जम्मू-कश्मीर में लंपी बीमारी को लेकर प्रशासन सतर्क
जम्मू: जम्मू-कश्मीर में पशुपालकों के सामने एक बार फिर लंपी स्किन डिजीज बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। गाय और अन्य संवेदनशील मवेशियों को प्रभावित करने वाली इस वायरल बीमारी को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर का पशुपालन विभाग सक्रिय हो गया है। बीमारी से प्रभावित इलाकों में निगरानी बढ़ाने और पशुओं को संक्रमण से बचाने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार की एक टीम ने जम्मू, सांबा और कठुआ जिलों का दौरा किया। टीम ने प्रभावित गांवों में जाकर पशुओं की स्वास्थ्य स्थिति, बीमारी के लक्षण, पशुपालकों की परेशानियों और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का जायजा लिया।
इस दौरे का मुख्य उद्देश्य संक्रमण की वास्तविक स्थिति को समझना और बीमारी की रोकथाम के लिए चल रहे प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाना था। इसके साथ ही स्थानीय पशुपालन अधिकारियों को निगरानी, जांच और समय पर रिपोर्टिंग के महत्व पर ध्यान देने के लिए कहा गया। जानकारी के मुताबिक, केंद्रीय टीम ने पशुपालकों से सीधा संवाद किया और उन्हें बीमारी से बचाव के आवश्यक उपायों के बारे में बताया। प्रशासन के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता संक्रमण को फैलने से रोकना और पशुपालकों की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
केंद्रीय टीम ने तीन जिलों में किया दौरा
जम्मू-कश्मीर में लंपी स्किन डिजीज की स्थिति की समीक्षा करने के लिए केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग में उप आयुक्त (पशु स्वास्थ्य) डॉ. सुदाम बाघ ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया। उनके साथ जम्मू के आरएस पुरा स्थित एमएस इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल हेल्थ एंड बायोलॉजिकल प्रोडक्शन के तकनीकी सहायक डॉ. संदीप पंडिता भी मौजूद रहे। उन्होंने संपर्क अधिकारी के रूप में दौरे में सहयोग किया।
केंद्रीय अधिकारियों ने विभिन्न गांवों में जाकर पशुओं की स्थिति देखी और स्थानीय पशुपालन विभाग द्वारा किए जा रहे कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने यह समझने का प्रयास किया कि प्रभावित पशुपालकों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से उनकी सहायता किस तरह की जा सकती है।
यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंपी जैसी संक्रामक पशु बीमारी से निपटने के लिए केवल पशुओं का उपचार पर्याप्त नहीं होता। संक्रमण की निगरानी, समय पर जांच, संवेदनशील पशुओं का टीकाकरण और किसानों को सही जानकारी देना भी आवश्यक है। केंद्रीय टीम के दौरे से स्थानीय विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और बीमारी के नियंत्रण संबंधी उपायों की समीक्षा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
प्रभावित पशुपालकों को वितरित की गई जरूरी सामग्री
केंद्रीय टीम ने प्रभावित क्षेत्रों में पशुपालकों की सहायता के लिए जरूरी सामग्री का वितरण भी किया। इसमें मिनरल मिक्सचर, घावों की देखभाल के लिए ड्रेसिंग सामग्री और कीटाणुनाशक शामिल थे।
लंपी स्किन डिजीज से प्रभावित पशुओं में त्वचा पर गांठें और घाव होने की समस्या सामने आ सकती है। ऐसी स्थिति में पशुओं को संक्रमण से बचाने, उनकी उचित देखभाल करने और पशु चिकित्सकों की सलाह के अनुसार उपचार देने की जरूरत होती है। अधिकारियों ने पशुपालकों को पशुशालाओं की साफ-सफाई, संक्रमित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखने और पशुओं के आसपास मक्खियों तथा मच्छरों की संख्या नियंत्रित करने के महत्व के बारे में जानकारी दी।
इसके अलावा पशुपालन विभाग के अधिकारियों के साथ जागरूकता कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया गया। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को बीमारी के लक्षणों की पहचान और संक्रमण रोकने के उपायों के प्रति जागरूक करना था। विशेषज्ञ दिशानिर्देशों के अनुसार, बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर पशु चिकित्सक से संपर्क करना बेहद महत्वपूर्ण है। समय पर चिकित्सकीय सहायता मिलने से पशु की देखभाल बेहतर ढंग से की जा सकती है।
जम्मू, सांबा और कठुआ में पशुओं के नमूने एकत्र
