देश में Rabi Season 2026 की तैयारियां तेज होने लगी हैं। गेहूं, चना, मसूर, सरसों और दूसरी प्रमुख रबी फसलों की बुवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों के सामने किसानों तक सही बीज, खाद, तकनीकी जानकारी, मौसम आधारित सलाह और बाजार की जानकारी पहुंचाना बड़ी प्राथमिकता बन गई है।
28 सितंबर 2026 को आयोजित राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों से रबी सीजन के लिए वैज्ञानिक योजना, केंद्र-राज्य समन्वय और जमीनी स्तर पर निगरानी मजबूत करने को कहा। सम्मेलन में दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ संतुलित उर्वरक उपयोग और मिट्टी की सेहत पर भी जोर दिया गया। मंत्री ने ‘खेत बचाओ’ अभियान को रबी सीजन में भी चलाने की बात कही।
ऐसे समय में किसानों के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। खेती की लागत, मिट्टी की गुणवत्ता, पानी की उपलब्धता, मौसम में बदलाव और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसी वजह से Khet Bachao Abhiyan 2026 जैसे कार्यक्रमों का महत्व बढ़ जाता है।
कुछ रिपोर्टों या सोशल मीडिया पोस्ट में 22 अक्टूबर 2026 से ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू होने की बात देखने को मिल सकती है, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में इस तारीख से नए राष्ट्रव्यापी अभियान के शुभारंभ की स्पष्ट पुष्टि नहीं है।
कृषि मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार मूल खेत बचाओ अभियान 1 जून से 30 जून 2026 तक देशभर में चलाया गया था। अब सितंबर में कृषि मंत्री ने इसे रबी सीजन के दौरान भी जारी रखने की बात कही है।
इसलिए किसानों को किसी विशेष तारीख से जुड़े कार्यक्रम के लिए अपने राज्य के कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र यानी KVK या कृषि मंत्रालय की आधिकारिक सूचना जरूर देखनी चाहिए।
क्या है ‘खेत बचाओ अभियान 2026’?
Khet Bachao Abhiyan 2026 कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की एक राष्ट्रव्यापी पहल है, जिसे खेतों की उत्पादकता बनाए रखने, मिट्टी की सेहत सुधारने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया। अभियान का पहला राष्ट्रव्यापी चरण 1 जून 2026 को शुरू हुआ और 30 जून तक चला। इसमें कृषि विज्ञान केंद्रों, ICAR संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और राज्य कृषि विभागों को शामिल किया गया। इस अभियान का विशेष जोर था:
- संतुलित मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल
- मिट्टी की जांच
- Soil Health Card का उपयोग
- प्राकृतिक और टिकाऊ खेती
- जल संरक्षण
- फसल के अनुसार पोषक तत्व प्रबंधन
- हरी खाद का इस्तेमाल
- स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल चयन
- नकली खाद, बीज और कीटनाशकों की पहचान
- मौसम के अनुसार खेती की सलाह
सरकार का उद्देश्य किसानों को केवल अधिक खाद डालकर अधिक उत्पादन लेने की सोच से हटाकर वैज्ञानिक तरीके से खाद और दूसरे कृषि इनपुट का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
रबी सीजन में क्यों जरूरी है खेत बचाओ अभियान?
भारत में रबी की फसलें आमतौर पर मानसून समाप्त होने के बाद बोई जाती हैं। गेहूं, चना, मसूर, मटर, सरसों और जौ जैसी फसलें इस सीजन में बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।Rabi Farming India के लिए मिट्टी में मौजूद नमी, सिंचाई की उपलब्धता और सही समय पर खाद देना काफी महत्वपूर्ण होता है।रबी फसल की शुरुआत में किसान अगर मिट्टी की वास्तविक जरूरत जाने बिना अत्यधिक यूरिया या अन्य रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे खेती की लागत बढ़ सकती है और लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण सरकार का जोर balanced fertilizer के अनुसार खेत बचाओ अभियान में कम खाद, सही खाद और सही सलाह की अवधारणा पर जोर दिया गया है।
लाखों किसान जुड़ चुके हैं अभियान से
खेत बचाओ अभियान केवल कागजी योजना तक सीमित नहीं रहा।कृषि मंत्रालय के अनुसार 4 जून 2026 तक ही अभियान से 9.42 लाख से ज्यादा किसान विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से जुड़ चुके थे।देशभर में हजारों जागरूकता कार्यक्रम, प्रशिक्षण कार्यक्रम और खेत प्रदर्शन आयोजित किए गए। किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती की जानकारी दी गई। यह बताता है कि आने वाले Rabi Season 2026 में भी सरकार इसी नेटवर्क का इस्तेमाल किसानों तक तकनीकी सलाह पहुंचाने के लिए कर सकती है।
रबी अभियान 2026 में चना, मसूर और सरसों पर जोर
इस बार सरकार रबी उत्पादन में केवल गेहूं पर निर्भरता की बजाय दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही है।
28 सितंबर 2026 के राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में चना, मसूर और सरसों को रबी सीजन की महत्वपूर्ण फसलों के रूप में आगे बढ़ाने की बात कही गई। सरकार चाहती है कि राज्यों में बीज से लेकर बाजार और खरीद तक की तैयारी पहले से की जाए।
भारत खाद्य तेल और कुछ दालों की जरूरत पूरी करने के लिए आयात भी करता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ने से किसानों के लिए नए अवसर बनने के साथ देश की आयात निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि किसान को फसल चुनने से पहले अपने इलाके की जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, स्थानीय बाजार और संभावित कीमतों को ध्यान में रखना चाहिए।
FTA क्या होता है?
