धान की खेती में बड़ी चुनौती बन रहा ब्लास्ट रोग
भारत में धान खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों में शामिल है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पंजाब और हरियाणा सहित कई राज्यों में किसान बड़े पैमाने पर धान की खेती करते हैं। अच्छी पैदावार के लिए किसान खेत की तैयारी से लेकर रोपाई, सिंचाई और खाद प्रबंधन तक काफी मेहनत करते हैं। लेकिन फसल तैयार होने के दौरान किसी बीमारी का प्रकोप बढ़ जाए तो पूरी मेहनत प्रभावित हो सकती है।
धान की ऐसी ही खतरनाक बीमारियों में ब्लास्ट रोग का नाम आता है। इसे कई क्षेत्रों में झुलसा या धान का ब्लास्ट भी कहा जाता है। हालांकि, यह जीवाणुजनित झुलसा रोग से अलग बीमारी है। ब्लास्ट का असर केवल पत्तियों तक सीमित नहीं रहता। अनुकूल मौसम मिलने पर यह पौधे की गांठों, पत्ती के जुड़ाव वाले हिस्से और बालियों की गर्दन तक पहुंच सकता है।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसकी तेजी से फैलने की क्षमता है। कई बार किसान शुरुआती धब्बों को मौसम का सामान्य प्रभाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। धीरे-धीरे पत्तियों पर निशान बढ़ने लगते हैं और पौधे की भोजन बनाने की क्षमता प्रभावित होती है।
धान में ब्लास्ट की समस्या विशेष रूप से तब गंभीर हो सकती है, जब लगातार नमी बनी रहे, खेत में हवा का आवागमन कम हो और फसल में नाइट्रोजन की मात्रा जरूरत से ज्यादा हो। ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे पौधों की नियमित जांच करें। बीमारी की शुरुआत में सही पहचान होने से इसे फैलने से रोकने की संभावना बढ़ जाती है।
ब्लास्ट रोग क्या है और यह कैसे फैलता है?
ब्लास्ट रोग एक फफूंदजनित बीमारी है। इसका प्रमुख कारक Magnaporthe oryzae नामक फफूंद है। कृषि साहित्य में इसे Pyricularia oryzae के नाम से भी जाना जाता है।यह रोगजनक धान के पौधों के विभिन्न ऊपरी हिस्सों को संक्रमित कर सकता है। बीमारी फैलने के लिए हवा, नमी और अनुकूल तापमान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संक्रमित पौधों से निकलने वाले फफूंद के बीजाणु हवा के साथ आसपास की फसल तक पहुंच सकते हैं। यदि मौसम लगातार नम बना रहे तो इन बीजाणुओं के विकसित होने और नए पौधों पर संक्रमण करने की संभावना बढ़ जाती है।
कई बार संक्रमित बीज या पिछली फसल के अवशेष भी रोग के स्रोत बन सकते हैं। इसलिए खेत में दिखाई देने वाली बीमारी को केवल मौजूदा मौसम से जोड़कर देखना ठीक नहीं है। खेती की पुरानी व्यवस्था, बीज की गुणवत्ता और पौधों की देखभाल भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकती है।
धान की कुछ किस्में ब्लास्ट के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, जबकि दूसरी किस्मों में बीमारी सहन करने की क्षमता बेहतर मिलती है। हालांकि, किसी भी किस्म की रोगरोधी क्षमता हर स्थान और हर मौसम में एक जैसी बनी रहे, यह जरूरी नहीं है।
धान की फसल में ब्लास्ट रोग के शुरुआती लक्षण कैसे पहचानें?