केंद्रीय टीम के दौरे के दौरान बीमारी की निगरानी और जांच को भी विशेष महत्व दिया गया। प्रभावित मवेशियों के नमूने एकत्र करने के लिए अलग-अलग जांच दलों ने काम किया।सांबा और कठुआ जिलों में डिप्टी डायरेक्टर, रिसर्च एंड प्रोडक्शन (DDR&P) की टीमों ने तालाब तिल्लो के प्रयोगशाला अधिकारी डॉ. अभिमन्यु चौहान के नेतृत्व में प्रभावित पशुओं के नमूने एकत्र किए।इसी तरह जम्मू जिले में डिस्ट्रिक्ट इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (DIO) की टीम ने प्रयोगशाला अधिकारी डॉ. रविंदर सिंह ठाकुर के नेतृत्व में पशुओं से नमूने लिए।जम्मू जिले के दौरे के दौरान आरएस पुरा के पशुधन विकास अधिकारी डॉ. मुदस्सिर नजर भी केंद्रीय अधिकारी के साथ मौजूद रहे।इन नमूनों की प्रयोगशाला जांच से पशुओं में संक्रमण की पुष्टि तथा बीमारी की स्थिति का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने में सहायता मिल सकती है।जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मवेशियों में त्वचा संबंधी कुछ अन्य बीमारियों के लक्षण भी लंपी जैसे दिखाई दे सकते हैं। प्रयोगशाला परीक्षण संक्रमण की सही पहचान करने में मदद करता है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में इन नमूनों के अंतिम जांच परिणाम और तीनों जिलों में संक्रमित पशुओं की कुल संख्या स्पष्ट नहीं की गई है। इसलिए बीमारी के स्थानीय प्रसार के बारे में किसी निश्चित आंकड़े का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
पशुपालन निदेशालय में हुई महत्वपूर्ण बैठक
प्रभावित इलाकों के निरीक्षण के बाद जम्मू स्थित पशुपालन निदेशालय में अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक भी आयोजित की गई।बैठक में जम्मू जिले में लंपी स्किन डिजीज की स्थिति, बीमारी की रोकथाम के लिए उठाए जा रहे कदमों और निगरानी व्यवस्था पर चर्चा हुई।अधिकारियों ने प्रभावी रोग निगरानी, समय पर मामलों की रिपोर्टिंग और पशुपालकों को लगातार जागरूक करने की आवश्यकता पर जोर दिया।केंद्रीय और स्थानीय पशुपालन विभागों के बीच समन्वय को भी महत्वपूर्ण बताया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रभावित इलाकों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर आवश्यक चिकित्सकीय और प्रशासनिक कदम उठाए जा सकें।
इस तरह की समीक्षा बैठकों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जमीनी स्तर की चुनौतियों का आकलन किया जा सके। दूरदराज के गांवों में पशु चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच, बीमारी के लक्षणों की समय पर पहचान और पशुपालकों तक सही जानकारी पहुंचाना संक्रमण नियंत्रण की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
क्या है लंपी स्किन डिजीज और कैसे फैलती है बीमारी?
लंपी स्किन डिजीज एक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से गाय और भैंस जैसे मवेशियों को प्रभावित करती है। यह बीमारी कैप्रीपॉक्स वायरस समूह के लंपी स्किन डिजीज वायरस के कारण होती है।यह संक्रमण मुख्य रूप से मक्खियों, मच्छरों और अन्य खून चूसने वाले कीटों के माध्यम से फैलता है। संक्रमित पशुओं के संपर्क में आने वाली वस्तुओं तथा दूषित उपकरणों से संक्रमण फैलने की आशंका को कम करने के लिए भी सावधानी बरतना जरूरी है।
इस बीमारी में पशुओं को बुखार हो सकता है और उनके शरीर पर गांठें उभरने लगती हैं। कुछ पशुओं में भूख कम लगना, कमजोरी, दूध उत्पादन में गिरावट और त्वचा पर घाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।संक्रमण की गंभीरता हर पशु में अलग हो सकती है। कई पशु उचित देखभाल और पशु चिकित्सकीय सहायता से स्वस्थ हो जाते हैं, जबकि गंभीर मामलों में जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।
केंद्र सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के अनुसार, यह बीमारी पशुधन स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। इसे नियंत्रित करने में टीकाकरण, संक्रमित पशुओं को अलग रखना और कीट नियंत्रण की बड़ी भूमिका होती है।
लंपी बीमारी के ये लक्षण दिखाई दें तो रहें सतर्क
तेज बुखार और सुस्ती
पशु सामान्य से अधिक सुस्त दिखाई दे सकता है और उसके व्यवहार में बदलाव आ सकता है।
त्वचा पर गांठें और सूजन
शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गोल गांठें दिखाई दे सकती हैं।
दूध उत्पादन में कमी
दुधारू पशुओं में बीमारी और कमजोरी के कारण दूध की मात्रा घट सकती है।
प्रभावित पशु कम चारा खा सकता है और उसके स्वास्थ्य में गिरावट आ सकती है।इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर पशुपालकों को तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय या पशुपालन विभाग से संपर्क करना चाहिए। केवल त्वचा की गांठों के आधार पर लंपी संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती।
