मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने Iran के सामने एक 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव रखकर वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस प्रस्ताव में एक महीने के युद्धविराम से लेकर तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी सीमाएं लगाने तक की शर्तें शामिल हैं। हालांकि विशेषज्ञ इसे शांति पहल कम और कूटनीतिक दबाव ज्यादा मान रहे हैं।
प्रस्ताव के मुताबिक, Tehran को अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना होगा और इसे United Nations की निगरानी में चलाना होगा। साथ ही, अमेरिका चाहता है कि परमाणु ईंधन उत्पादन की सुविधा ईरान के बाहर स्थापित की जाए। यह शर्त ईरान की संप्रभुता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकती है।
ट्रंप प्रशासन ने ईरान से यह भी मांग की है कि वह Hamas और Hezbollah जैसे प्रॉक्सी समूहों को समर्थन देना पूरी तरह बंद करे। इसके अलावा, ईरान की मिसाइल क्षमताओं और सैन्य ढांचे को खत्म करने की बात भी इस प्रस्ताव में शामिल है, जो तेहरान के लिए स्वीकार करना बेहद कठिन माना जा रहा है।
सबसे अहम शर्तों में से एक Strait of Hormuz को दोबारा खोलना है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। अमेरिका का कहना है कि इस जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
इसके बदले में अमेरिका ने ईरान को कुछ राहत देने की पेशकश भी की है। इसमें आंशिक आर्थिक प्रतिबंध हटाना, नागरिक परमाणु कार्यक्रम को अनुमति देना और आर्थिक सहयोग के जरिए ईरानी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का वादा शामिल है।
The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव Pakistan के माध्यम से ईरान तक पहुंचाया गया है। Shehbaz Sharif ने भी बातचीत की सुविधा देने की बात कही है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर शरीफ की पोस्ट साझा कर इस पहल का समर्थन किया।
संभावित वार्ता अगले सप्ताह शुरू हो सकती है, जिसमें अमेरिका की ओर से Steve Witkoff और Jared Kushner शामिल हो सकते हैं। यह वार्ता इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान इस प्रस्ताव को किस हद तक स्वीकार करता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों का मानना है कि प्रस्ताव में रखी गई शर्तें इतनी व्यापक और सख्त हैं कि ईरान के लिए इन्हें मौजूदा स्वरूप में स्वीकार करना बेहद मुश्किल होगा। खासकर सैन्य और परमाणु ढांचे से जुड़ी शर्तें तेहरान के लिए “रेड लाइन” मानी जाती हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह प्रस्ताव वास्तव में शांति की दिशा में कदम है या फिर ईरान पर दबाव बढ़ाने की एक रणनीति। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह पहल मध्य पूर्व में स्थिरता लाती है या तनाव को और बढ़ा देती है।

