Sarso Ki Kheti 2026: अक्टूबर का महीना आते ही उत्तर भारत के किसान रबी फसलों की बुवाई की तैयारी शुरू कर देते हैं। इस दौरान सरसों की खेती करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि कौन सी किस्म लगाई जाए, जिससे खेत में अच्छी फसल तैयार हो और बाजार में बेहतर आमदनी मिल सके। अगर आप भी इस सीजन में सरसों की खेती करने की योजना बना रहे हैं, तो दो उन्नत किस्मों के बारे में जानना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है।
कृषि अनुसंधान संस्थानों ने sarso ki kheti की कई ऐसी किस्में विकसित की हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता सामान्य किस्मों के मुकाबले बेहतर हो सकती है। हालांकि फसल का उत्पादन केवल बीज पर निर्भर नहीं करता। बुवाई का सही समय, मिट्टी की गुणवत्ता, खाद, सिंचाई और मौसम भी पैदावार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सरसों की खेती के लिए BPM 1825 और BPM (Q) 172 दो महत्वपूर्ण विकल्प हैं। इनकी विशेषताओं को समझकर किसान अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार बीज का चुनाव कर सकते हैं।
सरसों की खेती किसानों के लिए क्यों है फायदेमंद?
भारत में सरसों एक प्रमुख तिलहनी फसल है। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और बिहार सहित कई राज्यों में किसान बड़े पैमाने पर सरसों की खेती करते हैं। सरसों का उपयोग मुख्य रूप से खाद्य तेल बनाने में किया जाता है। इसके अलावा तेल निकालने के बाद बची खली का उपयोग पशु आहार के रूप में भी होता है। Sarso ki kheti की खास बात यह है कि कई क्षेत्रों में इसे सीमित सिंचाई की सुविधा के साथ भी उगाया जा सकता है। हालांकि कम पानी में फसल तैयार होने का मतलब यह नहीं है कि पानी की कमी का उत्पादन पर असर नहीं पड़ेगा जिन किसानों के खेतों में अच्छी जल निकासी है और सिंचाई की व्यवस्था उपलब्ध है, वे उपयुक्त किस्म का चयन करके बेहतर उत्पादन हासिल करने का प्रयास कर सकते हैं।
BPM 1825: सरसों की खेती के लिए उन्नत किस्म
अगर किसान अधिक उत्पादन क्षमता वाली सरसों की किस्म तलाश रहे हैं, तो BPM 1825 एक विकल्प हो सकती है। इस किस्म को DRMR 2018-25 के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान की उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी औसत पैदावार लगभग 2,596 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। यानी अनुकूल परिस्थितियों में इसकी औसत उत्पादन क्षमता करीब 25.96 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इस किस्म में लगभग 40.6 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है। इसे पकने में करीब 145 दिन लग सकते हैं। इसकी एक प्रमुख विशेषता सफेद रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है। BPM 1825 समय पर बुवाई वाली सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त किस्म है। जम्मू, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनुशंसित क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है। हालांकि सरसों की खेती में इस किस्म को अपनाने से पहले किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह जरूर लें, क्योंकि मौसम और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार उत्पादन बदल सकता है।
BPM (Q) 172: कम अवधि में तैयार होने वाली सरसों की किस्म
सरसों की दूसरी उन्नत किस्म BPM (Q) 172 है। इसे DRMRCI (Q) 172 के नाम से भी पहचाना जाता है। यह किस्म उन किसानों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती है, जो समय पर बुवाई करके अपेक्षाकृत जल्दी तैयार होने वाली फसल चाहते हैं। इस किस्म की औसत उत्पादन क्षमता लगभग 2,304 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। यानी इससे औसतन करीब 23.04 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलने की क्षमता बताई गई है। BPM (Q) 172 की फसल लगभग 131 दिनों में पक सकती है। इसमें करीब 41.8 प्रतिशत तेल पाया जाता है। इसकी खासियत कम इरूसिक एसिड की मात्रा और सफेद रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार के अनुशंसित क्षेत्रों में इस किस्म को उगाया जा सकता है। सरसों की खेती करने वाले किसानों को यह समझना चाहिए कि अधिक तेल प्रतिशत या कम पकने की अवधि ही किसी किस्म को सबसे बेहतर नहीं बनाती। फसल का चुनाव मिट्टी, मौसम और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार होना चाहिए।
Sarso Ki Kheti: अक्टूबर में कब करें सरसों की बुवाई?
सरसों की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए समय पर बुवाई करना जरूरी है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में सितंबर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के मध्य तक सरसों की बुवाई का समय उपयुक्त माना जाता है। हालांकि अलग-अलग राज्यों और किस्मों के लिए इसमें बदलाव हो सकता है। अक्टूबर 2026 में सरसों की खेती की तैयारी कर रहे किसानों को तापमान और खेत में उपलब्ध नमी पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि बुवाई के समय तापमान बहुत अधिक है, तो बीजों के अंकुरण और शुरुआती बढ़वार पर असर पड़ सकता है। वहीं देर से बुवाई करने पर फसल को अनुकूल मौसम में बढ़ने के लिए कम समय मिल सकता है। ऐसी परिस्थितियों में किसानों को स्थानीय कृषि विभाग से सलाह लेकर बुवाई का समय तय करना चाहिए। खासतौर पर BPM 1825 और BPM (Q) 172 जैसी समय पर बुवाई के लिए अनुशंसित किस्मों में सही समय का विशेष महत्व है।
सरसों की खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें?
अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। सरसों के बीज आकार में छोटे होते हैं। इसलिए बुवाई के दौरान खेत में बड़े ढेले होने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है। सबसे पहले खेत में पिछली फसल के अवशेषों और खरपतवार का उचित प्रबंधन करना चाहिए। इसके बाद मिट्टी की जरूरत के अनुसार जुताई करके खेत तैयार करें। सरसों की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सामान्य तौर पर उपयुक्त मानी जाती है। हालांकि दूसरी प्रकार की मिट्टियों में भी उचित प्रबंधन के साथ इसकी खेती की जा सकती है। खेत में पानी जमा रहने की समस्या हो तो बुवाई से पहले निकासी की व्यवस्था करें। इसके अलावा मिट्टी की जांच कराने से उर्वरकों की सही मात्रा तय करने में मदद मिलती है।
सरसों की खेती में एक एकड़ के लिए कितना बीज चाहिए?
Sarso ki kheti में सही बीज दर रखना बहुत जरूरी है। जरूरत से अधिक बीज डालने से पौधे बहुत घने हो सकते हैं, जिससे उनमें पानी, धूप और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। सामान्य कृषि सिफारिशों में सरसों की बीज दर लगभग 5 से 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताई जाती है। एक एकड़ के हिसाब से यह करीब 2 से 2.4 किलोग्राम होती है। हालांकि अलग-अलग किस्मों और बुवाई की परिस्थितियों में बीज की मात्रा बदल सकती है। आमतौर पर बीज को लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोया जाता है। पंक्तियों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई और फसल की देखभाल आसान हो सकती है। किसानों को बीज हमेशा विश्वसनीय और प्रमाणित स्रोत से खरीदना चाहिए, ताकि बीज की गुणवत्ता और अंकुरण क्षमता को लेकर जोखिम कम किया जा सके।
सरसों की खेती में कौन सी खाद डालने से होगा फायदा?
Sarso ki kheti से अच्छी पैदावार लेने के लिए पौधों को संतुलित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराना जरूरी है। कई बार किसान केवल यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सरसों जैसी तिलहनी फसल में सल्फर का भी काफी महत्व होता है। सल्फर पौधों की वृद्धि और तेल निर्माण की प्रक्रिया में उपयोगी भूमिका निभाता है। इसके अलावा नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश भी फसल के विकास के लिए जरूरी हैं। सरसों की खेती में खाद की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी की जांच कराना बेहतर रहता है। इससे यह पता चलता है कि खेत में पहले से कौन से पोषक तत्व मौजूद हैं और किनकी कमी है। किसान खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने और उसकी संरचना सुधारने में मदद मिल सकती है। ध्यान रखें कि अधिक खाद डालने से हमेशा अधिक उत्पादन नहीं मिलता। सही मात्रा में उर्वरक का इस्तेमाल करने से अनावश्यक खर्च को नियंत्रित किया जा सकता है।
सरसों की खेती में सिंचाई कब करनी चाहिए?
सरसों को अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत वाली फसल माना जाता है। इसके बावजूद बेहतर उत्पादन के लिए मिट्टी में उचित नमी बनाए रखना जरूरी है। सरसों की खेती में सिंचाई की जरूरत खेत की मिट्टी, मौसम और उपलब्ध नमी के आधार पर बदलती है। जिन खेतों में बुवाई के समय पर्याप्त नमी होती है, वहां शुरुआती अवस्था में सिंचाई की जरूरत कम पड़ सकती है। फसल में फूल आने और फलियां बनने की अवस्था काफी महत्वपूर्ण होती है। इस दौरान नमी की अधिक कमी से दानों के विकास पर असर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को सिंचाई करते समय जलभराव से बचने की सलाह देते हैं। खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने से जड़ों के विकास और पौधों के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। यदि किसी किसान के पास सीमित पानी उपलब्ध है, तो उसे फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं के अनुसार सिंचाई की योजना बनानी चाहिए।
सरसों की खेती में खरपतवार नियंत्रण क्यों जरूरी है?
सरसों की बुवाई के बाद खेत में अनावश्यक घास और दूसरे खरपतवार उग सकते हैं। ये पौधे मुख्य फसल के साथ पानी, धूप और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। खासकर फसल की शुरुआती बढ़वार के समय खरपतवार अधिक होने से सरसों के पौधों का विकास प्रभावित हो सकता है। सरसों की खेती करने वाले किसानों को समय-समय पर खेत का निरीक्षण करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर उपयुक्त समय पर निराई-गुड़ाई की जा सकती है। पंक्तियों में बुवाई करने से खरपतवार निकालने का काम अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इससे पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने में भी मदद मिलती है।
सरसों की फसल में किन रोगों और कीटों से बचाव जरूरी है?
