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Home कृषि समाचार

Maharashtra Fodder Crisis: एक ट्रक भरने के लिए कई गांवों में तलाश, पशुपालकों के सामने बड़ी चुनौती

Maharashtra Fodder Crisis: Search across multiple villages to fill a single truck; a major challenge for livestock owners.

Fiza by Fiza
October 16, 2026
in कृषि समाचार
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Maharashtra Fodder Crisis

Maharashtra Fodder Crisis

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Maharashtra Fodder Crisis: महाराष्ट्र में इस साल कमजोर मानसून का असर अब खेतों से निकलकर पशुपालकों के घरों तक पहुंचने लगा है। बारिश की कमी से खरीफ फसलों को नुकसान हुआ है और कई इलाकों में हरे तथा सूखे चारे की उपलब्धता घट रही है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि चारा खरीदने वाले व्यापारियों के लिए भी पर्याप्त मात्रा में माल जुटाना चुनौती बन गया है। एक ट्रक भरने के लिए पांच-छह गांवों में तलाश करने जैसी स्थिति चारे के बाजार पर बढ़ते दबाव को समझाती है। हालांकि, व्यापारियों के इस विशेष दावे की ताजा स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

मराठवाड़ा में संकट अधिक चिंताजनक दिखाई दे रहा है। बीड, जालना, लातूर, धाराशिव, नांदेड़ और आसपास के इलाकों में किसानों को आने वाले महीनों में पशुओं के भोजन और पानी की व्यवस्था करने की चिंता सता रही है।

राज्य सरकार भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सक्रिय हुई है। अक्टूबर 2026 में कई जिलों ने स्थानीय पशुओं के लिए उपलब्ध चारे को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से उसकी बाहरी बिक्री और ढुलाई पर प्रतिबंध लगाए हैं। इसके साथ ही चारा बैंक बनाने, चारा उत्पादन बढ़ाने और किसानों को प्रशिक्षण देने की योजनाओं पर काम किया जा रहा है।

महाराष्ट्र में सूखे ने क्यों बढ़ाया चारे का संकट?

महाराष्ट्र में इस साल बारिश का वितरण सामान्य नहीं रहा। कई जिलों में मानसून के दौरान लंबे समय तक बारिश नहीं हुई। इसका सीधा प्रभाव खरीफ की फसलों पर पड़ा। जिन खेतों में ज्वार, बाजरा, मक्का और दूसरी फसलों की अच्छी पैदावार की उम्मीद थी, वहां उत्पादन प्रभावित हुआ।

पशुपालन के लिए यह दोहरी परेशानी है। किसान फसलों से अनाज प्राप्त करने के अलावा उनके डंठल, पत्तियों और दूसरे अवशेषों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में भी करते हैं। जब फसल खराब होती है, तो अनाज के साथ चारे की उपलब्धता भी कम हो जाती है।

इस बार कई स्थानों पर यही स्थिति सामने आ रही है। खेतों से अपेक्षित मात्रा में सूखा चारा नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर पर्याप्त बारिश न होने के कारण चारागाहों में हरी घास भी कम हुई है।

अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, महाराष्ट्र में सामान्य से कम वर्षा होने के कारण 20 जिलों में बारिश की कमी दर्ज की गई। सोलापुर, बीड, जालना, हिंगोली, धाराशिव और अहिल्यानगर जैसे जिलों में स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।कम बारिश का असर केवल मौजूदा चारे पर नहीं पड़ेगा। यदि रबी सीजन में भी फसल उत्पादन प्रभावित हुआ, तो अगले कई महीनों तक पशुओं के भोजन की समस्या बनी रह सकती है।

बीड और जालना में सबसे ज्यादा चिंता, सीमित दिनों का चारा उपलब्ध

महाराष्ट्र के पशुपालन विभाग से संबंधित 30 सितंबर 2026 तक के आंकड़ों में चारे की उपलब्धता के बीच बड़ा क्षेत्रीय अंतर सामने आया था।राज्य स्तर पर लगभग 194.3 लाख मीट्रिक टन चारा उपलब्ध बताया गया था। यह मात्रा करीब 2.78 करोड़ पशुओं के लिए औसतन 188 दिनों की आवश्यकता पूरी करने के बराबर आंकी गई थी।लेकिन पूरे राज्य का औसत हर जिले की वास्तविक स्थिति नहीं बताता।

