Grain Ethanol Manufacturers Association (GEMA) ने एथेनॉल उत्पादन को लेकर फैल रही गलतफहमियों पर कड़ा जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि “एक लीटर एथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर पानी लगता है” वाला दावा पूरी तरह भ्रामक और संदर्भ से हटकर है। संगठन के अनुसार, यह आंकड़ा एथेनॉल के पूरे लाइफसाइकल वॉटर फुटप्रिंट को दर्शाता है, जिसमें फसल उगाने के दौरान होने वाली बारिश भी शामिल होती है, न कि वास्तविक औद्योगिक जल खपत।
GEMA ने बताया कि भारत में आधुनिक एथेनॉल संयंत्र अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हैं और इनमें प्रति लीटर एथेनॉल उत्पादन के लिए केवल 3 से 5 लीटर तक ही प्रोसेस वाटर की जरूरत होती है। इसके अलावा, उद्योग लगातार जल दक्षता बढ़ाने के लिए नई तकनीकों को अपना रहा है।
संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल (फीडस्टॉक) में भी बदलाव हो रहा है। मक्का (मेज) अब प्रमुख विकल्प के रूप में उभर रहा है, जो भारत में बड़े पैमाने पर वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। इससे भूजल पर दबाव कम होता है और यह अधिक टिकाऊ विकल्प साबित हो रहा है। एथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2023-24 में अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादन ने गन्ना आधारित उत्पादन को पीछे छोड़ दिया, जो इस बदलाव का संकेत है।
GEMA के अनुसार, एथेनॉल को लेकर बहस को केवल जल संकट के नजरिए से देखना अधूरा और गलत है। संगठन का कहना है कि यह बहस देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरणीय लाभ जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर देती है।
संगठन ने सरकार द्वारा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले टूटे चावल और अधिशेष अनाज के महत्व को भी रेखांकित किया। ऐसे अनाज को खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में वापस नहीं लाया जा सकता। GEMA के मुताबिक, “इस अनाज को उगाने में जो पानी पहले ही खर्च हो चुका है, उसे एथेनॉल में बदलना ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का उदाहरण है और इससे अतिरिक्त जल भार नहीं बढ़ता।”
भारत की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश अपनी लगभग 88-89 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के जरिए अब तक 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है, करीब 869 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन में कमी आई है और 289 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का विकल्प तैयार हुआ है। साथ ही, इससे किसानों को 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान भी किया गया है।
GEMA के अध्यक्ष Dr. C.K. Jain ने कहा, “एथेनॉल को पानी की अत्यधिक खपत करने वाला बताना पूरी तरह गलत है। 10,000 लीटर का आंकड़ा गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिसमें बारिश का पानी भी शामिल है। आधुनिक एथेनॉल संयंत्र बेहद दक्ष हैं और लगातार अपनी जल उपयोग क्षमता में सुधार कर रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि एथेनॉल को जल संकट का कारण बताना एक “एट्रिब्यूशन एरर” है, क्योंकि यह समस्या दशकों से चली आ रही कृषि संरचना से जुड़ी है, न कि हाल के औद्योगिक विकास से। उन्होंने चेतावनी दी कि गलत जानकारी देश के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा कार्यक्रम को नुकसान पहुंचा सकती है।
GEMA ने यह भी बताया कि भारत की नीति अब E20 से आगे बढ़ते हुए E85 और E100 जैसे उच्च मिश्रण ईंधनों की दिशा में विकसित हो रही है। इस बदलाव में मक्का और कृषि अवशेषों की भूमिका और बढ़ेगी, जिससे एथेनॉल उत्पादन और अधिक पर्यावरण अनुकूल बनेगा।
अंत में संगठन ने कहा कि भारत की जल चुनौतियों के समाधान के लिए तथ्य आधारित और संतुलित चर्चा जरूरी है। गलत आंकड़ों और भ्रम फैलाने से न केवल समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में चल रहे महत्वपूर्ण प्रयास भी प्रभावित हो सकते हैं।