पशुपालकों की आजीविका पर पड़ सकता है असर
जम्मू-कश्मीर के कई ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। गाय और भैंस जैसे दुधारू पशु परिवारों को दूध उपलब्ध कराने के साथ नियमित आय का जरिया भी बनते हैं।ऐसे में लंपी स्किन डिजीज जैसी बीमारी पशुपालकों के लिए आर्थिक चिंता पैदा कर सकती है। यदि किसी पशु में संक्रमण होता है, तो उसकी देखभाल के लिए अतिरिक्त समय और संसाधन लगाने पड़ सकते हैं।बीमारी से दूध उत्पादन प्रभावित होने की स्थिति में उन परिवारों की आय पर भी असर पड़ सकता है, जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा दूध की बिक्री से आता है।इसके अलावा पशुओं के उपचार, पौष्टिक आहार और स्वच्छता संबंधी व्यवस्थाओं पर होने वाला खर्च भी किसानों के लिए चुनौती बन सकता है।छोटे पशुपालकों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से कठिन हो सकती है, क्योंकि कई परिवारों के पास सीमित संख्या में दुधारू पशु होते हैं।
यही कारण है कि संक्रमण की शुरुआती अवस्था में पहचान और समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण माना जाता है। बीमारी को फैलने से रोकने के प्रभावी उपाय पशुओं के स्वास्थ्य के साथ ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी हैं।
टीकाकरण और निगरानी पर केंद्र सरकार का जोर
लंपी स्किन डिजीज की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार पहले से राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी और टीकाकरण कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।8 सितंबर 2026 को जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को टीकाकरण, संक्रमित पशुओं को अलग रखने, पशुओं की आवाजाही नियंत्रित करने और कीटों के नियंत्रण जैसे उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने की सलाह दी थी।
विभाग ने विशेष रूप से युवा तथा संक्रमण के प्रति संवेदनशील पशुओं के टीकाकरण पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई थी। प्रभावित क्षेत्रों के आसपास रिंग वैक्सीनेशन, यानी जोखिम वाले क्षेत्र के आसपास पात्र पशुओं का टीकाकरण, भी महत्वपूर्ण रणनीतियों में शामिल है।
केंद्र सरकार की 8 सितंबर की जानकारी के मुताबिक, देशभर में लंपी बीमारी के खिलाफ 36.18 करोड़ से अधिक टीकाकरण और पुनः टीकाकरण दर्ज किए गए थे। यह संचयी संख्या है, न कि अलग-अलग पशुओं की संख्या।
उसी तारीख को केंद्र ने देश में 3,461 सक्रिय मामलों की जानकारी दी थी। हालांकि, यह सितंबर का राष्ट्रीय आंकड़ा था और इसे अक्टूबर में जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति नहीं माना जाना चाहिए।
सरकार ने प्रयोगशाला सुविधाओं, पशु चिकित्सा कर्मचारियों के प्रशिक्षण और रोग निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता भी बताई है।
किसानों को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
पशु स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दिशानिर्देशों के अनुसार, संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए पशुपालकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।सबसे पहले, किसी पशु में लंपी जैसे लक्षण दिखाई देने पर उसे स्वस्थ पशुओं से अलग रखने और पशु चिकित्सक को सूचना देने की आवश्यकता है।पशुशाला में साफ-सफाई बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। पशुओं के आसपास मक्खियों और मच्छरों के प्रजनन को कम करने के लिए गंदगी और जमा पानी की समस्या पर ध्यान देना चाहिए।बीमार पशुओं की देखभाल में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की उचित सफाई और संक्रमण नियंत्रण संबंधी सावधानियां भी जरूरी हैं।
पशुपालकों को बिना पशु चिकित्सकीय सलाह के किसी भी दवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। लंपी एक वायरल बीमारी है और इसका कोई एक निश्चित एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। चिकित्सक पशु की स्थिति के अनुसार बुखार, दर्द, घाव और अन्य जटिलताओं का उपचार करते हैं।
स्वस्थ तथा टीकाकरण के पात्र पशुओं को विभागीय सलाह के अनुसार टीका लगवाना प्रभावी बचाव उपाय है। संक्रमित या बीमार पशु का टीकाकरण कब किया जाना चाहिए, इसका निर्णय पशु चिकित्सक को करना चाहिए।किसानों को यह भी समझना जरूरी है कि अफवाहों या अप्रमाणित घरेलू उपचारों पर निर्भर रहने से पशु को समय पर आवश्यक चिकित्सा सहायता मिलने में देरी हो सकती है।
क्या इंसानों में भी फैलती है लंपी बीमारी?