जालना में उस समय करीब 63 दिनों और बीड में लगभग 65 दिनों का चारा उपलब्ध होने का अनुमान था। हिंगोली में 121 दिन और नांदेड़ में लगभग 125 दिनों का भंडार दर्ज किया गया।छत्रपति संभाजीनगर संभाग में कुल उपलब्धता लगभग 113 दिनों की जरूरत के बराबर थी। यह राज्य के विभिन्न संभागों की तुलना में सबसे कम स्तरों में शामिल थी।इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त भंडार होने के बावजूद सूखाग्रस्त जिलों को अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ये आंकड़े 30 सितंबर की स्थिति बताते हैं। अक्टूबर में वास्तविक भंडार कितना बचा है, इसकी पुष्टि नए जिला स्तरीय मूल्यांकन से होगी।

एक ट्रक चारा जुटाना क्यों हो रहा मुश्किल?

चारे का कारोबार स्थानीय कृषि उत्पादन पर काफी निर्भर करता है। सामान्य परिस्थितियों में व्यापारी गांवों के किसानों से फसल अवशेष खरीदकर उन्हें पशुपालकों, डेयरी संचालकों और दूसरे जिलों के बाजारों तक पहुंचाते हैं।

जब फसल अच्छी होती है, तो पर्याप्त मात्रा में चारा एक ही क्षेत्र से मिल जाता है। इससे खरीद, भंडारण और परिवहन अपेक्षाकृत आसान रहता है। लेकिन सूखे में स्थिति बदल जाती है।

किसान अपनी जरूरत के लिए अधिक चारा रोककर रखने लगते हैं। जिनके पास कम पशु हैं, वे भी भविष्य की अनिश्चितता के कारण बिक्री करने में सावधानी बरतते हैं।इससे खुले बाजार में बिकने वाला चारा घट सकता है। व्यापारियों को अलग-अलग गांवों में उपलब्धता का पता करना पड़ता है। यदि किसी गांव में पर्याप्त चारा नहीं मिलता, तो उन्हें दूसरे स्थानों का रुख करना पड़ता है।

चारे की तलाश में दूरी बढ़ने से परिवहन पर खर्च भी बढ़ता है। छोटी-छोटी मात्रा में चारा इकट्ठा करने में समय और मजदूरी अधिक लगती है।

हालांकि, पांच-छह गांवों का चक्कर लगाने की स्थिति हर जिले या सभी व्यापारियों पर लागू नहीं मानी जा सकती। इसे समझने के लिए स्थानीय मंडियों, परिवहनकर्ताओं और किसानों से अलग-अलग स्तर पर जानकारी जुटाना आवश्यक है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि कम कृषि उत्पादन और जिलों के बीच चारे की आवाजाही पर प्रतिबंध बाजार में आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं।

चारे की कमी से किसानों के सामने दोहरी परेशानी

महाराष्ट्र के कई ग्रामीण परिवार खेती और पशुपालन दोनों पर निर्भर हैं। खेतों से मिलने वाली आमदनी मौसम के अनुसार बदलती रहती है, जबकि गाय और भैंस से प्राप्त दूध कई परिवारों के लिए नियमित आय का जरिया है।

सूखे के कारण इस व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।पहली परेशानी खेती से होने वाली आय में कमी है। जब फसल खराब होती है, तो किसान के पास अगली खेती के लिए बीज, खाद और दूसरे जरूरी खर्चों की व्यवस्था करना कठिन हो सकता है।दूसरी परेशानी पशुओं के पालन पर बढ़ने वाला खर्च है।सामान्य समय में किसान अपने खेत से प्राप्त चारे का उपयोग करके पशुओं की जरूरत पूरी कर लेते हैं। लेकिन पर्याप्त चारा नहीं मिलने पर उन्हें बाजार से खरीदारी करनी पड़ती है।यदि बाजार में आपूर्ति कम होती है, तो चारे की कीमत बढ़ने की आशंका रहती है। इससे दूध उत्पादन से मिलने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा पशुओं के भोजन पर खर्च हो सकता है।