अब बात करते हैं इस विषय के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से यानी FTA की। FTA का पूरा नाम Free Trade Agreement होता है। जब दो या उससे अधिक देश आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए किसी समझौते के तहत कई उत्पादों पर Import Duty या Customs Duty कम या समाप्त करते हैं, तो इसे Free Trade Agreement कहा जाता है।सरल भाषा में समझें तो FTA के बाद कुछ भारतीय उत्पाद दूसरे देश के बाजार में पहले की तुलना में कम शुल्क पर पहुंच सकते हैं।इससे भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना आसान हो सकता है। कृषि क्षेत्र के लिए इसका अर्थ यह हो सकता है कि चाय, कॉफी, मसाले, फल, सब्जियां, प्रोसेस्ड फूड और दूसरे कृषि उत्पादों को नए बाजार मिलें।
लेकिन इसका फायदा हर किसान और हर फसल को समान रूप से मिले, यह जरूरी नहीं है। वास्तविक लाभ उत्पाद, गुणवत्ता मानकों, निर्यात मांग, सप्लाई चेन और समझौते की विशेष शर्तों पर निर्भर करता है।
India-New Zealand FTA किसानों के लिए क्यों चर्चा में है?
अक्टूबर 2026 में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक घटनाक्रम होने जा रहा है।भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ India-New Zealand Free Trade Agreement 20 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला है।भारत सरकार के अनुसार इस समझौते के लागू होने के बाद न्यूजीलैंड में भारत से जाने वाले 100 प्रतिशत निर्यात को पहले दिन से शून्य शुल्क की सुविधा मिलेगी। इनमें कृषि और कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों से जुड़े अवसर भी शामिल हो सकते हैं।सरकार का कहना है कि समझौते से कृषि उत्पादकता में सहयोग और भारतीय उत्पादकों को global value chains से जोड़ने के अवसर मिल सकते हैं। इसी वजह से India New Zealand FTA आने वाले महीनों में कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय रह सकता है।
किसानों को FTA से क्या फायदे हो सकते हैं?