लंपी स्किन डिजीज को लेकर पशुपालकों और आम लोगों के बीच कई तरह की आशंकाएं रहती हैं।उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार, लंपी स्किन डिजीज को मनुष्यों में फैलने वाली बीमारी नहीं माना जाता। यह मुख्य रूप से पशुओं को प्रभावित करने वाला संक्रमण है।हालांकि, पशुओं के साथ काम करते समय सामान्य स्वच्छता नियमों का पालन करना चाहिए। बीमार पशुओं की देखभाल के बाद हाथ धोना, पशुशाला को साफ रखना और दूध की स्वच्छ हैंडलिंग जरूरी है।किसी पशु के बीमार होने पर उसके दूध के इस्तेमाल तथा बिक्री के संबंध में पशु चिकित्सक और स्थानीय पशुपालन विभाग की सलाह का पालन करना उचित है।पशुओं में संक्रमण की रोकथाम का उद्देश्य केवल बीमारी को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि पशुधन की उत्पादकता और पशुपालकों की आजीविका को सुरक्षित रखना भी है।
आगे की कार्रवाई में प्रयोगशाला रिपोर्ट और निगरानी महत्वपूर्ण
जम्मू, सांबा और कठुआ में केंद्रीय टीम का दौरा बीमारी नियंत्रण के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, अगले चरण में प्रयोगशाला जांच के परिणाम और प्रभावित क्षेत्रों की लगातार निगरानी अहम होंगे।जांच के आधार पर बीमारी की स्थिति का अधिक सटीक मूल्यांकन किया जा सकेगा। स्थानीय विभागों के लिए संदिग्ध मामलों की शीघ्र पहचान, प्रभावित पशुओं की उचित देखभाल और किसानों तक जरूरी जानकारी पहुंचाना भी महत्वपूर्ण रहेगा।जिन क्षेत्रों में संक्रमण की पुष्टि होती है, वहां पशुओं की आवाजाही और टीकाकरण संबंधी निर्णय स्थानीय परिस्थितियों और विभागीय दिशानिर्देशों के अनुसार लिए जाने चाहिए।विशेषज्ञों के अनुसार, पशुपालकों के बीच जागरूकता बढ़ाने से बीमारी के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने और संक्रमण नियंत्रण संबंधी सावधानियां अपनाने में मदद मिल सकती है।इस पूरी प्रक्रिया में पशु चिकित्सकों, प्रयोगशाला कर्मचारियों, स्थानीय प्रशासन और पशुपालकों के बीच तालमेल महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
पशुधन की सुरक्षा के लिए समय पर कार्रवाई जरूरी
जम्मू-कश्मीर के जम्मू, सांबा और कठुआ जिलों में लंपी स्किन डिजीज को लेकर केंद्र सरकार की सक्रियता ने पशुधन स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की आवश्यकता को एक बार फिर सामने रखा है। केंद्रीय टीम ने प्रभावित गांवों का निरीक्षण किया, पशुपालकों की समस्याओं का जायजा लिया, आवश्यक सामग्री वितरित की और प्रयोगशाला जांच के लिए नमूने एकत्र करवाए। इसके साथ ही पशुपालन अधिकारियों की बैठक में निगरानी, समय पर रिपोर्टिंग और जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया। अब बीमारी के प्रभावी नियंत्रण के लिए लगातार निगरानी, सही जानकारी, पशु चिकित्सकीय सहायता और जरूरत के अनुसार टीकाकरण महत्वपूर्ण होंगे।
जम्मू-कश्मीर के पशुपालकों के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि पशुओं में लंपी के लक्षण दिखाई देने पर घबराने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। समय पर पहचान, सही देखभाल और वैज्ञानिक बचाव उपाय ही पशुओं को सुरक्षित रखने तथा पशुपालकों की आजीविका बचाने का सबसे बेहतर रास्ता हैं।