छोटे किसानों की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील होती है। उनके पास चारा रखने के लिए बड़े गोदाम, अतिरिक्त जमीन या लंबे समय तक खरीदारी करने की आर्थिक क्षमता नहीं होती।

इसलिए चारे का संकट केवल खेती और पशुपालन की समस्या नहीं है। इसका असर पूरे ग्रामीण परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

लातूर में पशुओं को खिलाने के लिए गन्ने की फसल का सहारा

महाराष्ट्र के लातूर जिले से अक्टूबर की शुरुआत में एक चिंताजनक स्थिति सामने आई। सूखे और हरे चारे की कमी के बीच कुछ किसानों ने अपने खेतों में खड़ी गन्ने की फसल पशुओं को खिलाने के लिए काटनी शुरू कर दी।यह कदम किसानों की मजबूरी को दर्शाता है।गन्ना आमतौर पर नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है। किसान इसकी बिक्री से आय प्राप्त करने की योजना बनाते हैं। लेकिन पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें अपनी संभावित कमाई का नुकसान उठाना पड़ सकता है।गन्ने का उपयोग सीमित मात्रा में पशु आहार के हिस्से के रूप में किया जा सकता है, लेकिन इसे संतुलित भोजन का पूरा विकल्प नहीं माना जा सकता। पशुओं को पर्याप्त रेशा, ऊर्जा, प्रोटीन और खनिजों की भी आवश्यकता होती है।यदि सूखा लंबे समय तक बना रहता है, तो किसानों के सामने नकदी फसलों और पशुओं की जरूरतों के बीच निर्णय लेना कठिन हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे समय में पशु आहार का वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है, ताकि उपलब्ध संसाधनों से पशुओं को आवश्यक पोषण मिल सके।

नांदेड़ और लातूर में चारे की बाहरी आवाजाही पर प्रतिबंध

चारे की कमी की आशंका को देखते हुए महाराष्ट्र के कई जिला प्रशासन पहले ही एहतियाती कदम उठा चुके हैं।अक्टूबर की शुरुआत में नांदेड़ और लातूर के प्रशासन ने हरे तथा सूखे चारे को जिले की सीमाओं से बाहर ले जाने पर प्रतिबंध लगाए।इन आदेशों का उद्देश्य स्थानीय पशुओं के लिए उपलब्ध चारे को सुरक्षित रखना है।नांदेड़ जिले में खरीफ 2026 के लिए घोषित सूखाग्रस्त क्षेत्रों में अधिकांश तहसीलें शामिल थीं। प्रशासन ने आशंका जताई कि यदि उपलब्ध चारा बड़े पैमाने पर दूसरे स्थानों पर भेज दिया गया, तो आने वाले महीनों में स्थानीय पशुपालकों को गंभीर समस्या हो सकती है।इसलिए चारे की बिक्री और परिवहन को लेकर प्रतिबंधात्मक निर्णय लिए गए।इन प्रतिबंधों का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि स्थानीय किसानों की जरूरतों को प्राथमिकता मिलती है।

लेकिन बाजार के स्तर पर इससे नई चुनौतियां भी सामने आती हैं। जिन जिलों में स्थानीय उत्पादन कम है और जो दूसरे क्षेत्रों की आपूर्ति पर निर्भर रहते हैं, उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ सकती है।इसी कारण चारे के परिवहन पर नियंत्रण के साथ जिलों के बीच सरकारी समन्वय आवश्यक हो जाता है।

पुणे जिले में भी चारे की ढुलाई पर रोक

चारे का संकट केवल मराठवाड़ा तक सीमित नहीं है।14 अक्टूबर 2026 को पुणे जिला प्रशासन ने भी हरे और सूखे चारे को जिले से बाहर भेजने तथा बेचने पर प्रतिबंध लगाया।यह निर्णय जिले की आठ सूखाग्रस्त तहसीलों में पशुपालकों की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया।इनमें भोर, वेल्हे, खेड़, शिरूर, बारामती, इंदापुर, दौंड और पुरंदर शामिल हैं।आदेश में ज्वार के डंठल, कुट्टी, भूसे और दूसरे प्रकार के चारे को शामिल किया गया है।प्रशासन की चिंता यह है कि दूसरे जिलों में मांग बढ़ने से स्थानीय बाजार का चारा तेजी से बाहर जा सकता है। ऐसा होने पर आने वाले महीनों में जिले के पशुपालकों को अधिक परेशानी उठानी पड़ सकती है।सरकारी अनुमति वाले परिवहन के लिए निर्धारित अपवाद हो सकते हैं। इसलिए व्यापारियों और किसानों को सामान भेजने से पहले स्थानीय प्रशासन के मौजूदा आदेश की जानकारी लेना जरूरी है।इन प्रतिबंधों से यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार चारे की कमी को केवल भविष्य की आशंका मानकर नहीं चल रही, बल्कि अभी से उपलब्ध भंडार को बचाने की कोशिश कर रही है।