ब्लास्ट रोग की पहचान के लिए सबसे पहले धान की पत्तियों को ध्यान से देखना चाहिए। शुरुआती अवस्था में पत्तियों पर छोटे भूरे धब्बे दिखाई दे सकते हैं। समय के साथ ये धब्बे लंबे और दोनों सिरों से नुकीले होने लगते हैं।बीमारी बढ़ने पर धब्बों का बीच का हिस्सा हल्का भूरा या राख जैसा दिखाई देता है, जबकि किनारे गहरे भूरे रंग के हो सकते हैं।ब्लास्ट रोग के कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
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धान की पत्तियों पर छोटे भूरे या गहरे रंग के धब्बे बनना।
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धब्बों का धीरे-धीरे लंबा होकर नाव या हीरे जैसी आकृति लेना।
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धब्बों के बीच में धूसर रंग और किनारों पर गहरा भूरा रंग दिखाई देना।
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एक से अधिक धब्बों का आपस में मिलकर पत्ती के बड़े हिस्से को प्रभावित करना।
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गंभीर संक्रमण होने पर पत्तियों का समय से पहले सूखना।
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पौधों की वृद्धि कमजोर पड़ना और बालियों के विकास पर असर होना।
ध्यान देने वाली बात यह है कि पत्तियों पर हर भूरा धब्बा ब्लास्ट का संकेत नहीं होता। धान में ब्राउन स्पॉट, पोषक तत्वों की कमी और दूसरे रोगों के कारण भी ऐसे निशान दिखाई दे सकते हैं।इसलिए किसान केवल एक लक्षण देखकर बीमारी तय करने के बजाय पत्तियों के धब्बों की बनावट, मौसम और खेत में संक्रमण के फैलाव को भी देखें।
ब्लास्ट रोग के अलग-अलग प्रकार और उनका फसल पर असर
धान में यह बीमारी पौधे के जिस हिस्से पर हमला करती है, उसके आधार पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
1. लीफ ब्लास्ट: पत्तियों पर हमला
लीफ ब्लास्ट में बीमारी सबसे पहले पत्तियों पर दिखाई देती है। पत्तियों की हरी सतह प्रभावित होने से पौधे की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता घट सकती है।यदि संक्रमण ज्यादा हो तो पत्तियां जल्दी सूखने लगती हैं। इसका सीधा असर पौधों की वृद्धि और बाद में बनने वाली बालियों पर पड़ सकता है।
2. कॉलर ब्लास्ट: पत्ती के जुड़ाव वाले हिस्से में संक्रमण
धान के पौधे में जहां पत्ती का फैलाव वाला भाग और उसका आधार आपस में मिलते हैं, उस हिस्से को कॉलर कहा जाता है।इस स्थान पर संक्रमण होने से पत्ती का ऊपरी भाग सूख सकता है। कई बार पत्ती देखने में ठीक लगती है, लेकिन आधार के पास बीमारी बढ़ चुकी होती है।
3. नोड ब्लास्ट: तने की गांठों पर असर
इस प्रकार के ब्लास्ट में तने की गांठें प्रभावित होती हैं। संक्रमित जगह का रंग गहरा पड़ सकता है और तना कमजोर हो सकता है।गंभीर स्थिति में पौधे का प्रभावित हिस्सा टूटने या झुकने की आशंका बढ़ जाती है।
4. नेक ब्लास्ट: बालियों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक
नेक ब्लास्ट को धान की फसल के लिए विशेष रूप से खतरनाक माना जाता है।इसमें धान की बाली के ठीक नीचे गर्दन वाले हिस्से पर संक्रमण होता है। प्रभावित हिस्सा भूरा या काला पड़ सकता है। संक्रमण गंभीर होने पर बाली तक पानी और पोषक तत्वों की आपूर्ति बाधित होती है।इसके कारण दानों का भराव प्रभावित होता है। कई बार बालियां समय से पहले सूखी दिखाई देती हैं और उनमें हल्के या अधूरे विकसित दाने रह जाते हैं।