FTA के फायदे सीधे समझने के लिए मान लें कि किसी भारतीय कृषि उत्पाद पर न्यूजीलैंड में पहले आयात शुल्क लगाया जाता था।अगर समझौते के तहत वह शुल्क समाप्त हो जाता है, तो भारतीय उत्पाद वहां के बाजार में कम लागत पर प्रवेश कर सकता है। इससे भारतीय निर्यातकों को दूसरे देशों के उत्पादों के मुकाबले बेहतर प्रतिस्पर्धी स्थिति मिल सकती है।
1. कृषि उत्पादों के लिए नया बाजार
Agriculture Export Opportunities 2026 के तहत भारतीय किसानों और कृषि कारोबारियों के लिए विदेशी बाजारों में नए अवसर बन सकते हैं। विशेष रूप से processed food, spices और दूसरे value-added agricultural products को इसका फायदा मिल सकता है।
2. कृषि-प्रसंस्करण को बढ़ावा
कच्ची कृषि उपज की तुलना में processed food की कीमत ज्यादा हो सकती है। उदाहरण के लिए केवल फल बेचने के बजाय उनसे juice, pulp या दूसरे processed products तैयार करके निर्यात किए जा सकते हैं।FTA ऐसे कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों के लिए बाजार पहुंच आसान कर सकता है।
3. Farmer Producer Organisations को अवसर
छोटे किसानों के लिए सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचना आसान नहीं होता। यहां Farmer Producer Organisations यानी FPOs की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। FPO किसानों से बड़ी मात्रा में उपज इकट्ठा करके grading, sorting, processing और packaging की व्यवस्था कर सकते हैं।इससे छोटे किसानों के लिए export supply chain में शामिल होने की संभावना बढ़ती है।
4. बेहतर गुणवत्ता का प्रोत्साहन
विदेशी बाजारों में उत्पाद बेचने के लिए गुणवत्ता मानकों का पालन करना जरूरी होता है। इससे किसानों को बेहतर बीज, वैज्ञानिक खेती, सुरक्षित कीटनाशक प्रबंधन और traceability जैसी प्रणालियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
5. Global Value Chain से जुड़ाव
FTA का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य उत्पादकों को Global Value Chains से जोड़ना भी है। इसका मतलब केवल फसल पैदा करके स्थानीय मंडी में बेचने तक सीमित रहने के बजाय processing, packaging, branding और export तक पूरी supply chain का हिस्सा बनना है।
क्या FTA से हर किसान को सीधा फायदा मिलेगा?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
Farmers Benefits from FTA का अर्थ यह नहीं है कि समझौता लागू होते ही हर किसान की फसल की कीमत बढ़ जाएगी। FTA मुख्य रूप से व्यापार के नियमों और शुल्क में बदलाव करता है।किसान को वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब उसके उत्पाद की विदेशी बाजार में मांग हो और सप्लाई चेन उसे उस बाजार तक पहुंचा सके।
इसके लिए कई चीजें जरूरी हैं:गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, प्रमाणन, grading, packaging, cold storage, logistics, processing units और exporters से संपर्क।इसलिए FTA को किसानों के लिए संभावित अवसर के रूप में समझना ज्यादा उचित होगा, न कि निश्चित आय वृद्धि की गारंटी के रूप में।
संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण
भारत किसी भी FTA में केवल निर्यात बढ़ाने पर ध्यान नहीं देता। घरेलू किसानों और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा भी वार्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।भारत-न्यूजीलैंड समझौते की आधिकारिक जानकारी में कहा गया है कि भारत ने डेयरी और कृषि के कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में अपने हितों को सुरक्षित रखा है।इसी प्रकार दूसरे व्यापार समझौतों में भी संवेदनशील कृषि उत्पादों को अलग-अलग स्तर की सुरक्षा दी जा सकती है।इसलिए किसी भी FTA का कृषि पर प्रभाव समझने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि किन उत्पादों पर tariff हटाया गया है, किन पर quota है और किन उत्पादों को बाजार पहुंच से बाहर रखा गया है।
किसानों को FTA के बारे में जागरूक करना क्यों जरूरी है?
भारत का अधिकांश कृषि ढांचा छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है। ऐसे किसान अक्सर वैश्विक व्यापार नियमों, export standards और Free Trade Agreements से जुड़ी जानकारी से दूर रहते हैं।अगर देश नए FTA कर रहा है, तो किसानों तक केवल “FTA से फायदा होगा” जैसी सामान्य जानकारी पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें व्यावहारिक जानकारी भी चाहिए। उदाहरण के तौर पर: कौन-सी फसल की विदेश में मांग है?किस गुणवत्ता की जरूरत है?
किस उत्पाद पर import duty कम हुई है?Export के लिए certification कैसे मिलेगा?किस FPO या exporter के माध्यम से उत्पाद बेचा जा सकता है?Grading और packaging के क्या मानक हैं?विदेशी बाजार में pesticide residue limit क्या है?इस प्रकार की जानकारी किसानों को वास्तविक रूप से Free Trade Agreement India से बनने वाले अवसरों का फायदा लेने में मदद कर सकती है।
KVK और ICAR की भूमिका होगी महत्वपूर्ण
देश में कृषि विज्ञान केंद्र यानी Krishi Vigyan Kendras (KVKs) किसानों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम करते हैं।खेत बचाओ अभियान के पहले चरण में भी KVK, ICAR संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों की व्यापक भागीदारी रही थी।Rabi Season 2026 में इन्हीं संस्थानों के माध्यम से किसानों को मिट्टी जांच, फसल प्रबंधन, संतुलित खाद, बीमारी नियंत्रण और मौसम आधारित सलाह उपलब्ध कराई जा सकती है।अगर FTA से जुड़े कृषि निर्यात अवसरों पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं, तो KVK और FPO नेटवर्क किसानों तक जानकारी पहुंचाने में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।
मिट्टी की जांच क्यों जरूरी?