चारे की कमी का असर दूध उत्पादन पर कब दिखाई देगा?

महाराष्ट्र देश के महत्वपूर्ण दूध उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य के पश्चिमी हिस्से में डेयरी व्यवसाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है।नाशिक, अहिल्यानगर, पुणे, सोलापुर, सांगली, सातारा और कोल्हापुर जैसे जिलों में दूध उत्पादन की महत्वपूर्ण गतिविधियां संचालित होती हैं।अच्छी बात यह है कि सितंबर 2026 तक राज्य के दूध संग्रह में बड़ी गिरावट दर्ज नहीं हुई थी।उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में औसतन प्रतिदिन 161.4 लाख लीटर दूध एकत्र किया गया था। सितंबर में यह बढ़कर करीब 162.82 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया।इसमें लगभग 35.94 लाख लीटर दूध सहकारी क्षेत्र और 126.88 लाख लीटर निजी क्षेत्र से एकत्र हुआ।इससे पता चलता है कि सितंबर तक किसानों और डेयरी संचालकों ने चारे तथा पानी की व्यवस्था करके उत्पादन को संभाले रखा।हालांकि, आने वाले महीनों में स्थिति बदल सकती है।

यदि चारे की कमी बढ़ती है और पशुओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, तो दूध उत्पादन प्रभावित हो सकता है। पशुओं के स्वास्थ्य में गिरावट आने पर उसका असर लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है।डेयरी क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने अक्टूबर के अंतिम दिनों से दबाव बढ़ने की आशंका जताई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे राज्य में दूध की कमी निश्चित रूप से होने वाली है।अलग-अलग जिलों में पानी, चारे और पशुपालन की परिस्थितियों के आधार पर प्रभाव अलग हो सकता है।

चारा महंगा होने से डेयरी व्यवसाय की लागत बढ़ने का खतरा

दूध उत्पादन में पशु आहार एक महत्वपूर्ण खर्च है। इसमें हरा चारा, सूखा चारा, दाना और पोषण संबंधी पूरक शामिल होते हैं।

चारे की उपलब्धता कम होने से पशुपालक को बाजार पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।यदि किसान को बाहर से चारा मंगवाना पड़ता है, तो उसे खरीद मूल्य के अतिरिक्त परिवहन और मजदूरी का खर्च भी उठाना पड़ता है।यह स्थिति उन किसानों के लिए अधिक कठिन हो सकती है जो सीमित संख्या में गाय या भैंस पालते हैं।बड़े डेयरी व्यवसाय कुछ समय तक अतिरिक्त लागत सहन कर सकते हैं, लेकिन छोटे पशुपालकों के लिए लगातार बढ़ता खर्च आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है।

दूसरी ओर, पशुओं के भोजन में कमी करना स्थायी समाधान नहीं है। इससे दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।इसलिए चारे की कीमतों में होने वाला बदलाव आने वाले महीनों में डेयरी कारोबार के लिए महत्वपूर्ण संकेतक होगा।यदि उत्पादन लागत बढ़ती है, तो दूध खरीद मूल्य बढ़ाने की मांग भी सामने आ सकती है। हालांकि, उपभोक्ताओं के लिए दूध महंगा होगा या नहीं, यह बाजार, डेयरी कंपनियों और सरकारी निर्णयों पर निर्भर करेगा।