किसानों को यह समझना जरूरी है कि पत्तियों पर बीमारी कम दिखाई देने का मतलब यह नहीं कि बालियां पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसलिए बालियां निकलने और दाने बनने की अवस्था में भी फसल की निगरानी करनी चाहिए।
अक्टूबर 2026 का नया अपडेट: ब्लास्ट से बचाव के लिए वैज्ञानिकों को मिली बड़ी सफलता
धान की खेती से जुड़ी एक महत्वपूर्ण नई जानकारी अगस्त 2026 में सामने आई थी। इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) से जुड़े वैज्ञानिकों ने नेक ब्लास्ट के खिलाफ धान की प्राकृतिक रोगरोधी क्षमता से संबंधित एक अहम आनुवंशिक क्षेत्र की पहचान की है।
26 अगस्त 2026 को प्रकाशित जानकारी के अनुसार वैज्ञानिकों ने धान के गुणसूत्र संख्या 12 पर स्थित qNB1 नामक आनुवंशिक क्षेत्र की पहचान की। इस शोध में Ptr-a नामक जीन की भूमिका महत्वपूर्ण पाई गई।वैज्ञानिकों के अनुसार यह जीन धान के पौधे को ब्लास्ट संक्रमण से बचाने वाली प्राकृतिक रक्षा प्रणाली में योगदान दे सकता है।
शोधकर्ताओं ने धान की 335 अलग-अलग आनुवंशिक प्रविष्टियों का अध्ययन किया। इसके जरिए वे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि कुछ पौधे ब्लास्ट संक्रमण को बेहतर तरीके से क्यों सहन कर लेते हैं, जबकि दूसरे पौधों में बीमारी तेजी से बढ़ जाती है।
अध्ययन के दौरान एक विशेष आनुवंशिक संकेतक qNB1:H1 की पहचान हुई। शोध के अनुसार इससे परीक्षण की गई आबादी में नेक ब्लास्ट के प्रति प्रतिरोधी पौधों की पहचान लगभग 86 प्रतिशत सटीकता के साथ की जा सकी। यह खोज भविष्य में धान की ऐसी किस्में विकसित करने में मददगार हो सकती है, जिनमें ब्लास्ट रोग का खतरा कम हो।
हालांकि किसानों को यह नहीं समझना चाहिए कि इस खोज के आधार पर कोई नई किस्म तुरंत बाजार में उपलब्ध हो गई है। अभी इस शोध का प्रमुख महत्व नई किस्मों के विकास और वैज्ञानिक चयन प्रक्रिया में है।
अक्टूबर 2026 में रोग सहनशील धान की किस्मों को लेकर भी नई जानकारी
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से 8 अक्टूबर 2026 को नागालैंड में आयोजित किसान फील्ड डे के दौरान धान की सात नई किस्मों के बारे में जानकारी दी गई।आईसीएआर के अनुसार इन किस्मों को अप्रैल 2026 में राज्य स्तर पर जारी करने की स्वीकृति मिली थी। इनमें ब्लास्ट रोग के प्रति सहनशीलता के साथ-साथ नमी की कमी सहन करने की क्षमता भी बताई गई है।इन किस्मों की परिपक्वता अवधि लगभग 115 से 120 दिन बताई गई, जबकि उपयुक्त परिस्थितियों में इनकी संभावित उत्पादकता 5 से 7 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है।
यह जानकारी बताती है कि धान की नई किस्मों को विकसित करते समय वैज्ञानिक केवल ज्यादा उत्पादन पर ही ध्यान नहीं दे रहे हैं। अब बदलते मौसम और बीमारियों से मुकाबला करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण बनती जा रही है।हालांकि नागालैंड के लिए विकसित किस्मों को देश के दूसरे राज्यों में बिना स्थानीय परीक्षण और कृषि विभाग की सिफारिश के अपनाना उचित नहीं होगा।
किन मौसम परिस्थितियों में तेजी से फैलता है ब्लास्ट रोग?
