नई दिल्ली: इस साल मानसून को लेकर चिंताजनक संकेत सामने आ रहे हैं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही सामान्य से कम, करीब 92 प्रतिशत बारिश का अनुमान जताया है, लेकिन अब वैश्विक स्तर पर मौसम वैज्ञानिकों ने खतरे को और बड़ा बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य अलनीनो की जगह ‘सुपर अलनीनो’ विकसित हो सकता है, जो मौसम के पैटर्न को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
मौजूदा अनुमानों के मुताबिक, इस वर्ष अलनीनो बनने की संभावना 62 प्रतिशत है, जबकि ‘सुपर अलनीनो’ बनने का जोखिम भी करीब 25 प्रतिशत तक पहुंच गया है। अगर यह स्थिति बनती है, तो इसके असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरी दुनिया में मौसम का असंतुलन देखने को मिल सकता है। कहीं भीषण गर्मी और सूखा तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियां बन सकती हैं।
प्रशांत महासागर में होने वाले तापमान बदलावों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि हालात तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. पॉल राउंडी के अनुसार, पिछले 140 वर्षों में सबसे शक्तिशाली अलनीनो घटनाओं में से एक विकसित होने की आशंका वास्तविक है। यह संकेत वैश्विक जलवायु के लिए गंभीर माने जा रहे हैं।
वहीं, विश्व मौसम संगठन (WMO) की सेक्रेटरी जनरल सेलेस्ते साउलो ने भी हाल ही में चेतावनी दी थी कि 2023-24 का अलनीनो पहले ही रिकॉर्ड तापमान बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा चुका है। ऐसे में अगर इस साल और अधिक शक्तिशाली अलनीनो बनता है, तो तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की पूरी संभावना है।
अमेरिका के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र (Climate Prediction Center) के 6 अप्रैल को जारी ताजा आकलन के मुताबिक, फिलहाल वैश्विक मौसम प्रणाली ला नीना से तटस्थ स्थिति की ओर बढ़ रही है। हालांकि, कंप्यूटर मॉडलों के संकेत बताते हैं कि गर्मियों के दौरान अलनीनो विकसित हो सकता है और साल के अंत तक बना रह सकता है।
भारत के संदर्भ में देखें तो अलनीनो का सीधा असर मानसून पर पड़ता है। आमतौर पर अलनीनो के वर्षों में मानसून कमजोर रहता है, जिससे खेती, जल संसाधन और बिजली उत्पादन पर असर पड़ता है। यदि ‘सुपर अलनीनो’ की स्थिति बनती है, तो इसका असर और अधिक गंभीर हो सकता है—लंबे समय तक गर्मी, बारिश की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में स्थिति पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी होगा। सरकारों और संबंधित एजेंसियों को पहले से तैयारी करनी होगी, ताकि संभावित जल संकट, फसल नुकसान और चरम मौसम की चुनौतियों से निपटा जा सके।

