उन्नत कृषि महोत्सव 2026 के दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने तकनीक और ज्ञान के बीच भावनाओं की गहरी छाप छोड़ दी। यहां आयोजित एक प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक ने हजारों किसानों, वैज्ञानिकों और आगंतुकों के दिलों को छू लिया। इस नाटक के जरिए गूंजा एक सरल लेकिन सशक्त संदेश— “पराली न जला भाई, बात मान ले।”
यह प्रस्तुति Punjab Agricultural University के छात्रों द्वारा दी गई, जिन्होंने अपनी कला और अभिव्यक्ति के माध्यम से एक गंभीर कृषि समस्या—पराली जलाने—को जनआंदोलन का रूप देने का प्रयास किया।
जब कला बनी जागरूकता का माध्यम
नुक्कड़ नाटक के जरिए छात्रों ने खेतों की वास्तविक स्थिति को मंच पर जीवंत कर दिया। उन्होंने दिखाया कि किस तरह फसल अवशेष (पराली) जलाने से मिट्टी की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, सूक्ष्म जीव नष्ट होते हैं और पर्यावरण को भारी नुकसान होता है।
सिर्फ यही नहीं, इस प्रक्रिया से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ाता है, जो न केवल किसानों बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाता है। इस संदेश को छात्रों ने संवाद, गीत और भावनात्मक अभिनय के जरिए इतनी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया कि दर्शक खुद को उससे जोड़ने लगे।
किसानों से सीधा संवाद
इस नाटक की खासियत यह रही कि यह केवल एक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि किसानों के साथ सीधा संवाद बन गया। खेतों की समस्याओं को उन्हीं की भाषा और शैली में समझाया गया, जिससे संदेश अधिक प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचा।
किसानों, छात्रों और वैज्ञानिकों ने इस प्रस्तुति को ध्यान से देखा और सराहा। कई किसानों ने माना कि इस तरह के कार्यक्रम तकनीकी जानकारी से ज्यादा असरदार होते हैं, क्योंकि वे सीधे दिल को छूते हैं और सोच बदलने की प्रेरणा देते हैं।
पीढ़ियों के बीच एक भावनात्मक अपील
यह नुक्कड़ नाटक केवल एक जागरूकता अभियान नहीं था, बल्कि एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी से की गई अपील भी था। युवाओं ने किसानों से आग्रह किया कि वे परंपरागत तरीकों के बजाय आधुनिक और टिकाऊ विकल्प अपनाएं, ताकि मिट्टी की सेहत और पर्यावरण दोनों को बचाया जा सके।
इस संदेश में यह स्पष्ट था कि अगर आज पराली जलाने की समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
विज्ञान और संस्कृति का संगम
रायसेन में आयोजित इस महोत्सव में जहां एक ओर आधुनिक कृषि तकनीकों, मशीनों और वैज्ञानिक शोध की चर्चा हो रही थी, वहीं दूसरी ओर इस नुक्कड़ नाटक ने यह साबित कर दिया कि जागरूकता फैलाने के लिए संस्कृति और कला भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
यह आयोजन इस बात का उदाहरण बना कि जब विज्ञान और संस्कृति एक साथ आते हैं, तो बदलाव की प्रक्रिया और भी प्रभावी हो जाती है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में संदेश
पराली न जलाने का संदेश केवल एक कृषि मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है। हर वह खेत, जहां पराली को जलाने के बजाय उसका सही प्रबंधन किया जाता है, वह स्वच्छ हवा, स्वस्थ मिट्टी और टिकाऊ खेती की दिशा में एक कदम होता है।
बदलाव की ओर बढ़ता कदम
उन्नत कृषि महोत्सव में प्रस्तुत यह नुक्कड़ नाटक इस बात का प्रमाण है कि जागरूकता केवल आंकड़ों और भाषणों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और संवाद से भी पैदा की जा सकती है।