सरकार ने चारा बैंक बनाने की तैयारी तेज की

महाराष्ट्र सरकार ने चारे की कमी से निपटने के लिए नई तैयारियों की जानकारी दी है।14 अक्टूबर को सामने आई जानकारी के अनुसार, राज्य की सूखा निवारण संबंधी मंत्रिमंडलीय उपसमिति की बैठक में चारे के लिए विशेष कार्यप्रणाली तैयार करने के निर्देश दिए गए।

राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की अध्यक्षता में हुई बैठक में कृषि और पशुपालन विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया गया।सरकार की योजना के अनुसार, जिला स्तर पर चारा बैंक विकसित किए जाएंगे।इनका उद्देश्य चारे की उपलब्धता, जरूरत और वितरण को व्यवस्थित करना है।जिन जिलों में पर्याप्त मात्रा में चारा मौजूद है, वहां से कमी वाले पड़ोसी जिलों तक आपूर्ति की व्यवस्था करने की योजना है।इससे उन इलाकों को राहत मिल सकती है जहां स्थानीय खेतों से पर्याप्त मात्रा में चारा उपलब्ध नहीं हो रहा।हालांकि, इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि चारा खरीद, भंडारण, परिवहन और किसानों तक वितरण कितनी तेजी से किया जाता है।सरकार को स्थानीय प्रतिबंधों और अंतरजिला आपूर्ति के बीच भी स्पष्ट समन्वय स्थापित करना होगा।

चारा उत्पादन बढ़ाने के लिए बीज वितरण पर जोर

चारे की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने किसानों को बीज उपलब्ध कराने की योजना पर भी जोर दिया है।हाल की बैठक में 62 करोड़ रुपये के प्रावधान से चारा बीज उपलब्ध कराने की जानकारी दी गई।प्राथमिकता उन किसानों को देने की योजना है जिनके पास सिंचाई के लिए भरोसेमंद पानी उपलब्ध है।इसका उद्देश्य सीमित पानी वाले क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना चारे का उत्पादन बढ़ाना है। पशुपालन विभाग की पहले सामने आई जानकारी के अनुसार, बेहतर और संकर चारा बीजों के लिए जिला वार्षिक योजना के अंतर्गत शत-प्रतिशत अनुदान की व्यवस्था भी बताई गई थी।

इस योजना में व्यक्तिगत किसानों के लिए एक हेक्टेयर तक अधिकतम 4,000 रुपये और किसान समूहों के लिए पांच हेक्टेयर तक अधिकतम 20,000 रुपये की सहायता का प्रावधान बताया गया था।विभाग ने बीज वितरण के लिए 48.2 करोड़ रुपये का बजट और जिलों की ओर से अतिरिक्त धनराशि की मांग की भी जानकारी दी थी।

अलग-अलग योजनाओं की राशि और पात्रता को एक समान नहीं माना जाना चाहिए। किसानों को आवेदन करने से पहले अपने जिले के कृषि या पशुपालन कार्यालय से वर्तमान नियमों की पुष्टि करनी होगी।

सूखे में कौन-सी चारा फसलें उपयोगी हो सकती हैं?

महाराष्ट्र में चारे की भविष्य की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कम अवधि वाली उपयुक्त फसलों पर ध्यान दिया जा रहा है।ज्वार और बाजरा कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण चारा फसलें हैं। कुछ परिस्थितियों में ये दूसरी अधिक पानी मांगने वाली फसलों की तुलना में उपयोगी हो सकती हैं।लेकिन कम पानी वाली फसल का अर्थ यह नहीं है कि उसे बिना नमी के उगाया जा सकता है।बीज बोने से पहले मिट्टी में उपलब्ध नमी, पानी की व्यवस्था, मौसम और फसल की किस्म को ध्यान में रखना जरूरी है।जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध है, वे स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार चारा मक्का या अन्य उपयुक्त फसलें उगा सकते हैं।इसके अतिरिक्त खेतों से प्राप्त अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण भी महत्वपूर्ण है।

अच्छे प्रबंधन से फसल कटने के बाद बचने वाली सामग्री का अधिक उपयोग किया जा सकता है।

इस समय सबसे जरूरी बात यही है कि सीमित पानी का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाए और पशुओं के लिए उपलब्ध चारे को अनावश्यक नुकसान से बचाया जाए।

