है।

उन्होंने कहा कि देश की गैर-जीवाश्म स्थापित ऊर्जा क्षमता 308 गीगावाट से अधिक हो गई है। इसमें से 100 गीगावाट क्षमता पिछले ढाई वर्षों में जोड़ी गई है। गैर-जीवाश्म बिजली की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आई है। श्री जोशी के अनुसार, वर्ष 2012-13 में यह लागत लगभग 11 रुपये प्रति यूनिट थी, जो बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण घटकर करीब 2.60 रुपये प्रति यूनिट रह गई है।

ये आंकड़े भारत में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार को रेखांकित करते हैं। एग्रीवोल्टाइक तकनीक के माध्यम से इस ऊर्जा क्षमता को कृषि भूमि के साथ जोड़ने की संभावनाओं पर सम्मेलन में विशेष चर्चा की गई।

4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि एग्रीवोल्टाइक के लिए उपयुक्त

श्री प्रह्लाद जोशी ने टेरी (TERI) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि भारत की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त है। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की इसमें लगभग 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

उन्होंने कहा कि यदि इस उपयुक्त भूमि के केवल 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक प्रणाली स्थापित की जाए, तो भारत वर्ष 2050 तक अपनी अनुमानित बिजली मांग को इसी माध्यम से पूरा करने की क्षमता हासिल कर सकता है।

केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि कुछ अध्ययनों में एग्रीवोल्टाइक प्रणालियों के अंतर्गत फसल उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है। हालांकि, ऐसे परिणामों को विभिन्न फसलों, स्थानीय परिस्थितियों और तकनीकी डिजाइन के संदर्भ में समझना जरूरी है। एग्रीवोल्टाइक के तहत पैनलों की ऊंचाई, छाया की स्थिति और फसलों की जरूरतों का उचित तालमेल महत्वपूर्ण रहेगा।

इस क्षेत्र की व्यापक संभावनाओं को देखते हुए अनुसंधान, तकनीकी परीक्षण और किसानों के अनुभवों के आधार पर उपयुक्त मॉडल विकसित करना आवश्यक होगा, ताकि ऊर्जा उत्पादन के साथ कृषि उत्पादन को भी बनाए रखा जा सके।

पीएम-कुसुम के अगले चरण में शुरू होगा बड़ा अभियान

केंद्रीय मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। उनके अनुसार, इससे किसानों को रात के समय सिंचाई करने की कठिनाइयों से राहत मिली है और दिन में बिजली उपलब्ध होने का अवसर बढ़ा है।

उन्होंने घोषणा की कि सरकार पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण के तहत दुनिया का सबसे महत्वाकांक्षी एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रही है। इस पहल के जरिए खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को बड़े स्तर पर जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

श्री जोशी ने कहा कि अध्ययनों के अनुसार एग्रीवोल्टाइक क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होने की संभावना है। इससे ग्रामीण युवाओं को अपने गांवों और आसपास के क्षेत्रों में रोजगार के अवसर मिल सकते हैं और रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में उपकरणों की स्थापना, संचालन, रखरखाव और मरम्मत जैसे कार्यों के लिए प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होगी। यदि इन कार्यों में स्थानीय युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षण देकर शामिल किया जाता है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में नई आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।

तकनीकी सामग्री और विशेषज्ञों की भागीदारी

सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्री श्रीपाद येसो नाईक, भारत एवं भूटान में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव श्री संतोष कुमार सारंगी, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव श्री अतीश चंद्रा, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के महानिदेशक श्री आशीष खन्ना सहित कई प्रमुख प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

उद्घाटन सत्र के दौरान एग्रीवोल्टाइक से संबंधित तकनीकी टूल्स और संचार सामग्रियों का भी विमोचन किया गया। इन सामग्रियों का उद्देश्य किसानों और अन्य हितधारकों को खेत स्तर पर बेहतर निर्णय लेने में सहायता देना है।

खेती और ऊर्जा के तालमेल से ग्रामीण विकास की नई संभावनाएं

7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस में सामने आए विचारों से स्पष्ट है कि भारत खेती और स्वच्छ ऊर्जा के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। एग्रीवोल्टाइक के माध्यम से किसानों को एक ही जमीन से फसल और बिजली उत्पादन के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, उपकरणों के संचालन, रखरखाव और मरम्मत से ग्रामीण रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं।

हालांकि, इस मॉडल की सफलता के लिए छोटे और सीमांत किसानों के हितों की रक्षा, खेती के लिए पर्याप्त स्थान, वर्षा जल प्रबंधन, बिजली की खरीद और समय पर भुगतान जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत बनाना होगा। परियोजनाओं में किसानों की जिम्मेदारियों और कंपनियों की जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।

केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि और ऊर्जा मंत्रालय के बीच समन्वय का भरोसा दिलाया है, जबकि श्री प्रह्लाद जोशी ने पीएम-कुसुम के अगले चरण में बड़े एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम की तैयारी की जानकारी दी है।

‘अन्नदाता भी, ऊर्जादाता भी’ की अवधारणा के साथ एग्रीवोल्टाइक भारत के कृषि और ऊर्जा क्षेत्रों को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। यदि इसे किसानों की जरूरतों के अनुरूप लागू किया जाता है, तो यह खेती को जारी रखते हुए अतिरिक्त आय, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण रोजगार के विस्तार में योगदान दे सकता है।

 

Tags: AgricultureFarmingShivraj Singh Chouhan
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