Rabi crop preparation tips 2026 में सबसे पहला कदम मिट्टी की जांच होना चाहिए।कई किसान वर्षों से एक ही मात्रा में NPK या यूरिया इस्तेमाल करते हैं, जबकि खेत की पोषक जरूरत समय के साथ बदल सकती है।Soil Test से यह पता चल सकता है कि खेत में nitrogen, phosphorus, potassium और दूसरे पोषक तत्वों की स्थिति क्या है।इस आधार पर खाद का उपयोग करने से अनावश्यक खर्च कम किया जा सकता है।खेत बचाओ अभियान के दौरान भी Soil Health Card और मिट्टी परीक्षण पर विशेष जोर दिया गया था।
संतुलित खाद से कैसे घट सकती है लागत?
अगर किसी खेत में पहले से पर्याप्त phosphorus मौजूद है और किसान फिर भी बड़ी मात्रा में phosphorus fertilizer डालता है, तो पैसा खर्च होने के बावजूद उसका पूरा फायदा फसल को नहीं मिलेगा।यही कारण है कि सरकार Balanced Fertilizer Use को बढ़ावा दे रही है।किसान को यह समझना जरूरी है कि “ज्यादा खाद = ज्यादा पैदावार” हमेशा सही समीकरण नहीं होता।मिट्टी, फसल और मौसम के अनुसार खाद देना अधिक वैज्ञानिक तरीका है।
मौसम आधारित खेती पर रहेगा जोर
Rabi Season 2026 में मौसम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।मानसून के बाद मिट्टी में उपलब्ध नमी, सर्दियों का तापमान, शीतलहर, कोहरा और अचानक बारिश रबी फसलों को प्रभावित कर सकते हैं।ऐसे में किसानों के लिए मौसम आधारित advisories का पालन करना उपयोगी हो सकता है।कृषि मंत्रालय ने खेत बचाओ अभियान में भी मौसम, मिट्टी और बाजार के हिसाब से किसानों को सलाह देने पर जोर दिया था।
जलवायु परिवर्तन रबी खेती के लिए बड़ी चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में खेती पर अनियमित मौसम का प्रभाव अधिक चर्चा में आया है।तापमान में बदलाव और बारिश के समय में अनिश्चितता जैसी स्थितियां फसलों की growth cycle को प्रभावित कर सकती हैं।ऐसी परिस्थितियों में climate-resilient varieties, बेहतर सिंचाई प्रबंधन, crop diversification और soil moisture conservation जैसी तकनीकों की भूमिका बढ़ती है।खेत बचाओ अभियान का उद्देश्य भी खेती को लंबे समय के लिए टिकाऊ बनाना है।
किसानों के लिए रबी सीजन 2026 की तैयारी कैसे हो?
रबी फसल बोने से पहले किसानों को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।सबसे पहले मिट्टी की जांच कराई जा सकती है।इसके बाद प्रमाणित और स्थानीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त बीज चुना जाए।फसल की बुवाई सही समय पर करना भी महत्वपूर्ण है।खाद की मात्रा Soil Health Card या कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार तय की जा सकती है।सिंचाई वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता के अनुसार फसल चुनना उपयोगी हो सकता है।दलहन और तिलहन की खेती करने वाले किसानों को भी अपने राज्य की खरीद व्यवस्था और बाजार कीमतों पर नजर रखनी चाहिए।
FTA का लाभ लेने के लिए किसानों को क्या करना होगा?