सूखे चारे को सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती

चारे की कमी के समय केवल नया उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होता। पहले से उपलब्ध चारे को सही तरीके से सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।महाराष्ट्र के पशुपालन विभाग ने 14 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार चारा संरक्षण और जागरूकता अभियान शुरू करने की तैयारी की है।इस अभियान के तहत किसानों को ज्वार, बाजरा, मक्का, गेहूं, धान, अरहर और चने जैसी फसलों के उपयोगी अवशेषों को सुरक्षित रखने की जानकारी देने की योजना है।चारे को नमी और फफूंद से बचाना महत्वपूर्ण है। खराब या दूषित चारा पशुओं के स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।इसी प्रकार चारा काटने वाली मशीनों का उचित उपयोग भोजन की बर्बादी कम करने में मदद कर सकता है।सरकार साइलेज बनाने की जानकारी भी किसानों तक पहुंचाना चाहती है। साइलेज हरे चारे को नियंत्रित परिस्थितियों में सुरक्षित रखने की एक विधि है।इसके अलावा कुछ पशु चिकित्सा केंद्रों में वैकल्पिक चारा उत्पादन और प्रशिक्षण की व्यवस्था करने की योजना भी है।इन उपायों के सही इस्तेमाल के लिए पशुपालन विशेषज्ञों का मार्गदर्शन आवश्यक है। गलत तरीके से तैयार या सुरक्षित किया गया पशु आहार लाभ के बजाय नुकसान पहुंचा सकता है।

पशुओं की बिक्री बढ़ने की आशंका क्यों?

सूखे का एक गंभीर असर पशुओं की खरीद-बिक्री पर भी दिखाई दे सकता है।जब किसानों के पास चारा और पानी की व्यवस्था करने के पर्याप्त संसाधन नहीं होते, तो वे पशुओं की संख्या कम करने पर विचार कर सकते हैं।अक्टूबर की शुरुआत में महाराष्ट्र के कुछ पशु बाजारों से ऐसी खबरें सामने आई थीं कि आर्थिक दबाव के कारण किसान अपने पशुओं को बेचने पहुंच रहे हैं।यह परिस्थिति छोटे पशुपालकों के लिए चिंताजनक है।

किसान कई वर्षों की मेहनत से अच्छे दूध देने वाले पशु तैयार करते हैं। पशुओं की देखभाल, उपचार और पोषण में लगातार निवेश करना पड़ता है।यदि मजबूरी में पशु बेचने पड़ें, तो भविष्य में उसी स्तर का डेयरी व्यवसाय दोबारा स्थापित करना आसान नहीं होता।यही कारण है कि पशुपालकों की सहायता केवल कुछ दिनों का चारा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।समय रहते पानी, पशु चिकित्सा और उचित पोषण का प्रबंध होने से परिवारों को अपने पशु बेचने की मजबूरी से बचाने में मदद मिल सकती है।

चारे के साथ पानी की समस्या भी गंभीर

महाराष्ट्र में वर्तमान संकट को केवल चारे की उपलब्धता के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा।पशुओं के लिए रोजाना स्वच्छ पानी जरूरी है। गर्म मौसम में इसकी आवश्यकता और बढ़ सकती है।

राज्य में कम बारिश के कारण कई जगह कुओं, जलाशयों और स्थानीय जलस्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है।

10 अक्टूबर तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य के बांधों में लगभग 72.99 प्रतिशत जलभंडारण दर्ज किया गया था। पिछले वर्ष इसी समय यह लगभग 90.72 प्रतिशत था।इस अंतर के कारण आने वाले महीनों के लिए पानी का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना आवश्यक हो गया है।सरकार ने पेयजल को प्राथमिकता देने की बात कही है। लेकिन पशुओं के लिए पानी उपलब्ध कराने की भी अलग व्यवस्था आवश्यक है।यदि किसी क्षेत्र में पीने के पानी की समस्या बढ़ती है, तो पशुपालकों को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।एक ओर चारे की व्यवस्था करनी होगी और दूसरी ओर पशुओं को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना होगा।विशेष रूप से ऐसे परिवारों के लिए यह स्थिति मुश्किल है जिनके पास अपना कुआं, बोरवेल या दूसरा भरोसेमंद जलस्रोत नहीं है।