धान में ब्लास्ट रोग के बढ़ने का संबंध मौसम से काफी हद तक होता है। लगातार बारिश, सुबह के समय ओस और हवा में अधिक नमी रहने से बीमारी के फैलने की संभावना बढ़ सकती है।सामान्य तौर पर 20 से 28 डिग्री सेल्सियस के आसपास का अनुकूल तापमान, लंबे समय तक गीली पत्तियां और अधिक आर्द्रता फफूंद के विकास में मदद कर सकते हैं। हालांकि, बीमारी का वास्तविक प्रकोप धान की किस्म, स्थानीय मौसम और रोगजनक की सक्रियता पर निर्भर करता है।
खासकर उन खेतों में जोखिम बढ़ सकता है जहां पौधे बहुत घने हों और हवा आसानी से अंदर तक न पहुंच पाती हो।बारिश के बाद कई किसान मान लेते हैं कि खेत में पर्याप्त पानी होने के कारण पौधों को कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन पानी की उपलब्धता और पत्तियों पर लंबे समय तक रहने वाली नमी दो अलग बातें हैं।खेत में पानी होने से जरूरी नहीं कि ब्लास्ट बढ़े ही, लेकिन वातावरण में लगातार नमी और पत्तियों के गीले रहने की अवधि रोग के लिए अनुकूल हो सकती है।इसलिए किसानों को बारिश के बाद केवल खेत में पानी की स्थिति नहीं देखनी चाहिए, बल्कि पत्तियों और बालियों की भी जांच करनी चाहिए।
ज्यादा यूरिया डालने से क्यों बढ़ सकता है ब्लास्ट रोग का खतरा?
धान की खेती में यूरिया का इस्तेमाल आम है। किसानों को लगता है कि अधिक यूरिया डालने से पौधे तेजी से बढ़ेंगे और उत्पादन भी बढ़ेगा। लेकिन जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं।अधिक नाइट्रोजन से पौधों में कोमल और घनी बढ़वार हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में ब्लास्ट रोग का खतरा बढ़ सकता है, विशेषकर तब जब मौसम भी संक्रमण के अनुकूल हो।
जुलाई 2026 में IRRI ने भारत में धान के बेहतर नाइट्रोजन प्रबंधन से संबंधित एक अध्ययन की जानकारी साझा की थी। महाराष्ट्र और ओडिशा में किए गए शोध कार्य में खेतों की जानकारी, मिट्टी, सेंसर और उपग्रह आधारित आंकड़ों की सहायता से नाइट्रोजन प्रबंधन को बेहतर बनाने की संभावनाओं का अध्ययन किया गया।इस शोध का मुख्य उद्देश्य उर्वरकों के इस्तेमाल को अधिक सटीक बनाना और कृषि उत्पादन को टिकाऊ बनाना है।
किसानों के लिए इसका सीधा मतलब है कि खाद का इस्तेमाल अंदाजे से करने के बजाय मिट्टी की जरूरत और फसल की अवस्था के अनुसार करना अधिक फायदेमंद हो सकता है।धान में नाइट्रोजन के साथ फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर उर्वरक प्रबंधन करना बेहतर रहता है।
ब्लास्ट रोग से बचाव के लिए किसानों को क्या करना चाहिए?
ब्लास्ट रोग की रोकथाम के लिए सबसे जरूरी है कि किसान बीमारी सामने आने का इंतजार न करें। खेती की शुरुआत से ही कुछ सावधानियां अपनाने पर संक्रमण का जोखिम कम किया जा सकता है।
सही और स्वस्थ बीज का चुनाव करें
धान की खेती में बीज की गुणवत्ता का सीधा संबंध पौधों के स्वास्थ्य से होता है। किसानों को प्रमाणित स्रोत से स्वस्थ बीज लेना चाहिए।यदि किसी किसान के खेत में पिछले सीजन के दौरान ब्लास्ट का अधिक प्रकोप रहा है, तो उसी खेत की प्रभावित फसल से लिया गया बीज बिना उचित जांच के इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से यह भी जानकारी ले सकते हैं कि क्षेत्र में कौन-सी धान की किस्म ब्लास्ट के प्रति बेहतर प्रतिरोध दिखा रही है।
रोग सहनशील किस्मों को प्राथमिकता दें