अगर किसान भविष्य में export-oriented agriculture का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो उन्हें केवल उत्पादन मात्रा पर नहीं बल्कि गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा।इसके लिए FPO से जुड़ना एक उपयोगी विकल्प हो सकता है।किसान अपने जिले के कृषि विभाग, APEDA से जुड़े संसाधनों, KVK और मान्यता प्राप्त exporters से जानकारी ले सकते हैं।
International market में residue standards, grading और packaging बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए FTA को केवल “विदेश में सामान बेचने का मौका” समझने के बजाय पूरी export ecosystem के रूप में देखना चाहिए।
छोटे किसानों तक फायदा पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती
भारत की खेती में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या बड़ी है।इन किसानों के पास अक्सर storage, processing या export infrastructure नहीं होता। अगर FTA से जुड़े कृषि अवसरों का लाभ गांव स्तर तक पहुंचाना है, तो FPO, cooperatives, cold storage, food processing units और ग्रामीण logistics को मजबूत करना जरूरी होगा।
अन्यथा निर्यात बढ़ने का अधिकांश फायदा supply chain के बड़े कारोबारियों तक सीमित रहने का जोखिम हो सकता है।इसलिए किसान को बाजार से जोड़ने वाली संस्थागत व्यवस्था उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना व्यापार समझौता।
Rabi Season 2026 में सरकार के सामने प्रमुख प्राथमिकताएं
इस बार सरकार की रबी रणनीति के कई पहलू दिखाई देते हैं।एक तरफ दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने का प्रयास है।दूसरी तरफ मिट्टी की सेहत और संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर है।इसके साथ किसान क्रेडिट, Farmer ID, बीज की उपलब्धता, खाद की सप्लाई और खरीद व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जा रहा है। 28 सितंबर के राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में इन मुद्दों पर राज्यों के साथ चर्चा की गई। सरकार कृषि उत्पादन से लेकर वित्त, डिजिटल पहचान, मिट्टी स्वास्थ्य और बाजार तक कई स्तरों पर काम करने की बात कर रही है।
India-New Zealand FTA 20 अक्टूबर से लागू
किसानों के लिहाज से अक्टूबर 2026 की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक तारीखों में से एक 20 October 2026 है।
इसी दिन India-New Zealand FTA लागू होने वाला है।
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार समझौते से भारत से न्यूजीलैंड जाने वाले 100 प्रतिशत निर्यात को पहले दिन से zero-duty access मिलेगा। सरकार ने कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों को भी संभावित लाभ वाले क्षेत्रों में शामिल किया है।
यह समझौता 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में हस्ताक्षरित हुआ था।
क्या 22 अक्टूबर से शुरू होगा नया खेत बचाओ अभियान?
फिलहाल इस दावे पर सावधानी रखना जरूरी है।29 सितंबर 2026 तक उपलब्ध केंद्र सरकार की आधिकारिक सूचनाओं में 22 अक्टूबर से नए राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ के शुभारंभ की स्पष्ट घोषणा नहीं दिखाई देती। आधिकारिक रिकॉर्ड में:
1 जून से 30 जून 2026: मूल खेत बचाओ अभियान चला।
28 सितंबर 2026: कृषि मंत्री ने रबी सीजन में भी ‘खेत बचाओ’ चलाने को कहा।
20 अक्टूबर 2026: India-New Zealand FTA लागू होगा।
इसलिए 22 अक्टूबर से जुड़ी किसी भी नई घोषणा की पुष्टि कृषि मंत्रालय या PIB के नए आधिकारिक नोटिफिकेशन से करना उचित होगा।Rabi Season 2026 भारतीय कृषि के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण रहने वाला है। एक ओर गेहूं, चना, मसूर और सरसों जैसी रबी फसलों की बेहतर पैदावार पर ध्यान रहेगा, वहीं दूसरी तरफ मिट्टी की सेहत, पानी की उपलब्धता और संतुलित खाद के इस्तेमाल को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि Khet Bachao Abhiyan 2026 का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक खेती, मृदा स्वास्थ्य, Soil Health Card, जल संरक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग से जोड़ना है। अब रबी सीजन में भी इस अभियान को जारी रखने की बात कही गई है।
इसी बीच India-New Zealand FTA का 20 अक्टूबर 2026 से लागू होना भारतीय कृषि और processed food sector के लिए नए बाजार अवसर पैदा कर सकता है। सरकार के अनुसार भारतीय निर्यात को न्यूजीलैंड में zero-duty access मिलने से कृषि-प्रसंस्करण समेत कई क्षेत्रों के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि किसी भी FTA का वास्तविक फायदा किसान तक तभी पहुंचेगा, जब किसान को बाजार की सही जानकारी, गुणवत्ता मानकों, processing, packaging, FPO, logistics और export supply chain से जोड़ा जाए।
इसलिए आने वाले समय में government agriculture campaign for farmers 2026 की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वैज्ञानिक खेती और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी जानकारी गांव और खेत तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचती है।
किसानों के लिए सबसे जरूरी बात यह होगी कि वे किसी भी नई योजना या अभियान से जुड़ी जानकारी केवल आधिकारिक स्रोतों से जांचें, अपने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग के संपर्क में रहें और फसल का फैसला अपने क्षेत्र की मिट्टी, मौसम, सिंचाई और बाजार को ध्यान में रखकर करें।