रबी की खेती प्रभावित हुई तो संकट और बढ़ सकता है

महाराष्ट्र में अक्टूबर और नवंबर का समय रबी की खेती के लिए महत्वपूर्ण होता है।इस मौसम में ज्वार, गेहूं, चना और दूसरी फसलों की बुवाई की जाती है।राज्य में सामान्य तौर पर करीब 53.97 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रबी फसलें उगाई जाती हैं।रबी ज्वार पशुपालकों के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि इससे अनाज के अलावा पशुओं के उपयोग के लिए सूखा चारा भी प्राप्त होता है।लेकिन इस बार जमीन में नमी की कमी और सिंचाई के लिए पानी की अनिश्चित उपलब्धता किसानों की योजना को प्रभावित कर सकती है।

सोलापुर में बारिश की बड़ी कमी चिंता का विषय है। यह जिला ज्वार उत्पादन के लिए जाना जाता है।

यदि रबी की बुवाई कम होती है या फसल का विकास प्रभावित होता है, तो आगे मिलने वाले चारे की मात्रा भी कम हो सकती है।इससे मौजूदा समस्या अगले मौसम तक बनी रहने की आशंका है।हालांकि, वास्तविक नुकसान का आकलन रबी की बुवाई, वर्षा और फसल की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही किया जा सकेगा।

चारा संकट से निपटने में ग्राम पंचायतों की भूमिका

स्थानीय स्तर पर सही जानकारी और समय पर व्यवस्था इस संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।ग्राम पंचायतें अपने क्षेत्र में पशुओं की संख्या, उपलब्ध चारे, जलस्रोतों और जरूरतमंद पशुपालकों की जानकारी जुटाने में प्रशासन की सहायता कर सकती हैं।इससे जिला प्रशासन को अनुमान लगाने के बजाय वास्तविक मांग के आधार पर निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।कई बार एक गांव में चारा कम होता है, जबकि कुछ दूरी पर दूसरे गांव में थोड़ी अधिक उपलब्धता हो सकती है।यदि स्थानीय स्तर पर जानकारी साझा करने और वैध परिवहन की व्यवस्था बेहतर हो, तो जरूरतमंद किसानों को राहत मिल सकती है।महिला स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों की भागीदारी भी उपयोगी हो सकती है।सरकार ने खाली सरकारी जमीन और जलाशयों से जुड़ी उपयुक्त भूमि पर चारा उत्पादन की संभावनाओं पर विचार करने की जानकारी दी है।हालांकि, ऐसे प्रयासों में पानी की उपलब्धता, पर्यावरण संबंधी नियम और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।

आने वाले महीनों के लिए सरकार के सामने बड़ी परीक्षा

महाराष्ट्र में सूखे की परिस्थितियों से निपटने के लिए सरकार ने कई कदमों की घोषणा की है।

सितंबर में 265 तहसीलों के लिए सूखा राहत की शुरुआती प्रक्रिया से जुड़े निर्णय सामने आए थे। अक्टूबर में राहत संबंधी आकलन और आगे बढ़ाया गया।14 अक्टूबर की सरकारी समीक्षा से जुड़ी जानकारी के अनुसार, 305 तहसीलों में सूखा निवारण के तीसरे चरण की प्रक्रिया चल रही थी।

खेती के नुकसान से संबंधित लगभग 70 प्रतिशत पंचनामे पूरे होने की जानकारी भी दी गई।प्रशासन का लक्ष्य 31 अक्टूबर तक संबंधित आंकड़ों का संकलन पूरा करने का था।इस बीच चारा बैंक, बीज वितरण, जलापूर्ति व्यवस्था और विभागों के बीच समन्वय जैसे निर्णय महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।लेकिन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सहायता कितनी जल्दी गांवों तक पहुंचती है।विशेष रूप से उन जिलों में तत्काल व्यवस्था आवश्यक है जहां उपलब्ध चारे का भंडार सीमित बताया गया है।प्रशासन को चारे की उपलब्धता और बाजार में होने वाले बदलावों की लगातार समीक्षा करनी होगी।

पशुपालक अभी किन बातों पर ध्यान दें?