धान की सभी किस्मों में ब्लास्ट से लड़ने की क्षमता एक जैसी नहीं होती।कुछ किस्मों में रोग का संक्रमण अपेक्षाकृत कम होता है। इसलिए किसान अपने जिले के लिए अनुशंसित रोगरोधी या रोग सहनशील किस्मों का चयन करें।एक ही किस्म को लगातार बड़े क्षेत्र में लगाने से भी कभी-कभी रोग प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि समय के साथ फफूंद की अलग-अलग आबादियां विकसित हो सकती हैं।
पौधों के बीच उचित दूरी रखें
बहुत घनी रोपाई करने से खेत में हवा का आवागमन कम हो सकता है। इससे पत्तियां अधिक समय तक नम रह सकती हैं।उचित दूरी पर रोपाई करने से पौधों की देखभाल, निरीक्षण और सामान्य वृद्धि बेहतर हो सकती है।रोपाई की दूरी धान की किस्म, पौधों की उम्र और स्थानीय खेती की पद्धति के अनुसार तय करनी चाहिए।
खेत की नियमित निगरानी करें
फसल की नियमित निगरानी ब्लास्ट रोग से बचाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।किसानों को सप्ताह में कम से कम दो बार खेत के अलग-अलग हिस्सों का निरीक्षण करना चाहिए। बारिश और लंबे समय तक नम मौसम रहने पर निगरानी और बढ़ाई जा सकती है।जांच के दौरान केवल खेत के किनारे खड़े होकर फसल देखने के बजाय अंदर के हिस्सों में भी पत्तियों की स्थिति देखें।यदि कुछ पौधों में असामान्य धब्बे दिखाई दें तो उनकी तस्वीर लेकर कृषि विशेषज्ञ से पहचान कराना उपयोगी हो सकता है।
फसल के अवशेष और खरपतवार का प्रबंधन करें
कटाई के बाद खेत में बचे संक्रमित पौधों के अवशेष कुछ परिस्थितियों में रोग के बने रहने में भूमिका निभा सकते हैं।इसलिए खेत की सफाई और अवशेषों का उचित प्रबंधन जरूरी है। अवशेष जलाने के बजाय स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार उन्हें सुरक्षित तरीके से मिट्टी में मिलाने या दूसरे उपयोगी विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।खरपतवारों की नियमित सफाई से भी खेत का प्रबंधन बेहतर होता है।
धान में ब्लास्ट रोग दिखाई देने पर तुरंत कौन-से कदम उठाएं?
यदि किसान को खेत में ब्लास्ट के लक्षण दिखाई देते हैं, तो सबसे पहले बीमारी की सही पहचान पर ध्यान देना चाहिए।कई बार धान की पत्तियों में पोषक तत्वों की कमी के कारण भी धब्बे बन सकते हैं। कुछ दूसरे फफूंदजनित रोग भी ब्लास्ट जैसे दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में गलत पहचान के आधार पर उपचार करने से अनावश्यक खर्च बढ़ सकता है। किसान प्रभावित पौधों की स्पष्ट तस्वीर लें और नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग या प्रशिक्षित पौध रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें। रोग की पुष्टि होने तक अतिरिक्त नाइट्रोजन खाद देने से बचना समझदारी हो सकती है। साथ ही खेत में पानी की स्थिति और पौधों की बढ़वार पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर बीमारी बालियों तक पहुंचने लगी है, तो विशेषज्ञ की सलाह जल्द लेना जरूरी है, क्योंकि इस अवस्था में दानों के विकास पर असर पड़ सकता है। ध्यान रखें: पहले से गंभीर रूप से प्रभावित पत्तियां या बालियां दोबारा सामान्य नहीं हो जातीं। रोग प्रबंधन का उद्देश्य आगे संक्रमण को सीमित करना और फसल के स्वस्थ हिस्सों को बचाना होता है।
ब्लास्ट रोग में फफूंदनाशी का इस्तेमाल कब जरूरी हो सकता है?