Sarso ki kheti में किसानों को माहू, सफेद रतुआ, अल्टरनेरिया झुलसा और तना गलन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। माहू सरसों की प्रमुख कीट समस्याओं में से एक है। इसका प्रकोप बढ़ने पर पौधों की कोमल बढ़वार और फलियों के विकास पर असर पड़ सकता है। इसी तरह कुछ फफूंदजनित रोग पत्तियों और दूसरे हिस्सों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे फसल की उत्पादन क्षमता कम होने का खतरा रहता है। BPM 1825 और BPM (Q) 172 में सफेद रतुआ के प्रति प्रतिरोधक क्षमता दर्ज की गई है। हालांकि दूसरी बीमारियों और कीटों के प्रति भी ये पूरी तरह सुरक्षित होंगी, ऐसा मानना सही नहीं है। सरसों की खेती में कीटों और रोगों से बचाव के लिए किसानों को नियमित रूप से फसल की निगरानी करनी चाहिए। कोई समस्या दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ से पहचान और उपयुक्त उपचार की सलाह लें।
सरसों की कटाई का सही समय क्या है?
सरसों की खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक हर चरण महत्वपूर्ण होता है। कई बार फसल अच्छी होने के बावजूद सही समय पर कटाई नहीं करने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। जब सरसों की अधिकांश फलियां पीली या भूरी होने लगें और बीज पर्याप्त परिपक्व हो जाएं, तब कटाई की तैयारी की जा सकती है। अगर किसान बहुत जल्दी कटाई कर देते हैं, तो दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। वहीं जरूरत से ज्यादा देरी करने पर फलियां चटक सकती हैं और बीज खेत में गिर सकते हैं। कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करनी चाहिए। भंडारण से पहले बीजों में सुरक्षित स्तर तक नमी कम करना जरूरी है, ताकि उनकी गुणवत्ता बनी रहे।
सरसों की खेती से कितनी कमाई हो सकती है?
Sarso ki kheti से होने वाली आमदनी मुख्य रूप से प्रति एकड़ उत्पादन, बाजार भाव और खेती की लागत पर निर्भर करती है। रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6,200 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। उदाहरण के लिए, अगर किसी किसान को एक एकड़ खेत से 8 क्विंटल सरसों प्राप्त होती है और पूरी उपज 6,200 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बिकती है, तो उसकी कुल बिक्री 49,600 रुपये होगी। इसी तरह 10 क्विंटल उत्पादन होने पर कुल बिक्री 62,000 रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि यह केवल उदाहरण के तौर पर बिक्री का अनुमान है। इसमें बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, कटाई और परिवहन जैसे खर्च शामिल नहीं किए गए हैं। सभी किसानों को MSP पर बिक्री का अवसर मिले, यह भी जरूरी नहीं है। इसलिए सरसों की खेती में वास्तविक मुनाफे का आकलन करते समय सभी खर्चों और वास्तविक बिक्री मूल्य को ध्यान में रखना चाहिए।
सरसों की खेती में ज्यादा उत्पादन के लिए अपनाएं ये उपाय
Sarso ki kheti की अच्छी पैदावार के लिए केवल अधिक उत्पादन क्षमता वाली किस्म का चुनाव पर्याप्त नहीं है। किसान को पूरे फसल चक्र में सही प्रबंधन करना होता है। सबसे पहले अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित सरसों की किस्म चुनें। इसके बाद प्रमाणित बीज का उपयोग करके अनुकूल समय पर बुवाई करें। खेत में पौधों के बीच उचित दूरी रखें और मिट्टी की जांच के आधार पर खाद का इस्तेमाल करें। सिंचाई करते समय नमी का ध्यान रखें तथा खरपतवार को समय रहते नियंत्रित करें। फसल में रोग या कीट दिखाई देने पर बिना विशेषज्ञ की सलाह के अनावश्यक रसायनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके अलावा मौसम की जानकारी लेते रहना भी उपयोगी है। असामान्य बारिश, अधिक तापमान या लंबे समय तक नमी की कमी से सरसों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
निष्कर्ष
Sarso Ki Kheti 2026: इस रबी सीजन में सरसों की खेती करने वाले किसानों के लिए BPM 1825 और BPM (Q) 172 दो उपयोगी उन्नत किस्में हो सकती हैं। BPM 1825 की औसत उत्पादन क्षमता करीब 25.96 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है, जबकि BPM (Q) 172 की औसत पैदावार लगभग 23.04 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। हालांकि दोनों किस्मों की अनुशंसित खेती की परिस्थितियां और क्षेत्र अलग हैं। इसलिए किसानों को अपने जिले की जलवायु, सिंचाई सुविधा और मिट्टी की स्थिति के हिसाब से बीज चुनना चाहिए। Sarso ki kheti में बेहतर पैदावार का सबसे महत्वपूर्ण आधार सही किस्म, समय पर बुवाई और संतुलित फसल प्रबंधन है। किसान यदि इन बातों का ध्यान रखते हैं, तो अच्छी उपज के साथ खेती से होने वाली आमदनी बढ़ाने की संभावना भी बेहतर हो सकती है।