चारे की कमी के बीच किसानों के लिए पहले से योजना बनाना उपयोगी हो सकता है।

सबसे पहले अपने पास उपलब्ध चारे की मात्रा और पशुओं की सामान्य जरूरत का आकलन करना जरूरी है।इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि मौजूदा भंडार कितने समय तक पर्याप्त रह सकता है।दूसरा महत्वपूर्ण कदम चारे को खराब होने से बचाना है। सूखे चारे को सुरक्षित और नमी से दूर स्थान पर रखने से नुकसान कम किया जा सकता है।

तीसरा, पशुओं को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता पर ध्यान देना आवश्यक है। केवल पेट भरने के लिए किसी एक प्रकार के फसल अवशेष पर निर्भर रहना उचित नहीं है।आहार में बदलाव या किसी वैकल्पिक चारे के इस्तेमाल से पहले पशु चिकित्सक अथवा पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

किसानों को अपने नजदीकी पशुपालन कार्यालय से सरकारी योजनाओं, चारा बीज सहायता और उपलब्ध राहत सुविधाओं की जानकारी भी लेनी चाहिए।यदि किसी गांव में बड़ी संख्या में किसानों को एक जैसी परेशानी हो रही है, तो ग्राम पंचायत के माध्यम से सामूहिक मांग प्रशासन तक पहुंचाई जा सकती है।

क्या आने वाले दिनों में राहत मिलने की उम्मीद है?

महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में 17 अक्टूबर के बाद बारिश की संभावना मौसम पूर्वानुमान में जताई गई है।

लेकिन कुछ दिनों की बारिश से पूरे चारा संकट का समाधान होने की उम्मीद करना उचित नहीं होगा।फसलों को बढ़ने में समय लगता है और सूखे चारे की उपलब्धता कृषि उत्पादन से जुड़ी होती है।यदि आने वाले दिनों में कुछ क्षेत्रों में बारिश होती है, तो मिट्टी में नमी बढ़ने और स्थानीय वनस्पति को लाभ मिलने की संभावना हो सकती है।इसके बावजूद सीमित भंडार वाले जिलों में चारे के वितरण और संरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी।राज्य सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम जरूरत वाले क्षेत्रों की पहचान करके समय रहते सहायता उपलब्ध कराना होगा।

मौसम में सुधार राहत दे सकता है, लेकिन टिकाऊ समाधान के लिए बेहतर कृषि प्रबंधन, सुरक्षित चारा भंडारण और जल संरक्षण पर काम करना जरूरी है।

महाराष्ट्र में सूखे के कारण पैदा हुआ चारे का संकट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बनता जा रहा है।फसल उत्पादन में कमी ने किसानों की आय को प्रभावित किया है। साथ ही पशुओं के लिए आवश्यक हरे और सूखे चारे की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ाया है।बीड और जालना जैसे जिलों में सितंबर के अंत तक सीमित दिनों का भंडार उपलब्ध होने के आंकड़े स्थिति की गंभीरता समझाते हैं।नांदेड़, लातूर और पुणे जैसे जिलों में चारे की बाहरी आवाजाही पर लगाए गए प्रतिबंध भी प्रशासन की चिंता को दिखाते हैं।अच्छी बात यह है कि सरकार ने चारा बैंक, बीज वितरण और संरक्षण अभियान जैसे कदमों पर काम शुरू किया है।लेकिन इन उपायों का लाभ किसानों तक समय पर पहुंचना बेहद जरूरी है।पशुपालन महाराष्ट्र के लाखों ग्रामीण परिवारों के जीवन से जुड़ा हुआ है। गाय और भैंस केवल दूध उत्पादन का साधन नहीं हैं, बल्कि कई परिवारों की नियमित आय और आर्थिक सुरक्षा का आधार भी हैं।

इसलिए चारे का संकट केवल एक कृषि समस्या नहीं माना जा सकता।आने वाले महीनों में सरकार, प्रशासन, किसान संगठनों और पशुपालन विभाग के बीच बेहतर तालमेल ही इस चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत यही है कि जिन क्षेत्रों में चारा तेजी से कम हो रहा है, वहां सहायता भंडार समाप्त होने से पहले पहुंचाई जाए। समय रहते उठाए गए कदम ही किसानों को अपने पशुओं और आजीविका को सुरक्षित रखने में मदद कर सकते हैं।

 

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