धान में ब्लास्ट के गंभीर प्रकोप की स्थिति में कृषि विशेषज्ञ फफूंदनाशी आधारित उपचार की सलाह दे सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की खरीफ कृषि सलाह में भी ब्लास्ट प्रबंधन के लिए फसल की स्थिति के अनुसार फफूंदनाशी विकल्पों का उल्लेख किया गया है। हालांकि हर खेत के लिए एक ही उत्पाद उपयुक्त नहीं होता। बीमारी की अवस्था, धान की किस्म, स्थानीय कृषि विभाग की सिफारिश और उत्पाद की मौजूदा स्वीकृति को ध्यान में रखना जरूरी है। विशेष रूप से बालियां निकलने और दाना बनने की अवस्था में बिना विशेषज्ञ की सलाह के किसी भी फफूंदनाशी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कृषि रसायनों के साथ सुरक्षा संबंधी जोखिम भी जुड़े होते हैं। इसलिए इनका चयन और प्रयोग प्रशिक्षित वयस्क द्वारा अनुमोदित लेबल, आवश्यक सुरक्षा सावधानियों और स्थानीय कृषि विभाग के निर्देशों के अनुसार ही होना चाहिए। किसानों को केवल सोशल मीडिया पर बताए गए उपचार या दुकान से मिली सामान्य सलाह के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए।
ब्लास्ट रोग और ब्राउन स्पॉट में अंतर कैसे समझें?
धान की फसल में ब्लास्ट रोग और ब्राउन स्पॉट को लेकर कई बार किसान भ्रमित हो जाते हैं।दोनों बीमारियों में पत्तियों पर धब्बे दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी बनावट अलग हो सकती है।
| पहचान | ब्लास्ट रोग | ब्राउन स्पॉट |
|---|---|---|
| धब्बों का आकार | प्रायः लंबे, दोनों सिरों से नुकीले | अक्सर गोल या अंडाकार |
| बीच का रंग | हल्का भूरा या धूसर | भूरा या हल्का धूसर |
| किनारे | गहरे भूरे | गहरे भूरे |
| प्रभावित हिस्से | पत्ती, कॉलर, गांठ और बाली की गर्दन | मुख्य रूप से पत्ती, अन्य भाग भी प्रभावित हो सकते हैं |
| नुकसान | पत्तियों और दाना भरने की क्षमता पर असर | पत्ती के स्वास्थ्य और उपज पर असर |
केवल धब्बों के आधार पर अंतिम निदान करना हमेशा संभव नहीं है। इसलिए संदेह की स्थिति में कृषि विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।
बालियां निकलने के समय सबसे अधिक सावधानी क्यों जरूरी है?
धान की फसल में बालियां निकलने से पहले और उसके तुरंत बाद की अवस्था काफी महत्वपूर्ण होती है।इस दौरान पौधा अपनी ऊर्जा दानों के विकास की ओर लगाता है। यदि इसी समय नेक ब्लास्ट का संक्रमण हो जाए, तो दानों तक पोषक तत्व पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।कई बार धान की बाली देखने में सामान्य लगती है, लेकिन उसका गर्दन वाला हिस्सा प्रभावित होने लगता है।धीरे-धीरे दानों का भराव कम होने लगता है और कुछ बालियां समय से पहले सूखी दिखाई दे सकती हैं।इसलिए इस अवस्था में खेत का निरीक्षण करते समय पत्तियों के साथ-साथ बाली के नीचे वाले हिस्से को भी देखना चाहिए।अगर बालियों की गर्दन पर गहरे धब्बे दिखाई दें या कुछ बालियां असामान्य रूप से सूख रही हों, तो बीमारी की जांच जरूरी हो जाती है।हालांकि हर सूखी बाली के पीछे ब्लास्ट ही जिम्मेदार नहीं होता। पानी की कमी, कीटों का नुकसान और दूसरी समस्याएं भी इसके कारण हो सकती हैं।
क्या ब्लास्ट रोग से धान की पूरी पैदावार खत्म हो सकती है?
गंभीर परिस्थितियों में ब्लास्ट रोग धान की पैदावार को बहुत अधिक प्रभावित कर सकता है।नुकसान कितना होगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है। इनमें धान की किस्म, फसल की अवस्था, मौसम, बीमारी फैलने की अवधि और किसान द्वारा अपनाए गए प्रबंधन के उपाय शामिल हैं।यदि बीमारी शुरुआती अवस्था में सीमित हो और समय पर प्रबंधन किया जाए तो नुकसान अपेक्षाकृत कम रह सकता है।लेकिन नेक ब्लास्ट के गंभीर संक्रमण में बड़ी संख्या में बालियां प्रभावित होने पर दानों का भराव रुक सकता है।अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा अगस्त 2026 में प्रकाशित जानकारी में भी ब्लास्ट को विश्व स्तर पर धान की बड़ी चुनौतियों में शामिल किया गया है।वैश्विक स्तर पर ब्लास्ट से होने वाले नुकसान को लेकर प्रकाशित अध्ययनों में काफी बड़े अनुमान सामने आए हैं। हालांकि ऐसे अनुमानों को भारत के हर किसान या हर खेत में होने वाले निश्चित नुकसान के रूप में नहीं देखना चाहिए।
बदलते मौसम में किसानों को किस तरह की तैयारी करनी चाहिए?
धान की खेती में मौसम की अनिश्चितता किसानों के लिए एक नई चुनौती बन रही है।कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश होती है, जबकि कुछ स्थानों पर बारिश के बीच लंबे सूखे अंतराल देखने को मिलते हैं। ऐसी परिस्थितियां फसल की बढ़वार और रोगों के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।किसानों को अपने क्षेत्र के मौसम पूर्वानुमान पर नियमित ध्यान देना चाहिए। खासकर जब कई दिनों तक बादल छाए रहने, अधिक आर्द्रता और बारिश की संभावना हो।मौसम की जानकारी मिलने से किसान पहले से खेत की निगरानी बढ़ा सकते हैं।
स्थानीय कृषि मौसम सलाह में यदि धान के रोगों को लेकर चेतावनी जारी की गई हो, तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए।कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और सरकारी कृषि मौसम सेवाओं से प्राप्त जानकारी इसमें मददगार हो सकती है।
एकीकृत रोग प्रबंधन क्यों है सबसे बेहतर विकल्प?
ब्लास्ट रोग से बचाव के लिए केवल एक उपाय पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।कृषि विज्ञान में इसे एकीकृत रोग प्रबंधन कहा जाता है। इसमें बीज की गुणवत्ता, रोग सहनशील किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, उचित रोपाई, खेत की निगरानी और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ आधारित उपचार को साथ लेकर चला जाता है।
मान लीजिए किसी किसान ने अच्छी रोगरोधी किस्म लगाई है, लेकिन खेत में बहुत घनी रोपाई की है और जरूरत से ज्यादा यूरिया दिया है। ऐसी स्थिति में मौसम अनुकूल होने पर बीमारी की आशंका फिर भी बनी रह सकती है।इसी तरह यदि किसान केवल फसल के संक्रमित होने के बाद उपचार के बारे में सोचता है, तो कई बार नुकसान शुरू हो चुका होता है।इसलिए ब्लास्ट रोग को नियंत्रित रखने के लिए खेती की पूरी प्रक्रिया पर ध्यान देना जरूरी है।यह तरीका अनावश्यक खर्च कम करने और फसल को अधिक स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।
समय पर पहचान ही धान को ब्लास्ट रोग से बचाने की पहली जरूरत
धान की खेती में ब्लास्ट रोग किसानों के लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन सही जानकारी और नियमित निगरानी से इसके जोखिम को कम किया जा सकता है।पत्तियों पर लंबे भूरे धब्बे, बीच में राख जैसा रंग और बालियों की गर्दन पर संक्रमण जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।साथ ही किसानों को संतुलित खाद प्रबंधन, स्वस्थ बीज, उपयुक्त रोपाई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रोग सहनशील किस्मों पर ध्यान देना चाहिए।
साल 2026 की नई वैज्ञानिक खोजों से उम्मीद बढ़ी है कि आने वाले समय में धान की अधिक मजबूत किस्में विकसित की जा सकेंगी। फिलहाल किसानों के लिए सबसे उपयोगी उपाय यही है कि वे खेत की नियमित निगरानी करें और बीमारी की पुष्टि होने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उचित कदम उठाएं।
